मुसाफिर मिलते रहे
कारवां बनता रहा
हर मोड़ पर
एक नया मुसाफिर मिला
जिसने एक नया
रिश्ते का पौधा लगाया
उसे मैंने दिल की
धडकनों से सींचा
दिल के साथ साथ
रिश्ता पनपता रहा
जो कहता था
जी नहीं सकूँगा तुम बिन
वो रिश्ता मुँह मोड़ कर
कब चला जाता
पता भी ना चलता
और मैं पगली
उस रिश्ते को तब भी
अपनी धड़कन समझती
उसे दिल से लगाकर रखती
ये सोच शायद कभी तो
रिश्ता लौटेगा अपने दरख़्त पर
और खुद को भरमा देती
हर बार दिल को यही
तसल्ली देती -------नहीं
इस बार ऐसा नहीं होगा
इस बार ऐसा नहीं होगा
हर बार ठोकर खाती
खुद को संभालती
और चलने लगती
एक नए पौधे को रोंपने के लिए
फिर एक ज़ख्म खाने के लिए
एक बार फिर किस्मत से लड़ने के लिए
खुद को परखने के लिए
खुद को जानने के लिए
आखिर किस चीज का बना है ये दिल
जो कभी टूटता ही नहीं
किसी को बद्दुआ देता ही नहीं
शायद रिश्ते बोने की आदत पड़ चुकी है