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सोमवार, 25 जुलाई 2011

"ये मेरे साथ ही क्यों होता है ?"

ओबीओ पर "चित्र से काव्य तक" प्रतियोगिता मे दूसरा स्थान प्राप्त कविता
इस चित्र के माध्यम से किसान के 
जीवन पर लिखना था
इस लिंक पर जाकर देखा जा सकता है 

http://www.openbooksonline.com/group/pop/forum/topic/show?id=5170231%3ATopic%3A111893&xgs=1&xg_source=msg_share_topic






बोये थे मैंने कुछ पंख उड़ानों के
कुछ आशाओं के पानी से
सींचा था हर बीज को
शायद खुशियों की फसल लहलहाए इस बार
पता नहीं कैसे किस्मत को खबर लग गयी
ओलों की मार ने चौपट कर दिया
सपनो की ख्वाहिशों का आशियाना
फिर किस्मत से लड़ने लगा
उसे मनाने के प्रयत्न करने लगा
झाड़ फूंक भी करवा लिया
टोने टोटके भी कर लिए
कुछ क़र्ज़ का सिन्दूर भी माथे पर लगा लिया
और अगली बार फिर नए
उत्साह के साथ एक नया सपना बुना
इस बार खेत में मुन्नू के जूते बोये
मुनिया की किताबें बो दिन
और रामवती के लिए एक साड़ी बो दी
एक बैल खरीदने का सपना बो दिया
और क़र्ज़ को चुकाने की कीमत बो दी
और लहू से अपने फिर सींच दिया
मगर ये क्या ...........इस बार भी
जाने कैसे किस्मत को खबर लग गयी
बाढ़ की भयावह त्रासदी में
सारी उम्मीदों की फसल बह गयी
मैं फिर खाली हाथ रह गया
कभी आसमाँ को देखता
तो कभी ज़मीन को निहारता
और खुद से इक सवाल करता
"ये मेरे साथ ही क्यों होता है ?"

इक दिन सुना
रामखिलावन ने परिवार सहित कूच कर लिया
क्या करता बेचारा
कहाँ से और कैसे
परिवार का पेट भरता
जब फाकों पर दिन गुजरते हों
फिर भी ना दिल बदलते हों
और कहीं ना कोई सुनवाई हो
उम्मीद की लौ भी ना जगमगाई हो
कैसे दिल पर पत्थर रखा होगा
जिन्हें खुद पैदा किया
पाला पोसा बड़ा किया
आज अपने हाथों ही उन्हें मुक्ति दी होगी
वो तो मरने से पहले ही
ना जाने कितनी मौत मरा होगा
उसका वो दर्द देख
आसमाँ भी ना डर गया होगा
पर कुछ लोगों पर ना कोई असर हुआ होगा
बेचारा शायद मर के ज़िन्दगी से मिला होगा
मेहनत तो किसान कर सकता है
मगर कब तक कोई भाग्य से लड सकता है


रामखिलावन का हश्र देख
अब ना शिकायत करता हूँ
और रोज तिल तिल कर मरा करता हूँ
जाने कब मुझे भी.................?
हाँ , शायद एक दिन हश्र यही होना है

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

सबकी विदाई के मंज़र हसीन नही होते

सुनो
कहाँ हो?
ये कैसे पल है?
ये कैसी उदासी है
देखो ना
जी नही पा रही
कभी कभी
चाह होती है ना
आम का बौर
मेरे आँगन मे भी खिले
कभी कभी
चाह होती है ना
कोई अहसास
सांस बनकर
मेरी रूह मे भी उतरे
कभी कभी
चाह होती है ना
कोई अपने
होठों की हंसी
मेरे लबों पर भी सजा दे
कभी कभी
चाह होती है ना
कोई मेरी दबी
ढकी इच्छाओं को
आसमान पर लगा दे
और मुझे भी
जीने की वजह दे दे
देखो ना
कितनी टूट रही हूँ
किरच किरच होने से पहले
एक बार आ जाओ
और मेरी तड्पती
तरसती बेचैन रूह को
करार दे जाओ
एक आखिरी अहसान ही कर जाओ
मगर तुम एक बार
आ जाओ ना

देख ना
आँख से आंसू भी
नही ढलक रहे
और हम रो भी रहे हैं
आ जा ना एक बार
इन आंसुओं को पोंछने
जो बहकर भी नही बह रहे

देखो
इतनी शिद्दत से तो कभी
आवाज़ नही दी थी ना
तुम जानते हो
कोई तो कारण होगा ना
शायद रूह आखिरी
सांस ले रही हो
शायद उम्र की आखिरी
जुम्बिश हो और
सांस की डोर
छूट रही हो
वो वक्त आने से पहले
रूह के साज़ पर
एक तराना गुनगुना जाओ
और मुझे कुछ पल के लिये ही सही
एक ज़िन्दगी दे जाओ
जानते हो ना
सबकी विदाई के मंज़र हसीन नही होते

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

शुक्रगुज़ार

ब्लोगजगत के सभी दोस्तों की हार्दिक शुक्रगुज़ार हूँ जिन्होने मुझे अपने स्नेह से अभिभूत किया और सही मार्गदर्शन दिया। आप सबकी बातों को स्वीकार करती हूँ और कोशिश करूँगी कि मेरी तरफ़ से आप सबको कोई तकलीफ़ ना हो।
हार्दिक आभार्।

बुधवार, 20 जुलाई 2011

चलिए आपसे मिली आखिरी सौगात उम्र भर याद रहेगी .

दोस्तों
समझ नहीं आता दुनिया कैसी है ? क्या सही बात का जवाब देना हंगामा कहलाता है ? कोई हमसे कुछ पूछे और हम यदि उसकी बात का जवाब दे दें तो क्या वो गलत बात है ? और खास कर जब आपको सब जानते हों और सब आपसे कुछ कह रहे हों तो क्या उनकी बात का जवाब ना देकर चुप रहना गलत नहीं होगा? क्या ये उन सबके प्रति अन्याय नहीं जिन्होंने आपको इतना चाहा हो, इतना मान दिया हो इतना स्नेह दिया हो ...........क्या उन सबके किसी प्रश्न का जवाब देना गुनाह है ..........उसे हंगामा कह देना कहाँ तक उचित है ? उसी में यदि कोई किसी बात का इशु बना रहा हो तो उसे भी सही ढंग से बात कह देना क्या गलत है क्योंकि इसी तरह गलतफहमियां पैदा होती हैं कुछ लोग दो लोगों के बीच इसी तरह गलतफहमियां पैदा कर देते हैं और यदि उस बात का जवाब दे दिया तो क्या गुनाह किया?
आप सब जानते हैं काफी वक्त से मैं चर्चामंच से जुडी रही . अब पिछले कुछ वक्त से मुझे लग रहा था कि मैं अब ढंग से चर्चा नहीं कर पाऊँगी तो इस बात का संकेत कई महीनों पहले से शास्त्री जी को देने लगी थी तो उनका कहना था कोई नहीं जब तक कर सकती हो करती रहो.............अब पिछली चर्चा सोमवार १८ जुलाई को लगायी जिसमे मैंने अपने जाने के संकेत सभी पाठकों को दे दिया ताकि कल को सब ये ना कहें कि आपने मेरी पोस्ट नहीं ली चर्चा मंच पर क्योंकि काफी पाठक कहते हैं इसलिए सूचित करने में क्या बुराई है ये सोच सबको लिख दिया जो शास्त्री जी को पसंद नहीं आया जब मैंने उन्हें चैट पर सूचित किया तो कहने लगे वहाँ क्यूँ लिखा तो मैंने यही बात कही तो कहने लगे इसलिए मैंने आपकी पोस्ट का शीर्षक नहीं बदला.........चलो कोई बात नहीं उसके बाद मैंने जब सभी पाठकों के कमेंट्स पढ़े तो उनमे से कुछ पाठकों ने तो मेरे पास भी अलग से भेजे और कुछ वहीँ देखे कि आप मत जाइये या आप पुनर्विचार करिए तब मैंने सोचा कि मुझे अपने जाने के कारणों को सबको बता देना चाहिए उन्हीं में एक कमेन्ट रविकर जी नए चर्चाकर हैं उनका था जिन्होंने मेरी एक पोस्ट निर्मल हास्य का जिक्र करके मेरे जाने को उससे जोड़ना चाहा अब तो जवाब देना बहुत जरूरी बन गया था कि कहीं इस वजह से गलतफहमियां ना हो जायें क्यूँकि मेरे और शास्त्री जी के बीच ऐसी कोई बात थी ही नहीं और इस तरह की बात तो विवाद को जन्म दे सकती थी या ग़लतफ़हमी कर सकती थी जिसका जवाब मैंने  सिर्फ उन्ही लोगों को दिया जिन्होंने मुझे रुकने के लिए कहा था ना कि हर टिप्पणीकर्ता को जो इस प्रकार था...........
दोस्तों

सबसे पहले तो मै सबको ये बताना चाहती हूँ कि आजकल मेरी व्यस्तता कुछ ज्यादा बढ गयी है जिस वजह से मै कोई काम सही ढंग से नही कर पा रही हूं जिस वजह से मैने ये निर्णय लिया है इसमे कोई ऐसी वैसी बात नही है क्योंकि मैने एक नयी श्रंखला शुरु की है एक प्रयास पर जिसके लिये मुझे काफ़ी वक्त चाहिये होता है उसे ऐसे ही तो नही लिखा जा सकता और इसका संकेत तो मै शास्त्री जी को काफ़ी वक्त से दे रही थी कि मै अब ज्यादा वक्त नही दे पाऊँगी ये सब कोई अचानक नही हुआ है और दूसरी बात अगले छह महीनो तक मेरा कथाओ मे जाना लगातार होना हैजिस वजह से भी मुझे बहुत मुश्किल होगी इसी कारण मैने ये निर्णय लिया है………जहाँ तक रविकर जी आप उस हास्य कविता की बात कर रहे हैं तो वो सिर्फ़ एक निर्मल हास्य ही है उसका इससे कोई लेना देना नही है क्योंकि शास्त्री जी तो खुद सक्रिय रहे हैं हमेशा तो उनके लिये क्यों कहा जायेगा…………हास्य को आप इस दृष्टि से देखकर सबके दिलो मे गलत संदेश दे रहे है जो गलत बात है………सब यही सोचेंगे कि मेरे और शास्त्री जी के बीच कोई अनबन हो गयी है जबकि हमारे बीच ऐसी कोई बात नही है सबकी अपनी मजबूरीयां होती हैं अगर शास्त्री जी चाहेंगे तो जब मै इन सबसे फ़्री हो जाऊँगी तो दोबारा भी सक्रिय होने का प्रयत्न करूँगी।
ये जानकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता हुई कि मुझे मेरे पाठक दोस्त कितना चाहते हैं उन सबकी मै तहेदिल से शुक्रगुज़ार हूँ।
 
अब बताइए इसमें मैंने ऐसी कौन सी बात कह दी जिससे हंगामा होने की वजह बन सकती थी?
क्या रविकर जी को इस बात को इस तरह कहना चाहिए था.........यूँ तो शास्त्री जी ने मेरी १८ जुलाई वाली पोस्ट अपने चर्चामंच से हटा दी है मगर मैंने अपने trash बॉक्स में से रविकर जी की वो टिप्पणी  निकाली है ताकि सच सबको पता चल सके जो इस प्रकार थी -----------

रविकर has left a new comment on your post "हो सकता है विदाई का वक्त आ रहा हो ……चर्चा मंच":

हो सकता है विदाई का वक्त आ रहा हो ||

शीर्षक कुछ समझ नहीं आया बन्दना जी |
क्या कोई संकेत दिख रहा है ??
हो सकता है ----
इस हो सकता है को कौन सुनिश्चित करता है ?
कृपया हमें भी संकेत समझने का संकेत देकर उपकृत करें || सादर ||


हाँ याद आया--
शुक्रवार ८ जुलाई को आप ने निर्मल हास्य प्रस्तुत किया था |
क्या यह संकेत तभी प्राप्त हो गया था |

मुझे इसलिए याद है --
क्योंकि मैंने भी टिप्पणी लिखी थी ||
नया हूँ कृपया मार्ग-दर्शन करें ||

ब्लॉगर ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

आद. वंदना जी,
चर्चाकार की व्यथा बयान करती निर्मल हास्य की कविता बहुत अच्छी लगी ,शायद इसलिए भी कि इसमें सच्चाई की खुशबू भी समाहित है !
आभार !

८ जुलाई २०११ १०:०० पूर्वाह्न
ब्लॉगर रविकर ने कहा…

आपका हार्दिक अभिनन्दन ||

आभार ||

८ जुलाई २०११ १०:२७ पूर्वाह्न
हटाएं
ब्लॉगर Dr Varsha Singh ने कहा…

हर कोई तुझे सिर्फ
चर्चाकार ही बुलाएगा
और तू अपना असली नाम भूल जायेगा
पर व्यवस्थापक तो मौज उडाएगा
सबसे बढ़िया जुगाड़ है ये
सबको काम पर लगा देना
और खुद नाम कमा लेना


बहुत खूब...
करारा कटाक्ष....

८ जुलाई २०११ १०:४६ पूर्वाह्न
ब्लॉगर यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

आपकी एक पोस्ट की हलचल आज यहाँ भी है

८ जुलाई २०११ १०:४९ पूर्वाह्न
ब्लॉगर संतोष कुमार ने कहा…

vandana ji bilkul sahi kaha hai.

Aabhaar !!

८ जुलाई २०११ ११:३२ पूर्वाह्न
ब्लॉगर यादें ने कहा…

मिठाई में लपेटी,कड़वी सच्चाई .
वन्दना जी ,बधाई हो बधाई ||
शुभकामनायें !



Posted by रविकर to चर्चा मंच at July 18, 2011 4:39 PM

अब निर्मल हास्य को कोई इस तरह घसिटेगा ये तो मैं सोच भी नहीं सकती थी और उन्होंने आज हमारे बीच ग़लतफ़हमी कर दी मगर
मेरे दिल में ऐसी कोई बात नहीं थी तो मैंने सिर्फ सही बात कहकर बात ख़तम कर दी मगर मुझे अब लगता है कि शायद ग़लतफ़हमी तो पैदा कर दी गयी है शास्त्री जी के मन में ...........क्यूँकि उनका एक मेल मुझे मिला जिसमे उन्होंने मुझे इस तरह धमकाया है जैसे मैंने कोई बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो सच कहकर...........जो उन्होंने मुझे भेजा है वो इस प्रकार है.............


वन्दना जी!
जाने वाले ढंढोरा पीट कर नहीं जाते!
आप इस तरह से मेल क्यों भेज रहीं हैं?
इससे आपका अभिप्राय क्या है?
आप चर्चा मंच पर चर्चाकार के रूप में आयी आपका आभार!
मगर चली गईं हैं तो इतने हंगामें की क्या जरूरत है?
आखिर आप इस तरह से क्या साबित करना चाहती है ?
क्या आपके बिना चर्चा मंच बन्द हो जाएगा या आप जब यहाँ नहीं थी तो क्या चर्चा मंच पर पोस्ट नहीं लगती थी?
शुभकामनाएँ!

--
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
टनकपुर रोड, खटीमा,
ऊधमसिंहनगर, उत्तराखंड, भारत - 262308.
Phone/Fax: 05943-250207, Mobiles: 09368499921, 09997996437
Website - http://uchcharan.blogspot.com/

आज ये पढ़कर इतना दुःख हुआ कि पूछिये मत ..........आँख में आँसू आ गए कि सही बात को लोग किस दृष्टि से देखते हैं ..........मुझे भी पता है कि ना मेरे आने से या जाने से कहीं कोई फर्क नहीं पड़ने वाला..........ये तो शास्त्री जी एक छोटी सी जगह है मगर ये दुनिया इतनी बड़ी है जब इसे मेरे रहने ना रहने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला तो चर्चामंच के बारे में मैं ऐसा क्यूँ सोचूंगी? आपको इतना बुरा लगा कि आपने ऐसा सोच लिया और मेरी वो पोस्ट भी अपने मंच से हटा दी इसका क्या मतलब निकलता है? आप ही बता दें ? हाँ , आपके इस व्यवहार से मेरा दिल जरूर टूटा है क्यूँकि मैंने जब तक चर्चामंच लगाया दिलोजान से लगाया चाहे कितनी भी मजबूरी रही मगर काम किया ये सोच कर कि एक जिम्मेदारी है हमारी और आज भी ये जिम्मेदारी सही ढंग से नहीं निभा पाऊँगी यही सोचकर मना किया मगर रविकर जी ने जिस तरह बात बनाई और उसका आपने क्या अर्थ निकाला ये आप जाने मगर आपने उन्हें कुछ नहीं कहा बल्कि मुझमे ही दोष दिखा दिया............चलिए ये भी सीख लिया कि कैसे यहाँ की दुनिया में जीना है...............

आपने तो आज के चर्चामंच पर भी हमें ही कसूरवार ठहरा दिया ये कहकर की 

मुझे गर्व है कि आज हमारे पास ऐसा एक भी चर्चाकार नहीं है जो आपसे यह कहे कि आप चर्चा मंच पर आयें और ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ!
हाँ इतना जरूर है कि यदि किसी के ब्लॉग की चर्चा इस चर्चा पत्रिका में की जाती है तो यदि चर्चाकार चाहे तो वह सूचित कर सकता है कि आपके ब्लॉग की पोस्ट का लिंक हमने चर्चा मंच पर लगाया है। मगर यह बाध्यता नहीं होनी चाहिए कि लोग आयें और अपने सुझावों से हमें अवगत कराएँ या हमारा हौसला बढ़ाएँ!



अगर सबको सूचित करना बुरा था तो आप हमें पहले ही हटा देते तो ज्यादा अच्छा था मगर आज तो आपने बता दिया कि आपके दिल में हमारे लिए कितनी जगह रह गयी है मुझे तो काफी लोग कहा करते थे कि चर्चा में ऐसा नया करो वैसा करो मगर मैं कह देती थी कि शास्त्री जी का ब्लॉग है उनसे कहिये यदि वो कहेंगे तो कर दूंगी मगर आपको तो हमारा इस तरह सबसे कहना भी बुरा लगा जानकर आज दिल हद से ज्यादा दुखा है
चलिए आपसे मिली आखिरी सौगात उम्र भर याद रहेगी .

आज बस दिल इस ब्लॉगजगत से इतना दुखा है जितना पहले कभी नहीं दुखा कम से कम शास्त्री जी जैसे इन्सान से मुझे ये उम्मीद नहीं थी कि वो मुझसे ही इस तरह का व्यवहार करेंगे जिनके लिए मेरे दिल में इतना मान सम्मान है ........अगर सरल मन से सच कह देना गुनाह है तो हाँ मैंने गुनाह किया है ...............और अब यहाँ के किसी भी ब्लॉग से जुड़ने का मन ख़त्म हो गया है इसलिए यशवंत जी से अनुरोध है कम से कम वो तो मुझे अपनी हलचल से विदा दें क्यूँकि मैं इससे ज्यादा गम नहीं झेल सकती ...........दिल दुखता है ऐसी बातों से ...........जितने भी ब्लोग्स के साथ जुडी हूँ उन सबसे अनुरोध है मुझे अपने ब्लॉग के admin अधिकारों से अलग कर दें अब सिर्फ मैं अपने ब्लोग्स पर ही लिखूंगी.............

रविवार, 17 जुलाई 2011

देखना है अब नज़ारा

कर दिये बंद सारे दरवाज़े
खिडकियाँ झरोखे
समेट लिया खुद को
अन्तस मे
घुटने के लिये
देखना है अब नज़ारा
बिलबिलाते अन्तस के
टुकडे होते अस्तित्व का
और शोधन से उपजे
नये द्रव्य का परिमाण क्या होगा

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

ना जाने कब हम भारतवासी ईंट का जवाब पहाड से देना सीखेंगे?

वो तो रोज दीवाली मनायेंगे
कसाब के जन्मदिन मनायेंगे
सिर्फ़ देशवासी ही बेमौत मारे जायेंगे
आखिर दामाद बनाया है
तो कीमत तो चुकानी होगी
क्या हुआ जो ओबामा ने
दूसरे के घर जाकर वार किया
हम उनका अनुसरण तो करते हैं
मगर उनकी नीतियो पर नही चलते है
फिर उसकी कीमत तो चुकानी होगी
बेबसों को जान गंवानी होगी
निरीह जनता तो है ही मरने के लिये
कसाइयों के हाथ से कैसे बच पायेगी
अपनो के हाथों ही लुटती जायेगी
हम सिर्फ़ बातें करना जानते है
पर किसी पर ना वार करना जानते है
क्या हुआ भाई है ना हमारा
कैसे उन पर वार करें
क्या हुआ जो उसने हम पर वार किया
हम तो अपना सिर कटायेंगे
मगर उनको ना सरेआम
गोली लगवायेंगे
ना उनके हश्र का लाइव
टैलीकास्ट करवायेंगे
गर इतनी हिम्मत होती
तो देश की ना ये गत होती
बस कभी किसी के तो
कभी किसी के पीछे दुम हिलायेंगे
मगर कसाब हो या अफ़ज़ल गुरु
उन्हे ना फ़ांसी पर चढायेंगे
तो बताइये जब ईंट का जवाब
पत्थर से नही दे पाते
तो पहाड से कैसे दे पायेंगे
हम तो बस अपनो को मरवायेंगे………

सोमवार, 11 जुलाई 2011

देखा है तुमने कहीं जलता आशियाँ?

मेरे मन की वसुधा पर
अब घास उगती ही नही
फिर किस नेह जल से
सिंचित करोगे और किसे
देखो ना…………
हरियाली भी दम तोड चुकी है
और जमीन इतनी बंजर हो चुकी है
भावों की खेती भी नही होती
देखा है तुमने कहीं जलता आशियाँ?

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

निर्मल हास्य का आनंद लीजिये

निर्मल हास्य का आनंद लीजिये
चर्चाकारों की भी कुछ खबर लीजिये
व्यवस्थापक तो मौज उडाता है
बस बेचारा चर्चाकार फँस जाता है
व्यवस्थापक अपनी जिम्मेवारी
दूसरे के कन्धों पर ड़ाल
चैन की नींद सो जाता है
और बेचारा चर्चाकार
बेगारी में लग जाता है
ये कैसे सुनहरे जाल में फँस जाता है
ना निकल पाता है ना रह पाता है
बेबस जुबान ना खोल पाता है
अपने हाल पर रोता जाता है
पर मुफ्त के नाम पर कुर्बान हुआ जाता है
चर्चाकार को इतनी कीमत
तो चुकानी पड़ती है
अपनी नींद भी उड़ानी पड़ती है
सारा दिन भटकता फिरता है
हर ब्लॉग को पढता है
और उनमे से कुछ को
सेलेक्ट तो कुछ को रिजेक्ट करता है
किसी को हितैषी तो किसी को दुश्मन
दिखता है
जिसकी पोस्ट लेता है उसकी
बांछें खिल जाती हैं
जिसकी रह जाती हैं वो
आँखें तरेर लेता है
बेचारा चर्चाकार बुरा फँस जाता है
बेकार में नाम बदनाम  हो जाता है
मगर व्यवस्थापक मौज उडाता है
और चर्चाकार अपने ब्लॉग भी भूल जाता है
बस चर्चा में ही लगा रह जाता है
किसी को नाराज नहीं करना चाहता है
इसलिए दिन रात खटता रहता है
पर सबको संतुष्ट नहीं कर पाता है
पर व्यवस्थापक मौज उडाता है
हाय रे चर्चाकार तेरी यही कहानी
तेरी पीड़ा किसी ने ना जानी
सब करते हैं अपनी मनमानी
फिर क्यूँ करता है नादानी
मान जा प्यारे छोड़ नाम का मोह
अपने नीड में वापस आ जा
कर अपने ब्लॉग को इतना बुलंद
कि सभी व्यवस्थापक कहें
तेरा ब्लॉग तो हम खुद ले लेंगे
और तुझे सैल्यूट भी करेंगे
छोड़ माया मोह का फंदा
चर्चा की माया से निकल जा प्यारे
नहीं तो बहुत पछतायेगा
कहीं का नहीं रह जाएगा
हर कोई तुझे सिर्फ
चर्चाकार ही बुलाएगा
और तू अपना असली नाम भूल जायेगा
पर व्यवस्थापक तो मौज उडाएगा
सबसे बढ़िया जुगाड़ है ये
सबको काम पर लगा देना
और खुद नाम कमा लेना
एक को देख दूसरा भी
उसी राह पर चल निकलता है
व्यवस्थापक का धंधा
खूब फलता है
और चर्चा का मंच
जोर शोर से चलता है
पर बेचारा चर्चाकार
मुफ्त में फंसता है
ना कहे तो छवि बिगडती है
हाँ कहे तो कहीं का नहीं रहता है
साँप छछूंदर वाली हालात होती है
ना उगलता है ना निगलता है
पर व्यवस्थापक तो मौज उडाता है
और चर्चाकार बुरा फँस जाता है ...............



दोस्तों
ये निर्मल हास्य है इसे कोई भी गंभीरता से ना ले………बस कल कुछ देखकर ये ख्याल आया………तो आज इसी पर लिख दिया……कोई भी व्यवस्थापक या चर्चाकार इसे निजी तौर पर ना ले………कभी कभी ऐसी दिल्लगी भी होती रहनी चाहिये इससे आनन्द बना रहता है और सबको एक नयी ऊर्जा प्राप्त होती रहती है तो आपकी सेहत के मद्देनज़र है आज की ये दिल्लगी…………:)

बुधवार, 6 जुलाई 2011

घर साउंड प्रूफ बनवा लिया है

इक युग बीता
आवाजें देते देते
मगर लगता है
तुम तक पहुँचती
ही नहीं
कभी देखना
घर से बाहर
निकलकर
हर खिड़की.
हर दरवाज़े
की कुण्डियों पर
मेरी सदायें
लटकी मिलेंगी
इस आस पर
कभी तो तुम
उन कुण्डियों
को खोलोगे
मगर शायद
तुमने बाहर
आना ही छोड़
दिया है तभी
डाक कभी लौटकर
आई ही नहीं और
सदायें चौखट पर ही
दम तोड़ जाती हैं
लगता है तुमने
घर साउंड प्रूफ
बनवा लिया है

शनिवार, 2 जुलाई 2011

कैलेण्डर ज़िन्दगी का



दोस्तों 
ये कविता जुलाई माह के गर्भनाल अंक मे छपी है और अभी तक आपने इसे पढा भी नही है तो आज ये आपके समक्ष है। 


बुधवार, 29 जून 2011

ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

ये आस्तीन के साँपों की दुनिया
ये झूठे चालबाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

कभी झूठी बातें कभी झूठे चेहरे

कभी इन्सान को मिटाने के
करते हैं बखेड़े
हर एक शख्स झूठा
हर इक शय है धोखा
अपनों की भीड़ में छुपा है वो चेहरा
गर इसे पहचान भी जायें तो क्या है
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

कभी पीठ में खंजर भोंकती है दुनिया

कभी सच्चाइयों को रौंदती है दुनिया
हर तरफ फैली है नफ़रत की आँधी
हर ओर जैसे बिखरी हो तबाही
बंजर चेहरों में अक्स छुपाती ये दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है





अब चाहे मिटाओ या फूंक डालो ये दुनिया
मेरे किसी काम की नहीं है ये दुनिया 
बारूद के ढेर पर बैठी ये दुनिया  
किसी की कभी न होती ये दुनिया
कितना बचके चलना यहाँ पर
 किसी को कभी न बख्शती ये दुनिया 
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

रविवार, 26 जून 2011

क्या ऐसा होगा

ये सुबह ठहरती क्यों नही……
कब तक आस के मोती सम्हालूँ
जानते हो ना
तुम्हारी आस ही
ज़िन्दा रखे है
और तुम मेरी ज़िन्दगी की सुबह
जब तुम वापस आओगे
जानते हो ना
उसी दिन सुबह ठहरेगी मेरे आँगन में
कभी ना जाने के लिए ......तुम्हारी तरह
क्या ऐसा होगा ..........
मेरी आस का सूरज उगेगा........

और आसमां धरती पर उतरेगा
बताओ ना ...........
क्या ऐसा होगा
जब कुमुदिनी दिन में खिलेगी

गुरुवार, 23 जून 2011

पता नही क्यूँ

पता नही क्यूँ किनारा कर जाते हैं लोग
कुछ ऐसे मुझे आजमाते है लोग

जब भी मुझे अपना बनाते है लोग
फिर एक नया दगा दे जाते है लोग

अभी खुशफ़हमियों मे जी भी नही पाती
कि एक नयी हकीकत दिखा जाते है लोग

जिसे भी अपना समझ कदम बढाया मैने
उसी कदम पर ठोकर लगा जाते है लोग

दिल को मेरे खिलौना समझने वाले
रोज वो ही खिलौना तोड जाते है लोग

मै भी सिर्फ़ पत्थर नही एक इंसान हूँ
बस इतना सा ना समझ पाते है लोग

सोमवार, 20 जून 2011

आस्माँ रोज़ नही बदलता लिबास

तुम चाहते थे ना जीयूँ तुम्हारी तरह
लो आज तोड दीं सारी श्लाघायें
ढाल लो जिस सांचे मे चाहे
दे दो मनचाहा आकार
मगर फिर बाद मे ना कहना
नही चाहिये अपनी ही लिखी तहरीर
बदल दो फिर से कम्बल पुराना
जमीन रोज़ नही बदलती रूप
और तुम कहो कहीं फिर से
दे दो अपना पुराना सा
 रूप फिर से मुझे वापस
बताओ तो …………
एक बार टूटे साँचे कब जुडते हैं
कहाँ से लाउँगी मिट्टी को वापस
जानते हो ना……………
आस्माँ रोज़ नही बदलता लिबास

गुरुवार, 16 जून 2011

गर तूने ख्वाहिश की होती

तू खुश रहा वीरानों में
जगलों में पहाड़ों में
कभी ज़िन्दगी के
तो कभी
महफ़िलों के
हाँ महफ़िलों के भी
वीराने होते हैं
जब महफ़िल बाहर होती है
और दिल वीरान होते हैं
तू क्या समझता है
तेरे दिल की वीरान पगडंडियाँ
और वहाँ खड़े शुष्क पेड़ अरमानों के
तेरे अकेलेपन के गवाह
मुझे नहीं दीखते
अरे मेरी आँख की वीरानियों से
ही तो तेरी राहें गुजरती हैं
और छोड़ जाती हैं
अंतहीन निशाँ तेरी
हसरतों के
जिन्हें मैं अपनी पलकों
की कोरों पर सजा लेती हूँ
और करती हूँ इंतज़ार
उस पल का जिस दिन
तू खुद मुझसे मांगे
अपने सपनों को
अपनी ख्वाहिशों को
सच कहती हूँ………
तोड़ लाती चाँद आसमाँ से
गर तूने ख्वाहिश की होती

सोमवार, 13 जून 2011

वो जो शख्स रहता है मुझमे

वो जो शख्स रहता है मुझमे 
गर्मी की धूप सा जलता है मुझमे 
लावा जब कोई फूटता है उसमे
सुकूँ का इक दरिया बहता है मुझमे 
निकलती जब आह है उसमे 
डरता तब आसमान भी है उससे 
रेत भी समंदर नज़र आता है उसमे
दर्द से जब वो खिलखिलाता है मुझमे 
रौशनियों से जब लड़ता है मुझमे
अंधेरों को तब जीता है मुझमे 
वो जो शख्स रहता है मुझमे 
धूल भरी आँधियों सा चलता है मुझमे 

शुक्रवार, 10 जून 2011

आखिर कतरनें भी कभी सीं जाती हैं

इंतज़ार के पलों को
सींते सींते
बरसों बीते
मगर इंतज़ार है
कि बार बार
उधड जाता है
सीवन पूरी ही नही होती
 

कभी धागा कम पड़ जाता है
तो कभी सुईं खो जाती है
और अब तो
वो नाता भी नहीं बचा
जिसे सीने के लिए
उम्र तमाम की थी
आखिर कतरनें  भी
कभी सीं जाती हैं

मंगलवार, 7 जून 2011

इस देश का यारों क्या कहना……… ये देश है कसाबों का गहना

ये देश है भ्रष्टाचारियों का
सत्ता के लोलुपों का
इस देश का यारों क्या कहना
ये देश है कसाबों का गहना
यहाँ ए के 47 चलाने वाले
सर आँखों पर बैठाये जाते हैं
घर जँवाई बनाये जाते हैं
और घरवालो को घर से
निकाला जाता है
कार्यवाहियाँ की जाती हैं
बेमौत मरवाया जाता है
कानून का डर दिखाया जाता है
इस देश का यारों क्या कहना
ये देश है कसाबों का गहना

यहाँ पीठ मे छुरियाँ भोंकी जाती हैं
जनता की कमाई खायी जाती है
और जनता ही पिटवायी जाती है
इसी दिन के लिये तो जनता मे
चुनावो मे मिठाइयाँ बँटवाई जाती हैं
अब भुगतने का वक्त आया तो
जनता की गर्दने फ़ँसायी जाती हैं
जोर आजमाइशे अपनाई जाती हैं
और अपनी कुर्सियाँ बचाई जाती हैं
इस देश का यारों क्या कहना
ये देश है कसाबों का गहना

यहाँ झूठी शक्लें सरकारों की
यहाँ जय जयकार होती है कसाबो की
नित नित नये घोटाले होते हैं
स्विस बैंके मे पैसे जमा होते हैं
जाँच आयोग बैठाये जाते हैं
अपने कर्मी बचाये जाते हैं
सिर्फ़ ईमानदार मरवाये जाते हैं
देश हित की आवाज़ उठाने वाले ही
आन्दोलन चलाने वाले ही
जेल मे डलवाये जाते हैं
इस देश का यारो क्या कहना
ये देश है कसाबों का गहना

शनिवार, 4 जून 2011

देह की देहरी लांघी तो होती

सिर्फ देह की देहरी को ही
न पूजा होता
कभी इससे भी ऊपर
उठा होता
कभी देह की देहरी को
लाँघ पाया होता 
तो शायद इन्सान 
बन पाया होता
इस देहरी के पार
इक बार झाँका होता
तो मन का हर 
पता पा गया होता
वो जो इसी दहलीज पर
टूटता बिखरता रहा 
उस रिश्ते को कुछ तो
संभाल पाया होता
इसकी चौखटों पर टंगे
ख्वाबों की जलन को
जान पाया होता
कुछ पल उस ऊष्मा 
में खुद को झुलसाया होता
तो शायद  दर्द सहने का 
सलीका जान पाया होता
बेजुबान अश्रुकणों को 
कभी ऊँगली लगायी होती
तेज़ाब के कहर से
तेरी आँख भर आई होती
तू इक पल कभी 
वहां रुका होता तो 
मन के कोने में पड़ी
अपनी खंडित प्रतिमा
देख पाया होता
और जो सैलाब बरसों से
रुका पड़ा था
हर तटबंध को तोड़ता
तेरे आगोश में 
सिमट आया होता
बस सिर्फ एक बार तूने
देह की देहरी लांघी तो होती       

गुरुवार, 2 जून 2011

अब बुकमार्क जरूरी हो गया है

मैंने चाहा था
चाहतों पर
इक निशाँ
लगा दूं
तुम्हारे लिए
वैसे मोहब्बत को
निशानों की
जरूरत नहीं होती
मगर तुम ही
रास्ता भूलने लगे हो
शायद इसलिए
अब बुकमार्क
जरूरी हो गया है

मंगलवार, 31 मई 2011

हाय रे ब्लोगर तेरी यही कहानी

हाय रे ब्लोगर तेरी यही कहानी
हाथों मे कीबोर्ड और आँखो मे पानी
कैसे कैसे ख्वाब संजोता है
कभी पद्म श्री तो कभी पद्म विभूषण
की आस लगाता है
पर इक पल चैन ना पाता है
ये ब्लोगिंग की कैसी कहानी
कहीं है झूठ तो कहीं है नादानी
कोई खींचता टांग किसी की
तो कोई आसमाँ पर बैठाता है
किसी को धूल चटाता है तो
किसी को तिलक लगाता है
हाय रे ब्लोगिंग ये कैसी कारस्तानी
बड़े बड़ों को तूने याद दिला दी नानी
बेचारा ब्लोगर इसके पंजों में फँस जाता है
अपनों से जुदा हो जाता है
फिर टर्र टर्र टार्राता है
ब्लोगिंग के ही गुण गाता है
शायद कोई मेहरबान हो जाये
और दो चार टिप्पणियों का दान हो जाये
या कोई अवार्ड ही मिल जाये
और किसी अख़बार में उसका नाम भी छप जाए
इसी आस में रोज अपना खून सुखाता है
ब्लोगिंग का कीड़ा रोज उसे काट खाता है
और राम नाम की रटना छोड़
रोज ब्लोगिंग ब्लोगिंग गाता है
नाम के फेर में पड़ कर
की बोर्ड चटकाता है
मगर चैन कहीं ना पाता है
हाय रे ब्लोगर तेरी यही कहानी
हाथों मे कीबोर्ड और आँखो मे पानी

शनिवार, 28 मई 2011

जब से तेरी प्रीत की झांझर डाली है पांव मे

जब से तेरी प्रीत की
झांझर डाली है पांव मे
ठहर गये हैं दिल की
मुंडेर पर ठिठक कर
बता कैसे तेरे सपनों
की ताजपोशी करूँ
कौन सी महावर सजाऊँ
कौन सा अल्पना लगाऊँ
कि चल पडें लोक लाज छोडकर

बुधवार, 25 मई 2011

किसी रेत में आशियाँ बनता ही नहीं

वो आग ना मिली
जो जला सके मुझे
वो रेत ना मिली
जो दबा सके मुझे
वो पानी ना मिला
जो बहा सके मुझे
फिर कहो तुम
कैसे मिल गए
अब बह भी रही हूँ
दब भी रही हूँ
और जल भी रही हूँ
मगर अंतर्मन है कि
कभी राख होता ही नहीं
वहां की मिटटी अभी भी
सूखी है
किसी रेत में
आशियाँ बनता ही नहीं




शनिवार, 21 मई 2011

बताओ ना क्या कहती हो तुम मुझसे…………300 वीं पोस्ट

हाँ......
कहो.............
क्या कहा...........
समझ नहीं आ रहा
कुछ स्पष्ट कहो ना
तुम्हारे शब्द अस्पष्ट हैं
अस्पष्ट शब्दों के अर्थ
अनर्थ को जन्म देते हैं
कुछ कहती तो हो
मगर समझ नहीं पाती
कब से कह रही हो
कब तक कहती रहोगी
और मैं तुम्हें सुनती हूँ
मगर समझ नहीं आती हो
कैसी पहेलियाँ सी बुझाती हो
कभी सब कह जाती हो
कभी सिर्फ कानों में मंत्र सा
फूंक जाती हो
मगर उस मंत्र के
उच्चारण में होने वाली अशुद्धि
फिर वहीँ ले आती है
जहाँ से चलती हूँ
कहो कैसे जानूं तुम्हें
कैसे तुम्हारी अनकही समझूं
कौन सी चेतना जगाऊँ
जो तुम्हारे अनकहे शब्दों को
साकार कर दे
ना जाने क्या चाहती हो
जब कहती हूँ
आओ गले लगा लूँ तुम्हें
तो दूर छिटक जाती हो
और जब तुम से भागती हूँ
तो करीब चली आती हो
कितने ही प्रलोभन दिखाती हो
अपनेपन का आभास कराती हो
मगर जैसे ही तुम्हारी तरफ
कदम बढाती हूँ .......तुम फिर
ना जाने किस मोड़ पर
मुड जाती हो
और मैं फिर एक
गुबार में खो जाती हूँ
और अपना अक्स भी
धुंधलाने लगता है
मगर तुमको ना
पकड़ पाती हूँ
और ना ही
समझ पाती हूँ
आखिर तुम मुझसे
चाहती क्या हो
हाँ .........तुम्हारी ही
बात कर रही हूँ
क्यूँकि तुम हो
तो मेरा अस्तित्व है
और तुम नहीं
तो मेरा वजूद
मेरी रूह
का कहीं कोई
मोल नहीं
बताओ ना
क्या कहती हो
तुम मुझसे
ए मेरी ज़िन्दगी ?

शुक्रवार, 20 मई 2011

आखिर पतझड मे कब पेड हरे हुये हैं?

क्या हुआ जो भुला दिया तुमने
क्या हुआ जो कोई राह नही मुडती
मेरे चौबारे तक
क्या हुआ जो कंक्रीट का जंगल
बन गया दिल मेरा
क्या हुआ जो आस का सावन
नही बरसा मेरे ख्वाबों पर
क्या हुआ जो हवा का रुख
बदल गया
नही छुआ तुम्हारा दामन उसने
नही पहुंचाई कोई सदा तुम तक
क्या हुआ जो तेरी महक
फ़िज़ाँ मे नही लहराई
कोई फ़र्क नही पडता
कुछ फ़िज़ाओं पर
मौसम का असर नही होता
और जहाँ पतझड उम्र के साथ
ठहर गया हो
वहाँ कोई फ़र्क नही पडता
आखिर पतझड मे कब पेड हरे हुये हैं?

बुधवार, 18 मई 2011

नीम हर दर्द की दवा नहीं होता

वेदना को शब्द दे सकती
तो पुकारती तुम को
शायद नीम के पत्ते
तोड़ लाते तुम और
लगा देते पीस कर
मेरे ज़ख्मो पर
जानती हूँ
नीम भी बेअसर है
मगर तुम्हारी
खुशफहमी तो दूर
हो जाती और शायद
मेरी वेदना को भी
खुराक मिल जाती
मगर शायद तुम नहीं जानते
नीम हर दर्द की दवा नहीं होता
क्या ला सकते हो कहीं से
मीठा नीम मेरे लिये?

सोमवार, 16 मई 2011

सूद के साथ मूल भी छीन लेती है

ज़िन्दगी जब भी करवट लेती है
सब कुछ नेस्तनाबूद कर देती है
कभी जीने का पता नही देती है
कभी मरने का ठिकाना नही देती है
कभी आईने मे अक्स दिखा देती है
कभी अक्स को आईने मे छुपा देती है
नाज़ था जिन गुंचों पर माली को
उन्हे ही दामन से छीन लेती है 
सब कुछ छीनने के बाद ही
ज़िन्दगी जीने को उम्र देती है 
ना दिन को सहर देती है 
ना रात को कहर देती है
खून के घूंट पीने के बाद ही
अमृत का कलश देती है 
मगर अमर होने की चाहत  
को तेज़ाब मे घोल देती है 
कभी दोस्ती के भरम मे 
दुश्मनी निभा देती है 
ज़िन्दगी ज़िन्दगी को 
कुछ यूँ भरमा देती है 
कयामत ना आती गर 
गैरों से खाते घात 
ज़िन्दगी तो अपनो से 
दिलाती है मात 
कभी रुसवाईयों के  
अंधेरो मे धकेल देती है 
कभी दुश्वारियों से 
दामन भर देती है 
सूद के साथ  
मूल भी छीन लेती है
मंजी हुई व्यापारी सी  
ज़िन्दगी, ज़िन्दगी भी छीन लेती है

शनिवार, 14 मई 2011

कुछ मर कर देखा जाये

 जीकर बहुत देख लिया
कुछ मर कर देखा जाये
इक बार मौत को भी
गले लगाकर हंसाया जाये

डर गये क्या मौत की तस्वीर देख
देख हम तो रोज मुलाकात करते हैं
हम हँसे ना हँसे गम नही मगर
मौत को रोज़ हँसाया करते हैं


ज़िन्दगी का उधार किश्तों में चुकाकर
जीने का क़र्ज़ उतार चुके अब
मौत जो हमदर्द है अपनी, गले लगा
 कुछ उसका भी क़र्ज़ चुकाया जाये



आ आज मौत को भी 
कुछ पल के लिए हंसाया जाये

रविवार, 8 मई 2011

माँ …………मुझे तुझमे इक बच्चा नज़र आता है

माँ 
आजकल मुझे तुझमे
इक बच्चा  नज़र आता है
आजकल बच्चे का 
प्रतिरूप दिखती है मुझे 
वो ही सब तो 
करती हो तुम भी
देखो न
तुम्हारे शब्द 
तुतलाने लगे हैं
तुम्हारी भाषा 
अस्पष्ट हो गयी है
और मैं उसे
समझने के प्रयास में
उसके अर्थ ढूंढती हूँ
बिलकुल उस तरह
जिस तरह शिशु की 
भाषा उसकी माँ के लिए
पहेली होती है
मगर फिर भी वो
समझने का 
प्रयास करती है

बच्चे के लिए 
उसका अच्छा बुरा 
माँ ही समझती है
कुछ ऐसे ही 
तुम्हारी बहुत सी बातें
जो तुम्हारे लिए 
सही नहीं होतीं
मुझे छोडनी पड़ती हैं
तुम्हारे मन का 
नहीं कर सकती 
तुम्हारी सेहत की
चिंता है मुझे
मगर कह नहीं सकती 
और रोकना पड़ता है तुम्हें
तब बहुत सालता है
मेरे मन को 
मगर जो बच्चे के लिए
अच्छा होता है
वो ही तो माँ करती है 
बस वैसे ही मुझे
तुझे सहेजना पड़ता है
मगर माँ तो नहीं
बन सकती न
इसलिए कुछ 
मानना भी पड़ता है
कुछ अनसुना 
करना पड़ता है

शिशु कैसे
खुद -ब-खुद 
बोलता रहता है
न जाने क्या- क्या 
और कभी - कभी 
एक ही बात को
बार - बार दोहराता है
मगर उसे सुनकर
माँ खुश होती है
मगर माँ 
जब तुम ऐसा करती हो
तब कभी - कभी मैं
परेशान हो जाती हूँ
तुमसे कुछ 
कह नहीं पाती हूँ
इसलिए कहती हूँ 
माँ नहीं बन पाती हूँ
बेटी हूँ न 
माँ नहीं बन सकती 
लेकिन फिर भी 
मुझे तुझमे
इक बच्चा नज़र आता है      

शुक्रवार, 6 मई 2011

मोस्ट वांटेड "अन्नाभाई किड्नैप्ड"

आज की ताज़ा खबर 
आज की ताज़ा खबर
ब्लॉगजगत का भाई
यानि "अन्नाभाई किड्नैप्ड"
उर्फ़ अपना "मुन्नाभाई" 
आज की ताज़ा खबर
ब्लॉग ब्लॉग पर शोर था
अन्नाभई का जोर था
ब्लोगरमीट कराता था 
पुरस्कार दिलवाता था
अपनी पुस्तकें छपवाता था
नाम खूब कमाता था
बेनामियों से देखा न गया
अन्नाभई किडनैप हो गया 
जब से ऐलान करवाया था
नयी किताब छपवायेंगे
कवी कवयित्रियों को 
पहचान दिलवाएंगे
ब्लोगवुड को चढ़ा बुखार था
मुफ्त का चन्दन
कौन न घिसना चाहता था
हर कोई अपना भाग्य
आजमाना चाहता था 
मगर न जाने कैसे
दुश्मनों को खबर
लग गयी थी
अन्नाभाई की किस्मत
पलट गयी थी
उनके हत्थे चढ़ गया था
बेनामियों मे फ़ंस गया था
वकील , पत्रकारों और ब्लोगरों 
का लगा जमावड़ा था
अननाभई के नाम का
हर कोई गा रहा गुणगान था
आनन् फानन कमेटी बिठाई गई
अन्नाभई की सीट
किसे दिलवाई जाये
तय करना जरूरी था
ब्लॉगजगत के हित के लिए
एक ब्लोगनेता का होना
भी जरूरी था
आखिर जिसकी टांग खिंची जा सके
वक्त पर मुर्गा बनाया जा सके
इस आचार संहिता के लिए
एक बकरा तो बलि चढ़ना था  
अजय झा का नाम भी मशहूर था 
अन्नाभई की सीट का
ये भी प्रबल दावेदार था
राजीव तनेजा भी व्यंगकार है
अन्नाभाई का साझीदार है
चलो सीट इसे दिलवाते हैं
सूली पर इसे ही चढाते हैं
जैसे ही घोषणापत्र प्रस्तुत हुआ
अन्नाभाई का पुनः आगमन हुआ
और सपना मेरा टूट गया
हाय ! सपना मेरा टूट गया  
     
    

बुधवार, 4 मई 2011

कँवल ऐसे भी खिलाये जाते हैं .............

नहीं सजाती आस्मां को दरख़्त पर
नहीं बोती अरमानों के बीज मिटटी में
नहीं देखती वक्त की परछाइयाँ किताबों में
नहीं मुडती कोई राह अब अंधेरों में
ना ही गुजरे कल की संदुकची खोलती हूँ
...ना ही आने वाले कल के लिए
अरमानों के शामियाने टंगवाती हूँ
अब ना कल के सफ़हे पलटती हूँ
ना ही कल के आगमन में
ख्यालों के दीप जलाती हूँ
अब ना विगत का अफ़सोस
ना आगत का दुःख
सीख लिया है जीना मैंने वर्तमान में
कँवल ऐसे भी खिलाये जाते हैं .............

रविवार, 1 मई 2011

बता दे कोई…………

मोहब्बत कैसे होती है
बता दे कोई
हमे तो मोहब्बत ने
हर कदम रुसवा ही किया

किसी को कैसे
अपना बनाया जाता है
सिखा दे कोई
हमे तो हर किसी ने
हर कदम धोखा ही दिया

कैसे पतझड मे
गुलाब खिलाये जाते हैं
उगा दे कोई
हमे तो हर जगह 
जमीन बंजर ही मिली
 

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

जो बचता है शून्यता के बाद भी

शून्य शून्य और सिर्फ़ शून्य
पता नही फिर भी लगता है
कुछ बचता है कहीं शून्य से परे
स्वंय का बोध
या कोई कडी
अगली सृष्टि की
अलग रचना की
अलग सरंचना की
कुछ तो ऐसा है जो
बचता है शून्य के बाद भी
शून्य से शून्य मे समाना
बदलना होगा इस विचार को
खोजना होगा उस एक तारे को
उस नव ब्रह्मांड को
उस नव निर्माण को

जो बचता है शून्यता के बाद भी

जो मिट्कर भी नही मिटता

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

एक नया इतिहास रचने

मौन की भाषा
अश्रुओं की वेदना
और मिलन ?
कैसे विपरीत ध्रुव
कौन से क्षितिज
पर मिलेंगे
ध्रुव हमेशा
अलग ही रहे हैं
अपने अपने
व्योम और पाताल में
सिमटे सकुचाये
मगर मिलन की आस
ये तो मिलन का
ध्रुवीकरण हो जायेगा ना
बस तुम भी खामोश रहो
मैं भी खामोश चलूँ
संग संग नि:संग होकर
एक नया इतिहास रचने
चलो हम चलें
शायद तब कोई
नयी कविता जन्मे
और हमें
नए आयाम दे

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

दरिया वापस नही मुडा करते

मै तो आज भी
वहीं उसी मोड पर
खडी हूँ
जहाँ समय ने
तुम्हे मुझसे
...छीना था
मगर तुम ही
ना जाने कब
और कैसे
समय के साथ
बह गये
दरिया वापस
नही मुडा करते

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

हाँ ..........बचपन याद आ गया

एक बेफ़िक्री का आलम होता था
वो छत पर सोना तारों को निहारते हुये……
वो बारिश मे भीगना सखियों संग
वो नीले आकाश मे
पंछियों को उडते चहचहाते देखना
रात को हवा ना चलने पर
 पुरो के नाम लेना
वो सावन मे झूलों पर झूलना
कभी धूप मे खेलना
तो कभी शाम होते ही
छत पर धमाचौकडी मचाना 
कभी पतंगो को उडते देखना
तो कभी उसमे शामिल होना ,
कभी डूबते सूरज के संग
उसके रंगो की आभा मे खो जाना ,
कभी गोल गोल छत पर घूमना
और अपने साथ - साथ
पृथ्वी को घूमते देखना और खुश होना
आह! बचपन तेरे रंग निराले
सुन्दर सुन्दर प्यारे प्यारे
मगर अब ना दिखते ये नज़ारे
मेरे बच्चे ना जान पायेंगे
ये मासूम लम्हे ना जी पायेंगे
यादो मे ना संजो पायेंगे
आज न वो खेल रहे
न वो वक्त रहा   
पढाई  के बोझ तले
बचपन इनका दब गया  
उम्र का एक हिस्सा 
जो मैंने जी लिया
कैसे बच्चे जान पाएंगे  
सिर्फ यादों में बसर रह पाएंगे
एक सुखद अहसास का दामन
जिनका यादो मे बसेरा है
आज एक बार फिर
मुझे मुझसे मिला गया
मुझे भी बचपन याद आ गया
हाँ ..........बचपन याद आ गया 


सोमवार, 11 अप्रैल 2011

स्वादहीन फ़ीका बासी खाना लगती है ज़िन्दगी


स्वादहीन फ़ीका बासी खाना लगती है ज़िन्दगी
जब तक कि रूह के चौबारे पर ना उतरती है ज़िन्दगी

ये सब्ज़ियों के पल पल बदलते स्वाद मे उतरती है ज़िन्दगी
जब तक कि आत्मिक स्वाद को ना चखती है ज़िन्दगी

ये देवताओं सा अच्छा बुरा फ़ल देती है ज़िन्दगी
जब तक कि देवाधिदेव से ना मिलती है ज़िन्दगी

ये दिवास्वप्न सा भ्रमित करती है ज़िन्दगी
जब तक कि समाधिस्थित ना होती है ज़िन्दगी

ये अवसान मे भी बहुत उलझती है ज़िन्दगी
जब तक कि गरल को भी न अमृत समझती है ज़िन्दगी

ये भोर को भी अवसान समझती है ज़िन्दगी
जब तक कि जीने का मर्म ना समझती है ज़िन्दगी

ये संसार के झूठे मायाजाल मे उलझती है ज़िन्दगी
जब तक कि नीम के औषधीय गुण ना समझती है ज़िन्दगी

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

गरीबी के सिर्फ़ आंकडे होते हैं

गरीबी के सिर्फ़ आंकडे होते हैं………आकलन नही
नसीब का सिर्फ़ एकाउंट होता है………बंटवारा नहीं
हुस्न के सिर्फ़ नखरे होते हैं………हकीकत नही
मोहब्बत के सिर्फ़ सपने होते हैं………पैमाने नही
 
 
शब्दों का आलिंगन रोज करती हूँ
तब कुछ देर के लिये जी लेती हूँ
ये शब्द ही हैं जो हमे
जीने की कला सिखाते हैं
कभी शब्द रूह बन जाते हैं
कभी रूह शब्दो मे उतर आती है
 
 
अपनो के हाथ का मारा है हर शख्स
ज़िन्दा है मगर ज़िन्दगी का मारा है हर शख्स
मौसम सी बदल जाती हैं शख्सियतें 
मिज़ाज़पुरसी की चाहत का मारा है हर शख्स
 




कमबख्त कौन से युग मे पैदा हो गया 
जहाँ साया भी अपना होता नहीं
फिर गैर तो गैर ही होते हैं 
उम्र भर ये ही नही जान पाया 
बदनामी ओढ कर 
इंसानियत के चोले मे 
वजूद को ढांप कर सो गया
कमबख्त कौन से युग मे पैदा हो गया

 

 

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

कहीं देखा है ऐसा आशियाना ?

ए मेरे ख्वाब
डरती हूँ
तुझे साकार करने से
कहीं ज़माने की
नज़र ना पड़ जाये
कहीं कोई दूजा
तुझे ना नैनों से
चुरा ले जाये
कहीं कोई
और आँख
ना तुझे भा जाए
और मेरा वजूद
जो मैं
तुझमे देखती हूँ
किसी और की
आँख का खवाब
ना बन जाए
और मेरी नज़र
रीती ही रह जाये
कभी कभी
चाह होती है
तुझे पाने की
तुझे देखने की
तुझे आकार देने की
मगर डरती हूँ
इसलिए ना
नैन बंद करती हूँ
सिर्फ तुझे
अपने अहसास में ही
जी लेती हूँ
दिल का हर हाल
कह लेती हूँ
कुछ इस तरह
गुफ्तगू कर लेती हूँ
क्या देखा है
तूने मुझे कभी
ए  ख्वाब
हवाओं में उड़ाते हुए
बादलों पर तैरते हुए
आसमानों को छूते हुए
किसी फूल की खुशबू
सहेजते हुए
किसी से दिल लगाते हुए
किसी को अपना बनाते हुए
किसी से दिल की कहते हुए
किसी के अश्कों में बहते हुए
किसी के दिल की धड़कन
बनते हुए
नहीं ना ............
डरती हूँ ना
ख्वाब सजाने से
तुझे आकार देने से
इसीलिए तुझे सिर्फ
अहसासों में पिरो लिया है
अब हर पल
हर सांस के साथ
हर धड़कन के साथ
आँख की पुतली
 बन रहता है
नज़र ना किसी को
आता है
मगर मेरे संग संग
रहता है
कहीं देखा है
ऐसा आशियाना ?

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

छलावा

तू और तेरी याद
इक छलावा ही सही
छले जाने का भी
अपना ही मज़ा होता है
ज़िन्दगी रोज़ मुझे
छलती है----सोचा
इक रोज़ ज़िन्दगी को
छल कर देखूँ
और कौन ……तुम ही तो हो
मेरी ज़िन्दगी
मेरी याद
मेरी रूह
मेरा चैन
मेरे आरोह
मेरे अवरोह
तो क्या हुआ
जो इक बार
खुद से खुद को
छल लिया
जीने के लिये
कुछ तो वजह
होनी चाहिये

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

आज मूर्खोत्सव कुछ ऐसे मनाया

आज मूर्खोत्सव कुछ ऐसे मनाया
उनको बिना तेल पानी के झाड़ पर चढ़ाया
बिना बात ही उन्हें सरताज कह दिया
मानो आज तो उन्हें कोहिनूर मिल गया
ख़ुशी के मारे ऐसे उछल रहे हैं
जैसे उल्लू दिन में देख रहे हैं
आज उन्हें अपना lifeguard बताया
फिर तो जैसे आसमाँ जमीन पर उतर आया
बिना संगीत के आगे पीछे नाच रहे हैं
पाँव ना जमीन पर पड़ रहे हैं
अब उन्हें लिस्ट पकड़ा दी है
शौपिंग , outing , खाने पीने का
सारा प्लान समझा दिया है
बिना मेहनत के रंग जमा दिया है
आज के दिन का फायदा उठा लिया है
उनको महामूर्ख का ख़िताब दिला दिया है
तो तुम भी गुरु हो जाओ शुरू
बना लो दिन को दिवाली
एक पांसा फेंको और तमाशा देखो
महामूर्ख दिवस का कमाल देखो
अपने अजीजों को बेहाल देखो