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बुधवार, 29 जून 2011

ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

ये आस्तीन के साँपों की दुनिया
ये झूठे चालबाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

कभी झूठी बातें कभी झूठे चेहरे

कभी इन्सान को मिटाने के
करते हैं बखेड़े
हर एक शख्स झूठा
हर इक शय है धोखा
अपनों की भीड़ में छुपा है वो चेहरा
गर इसे पहचान भी जायें तो क्या है
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

कभी पीठ में खंजर भोंकती है दुनिया

कभी सच्चाइयों को रौंदती है दुनिया
हर तरफ फैली है नफ़रत की आँधी
हर ओर जैसे बिखरी हो तबाही
बंजर चेहरों में अक्स छुपाती ये दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है





अब चाहे मिटाओ या फूंक डालो ये दुनिया
मेरे किसी काम की नहीं है ये दुनिया 
बारूद के ढेर पर बैठी ये दुनिया  
किसी की कभी न होती ये दुनिया
कितना बचके चलना यहाँ पर
 किसी को कभी न बख्शती ये दुनिया 
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

रविवार, 26 जून 2011

क्या ऐसा होगा

ये सुबह ठहरती क्यों नही……
कब तक आस के मोती सम्हालूँ
जानते हो ना
तुम्हारी आस ही
ज़िन्दा रखे है
और तुम मेरी ज़िन्दगी की सुबह
जब तुम वापस आओगे
जानते हो ना
उसी दिन सुबह ठहरेगी मेरे आँगन में
कभी ना जाने के लिए ......तुम्हारी तरह
क्या ऐसा होगा ..........
मेरी आस का सूरज उगेगा........

और आसमां धरती पर उतरेगा
बताओ ना ...........
क्या ऐसा होगा
जब कुमुदिनी दिन में खिलेगी

गुरुवार, 23 जून 2011

पता नही क्यूँ

पता नही क्यूँ किनारा कर जाते हैं लोग
कुछ ऐसे मुझे आजमाते है लोग

जब भी मुझे अपना बनाते है लोग
फिर एक नया दगा दे जाते है लोग

अभी खुशफ़हमियों मे जी भी नही पाती
कि एक नयी हकीकत दिखा जाते है लोग

जिसे भी अपना समझ कदम बढाया मैने
उसी कदम पर ठोकर लगा जाते है लोग

दिल को मेरे खिलौना समझने वाले
रोज वो ही खिलौना तोड जाते है लोग

मै भी सिर्फ़ पत्थर नही एक इंसान हूँ
बस इतना सा ना समझ पाते है लोग

सोमवार, 20 जून 2011

आस्माँ रोज़ नही बदलता लिबास

तुम चाहते थे ना जीयूँ तुम्हारी तरह
लो आज तोड दीं सारी श्लाघायें
ढाल लो जिस सांचे मे चाहे
दे दो मनचाहा आकार
मगर फिर बाद मे ना कहना
नही चाहिये अपनी ही लिखी तहरीर
बदल दो फिर से कम्बल पुराना
जमीन रोज़ नही बदलती रूप
और तुम कहो कहीं फिर से
दे दो अपना पुराना सा
 रूप फिर से मुझे वापस
बताओ तो …………
एक बार टूटे साँचे कब जुडते हैं
कहाँ से लाउँगी मिट्टी को वापस
जानते हो ना……………
आस्माँ रोज़ नही बदलता लिबास

गुरुवार, 16 जून 2011

गर तूने ख्वाहिश की होती

तू खुश रहा वीरानों में
जगलों में पहाड़ों में
कभी ज़िन्दगी के
तो कभी
महफ़िलों के
हाँ महफ़िलों के भी
वीराने होते हैं
जब महफ़िल बाहर होती है
और दिल वीरान होते हैं
तू क्या समझता है
तेरे दिल की वीरान पगडंडियाँ
और वहाँ खड़े शुष्क पेड़ अरमानों के
तेरे अकेलेपन के गवाह
मुझे नहीं दीखते
अरे मेरी आँख की वीरानियों से
ही तो तेरी राहें गुजरती हैं
और छोड़ जाती हैं
अंतहीन निशाँ तेरी
हसरतों के
जिन्हें मैं अपनी पलकों
की कोरों पर सजा लेती हूँ
और करती हूँ इंतज़ार
उस पल का जिस दिन
तू खुद मुझसे मांगे
अपने सपनों को
अपनी ख्वाहिशों को
सच कहती हूँ………
तोड़ लाती चाँद आसमाँ से
गर तूने ख्वाहिश की होती

सोमवार, 13 जून 2011

वो जो शख्स रहता है मुझमे

वो जो शख्स रहता है मुझमे 
गर्मी की धूप सा जलता है मुझमे 
लावा जब कोई फूटता है उसमे
सुकूँ का इक दरिया बहता है मुझमे 
निकलती जब आह है उसमे 
डरता तब आसमान भी है उससे 
रेत भी समंदर नज़र आता है उसमे
दर्द से जब वो खिलखिलाता है मुझमे 
रौशनियों से जब लड़ता है मुझमे
अंधेरों को तब जीता है मुझमे 
वो जो शख्स रहता है मुझमे 
धूल भरी आँधियों सा चलता है मुझमे 

शुक्रवार, 10 जून 2011

आखिर कतरनें भी कभी सीं जाती हैं

इंतज़ार के पलों को
सींते सींते
बरसों बीते
मगर इंतज़ार है
कि बार बार
उधड जाता है
सीवन पूरी ही नही होती
 

कभी धागा कम पड़ जाता है
तो कभी सुईं खो जाती है
और अब तो
वो नाता भी नहीं बचा
जिसे सीने के लिए
उम्र तमाम की थी
आखिर कतरनें  भी
कभी सीं जाती हैं

मंगलवार, 7 जून 2011

इस देश का यारों क्या कहना……… ये देश है कसाबों का गहना

ये देश है भ्रष्टाचारियों का
सत्ता के लोलुपों का
इस देश का यारों क्या कहना
ये देश है कसाबों का गहना
यहाँ ए के 47 चलाने वाले
सर आँखों पर बैठाये जाते हैं
घर जँवाई बनाये जाते हैं
और घरवालो को घर से
निकाला जाता है
कार्यवाहियाँ की जाती हैं
बेमौत मरवाया जाता है
कानून का डर दिखाया जाता है
इस देश का यारों क्या कहना
ये देश है कसाबों का गहना

यहाँ पीठ मे छुरियाँ भोंकी जाती हैं
जनता की कमाई खायी जाती है
और जनता ही पिटवायी जाती है
इसी दिन के लिये तो जनता मे
चुनावो मे मिठाइयाँ बँटवाई जाती हैं
अब भुगतने का वक्त आया तो
जनता की गर्दने फ़ँसायी जाती हैं
जोर आजमाइशे अपनाई जाती हैं
और अपनी कुर्सियाँ बचाई जाती हैं
इस देश का यारों क्या कहना
ये देश है कसाबों का गहना

यहाँ झूठी शक्लें सरकारों की
यहाँ जय जयकार होती है कसाबो की
नित नित नये घोटाले होते हैं
स्विस बैंके मे पैसे जमा होते हैं
जाँच आयोग बैठाये जाते हैं
अपने कर्मी बचाये जाते हैं
सिर्फ़ ईमानदार मरवाये जाते हैं
देश हित की आवाज़ उठाने वाले ही
आन्दोलन चलाने वाले ही
जेल मे डलवाये जाते हैं
इस देश का यारो क्या कहना
ये देश है कसाबों का गहना

शनिवार, 4 जून 2011

देह की देहरी लांघी तो होती

सिर्फ देह की देहरी को ही
न पूजा होता
कभी इससे भी ऊपर
उठा होता
कभी देह की देहरी को
लाँघ पाया होता 
तो शायद इन्सान 
बन पाया होता
इस देहरी के पार
इक बार झाँका होता
तो मन का हर 
पता पा गया होता
वो जो इसी दहलीज पर
टूटता बिखरता रहा 
उस रिश्ते को कुछ तो
संभाल पाया होता
इसकी चौखटों पर टंगे
ख्वाबों की जलन को
जान पाया होता
कुछ पल उस ऊष्मा 
में खुद को झुलसाया होता
तो शायद  दर्द सहने का 
सलीका जान पाया होता
बेजुबान अश्रुकणों को 
कभी ऊँगली लगायी होती
तेज़ाब के कहर से
तेरी आँख भर आई होती
तू इक पल कभी 
वहां रुका होता तो 
मन के कोने में पड़ी
अपनी खंडित प्रतिमा
देख पाया होता
और जो सैलाब बरसों से
रुका पड़ा था
हर तटबंध को तोड़ता
तेरे आगोश में 
सिमट आया होता
बस सिर्फ एक बार तूने
देह की देहरी लांघी तो होती       

गुरुवार, 2 जून 2011

अब बुकमार्क जरूरी हो गया है

मैंने चाहा था
चाहतों पर
इक निशाँ
लगा दूं
तुम्हारे लिए
वैसे मोहब्बत को
निशानों की
जरूरत नहीं होती
मगर तुम ही
रास्ता भूलने लगे हो
शायद इसलिए
अब बुकमार्क
जरूरी हो गया है

मंगलवार, 31 मई 2011

हाय रे ब्लोगर तेरी यही कहानी

हाय रे ब्लोगर तेरी यही कहानी
हाथों मे कीबोर्ड और आँखो मे पानी
कैसे कैसे ख्वाब संजोता है
कभी पद्म श्री तो कभी पद्म विभूषण
की आस लगाता है
पर इक पल चैन ना पाता है
ये ब्लोगिंग की कैसी कहानी
कहीं है झूठ तो कहीं है नादानी
कोई खींचता टांग किसी की
तो कोई आसमाँ पर बैठाता है
किसी को धूल चटाता है तो
किसी को तिलक लगाता है
हाय रे ब्लोगिंग ये कैसी कारस्तानी
बड़े बड़ों को तूने याद दिला दी नानी
बेचारा ब्लोगर इसके पंजों में फँस जाता है
अपनों से जुदा हो जाता है
फिर टर्र टर्र टार्राता है
ब्लोगिंग के ही गुण गाता है
शायद कोई मेहरबान हो जाये
और दो चार टिप्पणियों का दान हो जाये
या कोई अवार्ड ही मिल जाये
और किसी अख़बार में उसका नाम भी छप जाए
इसी आस में रोज अपना खून सुखाता है
ब्लोगिंग का कीड़ा रोज उसे काट खाता है
और राम नाम की रटना छोड़
रोज ब्लोगिंग ब्लोगिंग गाता है
नाम के फेर में पड़ कर
की बोर्ड चटकाता है
मगर चैन कहीं ना पाता है
हाय रे ब्लोगर तेरी यही कहानी
हाथों मे कीबोर्ड और आँखो मे पानी

शनिवार, 28 मई 2011

जब से तेरी प्रीत की झांझर डाली है पांव मे

जब से तेरी प्रीत की
झांझर डाली है पांव मे
ठहर गये हैं दिल की
मुंडेर पर ठिठक कर
बता कैसे तेरे सपनों
की ताजपोशी करूँ
कौन सी महावर सजाऊँ
कौन सा अल्पना लगाऊँ
कि चल पडें लोक लाज छोडकर

बुधवार, 25 मई 2011

किसी रेत में आशियाँ बनता ही नहीं

वो आग ना मिली
जो जला सके मुझे
वो रेत ना मिली
जो दबा सके मुझे
वो पानी ना मिला
जो बहा सके मुझे
फिर कहो तुम
कैसे मिल गए
अब बह भी रही हूँ
दब भी रही हूँ
और जल भी रही हूँ
मगर अंतर्मन है कि
कभी राख होता ही नहीं
वहां की मिटटी अभी भी
सूखी है
किसी रेत में
आशियाँ बनता ही नहीं




शनिवार, 21 मई 2011

बताओ ना क्या कहती हो तुम मुझसे…………300 वीं पोस्ट

हाँ......
कहो.............
क्या कहा...........
समझ नहीं आ रहा
कुछ स्पष्ट कहो ना
तुम्हारे शब्द अस्पष्ट हैं
अस्पष्ट शब्दों के अर्थ
अनर्थ को जन्म देते हैं
कुछ कहती तो हो
मगर समझ नहीं पाती
कब से कह रही हो
कब तक कहती रहोगी
और मैं तुम्हें सुनती हूँ
मगर समझ नहीं आती हो
कैसी पहेलियाँ सी बुझाती हो
कभी सब कह जाती हो
कभी सिर्फ कानों में मंत्र सा
फूंक जाती हो
मगर उस मंत्र के
उच्चारण में होने वाली अशुद्धि
फिर वहीँ ले आती है
जहाँ से चलती हूँ
कहो कैसे जानूं तुम्हें
कैसे तुम्हारी अनकही समझूं
कौन सी चेतना जगाऊँ
जो तुम्हारे अनकहे शब्दों को
साकार कर दे
ना जाने क्या चाहती हो
जब कहती हूँ
आओ गले लगा लूँ तुम्हें
तो दूर छिटक जाती हो
और जब तुम से भागती हूँ
तो करीब चली आती हो
कितने ही प्रलोभन दिखाती हो
अपनेपन का आभास कराती हो
मगर जैसे ही तुम्हारी तरफ
कदम बढाती हूँ .......तुम फिर
ना जाने किस मोड़ पर
मुड जाती हो
और मैं फिर एक
गुबार में खो जाती हूँ
और अपना अक्स भी
धुंधलाने लगता है
मगर तुमको ना
पकड़ पाती हूँ
और ना ही
समझ पाती हूँ
आखिर तुम मुझसे
चाहती क्या हो
हाँ .........तुम्हारी ही
बात कर रही हूँ
क्यूँकि तुम हो
तो मेरा अस्तित्व है
और तुम नहीं
तो मेरा वजूद
मेरी रूह
का कहीं कोई
मोल नहीं
बताओ ना
क्या कहती हो
तुम मुझसे
ए मेरी ज़िन्दगी ?

शुक्रवार, 20 मई 2011

आखिर पतझड मे कब पेड हरे हुये हैं?

क्या हुआ जो भुला दिया तुमने
क्या हुआ जो कोई राह नही मुडती
मेरे चौबारे तक
क्या हुआ जो कंक्रीट का जंगल
बन गया दिल मेरा
क्या हुआ जो आस का सावन
नही बरसा मेरे ख्वाबों पर
क्या हुआ जो हवा का रुख
बदल गया
नही छुआ तुम्हारा दामन उसने
नही पहुंचाई कोई सदा तुम तक
क्या हुआ जो तेरी महक
फ़िज़ाँ मे नही लहराई
कोई फ़र्क नही पडता
कुछ फ़िज़ाओं पर
मौसम का असर नही होता
और जहाँ पतझड उम्र के साथ
ठहर गया हो
वहाँ कोई फ़र्क नही पडता
आखिर पतझड मे कब पेड हरे हुये हैं?

बुधवार, 18 मई 2011

नीम हर दर्द की दवा नहीं होता

वेदना को शब्द दे सकती
तो पुकारती तुम को
शायद नीम के पत्ते
तोड़ लाते तुम और
लगा देते पीस कर
मेरे ज़ख्मो पर
जानती हूँ
नीम भी बेअसर है
मगर तुम्हारी
खुशफहमी तो दूर
हो जाती और शायद
मेरी वेदना को भी
खुराक मिल जाती
मगर शायद तुम नहीं जानते
नीम हर दर्द की दवा नहीं होता
क्या ला सकते हो कहीं से
मीठा नीम मेरे लिये?

सोमवार, 16 मई 2011

सूद के साथ मूल भी छीन लेती है

ज़िन्दगी जब भी करवट लेती है
सब कुछ नेस्तनाबूद कर देती है
कभी जीने का पता नही देती है
कभी मरने का ठिकाना नही देती है
कभी आईने मे अक्स दिखा देती है
कभी अक्स को आईने मे छुपा देती है
नाज़ था जिन गुंचों पर माली को
उन्हे ही दामन से छीन लेती है 
सब कुछ छीनने के बाद ही
ज़िन्दगी जीने को उम्र देती है 
ना दिन को सहर देती है 
ना रात को कहर देती है
खून के घूंट पीने के बाद ही
अमृत का कलश देती है 
मगर अमर होने की चाहत  
को तेज़ाब मे घोल देती है 
कभी दोस्ती के भरम मे 
दुश्मनी निभा देती है 
ज़िन्दगी ज़िन्दगी को 
कुछ यूँ भरमा देती है 
कयामत ना आती गर 
गैरों से खाते घात 
ज़िन्दगी तो अपनो से 
दिलाती है मात 
कभी रुसवाईयों के  
अंधेरो मे धकेल देती है 
कभी दुश्वारियों से 
दामन भर देती है 
सूद के साथ  
मूल भी छीन लेती है
मंजी हुई व्यापारी सी  
ज़िन्दगी, ज़िन्दगी भी छीन लेती है

शनिवार, 14 मई 2011

कुछ मर कर देखा जाये

 जीकर बहुत देख लिया
कुछ मर कर देखा जाये
इक बार मौत को भी
गले लगाकर हंसाया जाये

डर गये क्या मौत की तस्वीर देख
देख हम तो रोज मुलाकात करते हैं
हम हँसे ना हँसे गम नही मगर
मौत को रोज़ हँसाया करते हैं


ज़िन्दगी का उधार किश्तों में चुकाकर
जीने का क़र्ज़ उतार चुके अब
मौत जो हमदर्द है अपनी, गले लगा
 कुछ उसका भी क़र्ज़ चुकाया जाये



आ आज मौत को भी 
कुछ पल के लिए हंसाया जाये

रविवार, 8 मई 2011

माँ …………मुझे तुझमे इक बच्चा नज़र आता है

माँ 
आजकल मुझे तुझमे
इक बच्चा  नज़र आता है
आजकल बच्चे का 
प्रतिरूप दिखती है मुझे 
वो ही सब तो 
करती हो तुम भी
देखो न
तुम्हारे शब्द 
तुतलाने लगे हैं
तुम्हारी भाषा 
अस्पष्ट हो गयी है
और मैं उसे
समझने के प्रयास में
उसके अर्थ ढूंढती हूँ
बिलकुल उस तरह
जिस तरह शिशु की 
भाषा उसकी माँ के लिए
पहेली होती है
मगर फिर भी वो
समझने का 
प्रयास करती है

बच्चे के लिए 
उसका अच्छा बुरा 
माँ ही समझती है
कुछ ऐसे ही 
तुम्हारी बहुत सी बातें
जो तुम्हारे लिए 
सही नहीं होतीं
मुझे छोडनी पड़ती हैं
तुम्हारे मन का 
नहीं कर सकती 
तुम्हारी सेहत की
चिंता है मुझे
मगर कह नहीं सकती 
और रोकना पड़ता है तुम्हें
तब बहुत सालता है
मेरे मन को 
मगर जो बच्चे के लिए
अच्छा होता है
वो ही तो माँ करती है 
बस वैसे ही मुझे
तुझे सहेजना पड़ता है
मगर माँ तो नहीं
बन सकती न
इसलिए कुछ 
मानना भी पड़ता है
कुछ अनसुना 
करना पड़ता है

शिशु कैसे
खुद -ब-खुद 
बोलता रहता है
न जाने क्या- क्या 
और कभी - कभी 
एक ही बात को
बार - बार दोहराता है
मगर उसे सुनकर
माँ खुश होती है
मगर माँ 
जब तुम ऐसा करती हो
तब कभी - कभी मैं
परेशान हो जाती हूँ
तुमसे कुछ 
कह नहीं पाती हूँ
इसलिए कहती हूँ 
माँ नहीं बन पाती हूँ
बेटी हूँ न 
माँ नहीं बन सकती 
लेकिन फिर भी 
मुझे तुझमे
इक बच्चा नज़र आता है      

शुक्रवार, 6 मई 2011

मोस्ट वांटेड "अन्नाभाई किड्नैप्ड"

आज की ताज़ा खबर 
आज की ताज़ा खबर
ब्लॉगजगत का भाई
यानि "अन्नाभाई किड्नैप्ड"
उर्फ़ अपना "मुन्नाभाई" 
आज की ताज़ा खबर
ब्लॉग ब्लॉग पर शोर था
अन्नाभई का जोर था
ब्लोगरमीट कराता था 
पुरस्कार दिलवाता था
अपनी पुस्तकें छपवाता था
नाम खूब कमाता था
बेनामियों से देखा न गया
अन्नाभई किडनैप हो गया 
जब से ऐलान करवाया था
नयी किताब छपवायेंगे
कवी कवयित्रियों को 
पहचान दिलवाएंगे
ब्लोगवुड को चढ़ा बुखार था
मुफ्त का चन्दन
कौन न घिसना चाहता था
हर कोई अपना भाग्य
आजमाना चाहता था 
मगर न जाने कैसे
दुश्मनों को खबर
लग गयी थी
अन्नाभाई की किस्मत
पलट गयी थी
उनके हत्थे चढ़ गया था
बेनामियों मे फ़ंस गया था
वकील , पत्रकारों और ब्लोगरों 
का लगा जमावड़ा था
अननाभई के नाम का
हर कोई गा रहा गुणगान था
आनन् फानन कमेटी बिठाई गई
अन्नाभई की सीट
किसे दिलवाई जाये
तय करना जरूरी था
ब्लॉगजगत के हित के लिए
एक ब्लोगनेता का होना
भी जरूरी था
आखिर जिसकी टांग खिंची जा सके
वक्त पर मुर्गा बनाया जा सके
इस आचार संहिता के लिए
एक बकरा तो बलि चढ़ना था  
अजय झा का नाम भी मशहूर था 
अन्नाभई की सीट का
ये भी प्रबल दावेदार था
राजीव तनेजा भी व्यंगकार है
अन्नाभाई का साझीदार है
चलो सीट इसे दिलवाते हैं
सूली पर इसे ही चढाते हैं
जैसे ही घोषणापत्र प्रस्तुत हुआ
अन्नाभाई का पुनः आगमन हुआ
और सपना मेरा टूट गया
हाय ! सपना मेरा टूट गया  
     
    

बुधवार, 4 मई 2011

कँवल ऐसे भी खिलाये जाते हैं .............

नहीं सजाती आस्मां को दरख़्त पर
नहीं बोती अरमानों के बीज मिटटी में
नहीं देखती वक्त की परछाइयाँ किताबों में
नहीं मुडती कोई राह अब अंधेरों में
ना ही गुजरे कल की संदुकची खोलती हूँ
...ना ही आने वाले कल के लिए
अरमानों के शामियाने टंगवाती हूँ
अब ना कल के सफ़हे पलटती हूँ
ना ही कल के आगमन में
ख्यालों के दीप जलाती हूँ
अब ना विगत का अफ़सोस
ना आगत का दुःख
सीख लिया है जीना मैंने वर्तमान में
कँवल ऐसे भी खिलाये जाते हैं .............

रविवार, 1 मई 2011

बता दे कोई…………

मोहब्बत कैसे होती है
बता दे कोई
हमे तो मोहब्बत ने
हर कदम रुसवा ही किया

किसी को कैसे
अपना बनाया जाता है
सिखा दे कोई
हमे तो हर किसी ने
हर कदम धोखा ही दिया

कैसे पतझड मे
गुलाब खिलाये जाते हैं
उगा दे कोई
हमे तो हर जगह 
जमीन बंजर ही मिली
 

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

जो बचता है शून्यता के बाद भी

शून्य शून्य और सिर्फ़ शून्य
पता नही फिर भी लगता है
कुछ बचता है कहीं शून्य से परे
स्वंय का बोध
या कोई कडी
अगली सृष्टि की
अलग रचना की
अलग सरंचना की
कुछ तो ऐसा है जो
बचता है शून्य के बाद भी
शून्य से शून्य मे समाना
बदलना होगा इस विचार को
खोजना होगा उस एक तारे को
उस नव ब्रह्मांड को
उस नव निर्माण को

जो बचता है शून्यता के बाद भी

जो मिट्कर भी नही मिटता

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

एक नया इतिहास रचने

मौन की भाषा
अश्रुओं की वेदना
और मिलन ?
कैसे विपरीत ध्रुव
कौन से क्षितिज
पर मिलेंगे
ध्रुव हमेशा
अलग ही रहे हैं
अपने अपने
व्योम और पाताल में
सिमटे सकुचाये
मगर मिलन की आस
ये तो मिलन का
ध्रुवीकरण हो जायेगा ना
बस तुम भी खामोश रहो
मैं भी खामोश चलूँ
संग संग नि:संग होकर
एक नया इतिहास रचने
चलो हम चलें
शायद तब कोई
नयी कविता जन्मे
और हमें
नए आयाम दे

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

दरिया वापस नही मुडा करते

मै तो आज भी
वहीं उसी मोड पर
खडी हूँ
जहाँ समय ने
तुम्हे मुझसे
...छीना था
मगर तुम ही
ना जाने कब
और कैसे
समय के साथ
बह गये
दरिया वापस
नही मुडा करते

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

हाँ ..........बचपन याद आ गया

एक बेफ़िक्री का आलम होता था
वो छत पर सोना तारों को निहारते हुये……
वो बारिश मे भीगना सखियों संग
वो नीले आकाश मे
पंछियों को उडते चहचहाते देखना
रात को हवा ना चलने पर
 पुरो के नाम लेना
वो सावन मे झूलों पर झूलना
कभी धूप मे खेलना
तो कभी शाम होते ही
छत पर धमाचौकडी मचाना 
कभी पतंगो को उडते देखना
तो कभी उसमे शामिल होना ,
कभी डूबते सूरज के संग
उसके रंगो की आभा मे खो जाना ,
कभी गोल गोल छत पर घूमना
और अपने साथ - साथ
पृथ्वी को घूमते देखना और खुश होना
आह! बचपन तेरे रंग निराले
सुन्दर सुन्दर प्यारे प्यारे
मगर अब ना दिखते ये नज़ारे
मेरे बच्चे ना जान पायेंगे
ये मासूम लम्हे ना जी पायेंगे
यादो मे ना संजो पायेंगे
आज न वो खेल रहे
न वो वक्त रहा   
पढाई  के बोझ तले
बचपन इनका दब गया  
उम्र का एक हिस्सा 
जो मैंने जी लिया
कैसे बच्चे जान पाएंगे  
सिर्फ यादों में बसर रह पाएंगे
एक सुखद अहसास का दामन
जिनका यादो मे बसेरा है
आज एक बार फिर
मुझे मुझसे मिला गया
मुझे भी बचपन याद आ गया
हाँ ..........बचपन याद आ गया 


सोमवार, 11 अप्रैल 2011

स्वादहीन फ़ीका बासी खाना लगती है ज़िन्दगी


स्वादहीन फ़ीका बासी खाना लगती है ज़िन्दगी
जब तक कि रूह के चौबारे पर ना उतरती है ज़िन्दगी

ये सब्ज़ियों के पल पल बदलते स्वाद मे उतरती है ज़िन्दगी
जब तक कि आत्मिक स्वाद को ना चखती है ज़िन्दगी

ये देवताओं सा अच्छा बुरा फ़ल देती है ज़िन्दगी
जब तक कि देवाधिदेव से ना मिलती है ज़िन्दगी

ये दिवास्वप्न सा भ्रमित करती है ज़िन्दगी
जब तक कि समाधिस्थित ना होती है ज़िन्दगी

ये अवसान मे भी बहुत उलझती है ज़िन्दगी
जब तक कि गरल को भी न अमृत समझती है ज़िन्दगी

ये भोर को भी अवसान समझती है ज़िन्दगी
जब तक कि जीने का मर्म ना समझती है ज़िन्दगी

ये संसार के झूठे मायाजाल मे उलझती है ज़िन्दगी
जब तक कि नीम के औषधीय गुण ना समझती है ज़िन्दगी

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

गरीबी के सिर्फ़ आंकडे होते हैं

गरीबी के सिर्फ़ आंकडे होते हैं………आकलन नही
नसीब का सिर्फ़ एकाउंट होता है………बंटवारा नहीं
हुस्न के सिर्फ़ नखरे होते हैं………हकीकत नही
मोहब्बत के सिर्फ़ सपने होते हैं………पैमाने नही
 
 
शब्दों का आलिंगन रोज करती हूँ
तब कुछ देर के लिये जी लेती हूँ
ये शब्द ही हैं जो हमे
जीने की कला सिखाते हैं
कभी शब्द रूह बन जाते हैं
कभी रूह शब्दो मे उतर आती है
 
 
अपनो के हाथ का मारा है हर शख्स
ज़िन्दा है मगर ज़िन्दगी का मारा है हर शख्स
मौसम सी बदल जाती हैं शख्सियतें 
मिज़ाज़पुरसी की चाहत का मारा है हर शख्स
 




कमबख्त कौन से युग मे पैदा हो गया 
जहाँ साया भी अपना होता नहीं
फिर गैर तो गैर ही होते हैं 
उम्र भर ये ही नही जान पाया 
बदनामी ओढ कर 
इंसानियत के चोले मे 
वजूद को ढांप कर सो गया
कमबख्त कौन से युग मे पैदा हो गया

 

 

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

कहीं देखा है ऐसा आशियाना ?

ए मेरे ख्वाब
डरती हूँ
तुझे साकार करने से
कहीं ज़माने की
नज़र ना पड़ जाये
कहीं कोई दूजा
तुझे ना नैनों से
चुरा ले जाये
कहीं कोई
और आँख
ना तुझे भा जाए
और मेरा वजूद
जो मैं
तुझमे देखती हूँ
किसी और की
आँख का खवाब
ना बन जाए
और मेरी नज़र
रीती ही रह जाये
कभी कभी
चाह होती है
तुझे पाने की
तुझे देखने की
तुझे आकार देने की
मगर डरती हूँ
इसलिए ना
नैन बंद करती हूँ
सिर्फ तुझे
अपने अहसास में ही
जी लेती हूँ
दिल का हर हाल
कह लेती हूँ
कुछ इस तरह
गुफ्तगू कर लेती हूँ
क्या देखा है
तूने मुझे कभी
ए  ख्वाब
हवाओं में उड़ाते हुए
बादलों पर तैरते हुए
आसमानों को छूते हुए
किसी फूल की खुशबू
सहेजते हुए
किसी से दिल लगाते हुए
किसी को अपना बनाते हुए
किसी से दिल की कहते हुए
किसी के अश्कों में बहते हुए
किसी के दिल की धड़कन
बनते हुए
नहीं ना ............
डरती हूँ ना
ख्वाब सजाने से
तुझे आकार देने से
इसीलिए तुझे सिर्फ
अहसासों में पिरो लिया है
अब हर पल
हर सांस के साथ
हर धड़कन के साथ
आँख की पुतली
 बन रहता है
नज़र ना किसी को
आता है
मगर मेरे संग संग
रहता है
कहीं देखा है
ऐसा आशियाना ?

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

छलावा

तू और तेरी याद
इक छलावा ही सही
छले जाने का भी
अपना ही मज़ा होता है
ज़िन्दगी रोज़ मुझे
छलती है----सोचा
इक रोज़ ज़िन्दगी को
छल कर देखूँ
और कौन ……तुम ही तो हो
मेरी ज़िन्दगी
मेरी याद
मेरी रूह
मेरा चैन
मेरे आरोह
मेरे अवरोह
तो क्या हुआ
जो इक बार
खुद से खुद को
छल लिया
जीने के लिये
कुछ तो वजह
होनी चाहिये

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

आज मूर्खोत्सव कुछ ऐसे मनाया

आज मूर्खोत्सव कुछ ऐसे मनाया
उनको बिना तेल पानी के झाड़ पर चढ़ाया
बिना बात ही उन्हें सरताज कह दिया
मानो आज तो उन्हें कोहिनूर मिल गया
ख़ुशी के मारे ऐसे उछल रहे हैं
जैसे उल्लू दिन में देख रहे हैं
आज उन्हें अपना lifeguard बताया
फिर तो जैसे आसमाँ जमीन पर उतर आया
बिना संगीत के आगे पीछे नाच रहे हैं
पाँव ना जमीन पर पड़ रहे हैं
अब उन्हें लिस्ट पकड़ा दी है
शौपिंग , outing , खाने पीने का
सारा प्लान समझा दिया है
बिना मेहनत के रंग जमा दिया है
आज के दिन का फायदा उठा लिया है
उनको महामूर्ख का ख़िताब दिला दिया है
तो तुम भी गुरु हो जाओ शुरू
बना लो दिन को दिवाली
एक पांसा फेंको और तमाशा देखो
महामूर्ख दिवस का कमाल देखो
अपने अजीजों को बेहाल देखो

गुरुवार, 24 मार्च 2011

ए .........एक बार पुकार लो ना

आज मोहब्बत चरम पर है शायद
तभी तुम , तुम्हारी याद , तुम्हारी परछाईं
सभी जान लेने पर तुली हैं
ए .........एक बार पुकार लो ना

मेरे मन के रेगिस्तान में
जब से तुम्हारे प्रेम का
फूल खिला है सनम
अब कैक्टस भी
गुलाब नज़र आता है

आज दिल काबू में नहीं
ये कैसा जादू कर दिया
मुझे मुझसे ही जुदा कर दिया
हाय ये क्या सितम कर दिया

आह! आज ये क्या हो गया है
क्या मौसम जवाँ हो गया है
या दिल बेकाबू हो गया है
जो तुम इतना याद आ रहे हो
ए .........एक बार पुकार लो ना 

शायद दिल कुछ सम्हल जाये
शायद अरमान कुछ निकल जायें
शायद इक हसरत ही निकल जाये
दिल की जुस्तजू परवान चढ जाये
बस ………एक बार पुकार लो ना

सोमवार, 21 मार्च 2011

उदास हूँ मैं………

अब न तुम्हारी याद
तुम्हारा ख्याल
और ना ही तुम
कोई नही होता
आस पास मगर
फिर भी
उदास हूँ मैं………


ना कोई काँटा
ना कोई टीस
ना कोई चाहत
अब पांव पसारती है
फिर भी
उदास हूँ मैं………


न कोई सपना
आंखो मे सजता है
ना कोई अरमान
दिल मे जगता है
ना कोई प्रीत
सहलाती है
मगर
फिर भी
उदास हूँ मैं………

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

सजन से मिलन का एक रंग

होली के रंग… मन में उमंग… दिल में तरंग……
सजन से मिलन का एक रंग



घूंघट की ओट में
सकुचाई लजाई
सजनिया
पी का रास्ता
निहार रही
आँखों में भर के
प्रीत के बादल
सजन का रास्ता
निहार रही
नैनों में छाये
रंग हजार
तन मन में
उठती प्रीत की
बयार
सब से है
छुपाय रही
कब आवेंगे
मोरे सांवरिया
प्रेम के रंगों की
लेके फुहरिया
नैन मूंदे
सोच रही थी
सपनो में उनके
खो रही थी
सुध बुध अपनी
भूल गयी थी
तभी आये
चुपके से सांवरिया
ले के हाथ में
रंगों की पुडिया
सजनिया पर
रंग बरसा गए
प्रेम रंग में
नहला गए
प्रीत का रंग
चढ़ा गए
हर्षित हो गयी
अब तो सजनिया
रंगों में खुद भी
डूब गई बावरिया
साजन ने पकड़ी
नाजुक कलइयाँ
रंग में भिगो दी
सारी चुनरिया
बाहो मे भर लीन्ही
सजनिया
कपोल पर अंकित
कर दीन्ही निशानियां
लाज को ताक पर
रख गये सांवरिया
होरी के बहाने
कर गए
छेड़छाड़ सांवरिया
ऐसी कर गये
ठिठोली सजनवा
प्रीत को कर गये
लाल सांवरिया


सोमवार, 14 मार्च 2011

सोन चिरैया

मैं और मेरा आकाश
कितना विस्तृत
कितनी उन्मुक्त उड़ान
पवन के पंखों पर
उडान भरती
मेरी आकांक्षाएं
बादलों पर तैरती
किलोल करती
मेरी छोटी छोटी
कनक समान
इच्छाएं
विचर रही थीं
आसमां छू रही थीं
पुष्पित
पल्लवित
उल्लसित
हो रही थीं
खुश थी मैं
अपने जीवन से
आहा ! अद्भुत है
मेरा जीवन
गुमान करने लगी थी
ना जाने कब
कैसे , कहाँ से
एक काला साया
गहराया
और मुझे
मेरी स्वतंत्रता को
मेरे वजूद को
पिंजरबद्ध कर गया
चलो स्वतंत्रता पर
पहरे लगे होते
मगर मेरी चाहतों
मेरी सोच
मेरी आत्मा
को तो
लहूलुहान ना
किया होता
उस पर तो
ना वार किया होता
आज ना मैं
उड़ पाती हूँ
ना सोच पाती हूँ
हर जगह
सोने  की सलाखों में
जंजीरों से जकड़ी
मेरी भावनाएं हैं
मेरी आकांक्षाएं हैं
हाँ , मैं वो
सोन चिरैया हूँ
जो सोने के पिंजरे
में रहती हूँ
मगर बंधनमुक्त
ना हो पाती हूँ

गुरुवार, 10 मार्च 2011

इक प्यास कायम रखता है

अरे क्या करेंगे जानकर
कितना जानेगे किसी को
क्या पूरा जान सकते हैं ?
कभी नहीं ..........
तो अच्छा है
confuse ही रहें
कुछ तो बचा रहेगा
अन्जाना सा
और अनजानेपन की
सौंधी मिटटी में  भी
बहुत से ख्वाब
छुपे होते हैं
और उन ख्वाबों की
धरती बहुत नम होती है
ऊंगली से छुयो तो भी
निशाँ पड़ जाते हैं
तो ऐसे में कहो
क्या करेंगे किसी को
पूरा जानकर
फिर इस अनजानेपन की
महक कैसे ले पाएंगे
रहने दो कुछ तो
अधूरा सा
अधूरापन भी
इक प्यास कायम रखता है

मंगलवार, 8 मार्च 2011

आज तो बेटी कहती है……

आज तो बेटी कहती है…………
बाबा वर तुम मत ढूँढना
मै जिसे लाऊँ बस
उसे स्वीकार कर लेना
पैसे ,स्टेट्स ,रूप बिना
क्या कोई स्थान मिलता है
जैसे कन्या के पिता की
जायदाद देखकर उसे
स्वीकारा जाता है
ऐसे ही
अब तो वर का सिर्फ़
बैंक बैलेंस से चयन होता है
गर खुद ढूँढ कर लाओ तो
याद ये कर लेना
बेटी हूँ कोई ढोर डंगर नही
किसी के गले भी मढ दोगे
अब तो जो मेरे मन को भायेगा
वो ही जीवनसाथी बन पायेगा
जरूरत नही किसी से कहने की
किसी की सुनने की
बेटी हूँ तो क्या हुआ
किसी से कम नही
जो जो शर्त वो बतलाये
वो ही तुम भी दोहरा देना
गर तुम ना कह पाओ तो
मुझको बतला देना
जरूरत नही किसी के आगे
सिर झुकाने की
कोई बोझ नही हूं तुम पर
गर्व से सिर ऊँचा कर लेना
जब भी बेटी का कोई नाम ले
कह देना --हाँ बेटी का बाप हूँ
अब दान नही देता हूँ
बराबर का रिश्ता करता हूँ
जो भी आकाँक्षाये तुम्हारी है
उनसे कम मेरी बेटी की भी नही
गर बराबर का मिले कोई
तभी बात तुम कर लेना
वरना बाबा तुम ही
रिश्ता तोड देना
मानसिकता को अब
बदलना होगा
नयी पहल करनी होगी
गर तुम ना कर पाओ तो
मुझे बतला देना
मै स्वंय कदम उठा लूँगी
मगर अब ना किसी के आगे
किसी बात पर सर तुम्हारा
न झुकने दूँगी
मै भी वो सब देखूँगी
वो सब चाहूँगी
जो हर बेटे वाला चाहता है
जो गुण अवगुण
रोक टोक लडकी पर
लगाये जाते हैं
मै भी वैसा ही कर दूँगी
मगर अब न तुम्हारी पगडी
किसी के पैरो मे रखने दूँगी
बाबा वर तुम मत ढूँढना
मानसिकता को अब बदलना होगा
नया इतिहास रचना होगा
वक्त के सीने पर
स्वर्णाक्षरो से लिखना होगा
बेटी किसी से कम नही
ये तुम्हे भी समझना होगा

दुनिया को भी समझाना होगा
दस्तूरों को बदलना होगा
रूढियों को तोडना होगा
तभी सैलाब आयेगा
तभी इंकलाब आयेगा
फिर ना कोई बेटी 
दहेज की बलि चढ पायेगी
ना ही परम्पराओं के नाम पर
कुर्बान की जायेगी
शायद भ्रूण हत्यायें 
भी रुक जायेंगी
और फिर
नयी आशायें झिलमिलायेंगी
इक नये युग का अवतार होगा
और बेटियाँ माथे का 
तिलक बन जायेंगी

गुरुवार, 3 मार्च 2011

पता नहीं क्यों…………

पता नहीं क्यों
बसते हो तुम मुझमे
कितनी बार चाहा
तोड़ दूँ चाहत का भरम
हर बार तुम्हारी चाहत
मुझे कमजोर कर गयी

पता नहीं क्यों

इतना चाहते हो मुझे
कितनी बार चाहा
भूल जाओ तुम मुझे
हर बार तुम्हारा प्यार
मंजिल से मिला गया

पता नहीं क्यों

याद करते हो मुझे
कितनी बार चाहा
लगा दूँ ताला 

दिल के दरवाज़े पर
हर बार तुम्हारी

भीगी नज़रें
भिगो गयीं मुझे
और मैं 

तेरे प्रेम के आगे
खुद से हार गयी

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

मैं दर्द में घुली इक नज़्म बनी होती

मैं 
दर्द में घुली इक नज़्म बनी होती
हर हर्फ़ में दर्द की ताबीर होती 
कुछ तो लहू- सा दर्द रिसा होता
हर्फों के पोर- पोर से तो
और हर पोर हरा बना होता 
असीम अनुभूत वेदना का 
साक्षात्कार किया होता 
तो शायद दर्द भी 
पनाह मांग बैठा होता
दर्द के आगोश में मैं क्या
दर्द ही मेरे आगोश में
सिमट गया होता
कुछ तो दर्द को भी
सुकून मिल गया होता
मेरे दर्द की जिंदा लाश पर
कुछ देर दर्द भी जी लिया होता    

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

हर चीज़ की कीमत होती है............

न जाने 
इतनी क़ुरबानी 
देनी पड़ी होगी
न जाने कितने 
अपनों का 
साथ छूटा होगा
न जाने कितनी 
हसरतों को 
दफ़न किया होगा
न जाने कितने 
मौसमों पर बसंत
आया  ही न होगा
न जाने कितनी
अरमानों की 
लाशों पर
पैर रख तू 
आगे बढ़ा होगा 
सिर्फ एक चाहत को
बुलंदी पर पहुँचाने के लिए 
आसमान को छूने की 
ऊंचाई पर पहुँचने की
चाहत की कुछ तो 
कीमत चुकानी पड़ती है
क्या हुआ गर 
"मैं" तुम से दूर हूँ तो 
क्या हुआ गर आज 
मेरी चाहत की कब्र 
पर पैर रख तुमने 
अपनी चाहतों को 
बुलंद किया 
मैं तो राह का 
वो पत्थर थी 
जो तुम्हारी
ऊंचाइयों में    
मील का पत्थर बनी 
शुक्र है पत्थर ही सही
तुम्हारी कामयाबी में 
कुछ तो बनी 
हर चीज़ की कीमत होती है
और ऊंचाई पर पहुँचने की
कीमत सभी को 
चुकानी पड़ती है
और तुम्हारी
ऊंचाई की
कीमत "मैं " हूँ

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

बदले अर्थ

रोने के भी क्या 
अर्थ होते हैं ?
हाँ , शायद 

एक रोना जब
दर्द हद से गुजरे तब
या कोई बच्चा रोये तब
या जब कोई अपना बिछुड़े तब

कभी विरह के
कभी ख़ुशी के
कभी गम के
अश्क उतरे जब भी
असर कर गए
मगर जब कोई 
स्वार्थ में रोये तब 
जब कोई दिखावटी रोये 
तब शायद अर्थ बदल जाते हैं 
न अश्क सच्चे होते हैं 
न रोना अर्थपूर्ण
मगर असर वो भी 
कर ही जाता है 
शायद हकीकत से भी ज्यादा

आज दुनिया 
दर्द की इन्तिहाँ 
शोर में सुनती है
बिन ढलके जो 
अश्क जज़्ब होते हैं 
उस रोने का भी 
क्या कोई अर्थ होता है?

ये दुनिया अपने 
अर्थ बनाती है
अपनी कसौटी पर
परखती है और 
जहाँ जितना दिखावा हो 
उसे उतना ही 
ग़मज़दा समझती है 

शायद तभी आज 
रोने के भी 
अर्थ बदल गए हैं