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शुक्रवार, 28 मार्च 2014

इश्क कटोरा पीत्ता भर भर

दोस्तों अभी अभी जाने क्या हुआ जो भाषा सिर्फ़ सुनी भर है उसे जानती भी नहीं उसमें भाव उमड आये , अब इसे क्या कहूँ समझ नही आता कोई कुदरत का ही चमत्कार है शायद क्योंकि पंजाबी सिर्फ़ सुनी है बाकि मेरा तो सारा माहौल ही हिन्दी का है पढ्ना तो बहुत दूर की बात है फिर भी ये भाव उभरे तो लगा किसी जानकार को दिखा देनी चाहिये कहीं कुछ गलत न लिख दिया हो तो पंजाबी के जानकार अमरजीत कौंके जी को दिखायी तो उन्होने बताया सिर्फ़ पिया शब्द को पीत्ता कर दें बाकि सब सही है तो खुद को भी आश्चर्य हुआ कि ये हुआ कैसे …………फिर उन्होने इसे गुरुमुखी में लिख कर भेजा जिसे ऐसा का ऐसा लगा रही हूँ 


मैं 

इश्क कटोरा पीत्ता भर भर 
फिर भी रह गयी प्यासी वे 

ओ मेरे राँझेया मैं तेरी हीर वे 
जिन जपया साँस विच तेरा नाम वे 
फेर क्यूँ जल विच मीन प्यासी वे 

मैं 
इश्क कटोरा पीत्ता  भर भर 
फिर भी रह गयी प्यासी वे 

रूहां ते मैं टुकड़े कर दित्ते 
टुकड़ों विच मैं राँझा लिख दित्ता 
ते फेर कौन फकीरा जुदा कर दित्ता 
जे मैं हो गयी खुद से बेगानी वे 

मैं 
इश्क कटोरा पीत्ता  भर भर 
फिर भी रह गयी प्यासी वे 

दिल दा तुझे खुदा बनाया 
तेरे नाम दा  सज़दा कित्ता 
और न द्वारे सर ये झुकता 
फेर क्यूँ न मिलया तेरा नज़ारा वे 

मैं 
इश्क कटोरा पीत्ता भर भर 
फिर भी रह गयी प्यासी वे 

तू मेरा माही तू ही पैगम्बर 
तू ही मेरा इक्को रब्बा वे 
तेरे लए  मैं दुनिया छड दी 
फेर क्यूँ न इश्क परवान चढ्या वे 

मैं 
इश्क कटोरा पीत्ता  भर भर 
फिर भी रह गयी प्यासी वे 

अंक्खां  विच चनाब  है वसदा 
तेरे नाम दियां डुबकियां लगांदा 
तेरे नाम दे ख़त है लिख्दां 
फेर क्यूँ न तेरा जवाब आंदा वे 

मैं 
इश्क कटोरा पीत्ता भर भर 
फिर भी रह गयी प्यासी वे 



अब इसे पढ़िए गुरुमुखी में अमरजीत कौंके द्वारा अनुवाद करके भेजी गयी है हार्दिक आभारी हूँ उनकी 

ਮੈਂ ਇਸ਼ਕ ਕਟੋਰਾ ਪੀਤਾ ਭਰ ਭਰ ਫਿਰ ਵੀ ਰਹਿ ਗਈ ਪਿਆਸੀ ਵੇ ਓ ਮੇਰੇ ਰਾਂਝਿਆ ਮੈਂ ਤੇਰੀ ਹੀਰ ਵੇ ਜਿਹਨੇ ਜਪਿਆ ਹੈ ਸਾਹਾਂ ਨਾਲ ਤੇਰਾ ਨਾਮ ਵੇ ਫਿਰ ਕਿਓਂ ਜਲ ਵਿਚ ਮੀਨ ਪਿਆਸੀ ਵੇ ਮੈਂ ਇਸ਼ਕ ਕਟੋਰਾ ਪੀਤਾ ਭਰ ਭਰ ਫਿਰ ਵੀ ਰਹਿ ਗਈ ਪਿਆਸੀ ਵੇ ਰੂਹਾਂ ਦੇ ਮੈਂ ਟੁਕੜੇ ਕਰ ਕੇ ਉੱਤੇ ਰਾਂਝਾ ਲਿਖ ਦਿਤਾ ਫਿਰ ਕਿਸ ਫ਼ਕੀਰ ਨੇ ਪਾਈ ਜੁਦਾਈ ਤੇ ਮੈਂ ਹੋ ਗਈ ਖੁਦ ਤੋਂ ਬੇਆਸੀ ਵੇ ਦਿਲ ਦਾ ਖੁਦਾ ਬਣਾਇਆ ਤੈਨੂੰ ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਦਾ ਸਜਦਾ ਕੀਤਾ ਹੋਰ ਦਵਾਰੇ ਸਿਰ ਨਾ ਝੁਕਦਾ ਫਿਰ ਕਿਓਂ ਨਾ ਮਿਲਿਆ ਤੇਰਾ ਨਜ਼ਾਰਾ ਵੇ ਮੈਂ ਇਸ਼ਕ ਕਟੋਰਾ ਪੀਤਾ ਭਰ ਭਰ ਫਿਰ ਵੀ ਰਹਿ ਗਈ ਪਿਆਸੀ ਵੇ ਤੂੰ ਮੇਰਾ ਮਾਹੀ ਤੂੰ ਹੀ ਪੈਗੰਬਰ ਤੂੰ ਹੀ ਮੇਰਾ ਇੱਕੋ ਰੱਬਾ ਵੇ ਤੇਰੇ ਲਈ ਮੈਂ ਦੁਨੀਆਂ ਛਡ ਦਿਤੀ ਫੇਰ ਕਿਓਂ ਨਾ ਇਸ਼ਕ ਪਰਵਾਨ ਚੜਿਆ ਵੇ ਅੱਖਾਂ ਵਿਚ ਝਨਾਂ ਹੈ ਵੱਸਦਾ ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਦੀਆਂ ਚੁਭੀਆਂ ਲਾਉਂਦਾ ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਦੇ ਖ਼ਤ ਹੈ ਲਿਖਦਾ ਫੇਰ ਕਿਓਂ ਨਹੀਂ ਤੇਰਾ ਜਵਾਬ ਆਉਂਦਾ.. ਮੈਂ ਇਸ਼ਕ ਕਟੋਰਾ ਪੀਤਾ ਭਰ ਭਰ ਫਿਰ ਵੀ ਰਹਿ ਗਈ ਪਿਆਸੀ ਵੇ
फिर भी कोई कमी रह गयी हो तो बताइयेगा

बुधवार, 26 मार्च 2014

कवि ,सिर्फ कुछ के कह देने भर से नहीं हो जाते हो ख़ारिज

तुम्हें अपमानित प्रताड़ित करना ही 
जिनका ध्येय है कवि  
वो ही आधार बनते हैं 
तुम्हारे नव सृजन के 
तुम्हारे अंतस में बोते हैं जो 
तुम्हारी अवहेलना के बीज 
देते हैं समय से खाद पानी 
अपने व्यंग्य बाणों आलोचनाओं द्वारा 
वो पथ बाधक नहीं 
कवि,  करो उन्हें नमन 
क्योंकि 
आधारशिला हैं वो 
तुममे नव सृजन के 
और संजीदगी से 
रचनाकर्म करने को 
प्रेरित करने वाले 
तुम्हारे अपने आलोचक ही होते हैं 
जो जानते हैं 
तुम्हारी क्षमताओं को 
पहचानते हैं तुममे छुपी प्रतिभाओं को 
और सिर्फ एक शब्द बाण से 
कर धराशायी तुम्हारी 
प्रसिद्धि की मीनारों को 
जगा देते हैं तुममें 
सुप्त पड़ी उस उत्कंठा को 
हाँ , पहुंचना है मुझे भी शिखर तक 
हाँ , करना है मुझे भी अपने 
लेखन द्वारा प्रतिकार 
हाँ , मनवाना है लोहा 
अपने कवित्व का 
अपने कौशल का 
स्वयं में दबी छुपी 
उस सोयी खोयी 
दबी ढकी 
कविता का जो 
बना दे तुम्हें और तुम्हारे लेखन को 
मील का पत्थर 
वो नही जानते 
चिंगारियाँ ही शोले बना करती हैं 
इसलिये करके तुम्हें आहत 
लिखवा देते हैं 
तुम्हारे ही माध्यम से 
कालजयी कविता 
इसलिए साबित करने को खुद को 
कवि  चलने दो साथ साथ अपने 
उन अदृश्य ताकतों को 
जो स्वयमेव सहायक सिद्ध हो रही हैं 
तुम्हारे नव सृजन में बन रही हैं 
वाहक भावों के आगमन की 

बेशक कभी छदम वेश धारण कर 
तो कभी प्रत्यक्षत: तोडेंगे वो तुम्हारा मनोबल 
बनायेंगे साजिशों के पुल करने को तुम्हें धराशायी 
बेशक समझते रहे वो तुम्हें कमजोर 
बेशक बिछाते रहे राह में नागफनियाँ 
कवि बस तुम्हें है चलते जाना 
लक्ष्य संधान हेतु रखना है 
सिर्फ़ मछली की आँख पर ही निशाना 
क्योंकि 
भावनाओं के वटवृक्ष से लबरेज हो तुम कवि 
और वो करना चाहते हैं तुम्हें 
भावनाओं द्वारा ही आहत 
कुचलना चाहते हैं तुम्हारी प्रतिभा 
तिरस्कार , अपमान द्वारा 
तुम्हें और तुम्हारे लेखन को दोयम बताकर 
मगर वो ये नही जानते 
जिस तरह सौ झूठ मिलकर भी 
एक सत्य को मिटा नहीं सकते 
उसी तरह 
चाहे जितने पैदा हो जाएँ 
तुम्हारे लेखन विरोधी 
भावों की बहती सरिता के 
प्रवाह को रोक नहीं सकते 
रुख मोड़ नहीं सकते 
बल्कि वो तो मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं तुम्हारा 
बिन कुछ किये ही हो रहे हो प्रसिद्ध 
क्योंकि 
कवि  सिर्फ कुछ के कह देने भर से 
तुम नहीं हो जाते हो ख़ारिज 
तुम या तुम्हारी कविता 
वो जो तुम्हारे प्रशंसक हैं 
क्या उनके कहे का कोई मोल नहीं 
क्या उनका कथन महज तुम्हारी 
प्रशंसा भर है 
नहीं , कवि 
तुम , तुम्हारा लेखन 
कभी नहीं होगा ख़ारिज 
जब तक तुम स्वयं पर 
विश्वास रख भावों के सागर में डूब 
शब्दों के मोती खोज लाते रहोगे 
जनमानस के मन की बात 
अपनी कविताओं में कहते रहोगे 
एक चिन्तन व्यक्त करते रहोगे 
कुछ समय से परे हकीकत के धरातल पर 
सत्य को उकेरते रहोगे 
भावों के मदिरालाय में डूबते रहोगे 
नहीं हो सकते ख़ारिज 
क्योंकि 
सत्य की कसौटियों पर 
सिर्फ कुंदन ही खरे उतरा करते हैं 
इसलिए 
करो नमन उन्हें 
जो तुम्हारे लिखे में 
दोष ढूँढा करते हैं 
और तुम्हें और अच्छा लिखने को 
वजहें दिया करते हैं 
कामयाबी की पहली सीढ़ी  तो 
सिर्फ वो ही हुआ करते हैं 
जो कराते हैं मुहैया तुम्हें 
आलोचना की पहली सीढ़ी 
रखो पाँव उसी आलोचना की कील पर 
हो जाओ लहुलुहान और आगे बढ़ो 
कवि  , कल तुम्हारा है 
कल के आसमान पर रखने को पाँव 
उन्हें नमन तो तुम्हें करना ही होगा 
क्योंकि 
यूँ  ही नहीं कहा गया 
निंदक नियरे राखिये 
आँगन कुटी छवाय 
बिन पानी साबुन बिना 
प्रसिद्धि रहे दिलवाय 

रविवार, 23 मार्च 2014

काश तुम विचारों में ही ज़िंदा होते


भगतसिंह 
काश तुम विचारों में ही ज़िंदा होते 
तो एक और इंकलाब कर गए होते 
मगर आज के परिदृश्य में 
न तुम रहनुमा हो 
न पथिक 
न साथी 
सिर्फ सन्दर्भ भर हो 
जिसे २३ मार्च आने पर ही 
चिताओं की राख से 
उठना है 
उड़ना है 
और फिर 
हवाओं में खो जाना है 
क्योंकि 
आज प्रासंगिक नहीं हो तुम 
न तुम्हारे विचार 
न तुम्हारा आंदोलन 
किसे परवाह है तुम्हारी शहादत की 
 कुर्सी पर बैठे 
इन कठमुल्लाओं से तुम 
क्या उम्मीद करते हो 
कि होते होंगे सच में कभी नतमस्तक 
तुम्हारी शहादत के प्रति 
दो फूल चढ़ाकर तुम्हारी फ़ोटो पर 
हो जाती है जिनकी इतिश्री 
और फिर उतर  जाते हैं 
अपनी हवस की नदियों में 
हाँ , कुर्सी की हवस की नदियों में 
तब याद नहीं आती तुम्हारी कुर्बानी 
बंध जाती है विवेक पर 
तुच्छ स्वार्थों की पट्टी 
और फिर की जाती हैं 
तुम्हारे नाम पर गोष्ठियाँ 
तुम्हारी शहादत को मिसाल बना 
सेंकी जाती हैं अपनी ही रोटियाँ 
बताओ भगतसिंह 
क्या इसी दिन के लिए हुए थे तुम कुर्बान 
क्या इसी दिन के लिए करवाया था देश आज़ाद 
इसीलिए कह रही हूँ 
अब सिर्फ सन्दर्भ भर रह गए हो तुम 
और जानते हो 
आज के इस स्वार्थपरक माहौल को देख कर कह सकती हूँ 
आने वाले काल में 
शायद न रहो प्रासंगिक सन्दर्भों में भी 
क्योंकि 
आज कोई माँ अपने बच्चे को नहीं सुनाती 
गुलामी की दहशत की कहानियां 
नहीं बंधाती ढांढस 
इकलौते सपूत की कुर्बानी पर 
जनता को ये कहकर 
एक भगत कुर्बान हुआ तो क्या है 
ये करोड़ों भगत तो ज़िंदा है तुम्हारे रूप में 
क्योंकि 
गुलामी किस चिड़िया का नाम है  …… यहाँ कोई नहीं जानता 
ये आज की पीढ़ी है 
२१ वीं सदी की पीढ़ी 
और तुम हो 
२० वीं सदी का सिर्फ एक  शिलालेख भर 
 फिर कैसे हो सकता है तारतम्य सदियों के फासलों में 
बताओ तो ज़रा 
और जानते हो 
'सन्दर्भ' जरूरत पड़ने पर सिर्फ प्रयोगों के लिए होते हैं 
जीवन में उतारने के लिए नहीं 
ये है आज के युग की वास्तविकता 
फिर कैसे कहूँ 
स्मृतियों में ज़िंदा हो तुम विचार रूप में 
सिर्फ इतना ही कह सकती हूँ 
शर्मिंदा हूँ अपनी बेचारगी पर 
फिर कैसे सिर्फ नतमस्तक हो 
कर दूं इतिश्री तुम्हारी शहादत पर 


गुरुवार, 20 मार्च 2014

चुभते दिन चुभती रातें

जहाँ न धूप निकलती है उन गलियों में भी ज़िन्दगी पलती है ………#geetashree  बिंदिया के मार्च अंक में ( उस गली में सूरज नहीं निकलता ) ने झकझोर कर रख दिया , मन कल से बहुत व्यथित हो गया तो बस ये ही उदगार निकले :

चुभते दिन चुभती रातें
कोई न बिरहन का दुख बाँचे

कैसे भोर ने ताप बढाया
कैसे साँझ ने जी तडपाया
युग के युग बीत गये
किससे कहे बिरहा की बातें

चुभते दिन चुभती रातें
कोई न बिरहन का दुख बाँचे

प्रेम कली मुस्कायी जब भी
आस की बाती गहरायी तब ही
इक रात की दुल्हन बनकर
उम्र भर की चोट पायी तब ही

चुभते दिन चुभती रातें
कोई न बिरहन का दुख बाँचे

यूँ न प्रीत ठगनी ठगे किसी को
यूँ न प्रेम अगन लगे किसी को
जहाँ भोर भी आने से डरती हो
उन गलियों न ले जाये किसी को

चुभते दिन चुभती रातें
कोई न बिरहन का दुख बाँचे

रविवार, 16 मार्च 2014

कहो तो ……ओ फ़ागुन




रंगों के इंद्रधनुष बनते ही नहीं 
फिर होली का सुरूर कैसे चढ़े 

पिया सांवरे मदमाते ही नहीं 
फिर गोरिया की होली कैसे मने 

पिचकारी प्रेम की चलाते ही नहीं 
फिर लाज का घूंघट कैसे हटे 

कहो तो ……ओ फ़ागुन 

हो हो हो होली कैसे मने 
अबकी प्रीत परवान कैसे चढ़े 

सजनिया कृष्ण बिन राधा कैसे बने 
हो हो हो होली कैसे मने 

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

क्या मेरा डरना जायज नहीं ?

शादी का माहौल हो 
तो मस्ती छा ही जाती है 
कितना छुपाओ चेहरे से 
ख़ुशी झलक ही जाती है 

इक दिन ऐसे ही शादी में जाना हुआ 
मानो कोई गीत गुनगुनाना हुआ 
रोजमर्रा के अख़बार सा चलन लगता है 
जब शादी का सीजन चलता है 
पडोसी के लड़के की शादी थी 
हमें तो सिर्फ इतना भर करना था 
बस जाकर शगन पकड़ना था 
और दावत  पर हाथ साफ़ करना था 

अब जायेंगे तो निगाहें 
घर पर तो नहीं छोड़ जायेंगे 
कुछ न कुछ तो देखेंगे 
कुछ किस्से नागवार भी गुजरेंगे 
तो कुछ दिल को सुकून भी देंगे 
सो हम भी अवलोकन करते घूम रहे थे 
कौन क्या कर रहा है देख रहे थे 

शादी का आकर्षण 
या तो दूल्हा दुल्हन होते हैं 
या फिर शादी में घूमती 
इठलाती , मचलती कन्याएं होती हैं 
जिन की सज धज पर सबकी निगाह होती है 
आकर्षण का मुख्य केंद्र होती हैं 
तो निगाहें भी बार बार 
वहीँ का रुख करती हैं 

अब ऐसे में यदि फैशन परेड सी हो जाए 
कुछ कैट वॉक करती हसीनाएं दिख जाएँ 
तो शादी में पहुँचे कुछ शोहदों की तो निकल पड़ती है 
निगाहों में तोला जाता है 
जाने क्या क्या टटोला जाता है 
जब हसीनाएं बेख़ौफ़ बैक लैस चोली पहनती हैं 
जो सिर्फ एक डोरी से  बंधी होती है 
बेहद खूबसूरत 'हाथ लगाओ तो मैली हो जाए '
ऐसी कोई बाला हो 
और ऐसे में यदि 
उसके पिता का हाथ ही कुछ कहते हुए 
बैक पर पड़ता है 
जाने कैसे न पिता को न पुत्री को असर होता है 
ये कैसी खोखली आधुनिकता है 
ये कैसी अंधानुकरण की प्रवृत्ति है 
जहाँ 
मर्यादाओं की पगड़ी  यूं उछलती हैं 
मानो कोई सीता चिता में जलती है 
ये देख देश की संस्कृति रोती है 
मगर आज आधुनिकीकरण के युग में 
न इस तरफ ध्यान कोई देता है 
फिर यदि कहीं कोई अनहोनी होती है 
तो दोष समाज को मिलता है 

बेशक मनचाहा पहनने पर 
सबका अपना हक़ होता है 
मगर जिस्म की नुमाइश कर 
कौन सी आधुनकिता होती है 
ये तो समझ से परे होती है 
क्या रिश्तों की मर्यादा भी मायने न रखती है 
जब  पिता का हाथ यदि पुत्री के 
अर्धनग्न हिस्से पर पड़ता है 
देखने वालों पर क्या असर होता है 
न इस तरफ कोई ध्यान देता है 

क्योंकि 
हर हाल में 
स्त्री तो स्त्री ही होती है 
अपने स्त्रीत्व के गुणों से भरपूर होती है 
ज़रा इस तरफ ध्यान दे 
आधुनिकता को अपनाएंगे 
तो क्या पिछड़ों की जमात में गिने जायेंगे 
ऐसा न कभी होता है 
बस एक मर्यादा ही पोषित होती है 
और आधुनिकता नग्नता से न उपजती है 
जिस दिन ये समझ जायेंगे 
शायद कुछ समाज को दे जायेंगे 

मगर हमें क्या फर्क पड़ता है 
किसी से कह नहीं सकते 
कुछ कहने पर 
हम पर ही कुछ नागवार कैक्टस 
पलटवार करते नज़र आयेंगे 
सो हम ने भी आँखों देखा हाल जज़्ब किया 
और चुप का ताला मुँह पर जड़ लिया 
बस स्वादिष्ट भोजन का आनंद लिया 
और घर को प्रस्थान किया 

मगर 
जाने क्यों 
उस लड़की की पीठ पीछा करती रही 
रोज सोच पर दस्तक देती रही 

न आधुनिकता के खिलाफ हूँ 
न स्त्री की स्वतंत्रता के खिलाफ हूँ 
स्त्री  अधिकारों के लिए लड़ सकती हूँ 
मगर स्त्री होकर यही सोच रही हूँ 
आखिर जब उसकी वस्त्रहीन पीठ ने 
मुझे व्यथित किया 
तो यदि ऐसे में किसी पुरुष की कुत्सित निगाह पड़ जाये 
तो  ……… ?

मेरे अंदर की स्त्री उस लड़की के लिए डरती रही 
क्या आज के इस अराजक माहौल में 
मेरा डरना जायज नहीं ?
 

शनिवार, 8 मार्च 2014

महिला दिवस के उपलक्ष्य में


सिर्फ एक दिन नही समस्त सृष्टि ही मेरी है 
या कहो मैं हूँ तभी सृष्टि का विस्तार है 
फिर कैसे ना कहूँ 
एक दिन में नही बँधने वाली 
मै हूँ हर दिन जीवन में मनने वाली दीवाली  
अब ये तुम्हें समझना जरूरी है 
जब हर दिन मेरा है 



सुबह से आज जैसे आम महिलायें करती हैं वैसे ही शापिंग के लिये गयी और साडियाँ खरीदीं भी और खरीदवायी भी ………लीजिये मन गया महिला दिवस आज कुछ इस तरह :) और फ़ुर्सत ही नही मिली कि यहाँ आयें मगर अब आये हैं तो आपको बता दें कि महिला दिवस के उपलक्ष्य में कल यानि 9 -3-2014 को रात 8 बजकर 5 मिनट पर आप आकाशवाणी के 246.9 m / 1215 kilo hertz पर महिला काव्य गोष्ठी का आस्वादन कर सकते हैं और चर्चा का भी आनन्द ले सकते हैं और यदि कोई सुने और रिकार्ड कर सके तो कर ले क्योंकि हम तो सुन नही पायेंगे ……कुछ चित्र साझा कर रही हूँ जिसमें रेणु हुसैन, रेणु पंत , इंदु सिंह , पुष्पा राही और आपकी ये दोस्त शामिल है 




रविवार, 2 मार्च 2014

ये संयोग तो नहीं हो सकता ना

दीगर था 
वक्त का रुकना 
चलते वक्त के साथ तो 
सभी चला करते हैं 
मगर 
जो रुक जाती हैं सूइयां 
और बंद हो जाती है घडी 
तब ठहर जाता है 
चलता हुआ लम्हा 
उस रुके हुए पल की 
मृत्यु शैया के पायतानों पर 
क्योंकि 
कहीं दूर टंकारता 
समय चक्र 
बेशक अपने चलने को 
सिद्ध करता रहे 
मगर 
रुकी घडी साक्षी थी 
वक्त के रुकने की , थमने की , ठहरने की 
बेशक
विराम की अवस्थाएं वाहक हैं पुनर्जन्म की 
मगर 
दीगर था
वक्त का रुकना 
उस रुकी घडी के साथ 
शून्य को भरने को 
चाहे कितने सूर्य उगा लो 
खालीपन नहीं भरा करते ठूंठ हुए वृक्षों के ............. 

(उधर एक ज़िन्दगी थम रही थी और इधर ये कविता उतर रही थी और दोनों में से किसी को नहीं पता था कि अगले पल क्या होने वाला है मगर कोई अवचेतन में बैठा यूं कविता में माध्यम से थमती ज़िन्दगी को बयां कर रहा था मगर उस वक्त ऐसा कुछ होने का अहसास भर भी न था और सच में एक घडी बंद हो गयी उसी क्षण ............. ये संयोग तो नहीं हो सकता ना ……… कल रात ऐसा ही हुआ जब ये कविता लिखी जा रही थी और उधर किसी अपने की ( पति के चाचा जी की )साँसें थम रही थीं …… अजब कैफियत है आज दिल की ये सोच सोच जब दोबारा इस कविता से गुजरी )

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

"बदलती सोच के नए अर्थ " का सफ़र


दोस्तों 
मेरे आने वाले पहले संग्रह "बदलती सोच के नए अर्थ " का सफ़र भी बहुत अजीबोगरीब रहा । पहले तो मैंने सोचा ही नही था संग्रह निकलवाने का । काफ़ी वक्त से कुछ दोस्त कहते रहते थे और मैं चुप हो जाती थी तब मेरी एक खास छोटी बहन सरीखी मित्र ने बहुत जोर दिया और इस संग्रह को निकलवाने को प्रेरित किया और हिन्दी अकादमी में भेजने के लिये जोर दिया और मैं हिम्मत ही नही कर पा रही थी क्योंकि वहाँ की राह नही जानती थी फिर भी उनके जोर देने पर हिम्मत करके पाण्डुलिपि तैयार कर ली और इसी बीच मेरा एक्सीडेंट हो गया और मैं बिस्तर पर हो गयी और सारा काम वहीं रुक गया और मैने तो उम्मीद का दामन भी छोड दिया क्योंकि जो पाण्डुलिपि जमा कराने की आखिरी तिथि थी वो पास आती जा रही थी और मै कुछ काम कर नही सकती थी मगर जैसे तैसै मेरी बेटी , बेटे और पति ने मिलकर सारे काम समय से पूरे करके जमा करवा दी तो एक निश्चिंतता आ गयी मगर अब थी इंतज़ार की घडियाँ जो लम्बी और लम्बी होती जा रही थीं और जब पुस्तक मेला नज़दीक आने लगा और प्रकाशक भी इतनी जल्दी छापने से हिचकिचाने लगे तब पता चला कि पुस्तक को अकादमी से स्वीकृति मिल गयी है तो समस्या यहाँ खडी हुयी कि पुस्तक मेले तक तो अब संभव ही नही किताब का आना और बहुत से मेरे मित्र चाह रहे थे कि पुस्तक मेले तक बुक आ जाये और ऐसे में एक बार फिर मेरी वो ही मित्र कृष्ण सा सारथी बन फिर सामने आ गयी और सारा जिम्मा अपने ऊपर ले लिया कि मै आपको छपवा कर दे दूंगी आप चिन्ता मत करें जिसे उन्हें इस खूबी से निभाया कि परिलेख प्रकाशन के अमन कुमार जी को मेरी पाण्डुलिपि सौंप दी और कह दिया इतने दिन में चाहिये किताब , ना पैसे की बात ना प्रतियों की बस सीधा कह दिया और मुझे निश्चिंत कर दिया और उन्होने भी अपने वचन को निभाया । मेरी तो प्रकाशक से तब जाकर बात हुई जब प्रूफ़ रीडिंग के लिये आया …………और आज उन्हीं के अपरिमित सहयोग और मार्गदर्शन की वजह से ये संग्रह आपके सम्मुख आ रहा है जिनके लिये , आभार , धन्यवाद और शुक्रिया जैसे शब्द मुझे बहुत तुच्छ लग रहे हैं क्योंकि आज के इस युग में कौन किसी के लिये इतना करता है निस्वार्थ होकर ……………यहाँ तक कि अब भी सब वो ही देख रही हैं जिन्हें हम और आप#डाक्टरसुनीता#के नाम से जानते हैं जो नही चाहती थीं कि उनका नाम सामने आये लेकिन मुझसे रहा ही नहीं गया इसलिये आज सब बता दिया .............जिन्हें अब भी जब चाहे जहाँ चाहे मैं फोन बजा कर तंग कर देती हूँ और वो मुस्कुराकर मेरा काम पूरा कर देती हैं बताइये ऐसे शख्स के लिये शुक्रिया शब्द कितना छोटा होगा इसलिये बस इतना ही कहूँगी उनके लिये जो मेरे दिल में मान सम्मान है वो शब्दों में बयाँ नहीं हो सकता , जाने किस जन्म का नाता है उनसे क्योंकि इस जन्म मे तो मैने ऐसा कुछ किया नही , ना उनसे इतना मिलना जुलना हुआ बस शायद दिल से ही दिल मिल गया ………मेरी पुस्तक के इस सफ़र की एक ऐसी साथी रहीं जिसके सहयोग के बिना इस पुस्तक का आना संभव ही नही दिख रहा था ………… #डाक्टरसुनीता#



रविवार, 9 फ़रवरी 2014

एक बहुप्रतीक्षित खुशखबरी : उम्मीद से ज्यादा :)



दोस्तों 

"हिंदी  अकादमी दिल्ली " के सौजन्य से मेरा पहला काव्य संग्रह" बदलती सोच के नए अर्थ " परिलेख  प्रकाशन नज़ीबाबाद के माध्यम से आ रहा है।  

इतने वक्त से सभी यही पूछ रहे थे कि कब आएगा तुम्हारा संग्रह और मैं सिर्फ इतना ही कह पा रही थी कि जल्द ही आएगा क्योंकि उस पर काम चल रहा था मगर पूरा नहीं हुआ था।  आज जाकर प्रूफ रीडिंग का काम पूरा हुआ है और अब उम्मीद ने ये आश्वासन दिया है कि इस बार के पुस्तक मेले में आपको मेरा संग्रह " बदलती सोच के नए अर्थ " उपलब्ध हो जायेगा।

इतने कम समय में इस संग्रह को लाने की चुनौती को स्वीकाराने के लिए  परिलेख प्रकाशन और अमन त्यागी जी का  हृदय से आभार। 

आरती वर्मा का तहेदिल से शुक्रिया जो मेरे एक बार कहने भर से किताब का आवरण मेरी सोच के अनुरूप बना दिया। 

अब आप सबकी ढेर सारी शुभकामनाओं और आशीर्वाद  की आकांक्षी हूँ  :) :)

आँखें नम हैं और दिल बच्चा हो रहा है जी :) 

पिछले कुछ दिनों से व्यस्तता का एक कारण ये भी था :)

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

' डाली …मोगरे की ' नाम ही काफ़ी है


' डाली …मोगरे की ' नाम ही काफ़ी है महकाने को तन मन रूह तक और उस पर यदि हाथ में ले ली जाये तो खुश्बू में सराबोर हुये बिना रह जाये कोई संभव ही नहीं । प्रसिद्ध गज़लकार नीरज गोस्वामी , भूषण स्टील में वाइस प्रेजीडेंट के पद पर कार्यरत , एक भावुक ह्रदय के मालिक के प्रथम गज़ल संग्रह का ही ये नाम है………' डाली …मोगरे की ' । मानो बिखर गयी हों मोगरे की कलियाँ आस पास ही इस तरह गज़लों को संजोया है , हर शेर मारक वार करता हुआ , हर शेर इंसान को इंसान से जोडता हुआ , हर शेर जैसे अपना कहा हुआ सा लगता हुआ एक संजीदगी को समेटे गागर में सागर भर देता है । कभी कभी जो बात बडी से बडी कविता नहीं कह पाती उसे चंद शेरों या गज़लों के जरिये कह देने का हुनर सबमें कहाँ होता है और गज़लकार नीरज को तो जैसे इस विधा में महारत हासिल है । मैं कोई गज़लों के बहर , वज़न , रदीफ़ या काफ़िये को नहीं जानती मगर फिर भी कुछ शेर ऐसे थे जिन्होने सब कहानी कह दी । यूँ तो पूरा गज़ल संग्रह ही संजोकर रखने वाला है क्योंकि हर गज़ल , हर शेर दिल की गहराइयों से निकला हर दिल तक पहुँचता है जो बताता है किसी कसौटी के मोहताज नहीं हम । 

जो खुद को खुद पढवा ले सब काम छुडवा कर उस संग्रह में कुछ तो ऐसा होगा ही जो खास होगा हर आम से बस ऐसा ही कुछ इस संग्रह के साथ हुआ कि इतनी व्यस्त होने के बावज़ूद भी मैने सबसे पहले ये संग्रह पढा और अब खुद के विचार व्यक्त करने से खुद को रोक नहीं सकी ।


गज़ल विधा कभी प्रेम व्यक्त करने की खालिस विधा मानी जाती थी ये तो बाद के वर्षों में उसमे समाजिक स्थितियों ने भी जगह ले ली उसी प्रेम के विभिन्न आयाम देखने को मिले ।  विरह की वेदना का चित्रण करने मे तो महारत हासिल है उसके साथ यादों की पीर का दस्तक देना और फिर उस दस्तक को शब्दों से सहलाना कोई कवि से सीखे । हर शेर एक मुकम्मल कहानी कहने में सक्षम है। हर शेर में इक दीवानगी है तभी तो घुटन , तड़पन , उदासी , अश्क , रुस्वाई , अकेलापन बिना इश्क की कहानी अधूरी है वैसे तो इश्क शब्द भी अधूरा है तो कहानी कैसे पूरी हो सकती है तभी तो 

रात भर आरी चलाई याद ने 
रात भर खामोश हम चिरते  रहे 

उठे सैलाब यादों का , अगर मन में कभी तेरे 
दबाना मत कि उसका ,आँख से झरना जरूरी है 

मुस्कुराते हैं हम तो पी के इन्हें 
आप कहते हैं अश्क खारे हैं 

तमन्ना थी गुज़र जाता , गली में यार की जीवन 
हमें मालूम ही कब था यहाँ मरना ज़रूरी है 

याद हर पल तुझको करने , का सिला पाने लगा 
मुझको आइना तेरा चेहरा , ही दिखलाने लगा 

घुटन , तड़पन , उदासी , अश्क , रुस्वाई , अकेलापन 
बगैर इनके अधूरी इश्क की हर इक कहानी है 

आज की ज़िन्दगी की एक कडवी सच्चाई को कितनी सहजता से प्रस्तुत कर दिया कि पाठक मन में हलचल मचा गया 

तुझ में बस तू बचा है मुझमे मैं 
अब के रिश्तों में हम नहीं होता 

इक गुज़ारिश है याद जब आओ 
आँख से मत मेरी झरा कीजे 

लाख कोशिश करो आ के जाती नहीं 
याद इक बिन बुलाई सी मेहमान है 

जहाँ जाता हूँ मैं तुझको वहीँ मौजूद पाता हूँ 
अगर लिखना तुझे हो ख़त तेरा मैं क्या पता लिक्खूँ 

लाख चाहो मगर नहीं छुपता 
इश्क में बस यही बुराई है 

दर्द को महसूस शिद्दत से करो 
दर्द में लज्ज़त  नज़र आ जायेगी 

दर्द को भी जो लज़्ज़त से महसूस करे उस दीवाने को क्या कहिये 

याद हर पल तुझको करने , का सिला पाने लगा 
मुझको आइना तेरा चेहरा , ही दिखलाने लगा 

काफूर हो गए जो मिलने पे थे इरादे 
देखा किये हम उन को बस पास में बिठा कर 

मानो वासना की सही परिभाषा ही प्रस्तुत कर दी हो और समय से आँख मिला दी हो 

जिस्म से चलकर रुके, जो जिस्म पर 
उस सफ़र का नाम ही, अब प्यार है 

ज़िन्दगी की सच्चाइयों से यदि मुखातिब होना हो और कहने का ढंग भी आता हो तो क्या कहने और इस काम में कवि निपुण है । गहरी मार करता शेर ज़िन्दगी की हकीकतों से परिचित कराते हैं कि कितनी खुदगर्ज़ी समाई है , सब बस कहने भर के साथी हैं या फिर तमाशाई

देखने में मकाँ  जो पक्का है 
दर हकीकत बड़ा ही कच्चा है 

जान ले लो कहा जिसने भी , उसको जब 
आज़माया , लगा काटने कन्नियाँ 

कौन सुनता है 'नीरज ' सरल सी ग़ज़ल 
कुछ धमाके करो तो बजें सीटियाँ 

आज के दौर की हकीकत को कितनी साफ़गोई से परोसा है कि पढने वाला चमत्कृत हुए बिना नहीं रहता , हम सिर्फ़ शोर मचाने वाले भांड भर हैं वरना हिम्मत की दहलीजें तो कब की नेस्तनाबूद हो चुकी हैं और विश्वास की डोरों के दूसरे छोरों पर इक आग सुलगती मिल रही है 

इस दौर में उसी को सब सरफिरा कहेंगे 
जो आँधियों में दीपक थामे हुए खड़ा है 

हालात देश के तुम कहते खराब 'नीरज '
तुमने सुधरने को बोलो तो क्या किया है ?

वही करते हैं दवा आग नफरत की बुझाने का 
कि जिनके हाथ में जलती हुई माचिस की तीली है 

आह ! अब भी कुछ कहने को बचा क्या :)

खिलखिलाता है जो आज के दौर में 
इक अजूबे से क्या कम वो इंसान है 

मीर , तुलसी , ज़फर , जोश , मीरा , कबीर 
दिल ही ग़ालिब है और दिल ही रसखान है 

आँधियाँ जब दे रही हों दस्तकें 
तब दिए की लौ बचाना सीखिए 
आज के दौर की एक सच्चाई ये भी है जिसने कहावतों के अर्थ ही बदल कर रख दिये और अपने ही नये अर्थ बना दिये क्योंकि वक्त जब तारीखें बदल देता है तो दिल पर उग आयी लोकोक्तियों को भी बदलना जरूरी है 

डालिये दरिया में यूँ मत नेकियाँ 
अब भला करके जताना सीखिए 

इस जहाँ में यही झमेला है 
झूठ ने सच सदा धकेला है 

देश की चिन्ता कवि मन को उसी तरह व्याकुल करती है जैसे एक देशभक्त को या आम इंसान को तभी तो प्रश्न भी उठाते हैं उसके अल्फ़ाज़ आखिर कौन जिम्मेदार है चैन-ओ-अमन को मिटाने को , इंसाँ से इंसाँ को लडाने को , क्यों सहमी ही पीढियाँ जन्म ले रही हैं 

रौंद के गुल प्यार के इस मुल्क में 
खार नफरत के उगाता कौन है 

खौफ का खंजर जिगर में जैसे हो उतरा हुआ 
आज का इंसान है कुछ इस तरह सहमा हुआ 

खुश्बू फूलों की ही तय करती है उनकी कीमतें 
क्या कभी तुमने सुना है , खार का सौदा हुआ 

दूर होठों से तराने हो गए 
हम भी आखिर को सयाने हो गए 

लूट कर जीने का आया दौर है 
दान के किस्से , पुराने हो गए 

आज के दौर में इंसानी मन में उपजी असंवेदनशीलता का प्रत्यक्ष उदाहरण बन उभरे हैं ये शेर जो ना केवल व्याकुल करते हैं बल्कि कहीं दिशा भी देते हैं तो कहीं रिश्तों की अहमियत भी समझाते हैं ।

साथ बच्चों के गुज़ारे पल थे जो 
बेशकीमत वो ख़ज़ाने हो गए 

तुम जिसे थे कोख ही में मारने की सोचते 
कल बनेंगी वो सहारा देख लेना बच्चियाँ 

खोल कर रखिये किवाड़ों को सदा 
फिर ख़ुशी न लौट जाने पायेगी 

 कभी ज़माना था जब रिश्तों के लिये ही जीया जाता था और आज के दौर में जैसे सभी अजनबी हो गये हैं ऐसे में माँ की अहमियत को बडी संज़ीदगी से उकेरा है 

भले हो शान से बिकता बड़े होटल या ढाबों में 
मगर जो माँ पकती है , वही  पकवान होता है 

वक्त और हालात हमेशा एक से नहीं रह्ते और बदलते हालात के साथ जो खुद की खुद्दारी को ज़िन्दा रखे उसका जीना ही वास्तव में जीना होता है तभी तो कवि कहता है 

जहाँ दो वक्त की रोटी , बड़ी मुश्किल से मिलती है 
वहाँ ईमान का बचना , समझ वरदान होता है 

गहरे दिए हैं जब से , यारों ने ज़ख्म मुझको 
दुश्मन की याद तब से , मुझ को सता रही है 

बचपन की यादों संग डोलता कवि मन संयुक्त परिवार की महत्ता को तो दर्शाता ही है साथ ही बच्चे पर अपनी महत्त्वाकांक्षाओं का बोझ डालना कैसे उनके बचपन को लील रहा है उसे भी व्यक्त करता है ।

घोंसलों में परिंदे , जो महफूज़ थे 
छोड़ कर घोंसले , हाथ मलने लगे 

जब तलक है पास कीमत का पता चलता नहीं 
आप उनसे पूछिए जो दूर हैं परिवार से 

दौड़ता तितली के पीछे , अब कोई बच्चा नहीं 
लुत्फ़ बचपन का वो सारा , होड़ में है खो दिया 

माँ बाप को न पूछा कभी जीते जी मगर 
दीवार पे उन्ही का है फोटो सजा लिया 

सारी  खुशियों को लील जाती है 
होड़ सबसे अधिक कमाने की 

ज़िन्दगी की राह में हो जाएँगी आसानियाँ 
मुस्कुराएँ याद कर बचपन की वो शैतानियाँ 

बच्चों को अपना बचपन तो जीने दो 
यूँ बस्तों का बोझ बढ़ाना ठीक नहीं 

राजनीति के हथकंडों से भी कवि मन अछूता ना रह सका और आखिर अपने दिल की बात बहुत ही तहज़ीब से व्यक्त कर दी 

हाथ में फूल दिल में गाली है  
ये सियासत बड़ी निराली है 

भूलता है ईमानदारी को 
पेट जिसका जनाब खाली है 
बातों से जो मसले हल हो सकते हैं 
उनके कारण बम बरसाना ठीक नहीं 

बोलकर सच यही सुना सबसे 
यार तेरी ज़बान काली है 

पहले तो सबका इक ही था 
अब सबका अपना अपना रब 

बेगानेपन का सटीक उदाहरण बन गया है ये शेर :

हालत तो देखो इंसां की 
खुद से ही डरता  है वो अब 

जो भी आता हाथ नहीं 
लगता है अनमोल मियाँ 

कवि ने कुछ बहुत ही सटीक कबीर सी वाणी प्रस्तुत की है जो ज़िन्दगी जीने में सरलता पेश करेगी ऐसा विश्वास है 

भला करता है जो सबका , नहीं बदले में कुछ पाये 
कहाँ पेड़ों को मिलते हैं , कभी ठन्डे घने साये 

तल्खियां दिल में न घोला कीजिये 
गाँठ लग जाए तो खोला कीजिये 

दिल जिसे सुन कर दुखे हर एक का 
सच कभी ऐसा न बोला कीजिये 

यूँ  जहाँ से निकाल सच फेंका 
जैसे सालन में कोई बाल रहा 

पता है रिहाई की दुश्वारियां पर 
ये कैदे कफस भी तो भाती  नहीं है 

तुम चाहतों की डोरी इतनी भी मत बढ़ाना 
घिर जाय आँधियों में दिल की पतंग जा कर 

आज असंवेदनशीलता की कगार पर पहुँचे रिश्तों का इससे बेहतर चित्रण और क्या होगा भला ………स्वीकार लो जो है जैसा है कम से कम अजनबीयत से दूर ही सही इक रिश्ता तो है 

तलाशो मत तपिश रिश्तों में यारों 
शुकर करिये अगर वो गुनगुने हैं 

जी हजूरी जब तलक है तब तलक वो आपका 
फेर लेता है नज़र जब भी हों ना - फर्मानियाँ 

नाम तो लेता नहीं मेरा मगर लगता है ये 
रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से 

भूख से बिलबिलाते लोगों को 
कायदे मत सिखाइये साहब 


शिद्दत से है तलाश मुझे ऐसे शख्स की 
इस दौर में है जिसने भी ईमाँ बचा लिया 

गैर का साथ गैर के किस्से 
ये तो हद हो गई सताने की 

साथ फूलों के वो रहा जिसने 
ठान  ली खार से निभाने की 


दौड़ हम हारते नहीं लेकिन 
थम गए थे तुझे उठाने को 

कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में 
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए 

 आईना दिखाती गज़लें इंसानी फ़ितरत पर भी तीखा वार करती हैं और सोच के किवाडों पर भी दस्तक देती हैं 

सांप को बदनाम यूं ही कर रहा है आदमी 
काटने से आदमी के मर रहा है आदमी 

हैवानियत हमको कभी मज़हब ने सिखलाई नहीं 
हमको लड़ाता कौन है ? ये सोचा है लाज़िमी 

देश के हालात बदतर हैं, सभी ने ये कहा 
पर नहीं बतला सका , कोई भी अपनी भूमिका 

छोड़िये फितरत समझना , दुसरे इंसान की 
खुद हमें अपनी समझ आती कहाँ है , सच बता 


देखिये जिसको , वाही मगरूर है 
मौत को , शायद समझता दूर है 

धुल झोंकी है उसी ने , आँख में 
हम जिसे कहते थे , इनका नूर है 


तय किया चलना जुदा जब भीड़ से 
हर नज़र देखा , सवाली हो गई 



संपूर्ण गज़ल संग्रह मानो ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा है जिसे जिसने गुना उसी ने जाना क्या वक्त ने उसमें लिखा है । जब पहली बार इस गज़ल संग्रह को खोलकर हाथ में लिया तभी मदहोश कर दिया । 

हर पन्ने पर मोगरा बिखरा हुआ और उस मोगरे पर गज़ल का लिखा जाना एक अलग अन्दाज़ को प्रस्तुत करता है और फिर ' मोगरे' इस शब्द से तो मेरा बहुत ही पुराना नाता रहा है जिसे आप सब से शेयर किये बिना जाने क्यों रह नही पा रही मेरे पिताजी के मामा थे उन्हें घर में सबके अलग अलग नाम रखने का शौक था और कभी किसी को उसके ओरिजिनल नाम से नही बुलाते थे और मज़े की चीज़ हमारा संयुक्त परिवार इतना बडा था कि कम से कम 50 लोग तो घर के ही होंगे और वो सबके अलग ही नाम रखते किसी के प्रिंस या प्रिंसेस या लार्ड या प्रैज़ीडेंट आदि लगाकर एक नया शब्द जोड देते थे और मैं तो उस वक्त बहुत ही छोटी थी जब मुझे उन्होने 'मोगरा' नाम दिया जिसका अर्थ मैं नहीं जानती थी मगर मुझे ये शब्द भी अच्छा नहीं लगता था और कभी इसका अर्थ किसी से पूछा भी नहीं । वो जब भी कहते "ये तो मरा मोगरा है मोगरा " तो मुझे लगता जैसे कितना गन्दा सा नाम दिया है मामा ने मुझे । रिश्ते के अनुसार तो बाबा कहना चाहिये था मगर वो हम सबके जगत मामा थे तो क्या बच्चे क्या बडे सभी उन्हें मामा कहते थे । यहाँ तक कि वो जब नहीं रहे तब तक भी मुझे मोगरे का अर्थ पता नहीं चला और उसके बाद तो जैसे मैं ये शब्द भी भूल सी गयी मगर जिस दिन से नीरज जी के ब्लोग पर उनके ब्लोग का ये नाम पढा और फिर किताब का तब जाना मोगरे का असली अर्थ जिसने मुझे मोगरे की भीनी सी खुश्बू से सराबोर कर दिया कि कितना सुन्दर नाम दिया था मामा ने मुझे सोच कर आज भी आँखें नम हो जाती हैं और ऐसे में जब नीरज जी की ये किताब हाथ में आयी और उन्होने इतने प्रेम और स्नेह से भिजवायी तो एक बार फिर ना केवल अपने बचपन से जुड गयी बल्कि मोगरे की महक से सराबोर हो गयी । सिर्फ़ इसलिये कह देना कि मोगरे शब्द से मेरा बचपन का नाता है इसलिये अच्छा कह रही हूँ ऐसा नहीं है बल्कि ये संग्रह वास्तव में दिल को छूने वाला , दिल में उतरने वाला और भविष्य में गज़ल की दुनिया में अपनी एक पहचान बनाने वाला साबित होगा ऐसी मुझे उम्मीद ही नहीं पूरा विश्वास है। नीरज जी को संग्रह के लिये बधाइयाँ और शुभकामनायें देते हुये उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हूँ । 

यदि आप इस संग्रह को प्राप्त करना चाहते हैं तो नीरज गोस्वामी या शिवना प्रकाशन के पंकज सुबीर से निम्न पते पर संपर्क कर सकते हैं : 

शिवना प्रकाशन 
पी सी लैब , सम्राट काम्प्लैक्स बेसमैंट 
बस स्टैंड , सीहोर - 46601  ( म प्र )
फोन : 07562405545, 07562695918
E-MAIL : shivna.prakashan@gmail.com