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सोमवार, 16 मार्च 2015

तो फिर दो हाथ में हाथ (इक प्रेम कहानी )

सुनो 
तुमने मुझे सही समझा 
तुम्हारी कविता में जैसे मै खुद से मिला

क्या सच में या मन रखने को कह रहे हो ? 

सच में मगर हैरत में हूँ 
इतनी दूर से भी कोई किसी को 
इतनी गहराई से कैसे समझ सकता है ?

दूर से ही तो इंसान ज्यादा समझ सकता है
पास रहकर तो दूरियाँ ज्यादा बढती हैं .......जानते हो न 

हाँ जानता हूँ फिर भी जाने क्यों लगा 
कोई मुझे कैसे इतनी अच्छे से समझ सकता है 
क्या ऐसा भी हो सकता है 

हाँ हो सकता है 
बशर्ते कोई आपकी शख्सियत से प्रभावित न हुआ हो
दूर खडा सिर्फ़ आपके क्रिया कलाप को गुन रहा हो 
कितनी सघन संवेदना है  
कितनी प्यास की तीव्रता है  
कितनी बची जिजीविषा है 
आसान होता है उसके बाद समझना 
जानते हो क्यों
क्योंकि 
जब आप दूर खडे किसी को देखा करते हो
उससे न कोई लगाव रखते हो 
बस एक द्रष्टा की भांति 
उसके ह्रदय में झाँका करते हो 
कहीं न कहीं 
अपनी ही कोई अस्फ़ुट प्रतिक्रिया वहाँ देखा करते हो ,
अपना ही कोई प्रतिबिम्ब वहाँ छलका करता है 
अपना ही अकथ्य वहाँ मुखर हुआ करता है
तब आसान हो जाता है आईने में अक्स को उभारना 

शायद सच कह रही हो तुम 
तुमसे एक अपनत्व सा होने लगा है 
सुनो 
मुझे कभी भूलोगी तो नहीं ?

ये प्रश्न आखिर क्यों ? 
मै तो जिसे अपना मान लेती हूँ 
दिल में जगह दे देती हूँ 

इसका मतलब नही भूलोगी ? 
ये तुम सोचो इसका क्या मतलब निकलता है 

तुम ही बता दो न 


मतलब हाँ और न का खेल है 



समझा नही 



मतलब हाँ कहूँ तो ही मानोगे कि नही भूलूँगी 

क्या इतना भी विश्वास नहीं 


है न ...

है तो फिर पूछना क्या 
अपना विश्वास पक्का होना चाहिए 
फिर तो आस्माँ भी धरती पर उतर आता है 


सही कहती हो शायद 
बहुत छला गया हूँ इसलिए संभल कर घूँट भरा करता हूँ
हर रिश्ते को शक की निगाह से देखा करता हूँ 


ओ अजनबी !यूँ न परेशान हो 
वक्त की करवटों से न हैरान हो 
बेशक सफ़र के राही हैं हम
फिर भी यूँ ही न मिले हैं हम 
शायद कहीं किसी खुदा की कोई मर्ज़ी हो 
शायद किसी खुदा की तूने की इबादत हो 
जो आज यूँ मुलाकात की शम्मा जलायी हो 


सुनो 
तुम्हारी बातें सुकून दे रही हैं 
सुकून से ज्यादा तो मेरे दिल में घर कर रही हैं 
लगता है आज पिघल जायेगा आस्माँ और झुक जाएगा धरा के कदमों पर


अरे अरे क्या सोचने लगे 
कहाँ खोने लगे 
किस आस्माँ पर ख्वाबों का महल बनाने लगे 


नहीं अब कुछ मत कहना 
बस चुप रहना 
जो कह रहा हूँ बस सुनती रहो 
और आँख बन्द कर संग मेरे चलती रहो 
सुनो 
दोगी न साथ ?


उफ़! तुमने ये क्या प्रश्न किया 
मुझसे मेरा वजूद ही छीन लिया 
अब क्या कहूँ किसे कहूँ याद नहीं
ये तो मेरी तपस्या की सम्पूर्णता हुई 
जो तुम्हारे ख्वाबों की शहज़ादी हुई 
कहो कहाँ चलना होगा , 
किस लोक में भ्रमण करना होगा 


तो फिर दो हाथ में हाथ और मूँद लो अपनी आँख 
मेरे काल्पनिक संसार से मेरी हकीकत के सफ़र तक 
आओ चलो चलें थामे इक दूजे का हाथ

मंगलवार, 10 मार्च 2015

यूं ही

जाने कौन सी खलिश बींधती है मुझे 
कि इक आह सी हर साँस पर निकलती रही 

और मैं अनजान हूँ ऐसा भी नहीं 
फिर भी खुद से पूछने में झिझकती रही 

अंजुमन यूं तो खाली ही रहा अक्सर 
फिर भी उम्र फासलों से गुजरती रही 

हसरतों को लुभाने की बात मत करना 
कि इक बियाबानी दिल में मचलती रही 

अब मुस्कुराने से भला क्या होगा 
जब नज्मों में दिल की लगी सुलगती रही 

अब कौन रखे हिसाब सिसकते ज़ख्मों का 
जब यूँ ही इक सिलवट दिल पर पड़ती रही 

रविवार, 8 मार्च 2015

मैं नर ……… तुम मादा





1
मैं नर ……… तुम मादा
तुम मादा 
मैं नर 
फिर चाहे 
मानव हो या दानव 
पशु हो या पक्षी 
पुरुष हो या प्रकृति 
हम सब पर लागू होता 
शाश्वत सिद्धांत हैं 
जननी के लिए 
जनक का होना जरूरी है
या जनक बनने के लिए 
जननी का होना लाजिमी है 
बिना सिद्धांत का पालन किये 
किसी प्रमेय का हल नहीं निकाला जा सकता 
सो लागू है हम पर भी 

 2
तुम …. एक बहु उपयोगी हथियार सी 
मेरी मनोकामनाओं  के 
बीजों को पोषित करतीं 
गर अट्टहास को आतुर हो तो 
समझना होगा तुम्हें 
कल भी 
आज भी 
और भविष्य में भी 
तुम्हें अट्टहास लगाने को वजह मैं ही दूंगा 
मगर कितना और किस मात्रा  में 
और कहाँ लगाना है 
ये मैं ही बताऊँगा 
चिन्हित करूंगा मार्ग 
दूँगा  दिशानिर्देश 
तब उन्मुक्त उड़ान का अट्टहास लगाने की 
तुम्हारी प्रक्रिया सार्थक होगी 

3
क्योंकि 
तुम ……… मादा हो 
नहीं है तुम्हें अधिकार 
प्रमेय के नियम बदलने का 
मगर मुझ पर भी लागू हो 
वो नियम , जरूरी नहीं 
तुम सिर्फ एक इकाई हो 
एक ऐसा कोष्ठक 
जिसे अपनी सुविधानुसार 
कहीं भी जोड़ा जा सकता है 
और जब कभी तुम्हें अहसास हो 
अपने वजूद की निरर्थकता का 
शोषित होने का 
तब आसान होगा मेरे लिए 
सारे  नियमो को ताक  पर रखकर 
तुम्हारी मर्यादा की धज्जियाँ उड़ाने का 
तुम्हें लक्ष्य पाने को आतुर 
भटकती आत्मा कहने का 
क्योंकि 
प्रयोग की दृष्टि से तो 
हम एक दूसरे के बिना अधूरे ही हैं 
और तुम्हारा उत्कर्ष 
मेरे निष्कर्षों का 
सदा ही मोहताज रहा है 
इसलिए 
बौद्धिक कहो , मानसिक कहो 
शारीरिक या वाचिक 
शब्दों की गरिमा कहीं भंग न हो जाए 
सोच , नहीं कहना चाहता तुम्हें  कुछ भी 
मगर तुम समझ ही गयी हो मेरा मंतव्य 

4
हाँ , नर हूँ मैं 
और तुम ……… मादा 
इस अंतर को याद रखना तुम्हारी नियति है 
वरना 
कुछ शाख से टूटे हुए पत्तों को 
हवाएं कहाँ ले जाती हैं 
पता भी नहीं चलता 
मगर वृक्ष पहले भी 
था , है और रहेगा 
ये आत्म प्रवंचना नहीं है 
ये वो सत्य है जिसे तुम 
जानती हो 
मानती हो 
स्वीकारती हो 
मगर फिर भी देखती हो 
खुद को देह से परे … एक अस्तित्व 
मादा होना ही एक प्रश्नचिन्ह है 
फिर देह से परे एक अस्तित्व खोजना 
तो तुम्हारी वो भूल है 
मानो तपते सूरज पर 
कोई चाँद की रोटियां सेंक रहा हो 
मगर पेट भी न भर रहा हो 

5
ओ मेरे पिंजरे की मैना 
मेरे हाथों की कठपुतली 
तुम्हारी सारी  डोरें 
सारे  दरवाज़े 
सारे  झरोखे 
मेरे अहम् के गाढे किले से बंधे हैं 
जहाँ मैं जानता हूँ 
कब और कितनी छूट देनी है 
कब डोर खींचनी है 
और कब प्रयोग करके तोड़ देनी है 
ख्याति के वटवृक्ष हेतु 
तुम्हारी बलि अनिवार्य है 
क्योंकि 
तुम मेरे खेल का वो पांसा हो 
जिसमे चौसर की बिसात पर 
दोनों तरफ से खिलाडी मैं ही हूँ 
और खुद की जीत की खातिर 
पांसों को कैसे पलटना है , जानता हूँ 
क्योंकि 
मैं वो शकुनि हूँ 
जो अपने उद्देश्यपूर्ति के लिए 
चाहे कितनी ही पीढियां तबाह हो जायें 
महाभारत कराये बिना कुछ नहीं देता 
गर हो तुम में दम 
गर हो तुम में अर्जुन और कृष्ण सा सारथि 
तभी करना कोशिश 
वर्ना तो कितनी ही 
सभ्यताएं नेस्तनाबूद होती रहीं 
मगर मेरा अस्तित्व 
ना कभी ख़त्म हुआ 
और ना ही ख़ारिज 

6
बेशक तुम्हारा होना भी जरूरी रहा 
मगर सिर्फ ढाल बनकर 
तलवार बनकर नहीं 
इसलिए याद रखना हमेशा 
प्रमेय का सिद्धांत 
मैं नर हूँ 
और तुम ………. मादा 
जिसमे नहीं है माद्दा 
बिना मेरे साथ की बैसाखी के 
हिमालय को फतह करना 
वर्ना आज तुम यूँ ना शोषित होतीं 
वर्ना आज तुम्हारी अस्मिता के 
यूँ ना परखच्चे उड़े होते 
वर्ना आज तुम्हारी ही इज्जत 
हर गली , कूचों और गलियारों में 
यूँ  ना शोषित होती 
फिर चाहे वो घर हो, समाज या साहित्य ………… 

मंगलवार, 3 मार्च 2015

उसने कहा

उसने कहा 
सबसे छोटी प्रेम कविता लिखो 
मैंने उसका नाम लिख दिया 

उसने कहा 
सबसे उदास प्रेम कविता लिखो 
मैंने अपना नाम लिख दिया 

उसने कहा 
सबसे दर्दभरी प्रेम कविता लिखो 
मैंने सजदे में सिर झुका लिया 

भला इसके बाद भी  प्रेम का और कोई मानी बचा है क्या ?

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

कमजोर बुनियादों का शहर

अंधेरों की पाँख पर बीजती सुबहों में 
इन्द्रधनुषी रंगों की छटा 
यूँ ही नहीं उतरी होती 
कोई कसमसाती रात की रानी के 
जब गिरते हैं टेसू 
तब जाकर सुबह की अलसाई आँखों में 
उतरती है एक बूँद ओस की 

और इस बार समेटना है ओस की हर बूँद को 
उसकी क्षणभंगुरता में पहुँचने से पहले 
बनाना है दीर्घकालिक उसका जीवन 
बूँद बूँद से घट भरने की तर्ज पर 

सामूहिक प्रयास की गंगा बहाने के लिए 
एक डुबकी खुद लगानी होती है 
तब जाकर गोमुख से गंगा निकला करती है जिस तरह 
उसी तरह मानव श्रृंखला बना करती है 
संवेदनाओं की फसल पका करती है 

संवेदनहीन दौर में जीने के शाप से ग्रसित हम लोग 
मजबूर नहीं हैं , बताना है एक बार खुद को 
सिर्फ तलवार की मूठ पर हाथ होने से नहीं जीती जातीं लड़ाइयाँ 
तलवार चलाने के हुनर में माहिर होना भी जरूरी है 

शह और मात का खेल नहीं ज़िन्दगी 
बताना है इस बार जन जन को 
जगानी हैं उनमे सोयी हुई खुद्दारी 
'मैं और मेरे' से परे भी है एक जहान
इंसानियत एक शब्द भर नहीं है 
परिचित कराना भी है मकसद 

बस काफी होगा फिर 
सोये शेर की मांद में घुसकर ललकारना भी 
संभव हो जाएगा फिर 
इन्द्रधनुष के हर रंग पर अपना नाम लिखना भी 

बुनियाद की मजबूती ही इमारत की दीर्घकालिकता निश्चित किया करती है 
और आज कमजोर बुनियादों का शहर बन गया है ये जहान

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

अफ़वाह

चरणबद्ध तरीके से फैलाकर 
भ्रांतियों का बाज़ार 
वो कर जाते हैं तुम्हें दरकिनार 
करके अफ़वाह का बाज़ार गरम 
सेंक लेते हैं कुछ रुमाली तो कुछ तालिबानी रोटियाँ 
करके तुम्हें हलाल 
सजा लेते हैं अपने लिए एक सम्मानित थाल 

आरती उतारने को जरूरत ही कितनी होती है 
सिर्फ़ एक घी से भरा दीप और तुम बन जाते हो भगवान 
हाँ भगवान, एक ऐसे भगवान 
जो खुद के द्वारा पोषित होता है 
जो स्वंय को सर्वेसर्वा सिद्ध करने को 
कर सकता है तुम्हारे खिलाफ़ अघोषित युद्ध 
बिना तीर तलवार के करके घायल 
हो जाता है सफ़ल कुछ निगाहों में 
मगर खुद की निगाह में ये छद्म सफ़लता 
क्या बना पाती है कोई मुकाम 
मापने को नहीं बने हैं अभी कोई यंत्र 

ये बाज़ार है प्यारे 
यहाँ अफ़वाहों के ओवन में पककर 
निकली खबरों पर ही राज किया जाता है 
और आज की ताज़ा खबर है ये 
अब तुम इस पर विश्वास करो या नहीं तुम पर निर्भर करता है 
तुम्हारी संभावनाओं का अंत करने को 
कोशिशों के तमाम उपकरण काम पर लगा दिए गये हैं 
क्या कर सकते हो तुम उन उपकरणों की पहचान 
जिसमें  एक कान से गुजरने पर 
और दूसरे कान तक पहुँचने तक 
जुड जाते हैं तमाम विशेष उपकरण 
ईर्ष्या और द्वेष के 
करने को तुम्हें खारिज 
तुम्हारी उपस्थिति से 
जहाँ सत्य के उन्ही घिसे पिटे उपकरणों के सहारे 
युद्ध करने पर हो जाते हो तुम निष्कासित 
वहाँ कैसे जीत सकते हो युद्ध तुम अफ़वाह के बाज़ार से 

सत्य के पथ को त्याग अपना सको तो अपना लो 
खुल जायेगी तुम्हारे यहाँ भी सफ़लता की ट्कसाल 
वरना मत करो उत्पात मत करो शोर 
जो खुद को नहीं ढाल सकते बाज़ार के चलन  में 
यही है दस्तूर सफ़ल व्यक्तित्व बनने को 
यदि थोडी कीचड कपडों पर लग भी जाए तो क्या 
पहचान और प्रसिद्धि कटिबद्ध रहेंगी तुम्हारे कदम चूमने को 

अफ़वाह का गर्म बाज़ार आज के जीवन में सफ़लता का मूलमंत्र है प्यारे !!!

जानकर सारी योजनायें भी 
सोचती हूँ इस बार 
फ़ँस ही जाऊँ जाल में 
क्योंकि वो हैं शिकारी और मैं हूँ उनका 
ईज़ी टारगेट उर्फ़ आसान शिकार !!!

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

ए कहाँ हो ?



ए कहाँ हो ?
देखो आज तुम्हारे शहर में 
मौसम ने डेरा लगाया है 
हवाएं पैगाम लिए दस्तक दे रही हैं 
दरवाज़ा खोलो तो सही 
घर आँगन ना महक जाए तो कहना 
रजनीगंधा की खुश्बू 
रूह में ना उतर जाए तो कहना 

आज तुम्हारे लिए 
मौसम के सारे गुलाब लेकर बहार आयी है 
देखो  
तुम्हारा मनपसंद काला गुलाब 
याद है न कहा करते थे 
ये तुम्हारे सुरमई बालों में 
चाँद की चांदनी में जब चमकेगा  
यूँ लगेगा जैसे नज़र का टीका लगाया हो 
देखो सुर्ख पलाश 
कैसे बिखरे हैं दरवाज़े पर 
जिनका रंग तुम 
अपनी कविताओं में उतारा करते हो 

क्या आज एक नज़्म नहीं लिखोगे 
फिर से उसी मोहब्बत के नाम 
जिसके फूल हरसिंगार की तरह झड़ रहे हैं 
देखो मोहब्बत ने 
कैसा दूधिया रंग बिखेरा है 
तुम्हारा आँगन भर गया है 
सफ़ेद हरसिंगार से 

बताओ अब और कौन सी रुत बची है 
पतझड़ का मौसम बीत चुका  है 
और आज तो बसंत का पुनः आगमन हुआ है 
तुम एक बार 
बंद दरवाज़े खोलो तो सही 
जानते हो न 


मोहब्बत रोज़ दस्तक नहीं दिया करती !!!

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

इश्क की कुदालें

मैंने तह करके रख दिए सारे सपने 
और अब धूप दिखा रही हूँ खाली मर्तबान को 

पीने को पानी होना जरूरी तो नहीं 
प्यास के समन्दरों में खेलती हूँ पिट्ठुओं से 

रूह खामोश रहे  या शोर करे 
कतरे सहेजने को नहीं बची मदिरा पैमानों में 

ए री मैं गिरधर की दासी कह 
अब कोई मीरा न रिझाती मोहन को 

इश्क की कुदालें छीलती हैं सीनों को 
तब मुकम्मल हो जाती है ज़िन्दगी मेरी 

आ महबूब मेरे चल जी ले कुछ पल मेरी तरह .......मेरे साथ ...... फिर इस रात की सुबह हो के न हो 

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

साहित्यिक गर्भ ज्ञान

गुरु जी साहित्यिक गर्भ ज्ञान बतला दीजिये 
कुछ दिव्य ज्ञान दे जिज्ञासा शांत कीजिये 

बच्चा ये क्या आज तुझे सूझी 
क्यों आज तुमने ये पहेली पूछी 
गुरु जी साहित्य में आना चाहता हूँ 
मैं भी नाम कमाना चाहता हूँ 

बच्चा ये डगर उनके लिए नहीं आसां बस इतना समझ लीजै 
जो उसूलों आदर्शों पर जीवित रहते हैं और उन्ही में जीते हैं 
यहाँ तो हर ऐरे गैरे को महान बनाया जाता है 
सिर्फ उसूलपसंद को  ही हाशिये पर लुढकाया जाता है 

गुरु जी आपका मार्गदर्शन चाहिए 
आपकी कृपा रुपी कर कमल सिर पर चाहिए 

बच्चा यहाँ गुट निरपेक्ष राज्य नहीं चलता है 
बस गुट बनाने वालों का ही धंधा फलता फूलता है 
तब अंधे के हाथो ही बटेर लगती है 
वर्ना तो अन्यों की न यहाँ दाल गलती है 

गुरु जी मेरे मन में उथल पुथल मची है 
कृपया पूर्ण ज्ञान दीजिये 
मुझे भी साहित्यिक बिरादरी में शामिल कीजिये 

शिष्य की अधीरता देख गुरु बोल उठे 
बच्चा फिर तो तुझे कमर कसनी होगी 
सबसे पहले एक किताब छपवानी होगी 
फिर सारे दांव पेंच खुद ही सीख जाएगा 

गुरूजी आपके बिना मेरा साहित्यिक कैरियर लडखडायेगा 
आपके बिना ये शिष्य कैसे साहित्यिक सागर पार कर पायेगा 

बच्चा मेरी ऊंगली पकड़ गर चलेगा 
तो जुगाड़ का दांव पेंच भी सीखना होगा 
क्योंकि किताब छपते ही स्वतः विरोधी खर पतवार से उग आयेंगे 
तेरे अपने बन तेरी जड़ में ही सेंध लगायेंगे 
उनसे पहले तुझे चाल चलनी होगी 
वो पटखनी दें उससे पहले ही जुगत करनी होगी 
दो चार पुरस्कार जेब में करने होंगे  
फिर खुद को सर्वेसर्वा सिद्ध करना होगा 
हर अपने दुश्मन को पहचान उस पर हमला करवाना होगा 

गुरूजी आप ये क्या बता रहे हो 
हमला करवा मुझे जेहादी बना रहे हो 

बच्चा कोई तुम्हें मारे उससे पहले वार करो 
यही युद्ध का नियम होता है 
गर नहीं मानेगा तो ओंधे मुंह गिरेगा 
मैं कौन सा सच की हिंसा करवा रहा हूँ 
बस शब्द बाण चलाने का हुनर बता रहा हूँ 

फिर ठीक है गुरु जी 
मैं तो डर गया था 

बच्चा जो डरा सो मरा जानो 
यहाँ तो चोरी और सीनाजोरी करने वाला ही मुकाम पाता है 
दूसरा प्रतिभावान तो अपने दडबे में छुपा रह जाता है 

अब सुन ध्यान लगाकर 
सबसे पहले एक गुट का सदस्य बनना होगा 
फिर कुछ साहित्यिक गोष्ठियां अपने गुट की करनी होंगी 
खुद चुप रह साहित्यिक मित्रों के माध्यम से 
प्रतिभावानों और समकालीनों की फजीहत करनी होगी 
अपने गुट के लोगों से जुबानी वार करवाने होंगे 
साथ ही खुद के स्तुतिगान भी उन्ही के माध्यम से करवाने होंगे 
बच्चा तुम न कभी मुख से गलत बोलना 
बस दूसरों के कंधे ही हमेशा प्रयोग करना 
यूँ तुम्हारा सिक्का जम जाएगा 
तब सच्चा ईमानदार भी तुमसे घबराएगा 
और वो भी हाशिये पर चला जाएगा 

बस जिस दिन ऐसी तिकड़में सीख जाओगे 
जाति बिरादरी को अपनी तरफ कर लोगे 
पुरस्कार तुम्हारी तरफ आकर्षित होंगे 
और तुम साहित्यिक जगत में घुसपैठ कर लोगे 

यहाँ पचास पुस्तक लिखने वाले हाशिये पर ही रह जाते हैं 
बस जुगाडू और दूसरे के कंधे इस्तेमाल करने वाले ही आगे बढ़ जाते हैं 
एक ही पुस्तक से खुद को चर्चित कर पुरस्कारों की लाइन लगा जाते हैं 

गुरूजी तो क्या सच्चाई ईमानदारी का यहाँ कोई मोल नहीं 

बच्चा मोल तो वास्तव में उसी का होता है 
मगर यहाँ का धंधा तो जुगाड़ से ही चलता है 
गर कोई नहीं जुगाड़ की राजनीति अपनाता है 
फिर चाहे लेखन कितना उन्नत हो पिछड़े दलितों में गिना जाता है 
या साहित्यिक बिरादरी से स्वमेव बाहर हो जाता है 
इतना उसे उपेक्षित कर कुंठित किया जाता है 
कोई इक्का दुक्का जीवट ही अंगद के समान पाँव जमा पता है 
तो उससे न इनपर ख़ास असर पड़ता है 
क्योंकि उनका धंधा तो भली भांति फूलता फलता है 
बस इसी तरह साहित्य का बाज़ार चलता है 

गुरूजी फिर कौन सा मार्ग अपनाऊँ सोच में पड़ गया हूँ 

बच्चा ये तो तुझे ही तय करना होगा 
साहित्यिक गर्भ ज्ञान जो तुझे मैंने दिया है 
किसी से न जिक्र करना वर्ना 
मेरा ही बहिष्कार हो जाएगा 
मेरा डिब्बा ही साहित्य जगत से गोल हो जायेगा 
सबके तीर तलवारों का मैं ही निशाना बन जाऊंगा 
और असमय मौत का भोजन बन जाऊँगा 

बस तू जो भी राह चुने मेरा न उपकृत होना 
मुझे तो परदे के पीछे ही रखना 
जब जब कोई समस्या आये इसी तरह उपाय पूछ लेना 

अथ श्री साहित्यिक गर्भ ज्ञान कथा नमो नमः 

निर्मल हास्य का आनंद लीजिये :)

शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

और नींद है कि टूटती ही नहीं

गाँव खो रहे हैं 
शहर सो रहे हैं 
और नींद है कि टूटती ही नहीं 

विकास के पहिये ने 
रेत दी हैं गर्दनें 
मगर लहू है कि कहीं दिखता ही नहीं 

उम्मीदों के आकाश 
चकनाचूर हो रहे हैं 
और अच्छे दिन की आस है कि टूटती ही नहीं 

शस्त्रागार में शस्त्र हैं बहुत 
मगर चलाने के हुनर से नावाकिफ हैं जो 
नहीं जानते चक्रव्यूह भेदने की विधा 

अब और नहीं 
अब और नहीं 
अब और नहीं 
कहते कहते गुजर गयीं सदियाँ 
मगर तख्तापलट है कि होता ही नहीं 

शायद यही है  वजह 
कि अब गुंजाईश को जगह बची ही नहीं 
अभिमन्यु भेदना है इस बार चक्रव्यूह तुम्हें ही .........मरना हासिल नहीं ज़िन्दगी का 

रविवार, 25 जनवरी 2015

ये कैसा बसंत आया ...........

ये कैसा बसंत आया सखी री 
न आम के नए बौर आये 
न कोयल ही कुहुकी 
न सरसों ही खिली 
न पी कहाँ पी कहाँ कह 
पपीहे ने शोर मचाया 
ये कैसा बसंत आया सखी री 

शीत लहर ही अपने रंग दिखाए 
अबके न अपने देस जाए 
जाने कौन पिया इसके मन भाये 
जो ये खेतिहरों को रही डराय 
ये कैसा बसंत आया सखी री 

न मन में उमंग उठी 
न गोरी कोई पिया मिलन को चली 
न कंगना कोई खनकाय 
न पायल कोई छनकाय 
जो मतवाली हो ऋतु बसंत 
प्रेमियों को देती थी भरमाय 
ये कैसा बसंत आया सखी री 
ये कैसा बसंत आया ...........


शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

कभी कभी लगता है बहुत खडूस हूँ मैं .........

कोई बेचारा अपना हाल -ए-दिल बयां करना चाहता है 
और मैं हूँ कि सिरे से ही नकार देती हूँ 
वो दिल की लगी कहना चाहता है 
मैं दुत्कार देती हूँ 
आधी रात फ़ोन घनघनाता है 
मैं ब्लाक कर देती हूँ 
अपनी आवारगी में दिल्लगी कर जाने क्या बताना चाहता है 

मैं शादीशुदा दो बच्चों की अम्मा 
वो अकेला चना बाजे घना 
कैसे समझ सकता है ये बात 
चाहत के लिए अमां यार मौसम तो दोनों तरफ का यकसां होना जरूरी है
 
वो इतना न समझ पाता है और गलती कर बैठता है 
जल्दबाजी में हाथ के साथ दिल भी जला लेता है  

अजब सिरफिरापन काबिज है मेरी फितरत में 
कभी कभी लगता है बहुत खडूस हूँ मैं .........

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

हिंदी चेतना में

इस बार हिंदी चेतना के जनवरी - मार्च अंक में मेरे कविता संग्रह ' 

बदलती सोच के नए अर्थ ' की संगीता स्वरुप जी द्वारा लिखी समीक्षा पढ़िए






सोमवार, 5 जनवरी 2015

दानव का जड़ से अंत

काट कर शरीर का सडा गला अंग 
संभव है जिंदा रह पाना 
मगर 
उस अंग की उपयोगिता का अहसास 
खुरचता रहता है उम्र भर 
ज़ेहन की दीवारों को 

अपंगता स्थायी होती है 
और विकल्पों के माध्यम से गुजरती ज़िन्दगी 
मोहताजगी का इल्म जब जब कराती है 
बेबसी के कांटे हलक में उग आते हैं 
तब असह्य रक्तरंजित पीड़ा शब्दबद्ध नही की जा सकती 

मगर मजबूर हैं हम 
जीना जरूरी जो है 
और जीने के लिए स्वस्थ रहना भी जरूरी है 
नासूर हों या विषाक्त अंग 
काटना ही है अंतिम विकल्प 
फिर शरीर हो , रिश्ते हों ,जाति हो , समाज हो या धर्म 

धर्म मज़हब सीमा और इंसानियत के नाम पर होती हैवानियत 
बुजदिली और कायरता का प्रमाण हैं 
ये जानते हुए भी 
आखिर कब तक नासूर को जिंदा रखोगी  .........ओ विश्व की महाशक्तियों 

दानव का जड़ से अंत ही कहानी की सार्थकता का अंतिम विकल्प है ........जानते हो न !!!

रविवार, 28 दिसंबर 2014

गिरहकट

कितने धीमे से काटते हो गिरह 
मालूम चलने का सवाल कहाँ 
चतुराई यही है 
और बेहोशी का दंड तो भोगना ही होता है 

होश आने तक 
ढल चुकी साँझ को 
कौन ओढ़ाए अब घूंघट ?

एक मुश्किल सवाल बन सामने खड़े हो जाना 
यही है तुम्हारा अंतिम वार 
जिससे बचने को पूरी शक्ति भी लगा लो अब चाहे 
काटना  नियति है तुम्हारी 

धीरे धीरे इस तरह  रिता देना 
कि बूँद भी न शेष बचे 
जानते हो न 
खाली कुओं से प्रतिध्वनियाँ नहीं आया करतीं 

कितने बड़े गिरहकट हो तुम ............ ओ समय !!!

रविवार, 21 दिसंबर 2014

ये समय की मौत नहीं तो क्या है ?

घुटन चुप्पी विवशता 
और पथरायी आँखें 
बिना किसी हल के शून्य में ताक रही हैं 

कैसे शेर के कसे हुए जबड़ों में 
दबी चीख 
घायल हिरण सी 
फड़फड़ा रही है 

ताको सिर्फ ताको 
घूँट भरने को नहीं बची संवेदना 
जंगल और जंगली जानवरों का 
भीषण हाहाकारी शोर 
नहीं फोड़ेगा तुम्हारे कान के परदे 

इस समय के असमय होने के साक्षी हो 
विकल्प की तलाश में भटकते हुए 
अब क्या नाम दोगे इसे तुम ?

सोचना जरा 
ये समय की मौत नहीं तो क्या है ?

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

वो मेरा कोई नहीं था

हैवानियत के  अट्टहास पर इंसानियत किसी बेवा के  लिबास सी लग रही है 


वो मेरा कोई नहीं था
वो पडोसी मुल्क का था
मैं उसे नहीं जानती
मैंने उसे कभी नहीं देखा
फिर भी मेरा उसका कोई रिश्ता था 
हाँ जरूर था कोई तो रिश्ता
वर्ना कलेजा यूँ फटा न होता
आँख से आंसू झरा न होता 


हाँ था मेरा और उसका रिश्ता
शायद इंसानियत का
शायद ममत्व का

वो मेरा कोई नहीं था ........फिर भी इक रिश्ता तो था , फिर भी इक रिश्ता तो था

(कल जब उन मासूमों के चेहरे दिखाए जो हैवानियत की भेंट चढ़ गए तो आंसू रोके नहीं रुके )

बुधवार, 17 दिसंबर 2014

अब किसकी करें इबादत

अब किसकी करें इबादत कौन सुनता है 
यहाँ दूर दूर तक फैला अँधेरा ही अँधेरा है 

मासूमियत संगसार हुई ज़िन्दगी दुश्वार हुई 
तेरे जहान में इंसानियत की ये कैसी हार हुई 

ओ खुदा ईश्वर अल्लाह जीसस  वाहे गुरु 
बता तो मासूमियत के क़त्ल में कहाँ है तू 

खुश्क आँखों से वहां रोती है इक माई 
क्या मासूमों पर इतनी दया भी न आई 

ये कैसा आतंक है ये कैसा समय है 
करुणा दया ममता को न मिली जगह है 

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

दर्द के बाज़ार में

प्रेम की चिरपरिचित आवाज़
जिसे सुन सुन तिड़क उठती है अन्दर की लड़की

देव तुम हो ,,,,,,,हाँ यहीं हो
मेरी निगाहों में देखो 
तुम्हारी ही तस्वीर नज़र आएगी
और आकाश सुनहरी ...........
बस जरूरत है तो सिर्फ मेरी आँख से देखने की ..........

हे देव ! क्या सुन पाए मेरा अनकहा ?
क्या अब लिख पाओगे फिर कभी कोई कविता ?

दर्द के बाज़ार में मायूसियों की अकेली खरीदार हूँ मैं !!!

रविवार, 30 नवंबर 2014

सोच को पछीटते हुए

सोच को पछीटते हुए कहाँ ले जाऊँ 
मैं कहाँ हूँ और कहाँ नहीं 
आखिर कब तक खुद से मुखातिब रहूँ 
उम्र तो गुजरी चाकरी में 
मगर इक सोच हो जाती है काबिज कभी कभी

सबकी ज़िन्दगी में अवकाश होते हैं 
और एक मैं हूँ 
बिना अवकाशप्राप्त सर्वसुलभ कामगार 

उठाने लगी है सिर एक चाहत
चाहिए मुझे भी एक अवकाश 
हर जिम्मेदारी और कर्तव्य से 
हर अधिकार और व्यवहार से 
हर चाहत और नफ़रत से 
ताकि जी सकूँ एक बार कुछ वक्त अपने अनुसार 
जहाँ न कोई फ़िक्र हो
एक उन्मुक्त पंछी से पंख पसारे उड़ती जाऊँ ,बस उड़ती जाऊँ

क्या संभव होगा कभी ये मेरे लिए 
या चिता पर लेटने पर ही होता है एक स्त्री को नसीब पूर्ण अवकाश …… सोच में हूँ !!!


(चित्र साभार : आरती वर्मा इस चित्र ने लिखने को प्रेरित किया )

सोमवार, 17 नवंबर 2014

क्योंकि अपराधी हो तुम..........

जो स्त्रियाँ हो जाती हैं ॠतुस्त्राव से मुक्त 
पहुंच जाती हैं मीनोपॉज की श्रेणी में 
फ़तवों से नवाज़े जाने की हो जाती हैं हकदार 

एक स्त्री में स्त्रीत्व होता है सिर्फ 
ॠतुस्त्राव से मीनोपॉज तक 
यही है उसके स्त्रीत्व की कसौटी 
जान लो आज की परिभाषा 

नहीं रहता जिनमे स्त्रीत्व जरूरी हो जाता है 
उन्हें स्त्री की श्रेणी से बाहर निकालना 
अब तुम नहीं हो हकदार समाजिक सुरक्षा की 
नहीं है तुम्हारा कोई औचित्य
इच्छा अनिच्छा या इज्जत  
नहीं रहता कोई मोल 
बन जाती हो बाकायदा महज संभोग की वो वस्तु 
जिसे नहीं चीत्कार का अधिकार 
फिर कैसे कहती हो 
ओ मीनोपॉज से मुक्त स्त्री 
हो गया तुम्हारा बलात्कार ?

आज के प्रगतिवादी युग में 
तुम्हें भी बदलना होगा 
नए मापदंडों पर खरा उतारना होगा 
स्वीकारनी होगी अपनी स्थिति 
स्वयंभू हैं हम 
हमारी तालिबानी पाठशाला के 
जहाँ फतवों पर चला करती हैं 
अब न्याय की भी देवियाँ 


क्योंकि 
अपराधी हो तुम ....... स्त्री होने की 
उससे इतर 
न तुम पहले थीं 
न हो 
न आगे होंगी 
फिर चाहे बदल जाएं 
कितने ही युग 
नहीं बदला करतीं मानसिकताएं 


स्त्रीत्व की कसौटी 
फतवों की मोहताजग़ी 
बस यही है 
आज की दानवता का आखिरी परिशिष्ट 


गुरुवार, 6 नवंबर 2014

खामोशियों के पाँव में घुँघरू नहीं होते

खामोशी का बीज वक्तव्य सिर्फ़ इतना था 
कोई मुझसे इतर मुझमें पैठा था 
जब भी झाँका ख्याले अंजुमन में 
सिर्फ़ चुप्पियों का कोलाहल था  

दरकने को न जमीं थी न सुराख़ को आस्माँ 
मेरी ख़ामोशियों का कोई राज़-ए -खुदा न था 

जब दिन की हँसी रातों के गुलाब खिलने का आसार था 
तब अश्कों के पलकों पर ठहरने के मौसम खुशगवार था 
ये जानकर खामोशियों के पाँव में घुँघरू नहीं होते 
यूँ इक रूह के भटकने का तमाम इंतजाम था 

शायद तभी ज़िद पर अडी खामोशियाँ किसी रुत की मोहताज़ नहीं होतीं ……