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सोमवार, 22 अगस्त 2011

मेरे ह्रदय मे जनम तुम लो ना




आओ मोहना मनमोहना
मेरे ह्रदय मे जनम तुम लो ना-2-

श्याम सोहना बाँका मोहना
बाँकी छवि इक बार दिखलाओ ना-2-


मुरली बजाओ ना रास रचाओ ना
अपनी राधा मुझे भी बनाओ ना-2-


श्याम आओ ना प्रीत बढाओ ना
मेरा मनरूपी माखन चुराओ ना-2-


हाथ बढाओ ना गले लगाओ ना
प्यारे मुझको भी अपना बनाओ ना-2-


प्यास बुझाओ ना तृष्णा मिटाओ ना
मेरी प्रीत को सफ़ल बनाओ ना-2-

शनिवार, 20 अगस्त 2011

शायद रिश्ते बोने की आदत पड़ चुकी है

मुसाफिर मिलते रहे
कारवां बनता रहा
हर मोड़ पर
एक नया मुसाफिर मिला
जिसने एक नया
रिश्ते का पौधा लगाया
उसे मैंने दिल की
धडकनों से सींचा
दिल के साथ साथ
रिश्ता पनपता रहा


जो कहता था
जी नहीं सकूँगा तुम बिन
वो रिश्ता मुँह मोड़ कर
कब चला जाता
पता भी ना चलता
और मैं पगली
उस रिश्ते को तब भी
अपनी धड़कन समझती
उसे दिल से लगाकर रखती
ये सोच शायद कभी तो
रिश्ता लौटेगा अपने दरख़्त पर
और खुद को भरमा देती

 हर बार दिल को यही
तसल्ली देती -------नहीं
इस बार ऐसा नहीं होगा
इस बार ऐसा नहीं होगा


हर बार ठोकर खाती
खुद को संभालती
और चलने लगती
एक नए पौधे को रोंपने के लिए
फिर एक ज़ख्म खाने के लिए
एक बार फिर किस्मत से लड़ने के लिए
खुद को परखने के लिए
खुद को जानने के लिए
आखिर किस चीज का बना है ये दिल
जो कभी टूटता ही नहीं
किसी को बद्दुआ देता ही नहीं
शायद रिश्ते बोने की आदत पड़ चुकी है



मंगलवार, 16 अगस्त 2011

कांग्रेस सत्ता छोडो लोकतंत्र का गला ना घोंटो

कहाँ है लोकतंत्र?
क्या ऐसा होता है लोकतंत्र?
क्यों खुद को भरमा रहे हो
अब आगे आना होगा
सरकार को दिखाना होगा
अपने वर्चस्व के लिये लडना होगा
देखते जाओ अब ये चिंगारी क्रांति बन भडकेगी
सरकार के हर भ्रष्टाचारी को जकडेगी
अब मशाल जला लेना
मगर ना इसे बुझने देना
एक अन्ना पकडा जाये चाहे
तुम 121 करोड अन्ना पैदा कर देना
मगर अब ना इसे बुझने देना
सरकार को बता देना
लोकतंत्र की परिभाषा सिखा देना
मगर इस बार ना तुम चुप होना
इंकलाब लाकर रहना
ये देश तुम्हारा है
सरकार को बता देना
उसे भी आईना दिखा देना
अब ना लूट खसोट चलेगी
पाप का घडा फ़ूट कर रहेगा
जनता का ही राज रहेगा
ये हमे दिखलाना है
मुट्ठी की ताकत बतलाना है
जो चिंगारी जलाई आज
मगर अब ना इसे बुझने देना
अब सिर्फ़ यही कहना

भ्रष्ट सरकार से नाता तोडो
देश को एकसूत्र मे जोडो
कांग्रेस सत्ता छोडो
लोकतंत्र का गला ना घोंटो

शनिवार, 13 अगस्त 2011

सुना है आज रक्षाबंधन है

सुना है आज
रक्षाबंधन है
एक धागे में सिमटा
भाई बहन के प्यार का बँधन
जो धागे का मोहताज नहीं होता
सिर्फ स्नेह की तार में लिपटा
एक अनोखा बँधन
मगर पता नहीं
यहाँ तो कोई ख्याल उपजता ही नहीं
कभी किसी ने मरुभूमि को सींचा ही नहीं
जाना ही नहीं बदलियाँ कैसे बरसती हैं
मेह में मरुभूमि कैसे भीगती है
कभी कोई बदली छाई ही नहीं
कभी सावन की रुत यहाँ आई ही नहीं
नहीं जाना कभी कैसे मन पंछी
दिनों पहले उड़ने लगता है
नहीं जाना कैसे द्रौपदी के चीर का ऋण
कृष्ण उतारा करते हैं
 शायद कुछ कलाईयों को
धागे नहीं मिला करते
या कुछ धागों को कलाइयाँ
कुछ अहसास हमेशा बंजर ही रहते हैं
कुछ आंगनो से बादल भी कतरा के निकल जाते है
या शायद मरुभूमि में कैक्टस ही उगा करते हैं

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

अब ऐसा देश है मेरा



'मैंने उसे देखा
...लैपटाप लिए
चैट करते .......''
अब भिखारी भी
चैट करते हैं
पेट की आग से
नही जलते हैं
बस चैटिंग को
तरसते हैं
आम इंसान से ज्यादा
ये कमाई करते हैं
गये वो ज़माने जब
कोई तोडती पत्थर थी
खून को पसीने मे
बहाती थी
आज एयर कंडीशन
गलियारों मे
भिखारी भी बसते हैं
देखो कैसा बदला
देश है मेरा
जिसने बदला
वेश है सारा
भिखारी भी
हाइ-टैक हो गये हैं
टैक्नोलोजी की कीमत
समझ गये हैं
अब ऐसा देश है मेरा
आगे बढता देश है मेरा




दोस्तों
मुझे ये फ़ोटो फ़ेसबुक पर मेरे दोस्त आशुतोष ने भेजी और कहा कुछ 
लिखो इस पर तो जो भाव इसे देखकर आये आपके सम्मुख हैं।

सोमवार, 8 अगस्त 2011

जो रह गया था अधूरा

जो रह गया था अधूरा 
आज हो गया पूरा
साफ़ आवाज़ मे 
एक बार फिर सुनिये
सार्थक बातचीत
इस लिंक पर 


 

गुरुवार, 4 अगस्त 2011

आसान नही होता

कभी देखा है
कहीं भी
भोर को ठिठकते हुये
या सांझ को रुकते हुये
अनवरत चलते रहना
बिना विश्राम किये
सफ़र तय करना
आसान नही होता
एक तय समय सीमा मे बंधना
जीवन चक्र को
निरन्तरता प्रदान करना
आसान नही होता
हर चाहत को
निशा की स्याह चादर मे
दफ़न करना
और फिर भोर मे
अपने अश्रु कणों को
ओस मे परिवर्तित देखना
आसान नही होता
यूं ही दिनो को महीनो मे
महीनो को सालो मे
और सालो को युगो मे
बदलते देखना
मगर अंतहीन सफ़र
तय करते जाना
आसान नही होता
नही पता क्या
एक लक्ष्यहीन सफ़र के
नसीब मे मंज़िलें नही होतीं
सिर्फ़ मरुस्थल की
मृगमरिचिका होती है