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शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

तब तक मेरी भावनाओं से खेलना तुम्हारा अपराध नहीं

आओ खेलो मेरी भावनाओं से 
ठगो मेरे विश्वास को 
करो मेरी आस्था का क़त्ल 
खूं करना कितना आसाँ जो है 
क्या हुआ जो मेरा भरोसा टूटा 
क्या हुआ जो मेरी संवेदनायें सूखीं 
क्या हुआ जो मेरा मन अब बंजर हुआ 
तुम तो कुकुरमुत्तों से उगते रहोगे 
तुम तो मेरी भावनाओं का बलात्कार करते रहोगे 
क्योंकि 
नपुंसक हो गया है समाज 
नपुंसक हो गयी है मानवीयता की जमीन 
तभी तो 
नहीं दिखती तुम्हें आज 
हर स्त्री में माँ , बहन और बेटी 
तभी तो 
करते हो तुम बलात्कार 
कभी बाबा बनकर 
कभी नेता बनकर 
कभी कलम का सिपाही बनकर 
तो कभी गली चौराहे पर घूमता 
हवस का पुजारी बनकर 
कैसे और कहाँ और कब तक मैं सुरक्षित हूँ 
कानून की धज्जियाँ तुम उड़ाते हो 
मुझे किसी ना किसी तरह 
अपने चंगुल में फंसाते हो 
कभी हमदर्द बनकर 
कभी मसीहा बनकर 
तो कभी शिकारी बनकर 
आह ! मेरे विश्वास की नींव को 
दीमक बन खोखला कर दिया तुमने 
अब सोचती हूँ तो पाती हूँ 
स्त्री विमर्श के नारों में भी मेरा 
महज उपयोग भर किया तुमने 
मानो बच्चे को मन बहलाने को 
बस झुनझुना दिया तुमने 
जबकि पाशविक मानसिकता पर अपनी 
नकेल ना कसा तुमने 
फिर कैसे सुरक्षित रह सकती हूँ 
ये ना सोचा मैंने 
इसलिए 
जब तक मैं खुद के लिए खुद ही 
कोई पुख्ता ज़मीन नहीं बनाती 
जब तक मैं खुद अपने लिए खुद ही 
अपनी आवाज़ नहीं उठाती 
तब तक 
मेरी भावनाओं से खेलना तुम्हारा अपराध नहीं 
सिद्ध कर दिया तुमने ……………… 

इंसानियत की तहजीबों के नकाब उघाड़ना कोई तुमसे सीखे ……… क्या कहूँ तुम्हें 
इंसान कह नहीं सकती 
तो कह दूं तुम्हें क्या हैवान …………ओ पुरुष रूप में छुपे आदम के छद्म रूप !!!

सोमवार, 18 नवंबर 2013

ओ मेरे काल्पनिक प्रेम

ओ मेरे काल्पनिक प्रेम 
प्रेम ही नाम दिया है तुम्हें 
काल्पनिक तो हो ही 
वो भी तब से 
जब जाना भी न था प्रेम का अर्थ 
जब जाना भी न था प्रेम क्या होता है 
फिर भी सहेजती रही तुम्हें 
ख्यालों की  तहों में 
और लपेट कर रख लिया 
दिल के रुमाल में 
खुशबू आज भी सराबोर कर जाती है 
जब कभी उस पीले पड़े 
तह लगे दिल के रुमाल 
की तहें खोलती हूँ 
भीग जाती हूँ सच अपने काल्पनिक प्रेम में 
और जी लेती हूँ एक जीवन 
काल्पनिक प्रेमी के प्रेम में सराबोर हो 
तरोताजा हो जाता है यथार्थ 
जरूरी तो नहीं न तरोताजा होने के लिए कल्पना का साकार होना 

यूं भी काल्पनिक प्रेम कब वैवाहिक रस्मों के मोहताज होते हैं 
ज़िन्दगी जीने के ये भी कुछ हसीन तरीके होते हैं 

सोमवार, 11 नवंबर 2013

सकारात्मक सोच की रौशनी

बालों में छाई सफेदी कोई कहानी कहे ना कहे मगर चेहरे की लकीरें उम्र के तजुर्बे में कब तब्दील हो जाती हैं सब को पता हो या ना हो मगर खुद के अन्दर एक क्रांतिकारी आन्दोलन आड़ोलित होने लगता है और अम्मा ने तो कभी खुद से भी बात नहीं की थी तो कैसे किसी को उसके अन्दर घटित होती घटनाएं तजुर्बे की दीवारों पर कहानी लिख पातीं।  चार बेटों की माँ बन अम्मा अपनी ज़िन्दगी के हर फ़र्ज़ को बखूबी निभा चुकी थीं।  सब अच्छी तरह अपनी गृहस्थी में सुखी थे बस अम्मा ही थी जो पति के जाने के बाद भी अपने को संभाल सबको एकत्र किये थी एक ही छत के नीचे।  बहुओं से भी कभी कोई उम्मीद नहीं करतीं।  सबको कार्य इस तरह बाँट देती कि  किसी को शिकायत न हो।  किसी को कहीं जाना हो तो पहले दिन बताये ताकि अगले दिन उसके बदले के काम बांटे जा सकें यदि कोई बहू भूल जाती थी तो अगले दिन बिना किसी बहू को कुछ कहे अम्मा खुद वो काम करने लगती तो बहू को खुद अपनी गलती का अहसास हो जाता और अगली बार वो ऐसी कोई गलती करने की कल्पना भी नहीं करती।  यही एक परिपक्व सोच की पहचान होती है जिस वजह से कभी घर में कलह न होती सब एक दूसरे  को पूरा प्यार और सम्मान देते।  जब छोटे बेटे की शादी भी हो गयी तो अम्मा ने सारी जमीन जायदाद को सारे  बच्चों में बाँटने का निर्णय लिया और दुकान  और मकान के बराबर चार हिस्से कर दिए बड़े बेटे  के हिस्से पुराना मकान आया तो उसने जब आवाज़ उठाई तो अम्मा ने कहा कि बेटा दुकान  तुम्हें चलती हुयी मिली है यदि ये नहीं लेना तो जो छोटे को दे रही हूँ उससे बदल लो वहां मकान नया होगा मगर दुकान तुम्हें खुद नए सिरे से चलानी होगी तब बड़े बेटे को अहसास हुआ कि हमारी माँ कितनी दूरदर्शी है अब इस उम्र में यदि नयी दुकान चलाऊंगा तो बच्चे बड़े हो गए हैं कैसे उनकी पढाई और शादी की जिम्मेदारी उठाऊंगा दूसरी तरफ छोटे पर अभी जिम्मेदारी नहीं है तो नए सिरे से कारोबार शुरू करेगा तो २-४ साल में व्यवसाय जम जाएगा।  अम्मा की इसी दूरदर्शिता और काबिलयत की वजह से सारे  बहू बेटे दिल से अम्मा का आदर किया करते थे और अम्मा के होते किसी को किसी भी बात की चिंता नहीं होती थी अम्मा जिस भी बेटे के घर बैठी होतीं वहीँ खाना खा लेतीं यहाँ तक कि  कोई भी भाई किसी के भी घर बैठे उठे वही खाना खा लेना , रुक जाना, एक दूसरे के काम आना उनके लिए आम बात थी।  आज अम्मा उनके बीच नहीं रहीं मगर वो अपने पीछे एकता और सहनशीलता में कितनी शक्ति होती है उसके  महत्त्व को  बच्चों में छोड़ गयी थीं।  किसी के बेटे बेटी उसे याद करें उसके जाने के बाद बड़ी बात नहीं मगर यदि उसके जाने के बाद उसकी बहुएँ उसे अपनी माँ से भी ज्यादा याद करें और उनके बताये रास्ते का अनुसरण करें इससे बेहतर और क्या होगा।  आज अम्मा की सकारात्मक सोच की रौशनी उनके परिवार के प्रत्येक बच्चे में ऐसे जज़्ब हो गयी थी जैसे शिराओं में लहू।  
ये किस्सा जब उसकी बहू ने अपनी सहेलियों को सुनाया तो सभी नतमस्तक तो हुयीं ही साथ में सबने अम्मा को सोच की एक एक किरण अपने जीवन में भी आत्मसात करने का निर्णय लिया ………… इस तरह अम्मा समाज में चेतना की नयी रौशनी बिखेर गयी थीं। 

बुधवार, 6 नवंबर 2013

ए --------कभी तो कुछ कहा भी करो

जब भी मिठास कम हुई चाय में
जान जाता हूँ
फिर कुछ टूटा है तुम्हारे अन्तस में
वरना
बिना अपने लबों को छुआये
प्याला दिया है क्या तुमने


जब भी नमक ज्यादा मिला दाल में
जान जाता हूँ
फिर अंधेरों ने शोर किया है तुम्हारे बियाबान में
वरना
तुम्हारी आँखों का नमक ही काफ़ी रहता है मेरे स्वाद के लिये


जब भी तुलसी पर दीया जलता नहीं मिला मुझे
जान जाता हूँ
तुम्हारी कुँवारी वेदना की मुस्कुराती तडप को
वरना
बिना दीया बाती किये साँझ की बत्ती नहीं जलाई तुमने


और ये होता है
तुम्हारी दिनचर्या का 
आखिरी पडाव


जब भी बिस्तर पर सिलवट मिली मुझे
जान जाता हूँ
कितनी कोशिश की होगी तुमने प्रैस से छुपाने की
वरना
यूँ रूह की सिलवटों की खामोशी ना उतरती तुममें


जानाँ -----अरसा हुआ सीख गया हूँ मैं भी अब
तुम्हारे अबोले शब्दों की गूढ भाषा
ए --------कभी तो कुछ कहा भी करो
एक मुद्दत हुयी
आवाज़ सुनने को तरस गया हूँ …………


रविवार, 27 अक्टूबर 2013

अब कभी मत कहना ………सब कुछ है

किसने कहा नहीं हूँ 
मैं तो वहीं हूँ हर पल 
जब जब तुमने 
अपने पुरज़ोर ख्यालों में 
मेरा आलिंगन किया , 
मुझे पुकारा और 
समय के सीने पर 
एक बोसा लिया 
कब और कहाँ दूर हूँ तुमसे 
सिर्फ़ शरीरों का होना ही तो होना नहीं होता जानाँ ………

जब ख्यालों की सरजमीं पर 
यादों की कोंपलें खिलखिलाती हों ,
हर लम्हे में एक तस्वीर मुस्काती हो, 
हर ज़र्रे ज़र्रे में महबूब की झलक नज़र आती हो 
वहाँ कौन किससे कब जुदा हुआ है 
ये तो बस अक्सों का परावर्तन हुआ है 

तुममें समायी मैं 
तुम्हारी आँखों से देखती हूँ कायनात के रंगों को , 
तुममें समायी मैं 
साँस लेती हूँ तुम्हारे ख्यालों के आवागमन से , 
तुममें समायी मैं 
धडकती हूँ बिना दिल के भी तुम्हारे रोम रोम में 
तो कहो भला कहाँ हूँ मैं जुदा ………तुमसे ! 

अब कभी मत कहना ………सब कुछ है …बस तुम ही नही हो कहीं 
क्योंकि 
तुम्हारा होना गवाह है मेरे होने का ……………. 

मोहब्बत में विरह की वेदी पर आस पास गिरी समिधा को कभी देखना गौर से……. 

शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

प्रियतमे !

प्रियतमे !






इतना कह कर 
सोच में पड़ा हूँ 
अब तुम्हें 
और क्या संबोधन दूं 
अब तुमसे 
और क्या कहूं 
मेरा तो मुझमे 
जो कुछ था 
सब इसी में समाहित हो गया 
मेरी जमीं 
मेरा आकाश 
मेरा जिस्म 
मेरी जाँ 
मेरी धूप 
मेरी छाँव 
मेरा जीवन 
मेरे प्राण 
मेरे ख्वाब 
मेरे अहसास 
मेरा स्वार्थ 
मेरा प्यार 
कुछ भी तो अब मेरा ना रहा 

जैसे सब कुछ समाहित है 
सिर्फ एक प्रणव में 
बस कुछ वैसे ही 
मेरा प्रणव हो तुम 

प्रियतमे !
कहो , अब और क्या संबोधन दूँ  तुम्हें 

रविवार, 20 अक्टूबर 2013

खनखनाहट की पाजेब

तुम्हारी हँसी में 
सुर है 
लय है 
ताल है 
रिदम है 
एक संगीत है 
मानो 
मंदिर में घंटियाँ बज उठी हों 
और 
आराधना पूरी हो गयी हो 
जब कहा उसने 
हँसी की खिलखिलाहट में 
हँसी के चौबारों पर सैंकडों गुलाब खिल उठे 
ये उसके सुनने की नफ़ासत थी 
या कोई ख्वाब सुनहरा परोसा था उसने 

खनखनाहट की पाजेब उम्र की बाराहदरी में दूर तक घुँघरू छनकाती  रही ……… 




बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

इस कदर भी कोई तन्हा ना हो कभी खुद से भी …

बूँद बूँद का रिसना 
रिसते ही जाना बस 
मगर आगमन का 
ना कोई स्रोत होना 
फिर एक दिन घड़े का 
खाली होना लाजिमी है 
सभी जानते हैं 
मगर नहीं पता किसी को 
वो घडा मैं हूँ 


हरा भरा वृक्ष 
छाया , फूल , फल देता 
किसे नहीं भाता 
मगर जब झरने लगती हैं 
पीली पत्तियां 
कुम्हलाने लगती है 
हर शाख 
नहीं देता 
फूल और फल 
ना ही देता छाँव किसी को 
तब ठूँठ से कैसा सरोकार 
बस कुछ ऐसा ही 
देखती हूँ रोज खुद को आईने में 

भावों के सारे पात झर गए हैं 
मन के पीपर से 
ख्यालों के स्रोते सब सूख गए हैं 
और बच रहा है तो सिर्फ 
अर्थहीन ठूंठ 
जिस पर फिर बहार आने की उम्मीद 
के बादल अब लहराते ही नहीं 
तो कैसे कहूँ 
खिलेगा भावों का मोगरा फिर से दिल के गुलशन में 

इस कदर भी कोई तन्हा ना हो कभी खुद से भी … 

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2013

आइये बकवास करें

आइये बकवास करें 
कुछ यूँ नाम रौशन करें 
बकवास महामन्त्र का जाप करें 
खुद को महान योगी सिद्ध करें 
बकवास बकवास बकवास 
सब बकवास ही तो है 
बकवास के भी अपने अर्थ होते हैं 
बकवास का भी अपना महत्त्व होता है 
बशर्ते कहने में दम हो 
बशर्ते कहने वाला दमखम रखता हो 
फिर बकवास भी अर्थ प्रिय हो जाती है 
फिर बकवास भी तवज्जो पाती है 
गर अपनी बकवास को एक ओहदा देना हो 
गर अपनी बकवास पर प्रस्ताव पारित कराना हो 
गर स्वयं को सबकी नज़रों में चढ़ाना हो 
गर अग्रिम पंक्ति में खड़ा होना हो 
तो जरूरी है तुम्हें खुद को सर्वेसर्वा सिद्ध करना 
और इसके लिए जरूरी है 
बकवास जैसे लफ़्ज़ों का प्रयोग करना 
फिर क्या कानून और क्या बिल और क्या आदेश 
सब बदल दिए जायेंगे 
सिर्फ एक तुम्हारे बकवास शब्द की भेंट चढ़ जायेंगे 
तो जाना तुमने कितनी गुणकारी है बकवास 
तो करो प्रण खुद से 
आज से करोगे सिर्फ और सिर्फ बकवास 
जो बना देगी तुम्हारे लिए एक सुलभ रास्ता 
जो पहुंचा देगी तुम्हें तुम्हारी मंजिल पर 
गर तुम पंक्ति में पीछे खड़े होंगे 
तो प्रथम स्थान पर पहुँचाना 
और तुम्हारा महत्त्व राष्ट्रीय दृष्टि में बढ़ाना 
बकवास नामक अचूक हथियार कर देगा 
फिर एक दिन ऐसा आएगा 
बकवास भूषण पुरस्कार से नवाज़ा जाएगा 
ये सर्वोत्कृष्ट पुरस्कार कहलाया जाएगा 
जो बकवास महाराज के बायोडाटा में 
चार चाँद लगाएगा 
ज्यादा कुछ तो नहीं मगर 
इसी बहाने पी एम बनने के सपने पर 
एक मोहर तो जरूर लगाएगा 
तो बोलो 
बकवास महाराज की जय 

रविवार, 4 अगस्त 2013

एक्सीडेंट हो गया

एक्सीडेंट हो गया एक बच्चे ने स्कूटी से ऐसी ट्क्कर मारी कि किसी के घर की सीढियों पर गिरी और उस सीढी का कोना रिब्स में लग गया ………॥अब रिब्स मे,न तो प्लास्टर लग नहीं सकता इसलिए कम्पलीट बेड रैस्ट ही करना पडेगा ………ना उठ पा रही हूँ और ना बैठ पा रही हूँ बडी मुश्किल हो रही है ……बेहद पेन है ………अभी कुछ दिन अब सक्रियता कम रहेगी।

बुधवार, 31 जुलाई 2013

नज़र में अपनी ही गिर जाती




जो दुआ को उठा देती हाथ 
नज़र में अपनी ही गिर जाती 
ए खुदा तेरी नेमत हैं ये हाथ ...जानती हूँ
इसलिये कर्म के बीज बोती हूँ
कर्म की फ़सल उगाती हूँ
हाथ की रेखाओं को आज मैं खुद बनाती हूँ

स्त्री हूँ ना
जान गयी हूँ
मान गयी हूँ
पहचान गयी हूँ
अपने होने को
इसलिये
अब किसी खुदा के आगे ना सिर झुकाती हूँ
कर्मठ बन स्वंय अपना मार्ग प्रशस्त किये जाती हूँ
और अपनी उपलब्धियों का तेज़
अपने मुखकमल पर स्वंय खिलाती हूँ
यूँ जीवन में आगे बढती जाती हूँ
मगर हाथ अब दुआ के लिये भी ना उठा उठाती हूँ

क्योंकि ………जानती हूँ
ना जाने कितनी फ़रियादें तेरे दरबार में अलख जगाती होंगी
कितने हाथ तेरी चौखट को छूते होंगे
कितने बेबस रोज तुझे बेबस करते होंगे
और उनके उठे हाथों को देख जब
तेरी रहमत बरसती होगी
दिल में तेरे भी इक खलिश सी उठती होगी
उफ़ ! क्या इसीलिये मैने संसार बनाया
मेरे होकर मुझसे माँग रहे हैं
खुद पर ना विश्वास कर रहे हैं
कैसे खुद्दारी को ताक पर रख रहे हैं
तू भी इक बेबसी जीता होगा
जब सबके गम पीता होगा
इसलिये
आज़ाद किया तुझे अपनी दुआओं से …………ओ खुदा !

(कर्मठता और खुद्दारी के बीज बो दिये हैं फ़सल का लहराना लाज़िमी है )




"कवि....सपनों का सारथी ,सत्य का प्रहरी ...के इस लिंक में मेरी इस

कविता को सर्वश्रेष्ठ चुना गया 
http://www.facebook.com/photo.php?fbid=568581683183483&set=gm.542030849196281&type=1&theater

रविवार, 28 जुलाई 2013

कल शाम डायलाग के नाम

कल शाम डायलाग के नाम ( 27-7-2013 ) 
एकेडमी आफ़ फ़ाइन आर्टस एंड लिटरेचर द्वारा आयोजित कार्यक्रम में लीलाधर मंडलोई जी की अध्यक्षता में अंजुम शर्मा द्वारा संचालित किया गया जिसमें अनिरुद्ध उमट , असंग घोष , सुमन केशरी, मिथिलेश श्रीवास्तव और अनिल जनविजय ने कविता पाठ किया । एक बेहतरीन शाम की कुछ यादें समेट लायी हूँ । एक से बढकर एक कविताओं ने मन मोह लिया। कविता का वृहद आकाश पंछियों को पंख पसारने के लिये उत्साहित करता है जिसकी झलक कल देखने को मिली। कौन सा क्षेत्र ऐसा है जिस पर कवि की कलम ना चली हो फिर चाहे देश हो या समाज , प्रेम हो या स्त्री विमर्श छोटी छोटी चीजों पर कवि की दृष्टि पहुँचती रही फिर चाहे किसी प्रदेश या जनपद की व्यथा हो या कोई दुर्घटना या जीवन और मृत्यु के भेद या फिर पौराणिक गाथा सभी पर कवियों की दूरदृष्टि एक संसार रचा जो हर मन को अन्दर तक छू गया। कौन कहता है कि कविता की माँग नहीं है ………जो ये कहता है उसे कल आकर देखना चाहिये था । भावुक हृदयों की भावमाला के सुमन की खुशबू हर श्रोता अपने मन में बसा कर लाया है।




लीलाधर मंडलोई जी के साथ मैं , अंजू शर्मा , सुमन केशरी और शोभा रस्तोगी 



अंजुम शर्मा मंच का संचालन करते हुये 



श्रोताओं के साथ अलका भारतीय 



शोभा रस्तोगी

ब्यूटी विद ब्रेन इंदु सिंह के साथ अंजू शर्मा 


 कला का उत्कृष्ट नमूना 


अनिरुद्ध उम्मट कविता पाठ करते हुये 



असंग घोष कविता पाठ करते हुये



श्रोतागण कवितासिंधु में गोता लगाते हुये 





सुमन केशरी कविता पाठ करते हुये




मिथिलेश श्रीवास्तव कविता पाठ करते हुये





अनिल जनविजय कविता पाठ करते हुये


लीलाधर मंडलोई जी अपने अध्यक्षीय वक्तव्य के साथ 




उसके बाद विचारों का आदान प्रदान और जलपान कर सबने अपने घर को प्रस्थान किया 

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

भावों के टुकडे ……2

1
अब पीरों के समंदर न उफनते हैं 
हूँ मुफलिसी में मगर फिर भी 
अब ना दरिया में भावों के  जहाज चलते हैं 
ये कौन सा दरिया -ए -शहर है दोस्तों 
जहाँ दिन में भी ना दिन निकलते हैं 
खो से गए थे जो आंसू कहीं 
जाने क्यों यहीं उमड़ते दिखते  हैं 
खारेपन में जो घुला है नमक 
जाने क्यूँ तेरे दर्द का कहर दिखते हैं 
कोई कहीं होगा तेरा खुदा किसी शहर में 
मेरी हसरतों के खुदा तो तेरी दहलीज में ही दिखते हैं 

2
राह तकते तकते 
मेरे इंतज़ार की फांकें यूँ बिखर गयीं 
गोया चाँद निकला भी हो 
और चाँदनी बिखरी  भी ना हो 

ये इश्क की तलबें इतनी कमसिन क्यूँ हुआ करती हैं ?


3
होती हैं कभी कभी 
ज़िन्दगी की तल्खियाँ भी 
और खुश्गवारियां भी 
शामिल कविताओं में 
तो क्या मूंह मोड़ लूं हकीकतों से 
जब विरह प्रेम और दर्द लिख सकती हूँ 
तो सच्चाइयां क्यों नहीं 
फिर चाहे खुद की ज़िन्दगी की हों या कल्पनाओं के समंदर का कोई मोती 

4
मौन की घुटन बदस्तूर जारी है …………पकती ही नहीं हँडिया में पडी कहानियाँ ………और आँच ना कम होती है ना तेज़ 


5
कोई नहीं साथ मेरे 
मैं भी नहीं 
मेरे शब्द भी नहीं 
मेरे ख्याल भी नहीं 
मेरे भाव भी नहीं 


कभी कभी लगता है फिर से कोरा कागज़ हो गयी हूँ मैं 

क्या सच में ?


6
उम्र भर एक चेहरा अदृश्य बादलों में ढूँढा 
ना मिलना था नहीं मिला 
सुनो !
तुम ही क्यों नहीं बन जाते वो चेहरा ……मेरे ख्वाब की ताबीर 
जो मुझे मुझसे ज्यादा जान ले 
जो मुझे मुझसे ज्यादा चाह ले ………
क्योंकि 
अब हर चेहरा ना जाने क्यों तुम में ही सिमट जाता है 
हा हा हा ………पागल हूँ ना मैं ! ख्वाब को पकडना चाहती हूँ
शायद भूल गयी हूँ हकीकत की रेतीली जमीनों पर गुलाब नहीं उगा करते ……

7
कितनी कंगाल हूँ मैं रिश्तों और दोस्तों की भीड में 
एक कांधा भी नसीब नहीं कुछ देर फ़फ़कने को 
ना जाने कैसा कर्ज़ था ज़िन्दगी का 
उम्र गुज़र गयी मगर कभी चुकता ही ना हुआ

8
धारा के विपरीत तैरने का भी अपना ही शऊर होता है 
जमीं को आसमान संग चलने की ताकीद जो की उसने 
उम्र तमाम कर दी तकते तकते 

9
बनाना चाहती हूँ 
अपने आस पास 
एक ऐसा वायुमंडल 
जिसमें खुद को भी ना पा सकूँ मैं 
जानते हो क्यूँ ? 
क्यूँकि मेरे होने की 
मेरे श्वास लेने की 
मेरे धडकने की
पावर आफ़ लाइफ़ हो तुम 
जब तुम नहीं ……तो कुछ नहीं 
मैं भी नहीं …………
ये है मेरा प्रेम 
और तुम्हारा ……???

10
सिर्फ़ एक साँस की तो अभिव्यक्ति थी 
जाने क्यों मैने शब्दों की माला पिरो दी 
अब ढूंढों इसमें ग़ज़ल , कविता या छंद 
मगर मेरे तो दृग अब हो गये हैं  बंद



रविवार, 21 जुलाई 2013

भावों के टुकडे-------1

1
ये गर्दिशों की स्लेटों पर 
रूहों की ताजपोशी करती 
तुम्हारी हसरतों की कलमें 
जब भी लिखती हैं 
लिखावट अदृश्य पर्दो की ओट 
में छिप जाती है 
और मैं बांचती रह जाती हूँ 
खाली स्लेट के काले कैनवस को 
अपनी ज़िन्दगी सा ...................

2
जैसे 
आँधियों के नाम नहीं होते 
तूफानों के जाम नही होते 
वैसे ही 
जो रहते हैं किसी के दिल में 
वो शख्स आम नहीं होते 

3
वो उमड़ता घुमड़ता तूफ़ान 
जाने कहाँ गुम हो गया 
ढूंढता हूँ अब मैं खुद को ही खुदी में 

लगता है आइनों के शहर में बलवा हो गया 

4
तवा ठंडा हो गया है 
पीर में भी ना वो शिद्दत रही है 
हूक कोई उठती ही नहीं 
हवाओं में सरगोशी भी होती नहीं 
कोई आँच जलती ही नहीं 
ना जाने कैसे फिर भी जिंदा हूँ ............लोग कहते हैं !!!

क्या साँसों का आवागमन काफी है ज़िन्दगी के लिए ?

5
पस्त हौसलों का चारमीनार हूँ मैं 
ज़िन्दगी से लडती चीन की दीवार हूँ मैं 
जो न पहुँच पायी कभी किसी बुलंदी पर 
ऐसी अनजानी इक कुतुबमीनार हूँ मैं 


6
चुप्पी की स्लेट पर चुप्पी की स्याही से कोई चुप्पी कैसे लिखे 
ये रूह में गढता छलनी करता आन्तरिक रुदन कोई कैसे सहे 

7
बिना आँच के भट्टी सा सुलगता दर्द 
रूह पर फ़फ़ोले छोड गया 
आओ सहेजें 
इन फ़फ़ोलों में ठहरे पानी को रिसने से …………
कम से कम 
निशानियों की पहरेदारी में ही 
उम्र फ़ना हो जाये 
तो तुझ संग जीने की तलब 
शायद मिट जाये 
क्योंकि ………
साथ के लिये जरूरी नहीं 
चांद तारों का आसमान की धरती पर साथ साथ टहलना

यूँ भी फ़ना होने के हर शहर के अपने रिवाज़ होते हैं ………


8
सोचती हूँ 
तलाश बंद कर दूं 
आखिर कब तक 
कोई खोजे उन चिन्हों को 
जिनके कोई पदचिन्ह ही न हों 
वैसे भी सुना है 
"मैं "(खुद)की तलाश में जो गया वो वापस नहीं आया 
और मेरे पास तो अब खोने को भी कुछ नहीं बचा ....."मैं" भी नहीं 

फिर भी ना जाने क्यूँ रुका  हुआ - सा एक आंसू है जो  ढलकता ही नहीं 





गुरुवार, 18 जुलाई 2013

ख्यालों की दस्तक बेवजह भी हुआ करती है

कुछ दिल की थीं अपनी रवायतें 
कुछ ज़िन्दगी से थीं शिकायतें 
चल तो दिये थे सफ़र में मगर 
कुछ रुसवाइयों की थीं अपनी इनायतें 

( मुकम्मल ज़िन्दगी और मुकम्मल जहान की खुशफ़हमियाँ ही शायद ज़िन्दगी गुजारने का ज़रिया हैं ) 

वरना 

किसे मिली जमीं किसे मिला आसमाँ 
हर आदम का नसीबा है इक दूजे से जुदा 

ना होता कोई सडक की खाक कोई महलों का बादशाह
इक दिन पल लग्न मुहुर्त में जिनका था जन्म हुआ 

ना बैसाखियों के दिन होते ना पलस्तरों की रातें 
जो कर्म की भट्टी में नसीब के दाने जल जाते 

फिर गरीब के झोंपड़ में भी नीलकलम खिल जाते 
जो ज़िन्दगी की स्लेट से नसीब के खेल मिट जाते 

फिर जात पाँत से ऊपर दिल के लेख लिखे जाते 
मिलन बिछोह के सारे तटबंध ही मिट जाते 

यूँ आसमान के सीने पर चहलकदमी कर पाते 
जो हाथ ना भी पकड़ते मगर साथ तो चल पाते 

( ख्यालों की दस्तक बेवजह भी हुआ करती है ..........यूँ ही भी )



सोमवार, 15 जुलाई 2013

भुंजे तीतर सा मेरा मन

भुंजे तीतर सा मेरा मन 
वक्त की सलीब चढ़ता ही नहीं 

कोई आमरस जिह्वा पर 
स्वाद अंकित करता ही नहीं 

ये किन पैरहनों के मौसम हैं 
जिनमे कोई झरना अब झरता ही नहीं 

मैं उम्र की फसल काटती रही 
मगर ब्याज है कि चुकता ही  नहीं 

खुद से लडती हूँ बेवजह रोज ही 
मगर सुलह का कोई दर दिखता ही नहीं 



बुधवार, 10 जुलाई 2013

मैट्रो में छायी अश्लीलता…जिम्मेदार कौन?

आज जो कुछ घटित हो रहा है उसे देखकर कुछ प्रश्न मनोमस्तिष्क को मथ रहे हैं और हम से ही प्रश्न कर रहे हैं  

सार्वजनिक जगह किसलिए होती हैं ?

सार्वजानिक जगहों का दुरूपयोग या सदुपयोग किसके लिए है ?

कौन कैसे इन जगहों का प्रयोग कर रहा है और इन जगहों का वास्तव में कैसे प्रयोग किया जाना चाहिए इसके बारे में आज की पीढ़ी को कितनी जानकारी है 


आज की पीढी या तो अनजान है या जान कर भी अनजान बन रही है तभी मैट्रो में छायी अश्लीलता का एम एम एस बन जाता है और पोर्न साइट्स पर चला जाता है . मगर उसमे भी दोष मैट्रो को चलाने वालों को दिया जा रहा है कि  उनके यहाँ से ऐसी विडियो कैसे अपलोड हो गयीं मगर कोई ये नहीं सोच रहा कि :

1) ऐसी अश्लील हरकत जिन जोड़ों ने सार्वजानिक जगह पर की क्या वो सही थी ? 

2) क्या उस वक्त मेट्रो में सिर्फ वो दो ही थे या मेट्रो में बड़ों से लेकर बच्चे तक सवार थे ?

3) क्या उन्हें ऐसी हरकत करना शोभा देता है ? 

4) क्या ये सब लाइव देखकर छोटे बच्चों पर गलत असर नहीं पड़ेगा ? 

5) क्या उन्हें इस तरह की अश्लील हरकत करते देख यदि कुछ मनचले उनके साथ मिसबिहेव करने लगते तो दोष उसमे किसका था ? 

6) क्या सारी  जिम्मेदारी सरकार या मेट्रो आदि के संचालकों की ही हैं ? 

7) क्या जिम्मेदार नागरिक होने के नाते ये जिम्मेदारी हमारी भी नहीं है कि  हम अपने बच्चों को सही शिक्षा दें और सही गलत से अवगत कराएं ? 

8) और विडियो अपलोड होने पर इतना हंगामा क्यों ? 

9) क्या इससे सिर्फ लड़की की बदनामी ही होगी ? 

10) क्या किसी को ये नहीं दिख रहा कि  जो लड़की खुद सहमती से इसमें सम्मिलित है जब उसे अपनी बदनामी की चिंता नहीं तो दूसरे  कैसे करेंगे ?

11) क्या हम लड़की की बदनामी का डर दिखाकर लड़कियों को कुछ भी करने की शह नहीं दे रहे ?

जब उन्हें सार्वजानिक जगह पर अश्लील हरकत करते शर्म नहीं आ रही चाहे कितने ही लोग देख रहे हों , सबकी निगाह उन्हीं पर हो तो यदि ऐसे में उनके विडियो किसी ने अपलोड कर दिए तो क्या बुरा किया ?कम से कम अब सबको एक डर तो बन जायेगा कि  यदि हमने ऐसी कोई हरकत की तो आज के तकनीकी युग में अंजाम खतरनाक भी हो सकता है जो उनके भविष्य को भी बर्बाद कर सकता है . 

क्या ही अच्छा हो कि  से जोड़ों को पकड़ा जाए और उन्हें और उनके घरवालों को बुलाया जाए ताकि उन्हें उनकी हरकत से अवगत कराया जाए और जहाँ तक हो दंड भी दिया जाए ताकि औरों के लिए ये एक सबक बने और ऐसी अश्लीलता करने से पहले वो सौ बार सोचें तभी स्वस्थ समाज बन सकेगा .

आखिर कब तक और कितनी जगह सरकार पुलिस या सुरक्षा मुहैया कराती रहेगी . 

आज जरूरत है कि  कुछ जिम्मेदारियां हम खुद भी उठानी सीखें न कि  हर जगह सिर्फ अधिकारों के लिए लड़ते रहे और कर्तव्य की बारी आने पर पीठ दिखाएं .आखिर कब तक हम अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाडते रहेंगे अब हमें स्वंय इसका अवलोकन करना होगा जो यदि आज हम खुद ऐसी बातों का विरोध करना नहीं सीखेंगे आने वाली पीढी  , आने वाले  समाज की तस्वीर और भी भयावह होगी .


अब ये हम पर निर्भर है कि हम कैसा समाज चाहते हैं . स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के अंतर को आज की पीढ़ी को समझना होगा तभी आने वाला कल सुरक्षित और सुखद होगा .

शनिवार, 6 जुलाई 2013

खुद से खुद को हारती .......... एक स्त्री

मेरे अन्दर की स्त्री भी 
अब नहीं कसमसाती 
एक गहन चुप्पी में 
जज़्ब हो गयी है शायद 

रेशम के थानों में 
अब बल नहीं पड़ा करते 
वक्त की फिसलन में 
ज़मींदोज़ हो गए हैं शायद 

बिखरी हुयी कड़ियाँ 
अब नहीं सिमटतीं यादों में 
काफी के एक घूँट संग 
जिगर में उतर गए हैं शायद 

बेतरतीब ख़बरों के 
अफ़साने नहीं छपा करते 
अख़बार की कतरनों में 
नेस्तनाबूद हो गए हैं शायद 

(खुद से खुद को हारती .......... एक स्त्री अपनी चुप से लड रही है )

सोमवार, 1 जुलाई 2013

इंतज़ार के कहकहे खुद लगाना ………



मेरे ख्वाबों की जलपरी ने 
इंतज़ार के शहजादे को 
जब से आँख की पुतली बनाया 
दिन गूंगे हो गए 
और रातें तन्हाई का लिबास पहन सुहागन 
क्या फर्क पड़ता है 
आस्मां तारों भरी चूनर पहने 
या अर्धरात्रि के चाँद से रोशन हो 

ख्वाबों की दुनिया से हकीकत की दुनिया तक के
फासले यूं ही तय नहीं किये जाते 
बिना रंगों के फूल सेज पर कितना सहेजो 
इंतज़ार के शहजादे हर दुल्हन की मांग नहीं भरा करते 

वो दूर वीराने में मंदिर में जलता दीया हो 
या दिल के तहखाने में जलती आस की शम्मा
ख्वाबों की जलपरियाँ कर ही लेती हैं अपने चाँद का दीदार 

अब वक्त के रौशनदान से चाहे झडे या नहीं कोई आस की किरण
ख्वाबों की शहज़ादियाँ बना ही लेती हैं 
इंतज़ार के शहज़ादे का ताजमहल 
और बुतपरस्ती बन जाती है उनकी इबादत उनका जुनून 

इंतज़ार के कहकहे खुद लगाना ………ये भी अन्दाज़ है इक मोहब्बत का