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शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

काव्य के नए मानक गढ़ने दो

क्यूँ बंदिशों में बांधते हो
क्यूँ बन्धनों में जकड़ते हो
भरने दो इन्हें भी उड़ान
नापने दो इन्हें भी दूरियां
छूने दो इन्हें भी आसमान
कर सकते हो तो इतना करो
हौसले इनके बढ़ाते चलो
मार्ग प्रशस्त करते चलो
 

क्यूँ लिंगभेद के उहापोह में
दिग्भ्रमित करते हो
रचना तो सबकी होती है
जनक चाहे कोई भी हो
क्यूँ स्त्री पुरुष के भेद को
ना पाट पाते हो
क्यूँ सृजनात्मकता पर
अंकुश लगाते हो
 

काव्य ---स्त्री या पुरुष
की थाती नहीं
सिर्फ कोमल भावों का
ही तो सृजन होता है
फिर पुरुष हो या स्त्री
भावों पर तो किसी का
जोर नहीं
तब तुम क्यूँ 

बाँध बनाते हो
उड़ने दो 

उन्मुक्त हवाओं को
बहने दो समय की
धारा के साथ
एक दिन ये भी
नया आकाश 

बना देंगी
इन्हें भी रूढ़ियों
को बदलने दो
काव्य के नए 
मानक गढ़ने दो


दोस्तों
ये रचना कल की पोस्ट की ही उपज है क्यूँकि कुछ लोग सोचते हैं कि स्त्री को स्त्री के भावों पर ही लिखना चाहिये और पुरुष को पुरुष् के भावों पर मगर मेरे ख्याल से तो भावों को बांधा नही जा सकता इसलिए फिर चाहे स्त्री हो या पुरुष वो जो भी मह्सूस करे उसे लिखने देना चाहिये …………हो सकता है काव्य की दृष्टि से ये बात सही हो मगर मुझे इसका ज्ञान नही है और जरूरत भी नही है क्यूँकि भाव तो किसी भी बंधन को स्वीकार नही करते………बस कल यूँ ही ये भाव बन गये तो आपके समक्ष प्रस्तुत कर दिये।

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

वरना आफताब पा गया होता..........

घर की देहरी 
पार कर भी ले 
मन की देहरी
ना लाँघ पाया कभी 
तेरे मन की दहलीज
पर अपने मन की
बन्दनवार सजाई
मगर फिर भी
सूक्ष्म, अनवरत 
बहते विचारों को 
मथ ना पाया कभी
ना जाने कौन सा 
सतत प्रवाह 
रोकता रहा  
बढ़ने से 
कौन सा बाँध 
बना था 
तेरे मन की 
देहरी पर खिंची 
लक्ष्मण रेखा पर 
जिसे आज तक 
ना तू लाँघ पाया
ना मुझे ही आने 
की इजाजत दी
मन की खोह 
में छिपी कौन सी 
प्रस्तर प्रतिमा 
रोकती है तुझे
जिसके अभिशाप 
से कभी मुक्त 
ना हो पाया
ना वर्तमान को
अपना पाया
ना भविष्य 
को सजा पाया
सिर्फ भूत के
बिखरे टुकड़ों 
में खुद को
मिटाता रहा 
एक छोटी- सी 
रेखा ना लाँघ 
पाया कभी
वरना आफताब सी
 प्रेम की तपिश
पा गया होता
माहताब तेरा 
बन गया होता
जीवन तेरा
सँवर गया होता 

सोमवार, 12 जुलाई 2010

यही तो अमर प्रेम है ………………है ना

दोस्तों , 

आज की पोस्ट में हम सबकी साथी कुसुम ठाकुर जी को समर्पित कर रही हूँ क्यूंकि आज उनका जन्मदिन है और कल उनकी शादी की सालगिरह ..........इसमें उनके भावों को शब्दों में पिरोने की कोशिश कर रही हूँ और उनकी उस महान भावना के आगे नतमस्तक हूँ ..........शायद यही तो अमर प्रेम होता है ............ये सिर्फ एक कोशिश है मगर शायद अभी भी काफी कुछ अधूरा रह गया हो तो उसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ क्यूंकि जितना उनको समझा है और जाना है उसी आधार पर ये लिखने का प्रयत्न कर रही हूँ .........

तुम्हें याद है
कल हमारे
वैवाहिक बँधन
में वक़्त एक
और यादों की
लकीर छोड़ रहा है
कल का दिन
तुम्हारे और मेरे
जीवन का अनमोल दिन
हमारा बँधन
शरीरों  का तो
रहा ही नहीं
आत्मिक बँधन
कब किसी
बँधन को
स्वीकारते हैं
आज तुम
मेरे पास नहीं
वहाँ जा चुके हो
जहाँ से कोई आता नहीं
सब यही कहते हैं
क्या  हमारा
बँधन शरीरों
का था
नहीं ना
क्या तुम
मेरे पास नही
मुझे तो तुम
कभी
दूर दिखे ही नहीं
हर पल
मेरे साथ ही
तो होते हो
मेरी साँसों
में बसते हो
मेरे दिल में
धड़कन बन
धड़कते हो
मेरे रोम- रोम में
तुम्हारा ही तो
अक्स झलकता है
देखो मैं
आज भी वैसे ही
वर्षगाँठ मानती हूँ
क्यूँकि तुम
मेरे साथ हो
मेरे पास हो
मैं तो आज भी
तुम्हारे लिए ही
सँवरती हूँ
जैसा तुम चाहते थे
मुझे हमेशा
इन्द्रधनुषी
रंगों सा
खिला - खिला देखना
और मैं तुम्हारे
रंगों में रंगी
आज भी प्रीत की
रंगोली सजाती हूँ
आत्मिक बँधन को
वो क्या जाने
जो कभी
शरीर से ऊपर
उठे ही नहीं
देखो अब
मुझे कल का
इंतज़ार है
जैसे हमेशा
होता था
जब तुम और मैं
एक साथ
मोहब्बत की
रस्म निभाएंगे
शायद तुम्हें भी
उसी लम्हे का
इंतज़ार होगा
है ना................

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

मैं कुछ पल का ब्लॉगर हूँ

मैं कुछ पल का ब्लॉगर हूँ
कुछ पल की मेरी पोस्टें हैं 
कुछ पल की मेरी हस्ती है
कुछ पल की मेरी ब्लॉगिंग है 
मैं कुछ पल ...........................

मुझसे पहले कितने ब्लॉगर
आये और आकर चले गए ,चले गए 
कुछ झंडे गाड़कर चले गए 
कुछ ठोकर खाकर चले गए,चले गए
वो उस पल की ब्लॉगिंग का हिस्सा थे 
मैं इस पल की ब्लॉगिंग का हिस्सा हूँ
कल तुमसे जुदा हो जाऊँगा 
जो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ
मैं कुछ  पल  .........................................

कल और आयेंगे ब्लॉगिंग की
नयी ऊँचाइयाँ छूने वाले 
हमसे बेहतर कहने वाले
तुमसे बेहतर पढने वाले
कल कोई किसी को याद करे
क्यूँ कोई किसी को याद करे 
मसरूफ ज़माना ब्लॉगिंग के लिए
क्यूँ वक़्त अपना बरबाद करे 
मैं कुछ पल ........................

बुधवार, 30 जून 2010

कभी तो जगेगा ही...............

तपते चेहरे 
कुंठित मन
ह्रदय में पलता 
आक्रोश का
ज्वालामुखी 
लिए हर शख्स 

 कभी 
सत्ता के 
गलियारों  में
भटकता
गिडगिडाता
कसमसाता
राजनीतिक 
समीकरणों से
बेहाल 
आक्रोशित 
नाराज मानस 
के मन का
उबाल 

 कभी 
समाज के 
विद्रूप चेहरे से
खुद को 
उपेक्षित
महसूसता
मानव
रीतियों, रिवाजों
की भेंट चढ़ता
जीवन का इक अंग

मानव के 
अंतस में
सिर्फ ज़हर का
दावानल ही 
सुलगाता है
कब तक 
इन्सान खुद से
सत्ता से
समाज से लड़े
कब तक
आश्वासन के
अवलंबन का
बोझ ढोए
कभी तो 
उफनेगा ही
लावा कभी तो
फूटेगा ही
बगावत का 
बिगुल बजेगा ही
फिर ये 
अँधा ,बहरा
और गूंगा 
समाज
कभी तो 
जगेगा ही
कभी तो .................

सोमवार, 21 जून 2010

दीया और लौ

दीया 
आस का 
विश्वास का
प्रेरणा का
प्रतीक बन
आशाओं का संचार करता 

मगर
टिमटिमाती लौ 
वक्त की आँधियों से थरथराती
टूटे विश्वास की
बिना किसी आस की
गहन वेदना को समेटे हुए
कंपकंपाते पलों को ओढ़कर
अपने आगोश में
सिमटने को आतुर
धूमिल होती
आशाओं का प्रतीक बन
जीवन के अंतिम कगार पर
बिना किसी विद्रोह के
समर्पण कर देती है
अपने हर 
रंग का, हर रूप का 
और बता जाती है
ज़िन्दगी का सबब

त्याग , बलिदान
आशा और उजाले
का प्रतीक बन
जीना सीखा जाती है

मंगलवार, 15 जून 2010

मैं लौट कर नहीं आऊंगा

कल
एक लम्हा 
टूटा
गिरने लगा 
मैंने लपका
पकड़ा हाथ में 
कहा
रुक तो ज़रा 
कहाँ जा रहा है?
वो बोला 
रुक नहीं सकता
मुझे तो 
मिटना है
तुम जी लो 
जितना जी
सकते हो 
भर लो
अंक में
हर क्षण को
जितना भर
सकते हो
संजो लो
हर ख्वाब को
जितना संजो 
सकते हो
मुझे तो अब 
गुजरना होगा
आने के बाद 
जाने के नियम
को निभाना होगा
बस तुम भी
ऐसे ही 
अपना नियम
निभाते रहो 
हर लम्हे को
जुदा होने 
से पहले
यादों के दामन
में समेट 
लिया करो
और कुछ पल 
जी लिया करो
इस अथाह 
सागर में
डूब लिया करो
मैं लौट कर 
नहीं आऊंगा 
इस सत्य को
मान लिया करो


 

शुक्रवार, 11 जून 2010

राष्ट्रमंडल खेलों का असर ?

राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन पहली बार वर्ष 1930 में हेमिल्‍टन शहर,  ओंटेरियो( कनाडा) में आयोजित किया गया था. तब इस खेल आयोजन का नाम ब्रिटिश एम्पायर गेम्स था. इसके खेल आयोजन का मूल विचार एक भारतीय का था जिनका नाम एशली कूपर था. उन्होंने इस खेल आयोजन को आपसी शांति और सौहार्द्र के लिए सही मानते हुए इसका प्रस्ताव तात्कालिक राजनेताओं को दिया था. 1930 में पहली बार  इस खेल आयोजन का शुभारंभ हुआ जिसमें मात्र 11 देशों के 400 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था. वर्ष 1978 में इसे सर्वसम्मति से कॉमनवेल्थ गेम्स नाम दिया गया.

खेल का उद्देश्य नेक था जिस कारण इसकी प्रसिद्धि  बढती गयी मगर हर देश के लिए तो ये सही नहीं है कम से कम उन देशों के लिए तो नहीं जो अभी विकास की ओर अग्रसर हैं , ऐसे देशों के लिए इन खेलों का आयोजन करना इतना आसान काम नहीं है .यही हाल हमारे देश का भी हो रहा है . 


राष्ट्रमंडल  खेल -----------जब से ये नाम हमारे देश में आया है यूँ लगता है जैसे कोई अजूबा आ गया हो जिसके आने से देश की क्या हर इंसान की किस्मत बदल  जाएगी ............जैसे कोई जादू की छड़ी हो जो घुमाई और बस फिर सब हाजिर हो जायेगा............देश से गरीबी मिट जाएगी ,इंसान बदल जायेगे ,सब खुशहाल हो जायेगे ..........................क्या ऐसा होगा?ये सोच कितनी कुंठाग्रस्त है . जबकि ऐसा कुछ नहीं होने वाला . जब से राष्ट्रमंडल खेलों का नाम आया है देश के हालत बद  से बदतर होते जा रहे हैं .........गरीब और गरीब होता जा रहा है और बेचारे अमीर पर भी इसकी तपिश पहुँचने लगी है और मध्यवर्गीय इंसान कैसे जी रहा है ये सिर्फ वो ही जानता है ...............सरकार सिर्फ अपनी सोच रही है कि एक बार ये खेल कराने  से सारी दुनिया में भारत का नाम रोशन हो जायेगा और इससे काफी पैसा देश में बरसेगा मगर ऐसा कुछ नहीं होगा सब जानते हैं भारत को और उसकी गरीबी को ...........हाँ ,शायद हो जाये तब जबकि गरीब रहे ही ना और ऐसा ही तो होना है तभी तो सारी शक्ति सरकार ने इन खेलों के प्रति लगा दी है फिर चाहे गरीब  जिए या मरे तभी तो देश में महंगाई  सुरसा के मुख की तरह बढती जा रही है और सरकार का इस तरफ ध्यान ही नहीं है और हो भी क्यूँ ? जो सरकार चाहती है वो हो रहा है तो उसके बाद देश का या उसकी जनता का जो चाहे सो हो जाये क्या फर्क पड़ता है .

महंगाई  बढ़ने के कारण किसी के घर में दो वक्त का चूल्हा जले या नहीं मगर खेलों का काम नहीं रुकना चाहिए ,कोई बच्चा स्कूल जा पाए या नहीं मगर खेल समय पर होने चाहिए . जब देश के करतार ही ऐसे होंगे तो फिर उसके बाशिंदों का तो अल्लाह ही मालिक है . क्या ये खेल इतने जरूरी थे इस वक़्त जब देश पहले ही आर्थिक रूप से इतना उन्नत नहीं था? दूसरी और सबसे जरूरी बात  क्या इतना पैसा जो खेलों में लगाया गया है यदि वो ही पैसा देश की उन्नति के लिए प्रयोग किया जाता तो क्या तब देश खुशहाल नहीं होता या जनता सुखी नहीं होती ..............बेरोजगारों को रोजगार दिया होता तो अपने आप देश तरक्की की सीढियां चढ़ता चला जाता और कहीं भी ये साबित करने की जरूरत नहीं होती अपने आप साबित हो जाता ............हीरा अपनी चमक अपने आप बिखेरता है उसे अपने को साबित नहीं करना पड़ता .अरबों रूपया लगाया जा रहा है क्या यही पैसा अगर अपने देश के गरीब और बेरोजगारों के लिए प्रयोग किया जाता तो क्या  तब देश खुशहाल नहीं  होता?विदेशियों की आवभगत में करोड़ों रुपया बर्बाद होगा मगर क्या फर्क पड़ता है ,इससे नाम तो होगा ना .बस इतना ही काफी है बाकी जनता का जो चाहे हो .  ये देश के कर्णधार देश को ना जाने किस दिशा में ले जा रहे हैं शायद सिर्फ अपना ही नाम रोशन करना चाहते हैं इसलिए हर हालत में खेल करवाने हैं ताकि आने वाली पीढियां उनका गुणगान कर सकें मगर इन खेलों की नींव में ना जानेकितने  लोगों के अरमानों की लाशें  दबी हैं ये कोई ना जान पायेगा .............किसान आत्महत्या कर रहा है तो करे मगर खेल होने जरूरी हैं क्यूंकि इनके कराये बिना ये सेहरा इनके सिर नहीं बंध सकेगा फिर चाहे उसमें गरीब और निरीह जनता का खून ही क्यूँ ना लिपटा हो.
करोड़ों रुपया बड़े -बड़े अभिनेताओं को आमंत्रित करने के लिए दिया जायेगा और विज्ञापनों पर खर्च  किया जाएगा  और फिर जब ये खेल हो जायेंगे तब एक गंदगी का ढेर मिलेगा उसकी साफ़ सफाई पर फिर रुपया बहाया जायेगा ..............क्या ये पैसा जनता का नहीं  है जिसे इस तरह बर्बाद किया जाएगा ?जनता का पैसा जनता से ही लूट कर अपनी वाहवाही कराने  का इससे अच्छा और क्या उपाय हो सकता है.
 इन खेलों के विद्रोह में कोई भी नेता या कोई भी पार्टी आगे नहीं आई क्यूंकि कोई भी अपने सिर नाकामी का सेहरा नहीं बांधना चाहता . सब बड़े हमदर्द बनते हैं जनता के मगर सभी एक ही थाली के बैगन हैं .यदि इसके अलावा और कोई बात होती चाहे कितनी ही छोटी होती उसे बड़ा मुद्दा बना दिया जाता जैसे एक मूवी को बड़ा बना दिया जाता है और उसे प्रदर्शित होने से रोक दिया जाता है मगर अब कोई नहीं बोलेगा .............टैक्स के बोझ से आम इन्सान मरता  जा रहा है मगर किसी भी दल  के कान पर जून तक नहीं रेंगी ........कौन ओखली में सिर दे ? आज एक मजदूर जिसके घर में  एक वक़्त का चूल्हा नहीं जल पाता कहाँ से रोटी का जुगाड़ करे और कैसे ? इसकी किसी को फिक्र नहीं है सबको अपनी ही पड़ी है ............ऐसे में खेल कितने जरूरी हैं  इस ओर किसी का ध्यान क्यूँ जायेगा .
अब तो ये खेल जनता के गले की फांस बन  ही चुके हैं और अब  इन्हें झेलना ही होगा जनता को और कामयाबी का सेहरा सरकार अपने माथे पर लगा ही लेगी फिर उसके बाद जनता का जो चाहे हो ..................मगर प्रश्न फिर भी अपनी जगह कायम रहेगा कि जब एक देश खेल कराने में सक्षम ना हो तो क्या ऐसे माहोल में खेल कराने जरूरी हैं? क्या निरीह , असहाय जनता के खून का पाप अपने सर लेना जरूरी है? कब यहाँ के कर्णधार देश और उसकी जनता के विषय में सोचेंगे ?ये कुछ अनुत्तरित प्रश्न हर युग में कायम रहेगे और आने वाली पीढ़ी इनके जवाब मांगेगी .

रविवार, 6 जून 2010

वो जो कभी दोस्त बनकर आया था.............

वो जो कभी
दोस्त बन कर 
आया था
दोस्ती का 
हर फ़र्ज़ 
निभाया था
दोस्ती की कसमें
खाता था
दोस्ती पर जान
लुटाता था
कब पथप्रदर्शक
बन गया 
कब आलोचक 
बन गया
कब दोस्ती 
को एक नाम 
देने का 
सोचने लगा 
सिर्फ अपने 
ख्यालों में ही 
किसी को पता
ही ना चला
मगर बिना कुछ 
कहे, दोस्ती
निभाता रहा
अपने जज्बातों को
अन्दर ही अन्दर
दबाता रहा
किसी पर ना
जाहिर करता रहा
पल- पल दोस्ती 
को पूजता रहा
हँसता रहा ,मुस्कुराता रहा
अपनी ज़िन्दगी का
हर फ़र्ज़ निभाता रहा
दोस्ती को प्यार नहीं
पूजना चाहता था
सिर्फ इतना ही तो
अधिकार चाहता था
मगर दोस्त ने तो
वो भी ना दिया
सिर्फ दोस्ती का 
ही वचन लिया
फिर एक दिन 
चला गया वो
नक्सली इलाके में
किस्मत ने तबादला
करा दिया
उसे कहाँ से कहाँ
पहुंचा दिया
हर पल मौत के
साये में जीने लगा वो
उधर उसका दोस्त 
भी तड़पने लगा
दोस्त के लिए
दुआएँ करने लगा
वापस मिलने के लिए
पैगाम देने लगा
जब कोई हादसा 
सुनता तो 
सहम- सहम जाता
सिर्फ` अपने दोस्त
का ही उसे तो 
ख्याल आता
कभी उससे मिला 
भी ना था
सिर्फ पत्राचार का
सिलसिला चला ही था 
उसको  देखा भी 
तो ना था
मगर दोस्ती का 
जज्बा भी 
कम ना था
मगर एक दिन
उसका दिल टूट गया
दोस्ती पर से 
विश्वास उठ गया
दोस्ती का हर 
भरम टूट गया
जब देखा उसने
एक ख़त आया था
गलती से पता
उसका लिखा था
मगर ख़त 
किसी और के नाम था
और ख़त का 
मजमून वैसा ही था
जैसा उसे लिखा
करता था
और अब उसने 
दोस्त बनाना
छोड़ दिया था

बुधवार, 2 जून 2010

ये कैसा प्रेम का पंछी है....................

वो रोज मुझे 
ये कहता है 
प्रेम वो मुझसे
करता है
मैं रोज उसे
ये कहती हूँ 
प्रेम तो बस 
इक धोखा है
वो रोज मुझे
समझाता है
प्रेम के पाठ 
पढ़ाता है
मैं रोज उसे
बतलाती हूँ
ये प्रेम हवा का
झोंका है
जो आकर 
गुजर जाता है
कभी ठहर कहीं 
नहीं पाता है
ये प्रेम- प्यार 
कुछ नही होता है
सिर्फ नज़रों का 
ही धोखा  है
वो प्रेम को 
पूजा कहता है
और प्रेम की
अतल गहराइयों में
ही डूबा रहता है
बस प्रेम- प्रेम 
पुकारा करता है
बावरा -सा जग में
घूमा करता है
मैं रोज उसे 
समझाती हूँ
प्रेम सिर्फ कोरा 
शब्द है यहाँ
कौन वहाँ तक
पहुंचा है
किसने प्रेम को
जाना है
महज शरीरों का
ये धोखा है
उसने इक ही 
रटना लगायी है
प्रेम ही उसकी
आशनाई है
सिर्फ एक ही शब्द
तो सीखा है
प्रेम के अलावा
तो कुछ ना जाना है
अब कैसे उसे 
समझाऊँ मैं 
ये प्रेम डगरिया
बड़ी टेढ़ी है
पथरीले कंटक पथों
पर चलकर भी
प्रेमी कब मिल पाते हैं
विरह अगन में
ही जलते रहते हैं
और प्रेम- प्रेम ही
रटते  रहते हैं
दूसरा शब्द तो 
जाना ही नहीं
किसी और को तो 
पहचाना ही नहीं 
प्रेमी भ्रमर तू 
मान भी जा अब
जान जाएगी 
जान जा अब
मगर भ्रमर 
कब सुनता है
अपनी धुन में
ही रहता है
प्रेम अगन में
जलता है
और पिहू -पिहू 
कहता है
प्रेम की माला
जपता है
मेरी कुछ ना
सुनता है
वो अपनी धुन 
में गाता है
बस प्रेम- प्रेम 
दोहराता है
ये कैसा प्रेम 
का पंछी है
ये कैसा प्रेम
का पंछी है..............

शनिवार, 29 मई 2010

धागा हूँ मैं

धागा हूँ मैं
मुझे माला बना
प्रीत के मनके पिरो
नेह की गाँठें लगा
खुद को सुमरनी
का मोती बना
मेरे किनारों को
स्वयं से मिला
कुछ इस तरह
धागे को माला बना
अस्तित्व धागे का
माला बने
माला की सम्पूर्णता
में सजे
जहाँ धागा माला में
विलीन हो जाये
अस्तित्व दोनों के
एकाकार हो जायें

मंगलवार, 18 मई 2010

खुद से निगाह मिला ना पाया

सुनो
उदासी का
लहराता साया
क्या तूने नहीं देखा?
जिसे कभी तू
कँवल कहा करता था
उस रुखसार पर
डला ख़ामोशी का
नकाब
हटाया तो होता
हर तरफ टूटी -बिखरी
निराशा में डूबी
आहें और ख्वाबों
को ही पाया होता
हर पग पर सिर्फ
ज़ख्मो के ही निशाँ
टिमटिमाये होते
हर तरफ तबाही का
मंजर ही पाया होता
और हर तबाही के लिए
खुद को ही कसूरवार
ठहराया होता
शायद इसीलिए
नकाब हटा ना पाया
सत्य के आईने में
खुद से निगाह
मिला ना पाया

सोमवार, 17 मई 2010

महिला ब्लॉगर्स का सन्देश जलजला जी के नाम

कोई मिस्टर जलजला एकाध दिन से स्वयम्भू चुनावाधिकारी बनकर.श्रेष्ठ महिला ब्लोगर के लिए, कुछ महिलाओं के नाम प्रस्तावित कर रहें हैं. (उनके द्वारा दिया गया शब्द, उच्चारित करना भी हमें स्वीकार्य नहीं है) पर ये मिस्टर जलजला एक बरसाती बुलबुला से ज्यादा कुछ नहीं हैं, पर हैं तो  कोई छद्मनाम धारी ब्लोगर ही ,जिन्हें हम बताना चाहते हैं कि हम  इस तरह के किसी चुनाव की सम्भावना से ही इनकार करते हैं.

ब्लॉग जगत में सबने इसलिए कदम रखा था कि न यहाँ किसी की स्वीकृति की जरूरत है और न प्रशंसा की.  सब कुछ बड़े चैन से चल रहा था कि अचानक खतरे की घंटी बजी कि अब इसमें भी दीवारें खड़ी होने वाली हैं. जैसे प्रदेशों को बांटकर दो खण्ड किए जा रहें हैं, हम सबको श्रेष्ट और कमतर की श्रेणी में रखा जाने वाला है. यहाँ तो अनुभूति, संवेदनशीलता और अभिव्यक्ति से अपना घर सजाये हुए हैं . किसी का बहुत अच्छा लेकिन किसी का कम, फिर भी हमारा घर हैं न. अब तीसरा आकर कहे कि नहीं तुम नहीं वो श्रेष्ठ है तो यहाँ पूछा किसने है और निर्णय कौन मांग रहा है? 
हम सब कल भी एक दूसरे  के लिए सम्मान रखते थे और आज भी रखते हैं ..
                            
 अब ये गन्दी चुनाव की राजनीति ने भावों और विचारों पर भी डाका डालने की सोची है. हमसे पूछा भी नहीं और नामांकन भी हो गया. अरे प्रत्याशी के लिए हम तैयार हैं या नहीं, इस चुनाव में हमें भाग लेना भी या नहीं , इससे हम सहमत भी हैं या नहीं बस फरमान जारी हो गया. ब्लॉग अपने सम्प्रेषण का माध्यम है,इसमें कोई प्रतिस्पर्धा कैसी? अरे कहीं तो ऐसा होना चाहिए जहाँ कोई प्रतियोगिता  न हो, जहाँ स्तरीय और सामान्य, बड़े और छोटों  के बीच दीवार खड़ी न करें.  इस लेखन और ब्लॉग को इस चुनावी राजनीति से दूर ही रहने दें तो बेहतर होगा. हम खुश हैं और हमारे जैसे बहुत से लोग अपने लेखन से खुश हैं, सभी तो महादेवी, महाश्वेता देवी, शिवानी और अमृता प्रीतम तो नहीं हो सकतीं . इसलिए सब अपने अपने जगह सम्मान के योग्य हैं. हमें किसी नेता या नेतृत्व की जरूरत नहीं है.
 
इस विषय पर किसी  तरह की चर्चा ही निरर्थक है.फिर भी हम इन मिस्टर जलजला कुमार से जिनका असली नाम पता नहीं क्या है, निवेदन करते हैं  कि हमारा अमूल्य समय नष्ट करने की कोशिश ना करें.आपकी तरह ना हमारा दिमाग खाली है जो,शैतान का घर बने,ना अथाह समय, जिसे हम इन फ़िज़ूल बातों में नष्ट करें...हमलोग रचनात्मक लेखन में संलग्न रहने  के आदी हैं. अब आपकी इस तरह की टिप्पणी जहाँ भी देखी जाएगी..डिलीट कर दी जाएगी.

बुधवार, 12 मई 2010

प्रश्नचिन्ह?

हर शख्स
एक प्रश्नचिन्ह सा 
नज़र आता है
ना जाने 
कितने सवालों
से जूझता 
हल की तलाश
में निकला 
प्रश्नों के 
व्यूह्जाल में
उलझता जाता है
और प्रश्नों के 
जवाब में
प्रश्नों से ही
टकराता है 
और फिर
प्रश्नों के 
मकडजाल में
फँसा खुद
एक दिन 
प्रश्नचिन्ह
बन जाता है

रविवार, 9 मई 2010

मातृ ऋण से कुछ तो खुद को उॠण कर लेना

मत करो
मेरा वंदन 
अभिनन्दन
मत करो
याद तुम
सिर्फ एक दिन 
मत दो 
सम्मान अभी
फर्क नहीं पड़ता 
अभी तो मैं
अपना बोझ 
उठा लूँगी
तुम पर 
जान न्यौछावर
कर दूंगी 
अपनी दुआओं में 
सिर्फ तुम्हारा
ही नाम लूँगी
अभी तो शक्ति
है मुझमें 
अभी तो 
सहने की 
क्षमता है मुझमें
पर उस दिन 
जब मैं
असहाय जो जाऊँ
निर्बल , निरीह 
हो जाऊं
सहारे बिन ना
चल पाऊँ
आँखों की ज्योति
कम हो जाये
शरीर  भी
निर्बल हो जाये
यादें भी 
धूमिल पड़ जायें
एक बात को 
बार -बार 
 मैं दोहराऊँ
उस दिन तुम
झुँझला मत जाना
खाना खाते वक्त
मूँह से निकलती
आवाजों से
तुम शरमा
मत जाना
इन बिखरी 
टूटी  हड्डियों को
तुम कोठरी में
सुखा मत देना 
अपनी बेबस 
पुरातन माँ में
नए ज़माने की
हवा भरने की ना
कोशिश करना
जब तुमसे मिलने 
को आतुर माँ
तरसती हो
तुम्हारे सानिध्य 
को तड़पती हो
दो बोल 
मीठे बोल देना
कड़वाहट का 
ज़हर ना
शब्दों में भरना
वक़्त की कमी
की ना 
दुहाई  देना
एक आखिरी
घडी गिनती
बेबस माँ को
तुम ना बेबस
कर देना
वरना
मौत से पहले
मर जाएगी
तुम्हें स्नेह 
करने वाली
दोबारा फिर 
नहीं आएगी
निश्छल ,निर्मल
स्नेहमयी माँ
फिर ना कभी
मिल पायेगी
मरते -मरते भी
दुआएँ तुम्हें
दे जाएगी
ये सौगात 
फिर ना कभी
मिल पाएगी 
इस अमूल्य
धरोहर को
शीश पर धारण
कर लेना
बस उस दिन 
जब उसे तुम्हारी 
जरूरत हो
याद उसे तुम 
कर लेना
मातृ ऋण  से 
कुछ तो खुद 
को उॠण
कर लेना

बुधवार, 5 मई 2010

नारी या भोग्या ?

नारी 
तुम्हारा 
अस्तित्व 
क्या है?
हर युग में
जन -जन के 
अंतस में व्याप्त 
तुम्हारी भोग्या
की छवि  से 
कब मुक्त
हो पाई हो
हर युग में ही
कुचली गयीं
मसली गयीं
तोड़ी गयीं
फेंकी गयीं
कब तुम्हारे 
अस्तित्व को 
स्वीकारा गया 
कब देह से पार 
तुम्हारे अस्तित्व
को जाना गया
तप भंग करना हो
या अग्निपरीक्षा देनी हो
तुम्हें ही बलि वेदी पर
चढ़ाया गया
देवी हो या माँ
हर रूप में 
तुम्हारी अस्मिता का
ही होम किया गया
तुम्हें ही छला गया 
हर युग में
तुम्हारे ' भोग्या ' शब्द 
को ही सार्थक किया गया
प्रदर्शन की विषय- वस्तु
बनाया गया आज भी 
आज भी तुम
पुरुष की सोच की
मात्र कठपुतली हो
कब तुममें माँ ,बेटी 
बहन , पत्नी की
छवि को निहारा गया
सिर्फ स्वार्थों की 
पूर्ति के लिए ही
इन उपनामों से
नवाज़ा गया 
नारी देह से तो 
मुक्त हो भी जाओगी
पर पुरुष की सोच से
भोग्या की तस्वीर 
ना हटा पाओगी
नारी तुम किसी 
भी युग में
'भोग्या' के दंश से 
ना बच पाओगी
अपने अस्तित्व को
काम-पिपासुओं के
चंगुल से ना 
बचा पाओगी
इनकी विकृत
मानसिकता से 
ना मुक्त हो पाओगी
फिर कैसे अपने 
अस्तित्व को
जान पाओगी?
नारी तुम 
कब नारी 
बन पाओगी?

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

क्षणिकाएं

तेरा चहकना
महकना ,मचलना
खिलखिलाना 
कुछ यूँ लुभाता है
जैसे कोई नदिया तूफानी 
सागर के सीने पर
अठखेलियाँ कर रही हो 

तेरे पहलू में 
सिर रखकर
सुकून पाना
अब किस्मत नहीं
तुझे याद रखना
या भूल जाना
अब बस में नहीं


दीदार तेरा हो 
अक्स मेरा हो
रूह तेरी हो
जिस्म मेरा हो
नींद तेरी हो
ख्वाब मेरा हो
मौत मेरी हो जिसमें
वो गोद तेरी हो 


नज़्म बना मुझे
कागज़ पर उतार मुझे
ख्वाहिश बना मुझे
नज़रों में बसा मुझे
तेरी चाहत का सिला बन जाऊँ
बस एक बार पुकार मुझे 


ख्वाबों के सूखे दरख्तों पर 
आशियाँ बनाया नहीं जाता
हर चाहने वाली सूरत को
दिल का दरवाज़ा दिखाया नहीं जाता 


तेरे ग़मों की दुनिया में
अश्क मेरे बहते हैं
दर्द के ये कुछ फूल हैं
जो काँटों पर ही सोते हैं

 

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

अधूरे ख्याल

यूँ ही
भटकते- भटकते
कभी- कभी
अधकचरे , अधपके
अधूरे ख्यालात
दस्तक देते हैं
और फिर ख्यालों
की भीड़ में
खो जाते हैं
और हम फिर
उन्हें ख्यालों में
ढूंढते हैं
मगर कभी
खोया हुआ
मिला है क्या
जो मिल पाता
ये अधूरे ख्याल
क्यूँ अंधेरों में
खो जाते हैं
क्यूँ इतना तडपाते हैं
क्यूँ अधूरे ख्याल
अधूरे ही रह जाते हैं
भावनाओं में
क्यूँ नही
पलते हैं
शब्दों में
क्यूँ नही बंधते हैं
क्यूँ अधूरेपन की
पीर सहते हैं
शायद कुछ ख्यालों की
किस्मत अधूरी होती है
या अधूरापन ही
उनकी फितरत होती है

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

कहा था ना .............२०० वीं पोस्ट

देखा 
कहा था ना
कभी मैंने 
एक वक़्त 
आएगा
जब तेरे 
अरमाँ जवाँ होंगे
 और मेरे
वक़्त की 
कब्र में 
तेरे ही हाथों 
दफ़न हो
चुके होंगे
उस वक़्त
कैसे , फिर से
जिंदा करेगा 
मृत जज्बातों को
 कहा था ना 
एक दिन 
आवाज़ देगा मुझे
जब तेरे अहसास 
जागेंगे तुझमें
जब अरमानो की
झिलमिलाती चादर
बह्काएगी तुझे 
जब ख्वाबों के 
अंकुर झूला 
झुलायेंगे तुझे 
तब आवाज़ 
देगा मुझे
मगर जिंदा लाशें भी
कहीं सुना करती हैं 
जिसके हर अहसास 
को तूने ही कभी
अरमानो की 
चिता पर राख़ 
किया था
और राख़ को भी
तूने ना सहेजने 
दिया था
फिर कैसे आज 
रिश्ते की राख़
ढूंढता है
अब किस नेह 
के बीज का 
अंकुरण करता है
मुरझा चुके हैं 
जो फूल
कितना ही नेह के 
जल से सींचो
फिर नहीं 
खिलने वाले
कहा था ना
मौसम बेशक 
बदलते हैं
मगर जिस 
गुलशन को 
अपने हाथों 
उजाडा हो
वहाँ बसंत 
नहीं आता
पतझड़ हमेशा 
के लिए 
ठहर जाता है
कहा था ना
वक़्त किसी का 
नहीं होता
अब लाख 
सदाएँ भेज
गया वक़्त
लौट कर 
नहीं आता
 

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

मन का पंछी

ना जाने 
वो कौन सी 
बंदिश है
जिसे तोड़ 
नहीं पाता
ये मन 
पंछी- सा
क़ैद में 
फ़डफ़डाता
उड़ना चाहकर 
भी उड़ नहीं पाता
सिसकता 
तड़पता 
मचलता
पल- पल
मगर फिर भी
उड़ने की चाहत
ना जाने 
कौन से गर्त
में दब गयी
किस खोह में
छुप गयी
और अपने 
पिंजरे के 
मोह में 
क़ैद पंछी 
मोह की बंदिशें
ना तोड़ पाता है
और यूँ ही
सिसक- सिसक कर
दम तोड़ जाता है

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

यादों का विकल्प

यादों की कहानी 
यादों के फ़साने 
हर दिल ने गाये
हर दिलजले ने
जीने का सबब बनाया
यादों का ही 
कफ़न सजाया
किसी ने खुद को 
नशे में डुबाया
तो किसी ने 
ज़िन्दगी को 
कर्मभूमि बनाया
मगर यादों से 
कभी बच ना पाया 
दिल-ओ-दिमाग को
यादों की गिरफ्त से
ना कोई छुड़ा पाया
 और कभी कोई ना
ढूंढ पाया
यादों का विकल्प
चाहे कितना ही 
अंधेरों में छुपाया
दिल की तहों में
लाख दबाया
मगर फिर भी
कोई ना कोई याद
किसी ना किसी 
कोने से कब , कैसे
दस्तक दे ही जाती है
फिर यादों को 
कहाँ दफ़न करे कोई
और कैसे 
यादों के विकल्प 
ढूंढें कोई

शुक्रवार, 26 मार्च 2010

क्षणिकाएं

आज तो 
चाँदनी भी 
जल रही है
चाँद के 
आगोश को 
तड़प रही है
मोहब्बत के
दंश झेल रही है
फिर भी
उफ़ ना कर रही है 

हर कश पर 
ख़त्म होती 
धुंआ बन 
उडती ज़िन्दगी 
गली के 
एक छोर पर
खडी
खामोश ज़िन्दगी
फिर भी
दूसरे छोर तक 
ना पहुँच 
पाती ज़िन्दगी 

ख्वाब सा 
आया और 
चला गया
ना जाने 
कितने 
मोहब्बत के 
ज़ख्म दे गया
तेरा आना 
और चला जाना
जैसे ज़िन्दगी
मौत से लड़
रही हो 
और फिर 
मौत जीत 
गयी हो

देखा
मिलन हुआ ना
मैंने कहा था 
हम मिलेंगे
एक दिन 
और आज 
वो दिन था
जब तुम और मैं
रु-ब-रु हुए 
तुम मेरे 
साथ थे 
हाथों में 
हाथ थे
देखा 
मिलन ऐसे
भी होता है
ख्वाब में 

प्यार को ताकत बना
कमजोरी  नहीं 
प्यार को खुदा बना
मजबूरी नहीं

अस्पष्ट तस्वीरें
गडमड होते शब्द 
बिखरते ख्वाब
अव्यवस्थित जीवन 
इंसानी वजूद का 
मानचित्र

मंगलवार, 23 मार्च 2010

मैं हिन्दुस्तानी हूँ

मै हिन्दुस्तानी हूँ 
 मजहब की दीवार 
कभी गिरा नहीं पाया 
किसी गिरते को 
कभी उठा नहीं पाया
नफरतों के बीज 
पीढ़ियों में डालकर 
इंसानियत का दावा 
करने वाला 
मैं हिन्दुस्तानी हूँ

भाषा को अपना 
मजहब बनाया
देश को फिर भाषा की 
सूली पर टँगाया
अपने स्वार्थ की खातिर
भाषा का राग गाया
कुर्सी की भेंट मैंने
लोगों का जीवन चढ़ाया
क्षेत्रवाद  की फसल उगाकर
इंसानियत का दावा 
करने वाला 
मैं हिन्दुस्तानी हूँ

जातिवाद की भेंट चढ़ाया
लहू को लहू से लडवाया
गाजर -मूली सा कटवाया
फिर भी कभी सुकून ना पाया
नफरत की आग सुलगाकर
अमन का दावा करने वाला
मैं हिन्दुस्तानी हूँ


शहीदों के बलिदान को 
हमने भुलाया
कुछ ऐसे फ़र्ज़ अपना
हमने निभाया
फ़र्ज़ का, बलिदान का,
देशभक्ति का पाठ
सिर्फ दूसरों को समझाया
आतंक को पनाह देने वाला 
शहीदों के बलिदान को
अँगूठा दिखाने वाला 
मैं हिन्दुस्तानी हूँ
हाँ, मैं सच्चा हिन्दुस्तानी हूँ
 

शुक्रवार, 19 मार्च 2010

ॐ जय ब्लोग्वानी

ॐ जय ब्लोग्वानी 
प्रभु जय ब्लोग्वानी
जो कोई तुमको ध्याता
हॉट में स्थान पाता 
ॐ जय ब्लोग्वानी .........

घर , परिवार , नौकरी 
सब दॉव पर लगा देता 
 खाना, पीना ,सोना 
ब्लॉगर सब भूल जाता 
उलटी सीढ़ी टिप्पणियाँ करके 
बस टी आर पी में सबसे 
ऊपर आना चाहता 
ॐ जय ब्लोग्वानी ..........

ब्लॉगिंग के सारे गुण अपनाता
किसी को रिश्तेदार बनाता 
किसी से दुश्मनी मोल लेता
उलटे सीधे करम ये करता 
विवादास्पद लेख लिखकर
पोस्ट को ऊपर रखना चाहता
ब्लोग्वानी प्रभु के चरण कमलों 
में  स्थान पाने को
अकृत्य कृत्य भी कर जाता
ॐ जय ब्लोग्वानी ..................

टिप्पणियों के अभाव में तो
अच्छी पोस्टों का 
दीवाला ही निकल जाता
बेकार पोस्टों का ही 
यहाँ तो दबदबा बन जाता
हॉट के चक्रव्यूह में फंसकर 
नॉट में अटक जाता 
बेचारा ब्लॉगर हॉट में 
स्थान पाने को तरस जाता
जुगाडू ब्लॉगर ही यहाँ
हॉट में कई कई दिन 
स्थान पाता 
ॐ जय ब्लोग्वानी ..........

ब्लोग्वानी प्रभु चमत्कार कर दो 
दीन दुखी ब्लोगरों की 
झोली भी भर दो 
हॉट के दर्शन करा दो
मनोकामना पूर्ण कर दो
जो कोई तुमको ध्याता 
मन वांछित फल पाता
ॐ जय ब्लोग्वानी ...............

इक तेरे बिना इनका कोऊ नाहीं.................

दोस्तों,

ये सिर्फ एक  स्वस्थ हास्य है .......काफी दिनों से काफी लोगों को इसी वजह से रोते बिलखते देख रही थी तो सोचा उन सबकी तरफ से थोड़ी सी प्रार्थना ब्लोग्वानी से कर दी जाए.

  

रविवार, 14 मार्च 2010

कोई तो जगे

अँधा हूँ मगर
आँख वालों को
आईना बेचता हूँ
शायद अपना अक्स
नज़र आ जाये
किसी को

गूंगा हूँ मगर
जुबान वालों को
शब्द बेचता हूँ
शायद कोई जुबाँ
के ताले खोले
कोई तो सत्य
की चादर ओढ़े

बहरा हूँ मगर
कान वालों को
गीत सुनाता हूँ
शायद सुनकर
किसी का तो
खुदा जगे
कोई तो वक़्त की
आवाज़ सुने

मंगलवार, 9 मार्च 2010

कचोट

बरसों साथ रहकर भी
तेरा मेरा अनजाना रिश्ता
देह की दहलीज पर ही
क्यूँ सिमट गया
मन के आँगन तक की राह
कोई मुश्किल तो ना थी
मौन का शून्य ही
अस्तित्व को बाँटता रहा
प्रगाढ़ स्नेह के बंधन को
कम आँकता रहा
अर्धांगिनी शब्द को
खूँटी पर टाँकता रहा
अर्ध अंग के महत्त्व
को नकारता रहा
शब्द को सिर्फ
शब्द ही रहने दिया
कभी शब्द को
अंतस में ना
उतार पाया
शायद इसीलिए
साथ रहकर भी
अनजान रहे
मन के बंधन
में ना बँधे
देह के रिश्ते
देह पर ही
बिखर गए

शनिवार, 6 मार्च 2010

नारी को नारी रहने दो

वो तो सीता ही थी
वो तो लक्ष्मी ही थी
त्याग , तपस्या
प्रेम समर्पण की
बेड़ियों में जकड़ी ही थी
अपने अरमानो की राख
ओढ़ पड़ी ही थी
फिर क्यूँ तुमने मजबूर किया
सीता से मेडोना बनने को
क्यूँ तुमको बाहर ही
उर्वशी रम्भा दिखाई देती थीं
जब तुमने मजबूर किया
उसने आगे कदम बढाया था
तुम्हारे दिखाए रास्ते
को ही अपनाया था
फिर क्यूँ आज हर गली
हर चौराहे, हर मोड़ पर
बातों के दंश लगाते हो
अपने झूठे दंभ की खातिर
क्यूँ नारी को प्रताड़ित करते हो
रूप सौंदर्य के पिपासुक तुम
क्यूँ मानसिक बलात्कार करते हो
सिर्फ अपना वर्चस्व कायम रहे
इसलिए मानसिक प्रताड़ना देते हो
सिर्फ एक दिन नारी का
सम्मान सह नहीं पाते हो
फिर कैसे तुम नारी को दुर्गा कहते हो
नारी पूजा का राग अलापते हो
खुद ही नारी को शोषित करते हो
दोहरे मानदंडों में जीने वाले
पुरुष तुम
क्यूँ अपनी हार से डरते हो
अपने अहम् की खातिर तुम
नारी की अवहेलना करते हो
तेरी जननी है वो
कैसे खुद से तुलना करते हो
वो तो आज भी सावित्री ही है
क्यूँ अपना नज़रिया नही बदलते हो
नारी की आवृत्ति को
नारित्त्व में ही रहने दो
अपने पुरुषत्व की छाँव
में ना जकड़ने दो
उसे जीने दो और आगे बढ़ने दो
बस नारी को नारी रहने दो

मंगलवार, 2 मार्च 2010

मुर्गा कटता रहता है

चल पागल
मोहब्बत करनी
भी नहीं आती
झूठे वादे करके
कोई वादा पूरा
न करना
जन्मों के इंतज़ार
की बातें करके
इस जन्म में भी
इंतज़ार न करना
मुरझाये गुल को भी
गुलाब बता देना
खाली पास- बुक को
अम्बानी की बता देना
उधार की गाड़ी को
अपना बना लेना
ये है आज का चलन
और तू है पागल
मोहब्बत के नाम पर
कुर्बान हुआ जाता है
जान हलाल किये जाता है
आँसू बहाए जाता है
वफ़ाओं की दुहाई
दिए जाता है
यहाँ किसी को
दर्द नही होता
यहाँ कोई
किसी के लिए
नहीं मरता है
आज तू , कल
कोई और सही
बस इसी तर्ज़ पर
मुर्गा कटता रहता है

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

नखरे वारे सजन

ओ रे सजन, प्यारे सजन
नखरे वारे सजन
फाग का महिना आ गया है
होरी का रंग भा गया है
तन मन ऐसे भीग रहे हैं
प्रेम रस में सींच रहे हैं
यूँ ना करो बरजोरी
गोरी से न करो ठिठोली
बैयाँ ऐसे ना पकड़ो सजना
रंग अबीर मलो मुख पे ना
ऐसे करो ना बरजोरी
नाजुक कलइयां है मोरी
सजना ऐसे मचल रहे हैं
भाँग सुरूर में अटे हुए हैं
लाज शरम सब ताक पर रखकर
गोरी की चुनरिया भिगो रहे हैं
नयनन की मादक चंचलता
फाग को मधुमास किये है
ओ रे सजन , प्यारे सजन
आज तो रंग में आ गए हैंहोरी की मस्ती में झूम रहे हैं
नखरे सारे भूल गए हैं
ओ रे सजन , प्यारे सजन
अब ना रहे ,नखरे वारे सजन

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

आईने कैसे- कैसे

आईना ना देखो यारों
अक्स से बू आती है
आईने में क़ैद अक्स से
खुद को मिलाओ तो ज़रा
गर खुद को पहचान लो तो
आईना खामोश हो जाये


हर आईना अपना सा
नज़र आता है
क्या करूँ महबूब मेरे
हर आईने में
तेरा ही चेहरा
नज़र आता है



मुझे आईना दिखाने वाले
कभी उस आईने में
झाँका होता
तो तेरा अक्स भी
धुंधला गया होता



नकाब चाहे जितना
ड़ाल लो रुखसार पर
आईना सब सच
दिखा देता है

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

एक बेचारा -------शायरी का मारा

दोस्तों ,

अभी -अभी एक मेल मुझे श्री प्रवीण पथिक जी से प्राप्त हुई और ये मेल उनके दोस्त श्री आनंद पाठक जी द्वारा रचित है और उनकी आज्ञा से मैं इसे अपने ब्लॉग पर लगा रही हूँ । एक हास्य व्यंग्य है जो मुझे इतना अच्छा लगा कि सोचा सभी दोस्तों से इसे साझा किया जाये और अगर उनमें से यदि कोई इस समस्या से ग्रसित हों तो ...............अंजाम के लिए हेलमेट लगाकर तैयार रहें। जिस रूप में आई है उसी में प्रस्तुत कर रही हूँ । शीर्षक मैं खुद दे रही हूँ ।

एक बेचारा ..........शायरी का मारा



विवाहित कवियों को जो एक सुविधा सर्वदा उपलब्ध रहती है और अविवाहित कवियों को नहीं - वह है एक अदद श्रोता और वह श्रोता होती है उनकी श्रीमती जी -अभागिन अभागिन इसलिए कि वह हमारे जैसे चिरकुट कवि की धर्मपत्नी होती है अगर वह किसी हवलदार की पत्नी होती तो वह हमसे ज्यादा ही कमा कर लाता इसीलिए वह आजीवन अपने भाग्य को कोसती रहती हैं एक वह दिन कि आज का दिन वह तो विधि का विधान था कि इस कलम घिसुए कवि से शादी हुई कौन मिटा सकता है इसे.!हर कवि की आदि श्रोता वही होती है और अंतिम श्रोता भी वही -बेचारी उधर किसी गीत का मुखडा बना नहीं कि कवि महोदय के पेट में प्रसव-पीडा शुरू हो जाती है- कब सुनाए ,किसे सुनाए उस समय तो कोई मिलता है नहीं अत: पत्नी को ही आवाज़ लगाते हैं -'अरे ! भाग्यवान ! इधर तो आना एक गीत सुनाता हूँ -

'रोटी कपडा और मकान
कवियों का इस से क्या काम
रोटी कपडा और मकान "

'बोलो कैसी लगी ?'- कवि महोदय ने समर्थन माँगा
पत्नी इस कविता का अर्थ नहीं ,मर्म समझती है -अपना निठ्ठ्ल्लापन ढांप रहा है यह आदमी.जल्दी रसोई घर में भागती है .तवे पर रोटी छोड़ कर आई थी. रोटी पलटनी थी . देखा रोटी जल गई . सोचती है -क्या जला? रोटी ,दिल या अपना भाग्य? इनकी कविता सुनते-सुनते काश ! कि हम बहरे होते
ऐसी ही एक प्रसव-पीडा एक कवि जी को रात २ बजे हुई कि सोती हुई पत्नी को जगा कर एक अंतरा सुनाने की चेष्टा की थी.पत्नी ने उनके मुख पर तकिया रख कर दबा दिया फिर सारे अंतरा-मुखडा सुप्त हो गए कहते हैं कि वह एक विदुषी महिला थीं
परन्तु अविवाहित कवियों को एक जो सुविधा सर्वदा उपलब्ध होती है वह विवाहित कवियों को आजीवन उपलब्ध नहीं होती . चाहें तो वाजपेई जी से पूछ सकते हैं और वह सुविधा है रात्रि शयन में खाट से उतरना अविवाहित कवि स्वेच्छा से जिस तरफ से चाहें उतर सकता है वह स्वतंत्र है स्वतंत्र लेखन करता है यह स्वतंत्रता विवाहित कवियों को नहीं है यही कारण है की विवाहित कवि या तो 'वाम-पंथी' विचारधारा के होते हैं या फिर 'दक्षिण-पंथी' विचारधारा के होते है जो खाट से उतरते ही नहीं वह 'निठ्ठल्ले" कवि होते हैं -नाम बताऊँ?
मगर शायरों की बात अलग है. एक बार ऐसा ही जच्चा वाला दर्द मुझे भी हुआ था . शे'र बाहर आने के लिए कुलांचे मार रहा था' 'मतला' हो गया (मिचली नहीं) .सोचा नई ग़ज़ल है .बेगम को सुनाते है -
तुमको न हो यकीं मगर मुझको यकीन है
रहता है दिल में कोई तुझ-सा मकीन है
'यह यकीन कौन है?कोई कमीन तो नहीं ? -बेगम ने शक की निगाह से पूछा
दिलखुश हो गया. चलो एक लफ्ज़ तो ऐसा लिखा जिसका मायने इन्हें नहीं मालूम. वज़नदार शे'र वही जिसका न तासीर समझ में आये न अल्फाज़ .लगता है शे"र अच्छा बना है मैंने बड़े प्यार से समझाया- 'मकीन माने जो घर में रहता है मकान वाला -उर्दू में मकीन बोलते हैं . उन्हें मेरे उर्दू की जानकारी पर फक्र हुआ हो या न हुआ हो मगर शुबहा ज़रूर हो गया की हो न हो मेरे दिल में उनके अलावा और भी कोई रहता है .मेरा कहीं लफडा ज़रूर है
यकायक चिल्ला उठी - मुझे तो पहले से ही यकीन था की ज़रूर तुम्हारा कहीं लफडा है आपा ठीक ही कहती थी कि ये शायर बड़े रोमानी आशिकाना मिजाज़ के होते हैं .इश्किया शायरी की आड़ में क्या क्या गुल खिलाते है ज़रा इन पर कड़ी नज़र रखना लगता है आपा ने ठीक ही कहा था
' बेगम तुम औरतों के दिमाग में बस एक ही बात घूमती रहती है अरे! इस शे'र का मतलब समझो ,शे'र का वज़न देखो -शायर कहना चाहता है की या अल्लाह ,परवरदिगार मेरे ,आप को यकीन हो न हो परन्तु हमें पूरा यकीन है की मेरे दिल में आप की मानिंद एक साया इधर भी रहता है
अभी मैं समझा ही रहा था की बेगम साहिबा बीच में ही चीख उठी -" चुप रहिए! हमें चराने की कोशिश न कीजिए .हम वो बकरियां नहीं कि आप चराएं और हम चर जाएँ. आप क्या समझते हैं की हमे आप की नियत नहीं मालूम !,नज़र किधर है नहीं मालूम !हमे सब मालूम्हें .अरे! यह शायर लिखते तो है अपने उस 'छमक-छल्लो' के लिए और नाम लेते है 'खुदा' का . अल्लाह का > अरे कमज़र्फ़ आदमी !शर्म नहीं आती परवरदिगार को बीच में लाने पर.
" कौन है वह?'-उन्होंने गुस्से में आँख तरेरते हुए पूछा
'कौन? -मैंने सकपकाते हुए पूछा
' अरे! वही कलमुंही ,मकीन,कमीन यकीन जो भी नाम हो उसका जो तुम्हारे दिलमें दिल-ओ-जान से रहती है ?'
'लाहौल विला कूवत. लानत है तुम्हारी समझदारी पर '
'हाँ हाँ !अब तो लानत भेजोगे ही मुझ पर जब शादी कर के लाए थे तब लानत नहीं भेजी थी '
'बेगम साहिबा ! तुम तो समझती ही नहीं '
'हाँ हाँ अब मैं क्यों समझने लगूं. तुम क्या समझते हो कि हमें शे'र समझने की तमीज नहीं !अरे! हमने भी कमेस्ट्री से एम० ए० किया है हम ने भी हाई स्कूल तक हिंदी पढ़ी है .खूब समझती हूँ तुम्हारी ग़ज़ल और ग़ज़ल की असल ....
फिर क्या होना था .वही हुआ जो ऐसे मौके पर हर पत्नी करती है -रोना-धोना सर पीटना (अपना) अचूक अस्त्र अचूक निशाना
अब ग़ज़ल का अगला शे'र क्या सुनाना
०० ०० ००००००
शायरों की यही तो कमज़ोरी है .इस तरह की दाद पर मायूस हो जाएं तो हो चुकी शायरी अरे! शायरी तो दीवानापन है ,बेखुदी है.सड़े अंडे-टमाटर की परवाह कौन करे मजनू ने की थी क्या? महीने गुज़र गए अब तक तो बेगम का गुस्सा भी ठंडा हो गया होगा चलते हैं दूसरा शे'र सुनाते हैं -
ताउम्र इसी बात की जद्द-ओ-ज़हद रही
अपनी ज़मीन है या उनकी ज़मीन है
अभी शे'र का काफिया ख़त्म भी न हुआ था की बेगम साहिबा एक बार फिर भड़क उठी -"हाय अलाह !अब ज़मीन जायदाद भी उसके नाम कर दिया क्या! "
"अरे! चुप ,किस की बात कर रही हो तुम?"
"अरे! तुम्हारे कमीन - मकीन की "
"या अल्लाह इस नाशुक्री बीवी को थोडा-सा अक्ल अता कर वरना तुम्हारा यह शायर इस कमज़र्फ़ बीवी के हाथों ख्वामख्वाह मारा जाएगा मैंने तो यह शे"र तुम्हारी शान में पढा था यह जिस्म यह जान किस की है ..अपनी या तुम्हारी ...."
"पहले ज़मीन-जायदाद का कागज़ दिखाओ ..ज़रूर उस सौतन को लिखने का इरादा होगा ...." बेगम साहिबा ने मेरा हाथ ही पकड़ लिया
अब इस शे'र के मानी क्या समझाते अगला शे'र क्या सुनाते चुप ही रहना बेहतर समझा
०० ०००००००००
अब मैंने यह तय कर लिया की अब इस औरत को न कोई शे'र सुनाना, न कोई ग़ज़ल इस से अच्छा तो किसी चाय की दुकान पे सुनाते तो कम से कम चाय तो मिलती.घर की मुर्गी साग बराबर .इस औरत के लिए तो घर का जोगी जोगडा ...इसे मेरी औकात का क्या पता आज शाम नखास पर मुशायरा है बड़े अदब से बुलाया है उन लोगो ने अपनी शेरवानी निकाली.चूडीदार पायजामा पहना,फर की टोपी पहनी ,आँखों में सुरमा लगाया ,कानो के पास इतर लगाया ,करीने से रुमाल रखा.फिल्मवालों ने यही ड्रेस कोड तय कर रखा है हम जैसे शायरों के लिए .शायरी में दम हो न हो मगर ड्रेस में तो दम हो .
कवि की बात अलग है ,शायरी की बात अलग वीर रस के कवि हैं तो मंच पर आये ,हाथ-पैर पटक गए,श्रृंगार रस के कवि हैं तो आए और लिपट गए, रस के कवि हैं तो रो-धो कर निपट गए मगर शायरी ! शायर को एक एक शे'र तीन-तीन बार पढ़ना पड़ता है फिर देखना पड़ता है किधर से गालियाँ आ रही है ,किधर से तालियाँ .हम गुमनाम शायरों के लिए सड़े अंडे-टमाटर तो छोड़ दीजिए यहाँ भी 'ब्रांड-वैल्यू' बिकता है नामचीन शायर है तो मंच पर आने से पहले 'तालियाँ बजती हैं ,हम जैसों के लिए जाने के बाद 'तालियाँ' बजती है -गया मुआ ! पता नहीं कहाँ -कहाँ से पकड़ लाते हैं यह प्रोग्राम वाले.
अब तो ड्रेस पर ही भरोसा था .शीशे के सामने खड़े हो कर शे'र अदायगी का रिहर्सल कर रहा था -
दीदार तो नहीं है चर्चे मगर सुने -
वह भी किसी हसीं से ज्यादा हसीन हैं

पीछे से किसी ने ताली बजाई ,सामने से मैंने शुक्रिया अदा किया .मुड़ कर देखा बेगम साहिबा हैं.-'वाह ! वाह ! सुभान अल्लाह !सुभान अल्लाह !क्या शे'र मारा है .अब जाओ दीदार भी कर लो ,बेकरार होगी .कब्र में पाँव लटकाए बैठे है ज़नाब की न जाने कब फाख्ता उड़ जाय ...वह भी हसरत पूरी कर लो ....'-बेगम साहिबा ने भडास निकाली .
'बेगम ! किसकी बात कर रही हो?'
'अरे! उसी कलमुंही कमीन मकीन की.हसीन हैं न ! हम से भी ज्यादा हसीन है न '
'लाहौल विला कूवत ! कमज़र्फ़ औरत! शे'र समझने की तमीज नहीं तमीज होगी भी कैसे -सास बहू सीरियल देखने से.टेसूए बहाने से .किट्टी पार्टी करने से फुरसत होगी तब न ,शायरी समझने की तमीज आयेगी '
'हाँ हाँ ,हमें क्यों तमीज आयेगी ! सारी तमीज या तो उस छमकछल्लो के पास है या आप के पास है '
'बेगम ! इस शे'र का मतलब तुम नहीं समझती हो ,इस का मतलब है या मेरे मौला ,परवरदिगार जिन्दगी गुजर गयी मगर आज तक दीदार नहीं हो सका ,मगर खुदा के बन्दे बताते है की आप इस ज़हान के सब से खूबसूरत हसीन .....'
देखिए जी .कहे देती हूँ !हमें इतनी भोली मत समझिए ,हमारे अब्बा ने मुझे भी तालीम दी है ,हमें भी अदीब की जानकारी है हम उड़ती चिडिया के पर गिन सकते हैं ,खुली आँखों से सुरमा चुरा सकते हैं आप हम से नज़रें नहीं चुरा सकते हैं .....वो तो मेरे करम ही फूटे थे की......'-कहते -कहते रो पडी

फिर उसके बाद क्या हुआ ,विवाहित पाठकों की कल्पना पर छोड़ देता हूँ वहां से जो भागा तो मुशायरे में जा कर ही दम लिया .पूरी ग़ज़ल वहीँ पढ़ी -गालियाँ मिली या तालियाँ आप स्वयं ही समझ लें



शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

फूलझड़ी

वैलेंटाइन के बहाने से चैट पर
आशिकी झाड़ने वालों
बच के रहना
जिस दिन कोई
सिरफिरी टकरा जाएगी
आशिकी की सारी
भूतनियाँ उतार जाएगी
जेब के पैसे जब
डकार जाएगी
तब घरवाली भी
हाथ से निकल जाएगी
वैलेन्टाइन की माला
जपने वाले एक बार में ही

तेरा वैलेन्टाइन मना जाएगी
फिर हर औरत में तुम्हें
माँ , बहन ही नज़र आएगी
तेरी आशिकी की फूलझड़ी में
कंगाली का बम लगा जाएगी
इस बार की होली में
अपनी दिवाली और
तेरा दिवाला निकाल जाएगी

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

बस इतना सा ............

मैं नही कहता
आसमाँ से चाँद
तोड़कर लाऊँगा
नहीं
कहता
तारों से
माँग सजाऊँगा
मैं नही कहता
तेरे लिए
आग का दरिया
पार कर जाऊंगा
नहीं कहता
तूफानों का
रुख मोड़ दूँगा
कोई वादा
नही करता
कोई कसम
नही उठाता
बस
धड़कन की
हर ताल
के साथ
पलकों की
गिरती -उठती
चिलमन के साथ
साँसों की
निर्बाध गति
के साथ
क्षण- प्रतिक्षण
अपनी ज़िन्दगी के
अंतिम पल
अंतिम श्वास
अंतिम धड़कन तक
सिर्फ और सिर्फ
तुझे ही चाहूँगा

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

क्षणिकाएं

तुम मानो या ना मानो
मुझे पता है
प्यार करती हो मुझे
तुम स्वीकारो या ना स्वीकारो
मुझे पता है
तुम्हारा हूँ मैं


अश्क भी आते नही
दर्द भी होता नही
तू पास होकर भी
अब पास होता नही


इक आती सांस के साथ
तेरे आने की आस बँधी
और जाती सांस के साथ
हर आस टूट गयी


तेरी पुकार में ही
दम ना था
मैं तो किनारे
ही खड़ी थी


किनारे की मिटटी को
छूकर तो देख
मेरे अश्क से
भीगी मिलेगी
दिल के तारों को
छेडकर तो देख
मेरे ही गीत
गाते मिलेंगे
लम्हों के पास
आकर तो देख
तेरे मेरे प्यार के
फ़साने ही मिलेंगे


या तो
याद बना ले मुझको
या याद बन जा
यादों के आने जाने से
पास होने का
अहसास होता है

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

मत हवा दो

भड़कती चिंगारी
धधकता ज्वालामुखी
हर सीने में है
मत हवा दो

चिंगारी गर शोला
बन जाएगी
कहर बन बरस जाएगी
ज्वालामुखी गर
जो फट जायेगा
सैलाब इक ले आएगा
मत हवा दो

हवा का रुख
ज़रा तो देखा करो
कुछ तो सोचा
समझा करो
मत आदमी के
सब्र का इम्तिहान लो
गर एक बार
आदमी , आदमी बन गया
शोलो को उठाकर
हाथ में
धधकते ज्वालामुखी
की आग में
करके भस्म
भ्रष्टाचार, हिंसा,
स्वार्थपरता,
आतंकवाद की
हर शय को
खुद को वो
साबित कर देगा
हवाओं का रुख
भी बदल देगा
अब तो संभल जाओ
मत रेत के
महल बनाओ
मत आज़ादी का
गलत फायदा उठाओ
मत हवा दो
आदमी की
उस आग को
मत हवा दो .........

बुधवार, 20 जनवरी 2010

मन की गलियाँ

मन की
विहंगम गलियाँ
और उसके
हर मोड़ पर
हर कोने में
इक अहसास
तेरे होने का
बस और क्या चाहिए
जीने के लिए
वहाँ हम
तुझसे बतियाते हैं
और चले जाते हैं
फिर उन्ही गलियों के
किसी मोड़ पर
और खोजते हैं
उसमें खुद को
ना तुझसे बिछड़ते हैं
ना खुद से मिल पाते हैं
और मन की गलियों की
इन भूलभुलैयों में
खोये चले जाते हैं

रविवार, 17 जनवरी 2010

मत करो ऐसा ...........

मैं कोई वस्तु नही
क्यूँ मेरी बोली लगाते हो
दुनिया की इस मंडी में
क्यूँ खरीदी बेचीं जाती हूँ
कभी धर्म के ठेकेदारों ने
मेरी बलि चढ़ाई है
कभी समाज के ठेकेदारों ने
मेरी बोली लगायी है
मैं भी इक इंसान हूँ
मुझमें भी खुदा बसता है
उसी खुदा की नेमत हूँ
जिसकी करते तुम आशनाई हो
फिर क्यूँ मुझे ही पीसा जाता है
क्यूँ मेरा ही गला दबाया जाता है
जननी भी हूँ , भगिनी भी हूँ
फिर भी भटकती फिरती हूँ
अपना अस्तित्व बचाने की चाह में
मर -मरकर भी जीती हूँ
मुझमें भी हैं अरमान पलते
मेरी भी हैं चाहतें मासूम
क्यूँ नही उन्हें मिली आज तक
दिल की जो गहराई है
क्यूँ अबला का तमगा चिपकाते हो
रिश्तों को क्यूँ बेडी बनाते हो
औरत हूँ मैं
सिर्फ भोग्या नही
मान क्यूँ नही लेते हो
कदम दर कदम चली मैं तुम्हारे
फिर क्यूँ नही मेरे साथ तुम चलते हो
अधिकरों की बात पर क्यूँ तुम
इतना शोर मचाते हो
कर्तव्यों की आंच पर क्यूँ
मेरी भावनाएं जलाते हो
क्या फर्क है मुझमें और तुममें
कौन सी कड़ी कमजोर है
फिर क्यूँ मुझे ही ये
ज़हर का घूँट पिलाते हो
मैं भी इक इंसान हूँ
मेरा भी लहू लाल है
मुझमें भी वो ही दिल है
बताओ फिर क्या फर्क है
मुझमें और तुममें
क्यूँ मुझे ही दोजख की
आग में जलाये जाते हो

गुरुवार, 7 जनवरी 2010

कुछ ख्याल

पति होने का धर्म
उसने कुछ ऐसे निभाया
इक हँसते , मुस्कुराते
ज़िन्दगी की उमंगों से
भरपूर गुल को
निर्जीव, बेजान बनाया


तू
तेरा ख्याल
और
तेरी ज़िन्दगी
सब तेरा
इसमें
'मैं ' कहाँ हूँ ?


जो दिखाई ना दे
वो अश्क
जो सुनाई ना दे
वो शब्द
और दोनों का दर्द
कभी झांकना
उनके आईने में
वहां जलते हुए
रेगिस्तान मिलेंगे


रोज चूर -चूर होना
और फिर जुड़ जाना
ए दिल-ए-नादाँ
ये फितरत कहाँ से पाई ?


कोई भाग सकता है सबसे
मगर नही भाग सकता खुदी से


ख्वाहिशों के बिस्तर पर
करवट बदलती रात
भोर की पहली किरण के साथ
दम तोड़ जाती है

शनिवार, 26 दिसंबर 2009

गिले -शिकवे

इक प्यासी रूह को
सुकून कब मिला है

घुटन की दलदल में फंसी
ज़िन्दगी का यही सिला है

चेहरे पर उभरती लकीरों में
दर्द का ही सिलसिला है

कुछ पल ठहर जाऊं कहीं
ज़िन्दगी का बस यही गिला है

रविवार, 6 दिसंबर 2009

दबी चिंगारी को हवा मत दो............६ दिसम्बर

मरा इक शख्स था
हुए बरबाद
न जाने कितने थे


उस एक चेहरे को ढूंढती
निगाहें आज
न जाने कितनी हैं
गम का वो सूखा
ठहरा आज भी
हर इक निगाह में है
सियासत की ज़मीन
पर बिखरी
लाशें हजारों हैं


राम के नाम पर
राम की ज़मीन
हुई लाल है
धर्म के नाम पर
ठगी ज़िन्दगी
आज नाराज है


कैसे ये क़र्ज़ चुकाओगे
कैसे फिर फ़र्ज़ निभाओगे
लहू के दरिया में बही
मानवता फिर आज है


कैसे एक दिन के लिए
सियासत यूँ चमकती है
बरसों से जमी
यादों की परतें
कैसे मिटाओगे
सीने में दबी
चिंगारी को हवा
दिया नही करते
जो भड़के
अबकी शोले
फिर कैसे बुझाओगे ?

बुधवार, 25 नवंबर 2009

कैसे करूँ नमन ?

शहीदों को नमन किया
श्रद्धांजलि अर्पित की
और हो गया कर्तव्य पूरा


ए मेरे देशवासियों
किस हाल में है
मेरे घर के वासी
कभी जाकर पूछना हाल उनका


बेटे की आंखों में
ठहरे इंतज़ार को
एक बार कुरेदना तो सही
सावन की बरसात
तो ठहर भी जाती है
मगर इस बरसात का
बाँध कहाँ बाँधोगे
कभी बिटिया के सपनो में
झांकना तो सही
उसके ख्वाबों के
बिखरने का दर्द
एक बार उठाना तो सही
कुचले हुए
अरमानों की क्षत-विक्षत
लाश के बोझ को कैसे संभालोगे?


कभी माँ के आँचल
को हिलाना तो सही
दर्द के टुकड़ों को न समेट पाओगे
पिता के सीने में
जलते अरमानो की चिता में
तुम भी झुलस जाओगे

कभी मेरी बेवा के
चेहरे को ताकना तो सही
बर्फ से ज़र्द चेहरे को
एक बार पढ़ना तो सही
सूनी मांग में ठहरे पतझड़ को
एक बार देखना तो सही
होठों पर ठहरी ख़ामोशी को
एक बार तोड़ने की
कोशिश करना तो सही
भावनाओं का सैलाब जो आएगा
सारे तटबंधों को तोड़ता
तुम्हें भी बहा ले जाएगा
तब जानोगे
एक ज़िन्दगी खोने का दर्द

चलो ये भी मत करना 
बस तुम कुछ तो जिंदा खुद को कर लेना 
मेरी बीवी मेरे बच्चे 
मेरी माँ मेरे पिता 
सबके चेहरे पर मुस्कान खिल जायेगी 
जिस दिन शहादत के सही मायने तुम्हें समझ आयेंगे 
और तुम 
अपने घर में छुपे गद्दारों से दो - दो हाथ कर पाओगे 

पडोसी मुल्क जिंदाबाद के नारों 
और आतंकवादी की मृत्यु के विरोध में 
उठती आवाजों से
जिस दिन तुम्हारे कान फट जायेंगे 
विद्रोह के बीज के साथ 
देशभक्ति के बीज तुम्हारी नस्लों में बुब जायेंगे 
मेरी शहादत आकार पा जायेगी 
देश की मिटटी देश के काम आयी 
सोच , मेरी रूह सही मायनों में 
उस दिन सुकून पाएगी 

क्योंकि तुम
तब शायद समझ पाओगे
कर्तव्य सिर्फ़ नमन तक नही होता
सिर्फ़ नमन तक नही होता....

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

मत ढूँढ बाहर

उस एक स्वरुप में
क्यूँ न खोजा तूने
जो दूसरे में पाना
चाहता है
मानव तू क्यूँ
भटकना चाहता है
भावों के दलदल में
क्यूँ धँसता जाता है
तेरे हर ख्वाब की
ताबीर वहीँ है
हर चाहत का
हासिल वही है
हर राह की
मंजिल वही है
फिर क्यूँ तू
मरुभूमि में
जल के कण
ढूंढ़ना चाहता है
क्यूँ सागर से
प्यास बुझाना
चाहता है
तेरा चाँद तेरे साथ है
फिर क्या भटकने की बात है
खोज , जो खोजना है
पा , जो पाना चाहता है
दे , जो देना चाहता है
मगर सिर्फ़
उसी स्वरुप में
उसी दिव्य रूप में
जो तेरे साथ है
तेरे पास है
फिर क्यूँ तुझे
झूठे प्यार की तलाश है
मृगतृष्णा को छोड़
उस कच्चे धागे की
डोर से बंधकर
तो देख एक बार
हर ओर
रौशनी होगी
सितारों सी चमक होगी
बहारों की महक होगी
मत ढूंढ बाहर कहीं
तेरा महबूब
उसी स्वरुप में
तुझे मिल जाएगा
जिसे तूने कभी
चाहने की कोशिश न की
जिसके अंतस में
दिया कभी जलाया ही नही
एक बार
तू कोशिश तो कर
फिर दूसरा न कोई रूप
दूसरा न कोई स्वरुप
तुझे दिख पायेगा
तेरा अपना महबूब ही
उसमें मिल जाएगा
तू एक बार
उसके अंतस में
उतर कर तो देख

बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

ज़ख्मों का बाज़ार

ज़ख्मों को प्यार हमने दिया
तेरे दिए हर ज़ख्म को
दुलार हमने दिया
ज़ख्मों का बाज़ार
हमने भी लगा रखा है
एक बार हाथ लगाओ तो सही
ज़ख्मों को देख मुस्कुराओ तो सही
हर ज़ख्म से आवाज़ ये आएगी
यार मेरे , तुम एक नया ज़ख्म
और दे जाओ तो सही
आओ प्यार मेरे , ज़ख्मो को
नासूर बनाओ तो सही
प्यार का ये रंग भी
दिखाओ तो सही
बेवफाई नाम नही देंगे इसे
मोहब्बत का हर तोहफा कुबूल है हमें

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

कोई तो कारण रहा होगा

क्यूँ तेरी याद फिर आई है
लगता है
तुमने मुझे पुकारा है
किस दर्द ने फिर दस्तक दी है
तभी तो
हूक मेरे दिल में भी उठी है
तेरे गम से जुदा
मेरा दर्द कब था
तेरी इक आह पर
दर्द मेरा सिसकता है
लगता है
फिर कोई ज़ख्म उधड गया है
तभी तो
तेरी इक सिसकी पर
रूह मेरी कसमसाई है
कोई तो कारण रहा होगा
यूँ ही तो तेरी याद नही आई है

रविवार, 4 अक्टूबर 2009

ये कैसा है पोरुष तेरा

ये कैसा है पोरुष तेरा
ये कैसा है दंभ

अबला की लुटती लाज देख
जो बहरा बन , मूक हो
नज़र चुरा चला जाए
करुण पुकार भी न
जिसका ह्रदय विदीर्ण
कर पाए
फिर ये कैसा है पोरुष तेरा
ये कैसा है दंभ

अत्याचारों की बानगी देख
असहाय , निर्दोष की
हृदयविदारक चीख सुन भी
जो सिर्फ़ तमाशाई बन जाए
दयनीय हालत देखकर भी
जिसका सीना पत्थर बन जाए
फिर ये कैसा है पोरुष तेरा
ये कैसा है दंभ

राजनीति की बिसात पर जो
चापलूसी की नीति अपनाए
अन्याय के खिलाफ जो
कभी आवाज़ न उठा पाए
नेताओं के हाथों की जो
ख़ुद कठपुतली बन जाए
फिर ये कैसा है पोरुष तेरा
ये कैसा है दंभ

पत्नी की चाहत को जो
अपना न बना पाए
उसके रूह के द्वार की कभी
किवडिया ना खडका पाए
अपने ही अभिमान में चूर
अर्धांगिनी की जगह न दे पाए
पत्नी पर ही अपने पोरुष का
जो हर पल झंडा फहराए
अपने अधिकारों का
अनुचित प्रयोग कर जाए
अपने मान की खातिर
भार्या का अपमान कर जाए
अपने झूठे दंभ की खातिर
ह्रदय विहीन बन जाए
कैसा वो पुरूष होगा
और कैसा उसका पोरुष
किस पोरुष की बात हो करते
किस दंभ में हो फंसे
जागो , उठो
एक बार इन्सान तो बन जाओ
नपुंसक जीवन को छोड़
एक बार पुरूष ही बन जाओ
एक बार पुरूष ही बन जाओ