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रविवार, 4 दिसंबर 2011

यूँ भी हर किसी के ख्वाबगाह युगों तक सुलगते नहीं रहते


एक ख्वाबगाह से हकीकत तक का सफ़र
फिर किसी ख्वाबगाह के 
मोड पर आकर रुक गया 
ज्यों लम्हा गिरा किसी तबस्सुम पर 
और लफ़्ज़ कोई लरज़ गया 
ये आने जाने के सफ़र मे 
युग देखो बदल गया
क्या आज भी तुम्हारे सिरहाने पर 
धूप दस्तक देती है
क्या आज भी ओस की पहली बूँद 
तुम्हारे रुखसार पर गिरती है
क्या आज भी दिनकर 
तुम्हारे दीदार के बाद ही सफ़र शुरु करता है
देखो ना …………
मै तो कैद हूँ तुम्हारी ख्वाबगाह मे
बताना तो तुम्हे ही पडेगा ………
बदलते मौसम के मिज़ाज़ को
अरे रे रे ..........ये क्या 
तुम तो अभी तक मोड़ मुड़े ही नहीं 
तो क्या युग परिवर्तन के साथ
तुम्हारे असीम निस्सीम प्रेम की 
धारा ने भी प्रवाह बदला है 
या प्रेम का बुलबुला उसी मोड़ पर 
लम्हे के हाथों कैद हुआ खड़ा है 
देखा कैद करने का हश्र ..........
ना सिर्फ कैदी बल्कि करने वाला भी 
स्वयं कैद हो जाता है निगेहबानी करते करते 
बताओ अब ............
क्या कभी जी पाए एक भी लम्हा मेरे बिन 
जब तुम्हारी ख्वाबगाह का आतिथ्य 
मैंने स्वीकार कर ही लिया था
तो फिर क्या जरूरत थी तुम्हें रुकने की
मोड़ से ना मुड़ने की
क्या जरूरत थी लम्हों को कैद करने की
यहाँ तो देखो वक्त ने सीढियां चढ़ी ही नहीं
और तुमने भी वक्त के केशों को उलझा दिया
ना खुद की कोई सुबह हुई
ना मेरी कोई शाम हुई
ये ख्वाबगाह  के सफ़र से 
ख्वाबगाह के मोड़ तक ही
उम्र तमाम हुई .............
भूले बिसरे लम्हे आज भी
आसमाँ के आँचल में बिखरे पड़े हैं
हिम्मत हो तो कभी
कोई तारा तोड़ कर देखना ..............
शायद किसी रूह को पनाह मिल जाए 
और उसकी मोहब्बत 
लम्हों की कैद से आज़ाद हो जाये ...............
यूँ भी हर किसी के ख्वाबगाह युगों तक सुलगते नहीं रहते 

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

आपकी ब्लोग चर्चा यहाँ भी है

दोस्तों,


चलिए आज मिल लीजिये खुद से भी यहाँ पर ...........गर्भनाल के दिसम्बर अंक में आप सबके ब्लोग्स का जिक्र है ...........जो रह जाते हैं वो अफ़सोस न करें उन्हें अगले अंकों में स्थान मिलता रहेगा.........मैंने जो चर्चा आप सबके बारे में की है उसे यहाँ लगा रही हूँ क्यूंकि पीडीऍफ़ में होने के कारण वो लिंक ओपन नहीं हो पाता और आप सब पढ़ नहीं पाते इसलिए मैंने सोचा वो आलेख पूरा यहीं लगा देती हूँ .........वैसे गर्भनाल का लिंक भी दे रही हूँ अगर आप चाहें तो उस लिंक को ओपन करके भी पेज ३२-३३ पर पढ़ सकते हैं.




https://mail-attachment.googleusercontent.com/attachment?ui=2&ik=83ac09a125&view=att&th=133f343d80300e1e&attid=0.1&disp=inline&realattid=f_gvlsgt3y0&safe=1&zw&saduie=AG9B_P-sqdOOtE1oq5h2pgM3cTYR&sadet=1322805836144&sads=RkBPSFnmQTBe-GNLxEjwP9M4qMQ


ये है आपकी चर्चा………


दोस्तों
आज हिंदी और ब्लोगिंग एक दूसरे के पर्याय नज़र आते हैं । एक बार जब संभावनायें अपने लिये जमीन तैयार कर लें तो उस पर जो चाहे जैसी चाहे खेती की जा सकती है । कितनी ही फ़सलें बोयी जा सकती हैं और मनचाहे परिणाम पाये जा सकते हैं और इसका जीता जागता उदाहरण हिंदी ब्लोगिंग है जहां रोज नये पुराने ब्लोगर्स ने एक ऐसा माहौल , एक ऐसी जमीन तैयार की है कि अब हर आने वाले नये ब्लोगर को पता ही नही चलता कि कब आया और कब सबमे घुलमिल गया जैसे दूध मे शक्कर और फिर अपनी मिठास से सबके ह्रदयों पर राज करना इतना आसान हो जाता है कि कभी परायेपन का आभास ही नही होता ।
आज ब्लोगर्स ने अपनी एक विशिष्ट पहचान बनायी है जो हिंदी के प्रसार मे अपना अमूल्य योगदान दे रही है साथ ही साहित्य को एक नयी दिशा……साहित्य हर युग मे बदला है हर बार साहित्य ने नये आयाम तय किये हैं और आज साहित्य की जमीन पर ब्लोगरों ने कब्ज़ा करना शुरु कर दिया है और वो दिन दूर नही जब साहित्य जगत मे ब्लोगरों की काबिलियत का परचम लहरायेगा।
अगर जानना चाहते हैं कि कैसे ब्लोगरों ने अपना आधिपत्य जमाना शुरु किया है तो सबसे पहले उनसे मिलना होगा उनकी सोच को जानना और समझना होगा इसलिये चलिये आज मिलते हैं इसी कडी मे कुछ और शानदार ब्लोग के स्वामियों से ………
सबसे पहले मिलिये ………


बी एस पाबला जी का ब्लोग कम्प्यूटर सुरक्षा http://pcsuraksha.blogspot.com/2011/08/19.html का उल्लेख बेहद आवश्यक है जहाँ वो नित्य नयी जानकारियो से सब पाठको को अवगत तो कराते ही है अगर कभी कोई मुश्किल आ जाये तो उसे दूर करने मे भी जी जान से मदद करते हैं। हर ब्लोगर के लिए हर वक्त तैयार रहते हैं कैसी भी समस्या हो उसे जब तक दूर नहीं कर देते चेन से नहीं बैठते और यही उनकी विश्वसनीयता का प्रमाण है . इसके अलावा सभी ब्लोगर्स के जन्मदिन और वैवाहिक  वर्षगांठ के लिए भी एक ब्लॉग बना रखा है जिस पर सभी को शुभकामनाएं प्रेषित करते हैं साथ ही बाकी ब्लोगर्स को भी याद दिला देते हैं ...........निस्वार्थ प्रेम का एक जीवंत उदाहरण हैं पाबला जी .



साईंस ब्लोगर एसोसियेशन आफ़ इंडिया ब्लोग पर एक से बढकर एक नयी जानकारियां उपलब्ध  कराई जाती है
http://sb.samwaad.com/2011/08/blog-post_08.html जिसमे साइंस से संबंधित जानकारी से अवगत कराया जाता है।विनय प्रजापति और जाकिर अली रजनीश जी के सहयोग से बने इस ब्लॉग पर हर तरह की जानकारियां उपलब्ध रहती हैं जो पाठकों को नए नए आयामों से परिचित करती हैं . इसी सन्दर्भ में एक और ब्लॉग है जिस पर http://techprevue.blogspot.com/  ब्लोगिंग से सम्बंधित जानकारियां उपलब्ध हैं की कैसे अपने ब्लॉग को सुरक्षित किया जा सकता है ? कैसे कंप्यूटर की चाल को सुधार जा सकता है ?कैसे हिंदी में लिखा जा सकता है ? सभी तरह की जानकारियां यहाँ उपलब्ध हैं जिनसे नए पाठकों को समझने में कोई परेशानी नहीं होती और पुराने पाठक भी लाभान्वित होते हैं .


राजीव जायसवाल अपने ब्लोग राजीव जायसवाल पर http://rajiv-jayaswal.blogspot.com/2011/08/meditation.html?showComment=1312801170537#c8860296601956955622 मनुष्य जीवन के गूढ रहस्यो का वर्णन करते हैं।अपने बारे में सिर्फ इतना कहते हैं ...........
पेशे से सी ए और मन से कवि | दिल्ली में निवास | आध्यात्मिकता व परमात्मा की सार्वभौमिकता में विश्वास |
चंद शब्दों में संपूर्ण परिचय दे दिया जिसकी बानगी उनकी कविताओं में भी दिखती है ........
रोज सुबह जीते हैं/रात को मर जाते हैं/दिन के दावानल को/मेहनत के मेघ/भिगो जाते हैं/रात के सन्नाटे में/कोलाहल सपनों के/हम को जगा जाते हैं |


जीवन की किताब और दर्द के पन्ने ब्लोग http://anandkdwivedi.blogspot.com/    पर आनन्द द्विवेदी जी एक से बढकर एक रचनाये लिखते है जो मानव को सोचने को मजबूर कर देती हैं । ज़िन्दगी के सच को करीने से उधेडते हैं।बेहद गंभीर बात सरलता से कहना ही उनका वास्तविक परिचय है जिसकी बानगी उनकी कविताओं और गज़लो मे देखी जा सकती है जिसका एक अन्दाज़ ये है………
जैसे पानी का एक बुलबुला  /सपना तो/बिलकुल भी नहीं था/था तो हकीकत ही .../मगर/इन  कमबख्त बुलबुलों की/उम्र ही कितनी होती है/कुछ तो आवाज़  भी नहीं करते ..../मेरा प्यार..../खामोश  बुलबुला  तो नहीं था न ?

फिर चाहे अध्यात्मिक चिन्तन ही क्यो ना हो कितनी मिठास होती है उसे यहाँ महसूस किया जा सकता है ……

माधव !/सुना है तुम/केवल प्रेम से मिलते हो../चाहत से नही..ना ?/तो,/मेरा एक काम करदो/जब तक/मुझे प्रेम ना हो जाए/तब तक/न तो मेरी प्रेम की प्यास मिटे/न ये चाहत/देख लो/मुझे/कई जन्म लग सकते हैं !
अपने नाम को सार्थक करते आनन्द जी आनन्द की गंगा ही बहाते रहते हैं।




अविनाश वाचस्पति जी का साझा ब्लोग नुक्कड http://www.nukkadh.com/ अपने नाम के अनुरूप है जहाँ हर कोई अपनी बात रख सकता है, नयी से नयी जानकारियाँ साझा कर सकता है। जैसे गली के नुक्कड पर जाकर सारे जहाँ की जानकारी मिल जाती है वैसे ही यहाँ भी फिर चाहे ब्लोगजगत की हो या किसी साहित्य जगत की या राजनैतिक, सामाजिक या धार्मिक्……कोई भी क्षेत्र अछूता नही है ।



केवल राम ब्लोग जगत पर शोध कर रहे है दिल्ली युनिवर्सिटी से और अपना ब्लोग भी लिखते है चलते -चलते ....! http://www.chalte-chalte.com/2011/08/blog-post_09.html
एक से बढ़कर एक आलेख ज़िन्दगी को दिशा देते हैं. इतनी छोटी उम्र में इतनी गहन श्रद्धा का होना काबिल ए तारीफ है . हर आलेख सार्थक दिशा देता है और जीवन को देखने और समझने का नजरिया प्रदान करता है .



हम और हमारी लेखनी ब्लोग http://gita-pandit.blogspot.com/2011/08/blog-post_08.html पर गीता पडित स्त्री विमर्श से संबंधित अन्य लेखको , कवियो की कविताये लगाती हैं। स्त्री विमर्श से संबंधित कविताओं के लिये गीता पंडित जी का ब्लोग एक सशक्त हस्ताक्षर है जहाँ स्त्री के हर रूप, हर संयम और दर्द का चित्रण होता है।



सतीश सक्सैना अपने ब्लोग मेरे गीत http://satish-saxena.blogspot.com/2011/08/blog-post_09.html
पर अपना परिचय कुछ इस प्रकार देते है जिससे उनके व्यक्तित्व की गहराई का पता चलता है , उनके ही शब्दो मे……
जब से होश संभाला, दुनिया में अपने आपको अकेला पाया, शायद इसीलिये दुनिया के लिए अधिक संवेदनशील हूँ ! कोई भी व्यक्ति अपने आपको अकेला महसूस न करे इस ध्येय की पूर्ति के लिए कुछ भी ,करने के लिए तैयार रहता हूँ ! नियमित रक्तदाता हूँ, मरने के बाद किसी के काम आ जाऊं अतः बरसों पहले अपोलो हॉस्पिटल में देहदान कर चुका हूँ ! विद्रोही स्वभाव,अन्याय से लड़ने की इच्छा, लोगों की मदद करने में सुख मिलता है ! निरीहता, किसी से कुछ मांगना, झूठ बोलना और डर कर किसी के आगे सिर झुकाना बिलकुल पसंद नहीं ! ईश्वर से प्रार्थना है कि अन्तिम समय तक इतनी शक्ति एवं सामर्थ्य अवश्य बनाये रखे कि जरूरतमंदो के काम आता रहूँ , भूल से भी किसी का दिल न दुखाऊँ और अंतिम समय किसी की आँख में एक आंसू देख प्राण त्याग कर सकूं !
और इन्ही संवेदनाओ को कभी आलेख तो कविताओ मे उतारते हैं।
संगीता स्वरुप जी अपने ब्लॉग बिखरे मोती http://gatika-sangeeta.blogspot.com/२011/08/blog-post_09.html में गागर में सागर भर देती हैं . चंद शब्दों में गहरी बात कह देती हैं वो भी इतनी सहजता से कि यूँ लगता है ऐसा हम क्यों नहीं कह पाते ......उसकी बानगी देखिये .............तल्ख़ जुबां / करती है असर /जब होता है/अपनापन /कहीं न कहीं /जब हो गए /अजनबी/तो सच ही/ तल्खी जाती रही ..
अपने बारे में सिर्फ इतना कहती हैं --------
कुछ विशेष नहीं है जो कुछ अपने बारे में बताऊँ... मन के भावों को कैसे सब तक पहुँचाऊँ   कुछ लिखूं या फिर कुछ गाऊँ । चिंतन हो जब किसी बात पर और मन में मंथन चलता हो उन भावों को लिख कर मैं शब्दों में तिरोहित कर जाऊं । सोच - विचारों की शक्ति जब कुछ उथल -पुथल सा करती हो उन भावों को गढ़ कर मैं अपनी बात सुना जाऊँ जो दिखता है आस - पास   मन उससे उद्वेलित होता है उन भावों को साक्ष्य रूप दे मैं कविता सी कह जाऊं.
शायद इसके बाद कहने को कुछ नही बचता और यदि बचता है तो वो उनकी कविताओं मे परिलक्षित होता है।


स्वराज्य करुण जी अपने ब्लोग दिल कि बात
http://swaraj-karun.blogspot.com/2011/08/blog-post_09.html पर सच मे दिल कि बात लिखते है जो लगता है जैसे हर दिल कि बात हो . देश के हालत से त्रस्त जनता का दर्द, नेताओं और सरकार पर व्यंग्यात्मक कविताओं के माध्यम से प्रहार करते हैं . इसकी बानगी इनकी कविता

मनचाहे दाम पर 'सत्यवादी पुरस्कार ' !के 

इस अंश में देखिये ........अर्थ का अनर्थ कर /जो जितना फैला सकता है /तरह-तरह के प्रदूषण /वो ही कहलाता है  यहाँ आज/इस देश का पद्म-विभूषण !
हर कविता सोचने को विवश करती है और एक प्रश्न छोड जाती है जिसमे पाठक उलझ जाता है।



घुघुती बासूती ब्लोगhttp://ghughutibasuti.blogspot.com/2011/08/blog-post.html पर घुघूती जी जीवन कि रोजमर्रा कि समस्याओ को इस तरह उठाती हैं और फिर उनका समाधान देती हैं कि पढने वाला हैरत में पड़ जाता है . कभी व्यंग्यात्म शैली में तो कभी साफ़ लफ़्ज़ों में अपनी बात कह देती हैं जो उनके चरित्र की उज्जवलता को दर्शाता है .


हमारी नयी ब्लोगर जैसा नाम वैसी ही लगती हैं । वैसी ही हलचल उनकी पोस्ट पर होती है रुनझुन सी………रुनझुन ब्लोगhttp://praanjalideep.blogspot.com/ पर रुनझुन यानि प्रांजलि दीप अपनी ज़िन्दगी के खुशगवार लम्हो से परिचित कराती हैं।



चंद्रमा , तारामंडल , ग्रहों , सौरमंडल, खगोलीय घटनाओं के बारे में रूचि रखने वालों के लिए ये ब्लॉग एक आश्चर्यजनक खजाना है .
विज्ञानं में रूचि रखने वालों के लिए विज्ञानं विश्व http://vigyan.wordpress.com/2011/08/08/hubble-2/?blogsub=confirming#subscribe-ब्लॉग पर विज्ञानं से सम्बंधित एक से बढ़कर एक अद्भुत जानकारियां उपलब्ध हैं जिनमे मेहनत  परिलक्षित होती है .
डॉक्टर डंडा लखनवी का ब्लॉग मानवीय सरोकार http://dandalakhnavi.blogspot.com/2011/05/blog-post_2194.html?showComment=1312962464571#c3639389402859229246 यथा नाम तथा गुण को चरितार्थ करता है ………अपने ब्लोग पर लखनवी जी मानवीय सरोकारों को इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि लगता है सच मे एक डाक्टर मरीज का इलाज कर रहा है…………अपनी बात कह जाना और गलतियाँ बता भी जाना यही तो उनकी खासियत है ।


रेडिओ नामा ब्लॉग http://radionamaa.blogspot.com/2011/07/blog-post_09.html एक साझा ब्लोग है जिसमे रेडियो से जुडी जानकारियाँ उपलब्ध हैं जिसके बारे मे इसके संचालक का कहना है ………
रेडियोनामा रेडियो-विमर्श का सामूहिक-प्रयास है। अगर आप भी रेडियो-प्रेमी हैं और रेडियो से जुड़ी अपनी यादें या बातें हमारे साथ बांटना चाहते हैं तो आपका स्वागत है।



पेशे से डॉक्टर और खुद को iron lady बताने वाली दिव्या जी के ब्लॉग ज़ीलhttp://www.blogger.com/profile/०४०४६२५७६२५०५९७८१३१३ पर आपको उनके विचारों का एक प्रवाह मिलेगा जिसमे हर सामाजिक विषय पर उनकी लेखनी कि धार से रु-ब-रु होने का मौका मिलेगा ......बेशक विदेश में रहती हैं मगर दिल में हिंदुस्तान को लिए घूमती हैं और उसी तरह आहत होती हैं जैसे हिंदुस्तान में रहने वाला होता है ...........ज़िन्दगी कि छोटी छोटी बातों को लक्ष्य करके बहुत गहरी बात कह जाना ही उनके लेखन की सफलता  है ।


अब मिलवाती हूँ एक ऐसी शख्सियत से जिनके ११ ब्लॉग हैं जिन पर वो सक्रिय हैं . यूँ तो वो २००९ से ही ब्लॉगजगत में पधारे हैं मगर उन्होंने अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है .
ये हैं आदरणीय डॉक्टर रूप चन्द्र शास्त्री मयंक जी जिनका मुख्य  ब्लॉग है -----------उच्चारणhttp://uchcharan.blogspot.com/2011/09/blog-post_05.html जिस पर वो बेहद सरल, लयबद्ध  व् छंदबद्ध भाषा में गीत , कवितायेँ , दोहे इत्यादि लिखते हैं . जिन्हें गुनगुनाने का मन करता है और देखा जाये तो यही कविता का सौंदर्य होता हैजब कविता गुनगुनाने को जी चाहे तो वो कविता सीधा दिल से जुडती है. . इन्हें अतुकांत लिखना पसंद नहीं है तभी इनकी विशिष्ट शैली सभी पाठकों को लुभाती है
हर विधा को आयाम दिया है शास्त्री जी ने अपने लेखन  में फिर चाहे देश हो , समाज हो , प्रेम हो या मौसम कोई भी कोना, कोई भी रस उनकी दृष्टि से छूटा नहीं है और यही उनके लेखन की व्यापकता का आभास कराता है . 



अब मिलवाती हूँ एक नयी ब्लोगर सर्जना शर्मा जी से जो पत्रकारिता के पेशे से जुडी हैं  और २०१० में ही ब्लॉगजगत में पदार्पण किया है मगर अपनी मीठी मीठी रस भारी बातों से सबका मन मोह लेटी हैं तभी तो उन्होंने अपने ब्लॉग का नाम भी तो रखा है रसबतिया. http://rasbatiya.blogspot.com/ जिस पर कभी तो विवाह में सप्तपदी का महत्त्व बताती हैं तो कभी सावन में हरियाली तीज के महात्व को तो कभी लोहड़ी तो कभी माघ के महीने का महत्त्व बताते हुए वो अपने देश कि संस्कृति से परिचित कराती हैं और वो भी इतने मोहक और चित्ताकर्षक अंदाज़ में कि पाठक बिना रुके एक सांस में पूरा पढ़ जाता है और जब पोस्ट ख़त्म होती है तो भी उसी में खोया रहता है और यही उनके लेखन की सफलता है.




२००९ से ब्लोगिंग में पदार्पण करने वाले पेशे से पत्रकार खुशदीप सहगल अपने ब्लॉग देशनामा
http://www.deshnama.com/2011/09/blog-post_11.html

पर आज कि राजनैतिक ,सामाजिक ज्वलंत समस्याओं का चित्रण अपने ब्लॉग पर करते हैं .फिर उसके लिए चाहे सरकार को ही आड़े हाथों क्यूँ ना लेना पड़े अपनी हर बात निर्भीकता से रखते हैं और यही उनके लेखन का कमाल  है ।

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

जहाँ बाड खेत को खुद है खाती


ये जग झूठा
नाता झूठा
खुद का भी
आपा है झूठा
फिर सत्य माने किसको

मन बंजारा
भटका फिरता
कोई ना यहाँ
अपना दिखता
फिर अपना बनाए किसको

कैसी मची है
आपाधापी
कोई नहीं
किसी का साथी
सब मुख देखे की लीला है
फिर दुखडा सुनायें किसको



जहाँ बाड खेत को
खुद है खाती
लुटेरों के हाथ में
तिजोरी की चाबी
वहाँ किससे बचाएं किसको 

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

यूँ ही नहीं कोई मौत के कुएं में सिर पर कफ़न बाँधे उतरता है

दोस्तों
 ओपन बुक्स ऑनलाइन द्वारा आयोजित प्रतियोगिता " चित्र से काव्य तक" में मेरी इस कविता को द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ है जिसका लिंक निम्न है जहाँ तीनो विजेताओं की रचनायें लगी हैं .........http://openbooksonline.com/group/pop/forum/topic/show?id=5170231%3ATopic%3A169440&xg_source=मशग





यूँ ही नहीं कोई मौत के कुएं में सिर पर कफ़न बाँधे उतरता है



ये रोज पैंतरे बदलती ज़िन्दगी
कभी मौत के गले लगती ज़िन्दगी
हर पल करवट बदलती है
कभी साँझ की दस्तक
तो कभी सुबह की ओस सी
कभी जेठ की दोपहरी सी तपती
तो कभी सावन की फुहारों सी पड़ती
ना जाने कितने रंग दिखाती है
और हम रोज इसके हाथों में
कठपुतली बन 
एक नयी जंग के लिए तैयार होते 
संभावनाओं की खेती उपजाते
एक नए द्रव्य का परिमाण तय करते
उम्मीदों के बीजों को बोते 
ज़िन्दगी से लड़ने को 
और हर बाजी जीतने को कटिबद्ध होते
कोशिश करते हैं 
ज़िन्दगी को चुनौती देने की
ये जानते हुए कि 
अगला पल आएगा भी या नहीं
हम सभी मौत के कुएं में 
धीमे -धीमे रफ़्तार पकड़ते हुए 
कब दौड़ने लगते हैं 
एक अंधे सफ़र की ओर
पता भी नहीं चलता
मगर मौत कब जीती है
और ज़िन्दगी कब हारी है
ये जंग तो हर युग में जारी है
फिर चाहे मौत के कुएं में
कोई कितनी भी रफ़्तार से
मोटर साइकिल चला ले
खतरों से खेलना और मौत से जीतना
ज़िन्दगी को बखूबी आ ही जाता है
इंसान जीने का ढंग सीख ही जाता है
तब मौत भी उसकी जीत पर
मुस्काती है , हाथ मिलाती है
जीने के जज्बे को सलाम ठोकती है 
जब उसका भी स्वागत कोई
ज़िन्दगी से बढ़कर करता है
ना ज़िन्दगी से डरता है
ना मौत को रुसवा करता है 
हाँ , ये जज्बा तो सिर्फ 
किसी कर्मठ में ही बसता है 
तब मौत को भी अपने होने पर
फक्र होता है ..........
हाँ , आज किसी जांबाज़ से मिली 
जिसने ना केवल ज़िन्दगी को भरपूर जिया
बल्कि मौत का भी उसी जोशीले अंदाज़ से
स्वागत किया
समान तुला में दोनों को तोला 
 मगर
कभी ना गिला - शिकवा किया 
जानता है वो इस हकीकत को 
यूँ ही नहीं कोई मौत के कुएं में
सिर पर कफ़न बाँधे उतरता है
क्यूँकि तैराक ही सागर पार किया करते हैं 

जो ज़िन्दगी और मौत दोनो से
हँसकर गले मिलते हैं

बुधवार, 23 नवंबर 2011

हर अमावस दिवाली का संकेत नहीं होती ..........


हैलो ....हाउ आर यू
जब कोई पूछता है
दिल पर एक घूँसा सा लगता है
ना जाने कितनी उधेड्बुनो
और परेशानियों से घिरे हम 
हँस कर जवाब देते हैं 
फाईन .........
क्या सच में फाइन होते हैं 
सामने वाला तो जान ही नहीं पाता
फाइन कहते वक्त भी
एक अजीब सी मनः स्थिति से
गुजरते हम 
पता नहीं उसे या खुद को 
भ्रम दिए जाते हैं 
हम सपनो की दुनिया में जीने वाले
कब हकीकत से नज़र चुराने लगते हैं
कब खुद को भ्रमजाल में उलझाने लगते हैं
कब खुद से भागने लगते हैं 
पता ही नहीं चलता
या शायद पता होता भी है
पर खुद को भरमाने के लिए भी तो
एक बहाना जरूरी होता है ना
अब क्या जरूरी है ........अपने साथ
दूसरे को भी दुखी किया जाए
या अपने गम हर किसी के साथ बांटे जायें
क्यूँकि ..........पता है ना
ये ऐसी चीज नहीं जो बाँटने से बढ़ जाये 
फिर क्या रहा औचित्य 
फाइन कहने का
क्या कह देने भर से 
सब फाइन हो जाता है क्या?
हर अमावस दिवाली का संकेत नहीं होती ..........

सोमवार, 21 नवंबर 2011

है प्रेम जगत में सार और कुछ सार नहीं

दोस्तों
आज बिंदु जी का बहुत चर्चित भजन लगा रही हूँ . इसकी दो पंक्तियाँ मैंने आदरणीय भोलाराम जी के ब्लॉग पोस्ट पर लगायी थीं तो उनकी तरफ से फरमाइश आई की पूरी पढवाइये तो सोचा आप सबको भी पढवानी चाहिए हो सकता है आप में से काफी लोगों ने पढ़ी हो ...........तो एक बार और सही.








है प्रेम जगत  में सार और कुछ सार नहीं
तू कर ले प्रभु से प्यार और कुछ प्यार नहीं
कहा घनश्याम ने उधो से वृन्दावन जरा जाना
वहाँ की गोपियों को ज्ञान का कुछ तत्व समझाना
विरह  की वेदना में वे सदा बेचैन रहती हैं
तडप कर आह भर कर और रो रोकर ये कहती हैं
है प्रेम जगत में सार...................................

कहा उधो ने हँसकर मैं अभी जाता हूँ वृन्दावन
ज़रा देखूं कि कैसा है कठिन अनुराग का बँधन
है कैसी गोपियाँ जो ज्ञान बल को कम बताती हैं
निरर्थक लोक  लीला का यही गुणगान गाती हैं
है प्रेम जगत में सार...................................

चले मथुरा से जब कुछ दूर वृन्दावन निकट आया
वहीँ से प्रेम ने अपना अनोखा रंग दिखलाया
उलझ कर वस्त्र में कांटे लगे उधो को समझाने
तुम्हारा ज्ञान  पर्दा फाड़ देंगे प्रेम दीवाने
है प्रेम जगत में सार...................................

विटप झुक कर ये कहते थे इधर आओ इधर आओ 
पपीहा कह रहा था पी कहाँ यह भी तो बतलाओ
नदी यमुना की  धारा शब्द हरि हरि का सुनाती थी
भ्रमर गुंजार से भी ये मधुर आवाज़ आती थी
है प्रेम जगत में सार......................................

गरज पहुंचे वहाँ था गोपियों का जिस जगह माडल
वहाँ थीं शांत पृथ्वी वायु धीमी थी निर्मल
सहस्त्रों गोपियों के मध्य में श्री राधिका रानी
सभी के मुख से रह रह कर निकलती थी यही वाणी 
है प्रेम जगत में सार.....................................

कहा  उधों ने यह बढ़कर कि मैं मथुरा से आया हूँ
सुनाता हूँ संदेसा श्याम का जो साथ लाया हूँ 
कि जब यह  आत्मसत्ता ही अलख निर्गुण कहाती  है
तो फिर क्यों मोह वश होकर वृथा यह गान गाती  है
है प्रेम जगत में सार.....................................

कह श्री राधिका ने तुम संदेसा खूब लाये हो
मगर ये याद रक्खों प्रेम की  नगरी में आये हो
संभालो योग की  पूँजी ना हाथों से  निकल जाए
कहीं विरहाग्नि में यह ज्ञान की  पोथी ना जल जाए
है प्रेम जगत में सार.................................

अगर निर्गुण हैं हम तुम कौन कहता है खबर किसकी?
अलख हम तुम हैं तो किस किस को लखती है नज़र किसकी 
जो हो अद्वैत के कायल तो फिर क्यों द्वैत लेते हो
अरे खुद ब्रह्म होकर ब्रह्म को उपदेश देते हो
है प्रेम जगत में सार...............................

अभी तुम खुद नहीं समझे कि किसको योग कहते हैं
सुनो इस तौर योगी द्वैत में अद्वैत रहते हैं 
उधर मोहन बने राधा  , वियोगिन की  जुदाई में
इधर राधा बनी है श्याम . मोहन की  जुदाई में
है प्रेम जगत में सार...................................

सुना जब प्रेम का अद्वैत उधो की  खुली आँखें
पड़ी थी ज्ञान मद की  धूल जिनमे वह धुली आंखें
हुआ रोमांच तन में बिंदु आँखों से निकल आया
गिरे श्री राधिका पग पर कहा गुरु मन्त्र यह पाया
है प्रेम जगत में सार...................................

बुधवार, 16 नवंबर 2011

क्रांति के बीज यूँ ही नहीं पोषित होते हैं

जिसने भी लीक से हटकर लिखा
परम्पराओं मान्यताओं को तोडा
पहले तो उसका दोहन ही हुआ
हर पग पर वो तिरस्कृत ही हुआ
उसके दृष्टिकोण को ना कभी समझा गया
नहीं जानना चाहा क्यूँ वो ऐसा करता है
क्यूँ नहीं मानता वो किसी अनदेखे वजूद को
क्यूँ करता है वो विद्रोह 
परम्पराओं का
धार्मिक ग्रंथों का
या सामाजिक मान्यताओं का
कौन सा कीड़ा कुलबुला रहा है
उसके ज़ेहन में
किस बिच्छू के दंश से 
वो पीड़ित है 
कौन सी सामाजिक कुरीति 
से वो त्रस्त है
किस आडम्बर ने उसका 
व्यक्तित्व बदला
किस ढोंग ने उसे 
प्रतिकार को विवश किया
यूँ ही कोई नहीं उठाता 
तलवार हाथ में
यूँ नहीं करता कोई वार 
किसी पर
यूँ ही नहीं चलती कलम 
किसी के विरोध में
यूँ ही प्रतिशोध नहीं 
सुलगता किसी भी ह्रदय में
ये समाज  में 
रीतियों के नाम पर 
होते ढकोसलों ने ही
उसे बनाया विद्रोही 
आखिर कब तक 
मूक दर्शक बन
भावनाओं का बलात्कार होने दे
आखिर कब तक नहीं वो
खोखली वर्जनाओं को तोड़े
जिसे देखा नहीं
जिसे जाना नहीं
कैसे उसके अस्तित्व को स्वीकारे
और यदि स्वीकार भी ले
तो क्या जरूरी है जैसा कहा गया है
वैसा मान भी ले
उसे अपने विवेक की तराजू पर ना तोले 
कैसे रूढ़िवादी कुरीतियों के नाम पर
समाज को , उसके अंगों को 
होम होने दे
किसी को तो जागना होगा
किसी को तो विष पीना होगा
यूँ ही कोई शंकर नहीं बनता
किसी को तो कलम उठानी होगी
फिर चाहे वार तलवार से भी गहरा क्यूँ ना हो
समय की मांग बनना होगा
हर वर्जना को बदलना होगा
आज के परिवेश को समझना होगा
चाहे इसके लिए उसे
खुद को ही क्यूँ ना भस्मीभूत करना पड़े
क्यूँ ना विद्रोह की आग लगानी पड़े
क्यूँ ना एक बीज बोना पड़े
जन चेतना , जन जाग्रति का 
ताकि आने वाली पीढियां ना
रूढ़ियों का शिकार बने
बेशक आज उसके शब्दों को 
कोई ना समझे
बेशक आज ना उसे कोई 
मान मिले
क्यूँकि जानता है वो
जाने के बाद ही दुनिया याद करती है
और उसके लिखे के 
अपने अपने अर्थ गढ़ती है
नयी नयी समीक्षाएं होती हैं
नए दृष्टिकोण उभरते हैं
क्रांति के बीज यूँ ही नहीं पोषित होते हैं
मिटकर ही इतिहास बना करते हैं 

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

सुना था होता है इक बचपन




सुना था होता है इक बचपन
जिसमे होते कुछ मस्ती के पल
पर हमने ना जाना ऐसा बचपन
कहीं ना पाया वैसा बचपन
जिसमे खेल खिलौने होते
जिसमे ख्वाब सलोने होते
यहाँ तो रात की रोटी के जुगाड़ में
दिन भर कूड़ा बीना करते हैं
तब जाकर कहीं एक वक्त की
रोटी नसीब हुआ करती है
जब किसी बच्चे को
पिता की ऊंगली पकड़
स्कूल जाते देखा करते हैं
हम भी ऐसे दृश्यों को
तरसा करते हैं
जब पार्कों में बच्चों को
कभी कबड्डी तो कभी क्रिकेट
तो कभी छिड़ी छिक्का 
खेलते देखा करते हैं
हमारे  अरमान भी उस 
पल को जीने के 
ख्वाब रचाया करते हैं

मगर जब अपनी तरफ देखा करते हैं
असलियत से वाकिफ हो जाते हैं
सब सपने सिर्फ सपने ही रह जाते हैं
कभी भिखारियों के 
हत्थे चढ़ जाते हैं
वो जबरन भीख मंगाते हैं
हमें अपंग बनाते हैं 
तो कभी धनाभाव में 
स्कूल से नाम कटाते हैं
और बचपन में ही 
ढाबों पर बर्तन धोते हैं
तो कभी गाड़ियों के शीशे 
साफ़ करते हैं
तो कभी लालबत्ती पर
सामान बेचा करते हैं

यूँ हम बचपन बचाओ 
मुहीम की धज्जियाँ उडाया करते हैं 
बाल श्रम के नारों को 
किनारा दिखाया करते हैं
पेट की आग के आगे
कुछ ना दिखाई देता है
बस उस पल तो सिर्फ
हकीकत से आँख लड़ाते हैं 
और किस्मत से लड़- लड़ जाते हैं
बचपन क्या होता है
कभी ये ना जान पाते हैं
जिम्मेदारियों के बोझ तले
बचपन को लाँघ 
कब प्रौढ़ बन जाते हैं
ये तो उम्र ढलने पर ही 
हम जान पाते हैं
सुलगती लकड़ियों की आँच पर
बचपन को भून कर खा जाते हैं
पर बचपन क्या होता है
ये ना कभी जान पाते हैं 

सोमवार, 7 नवंबर 2011

कभी किया है त्रिवेणी मे स्नान?

मोहब्बत इक कर्ज़ है ऐसा जो चुकाये बने ना उठाये बने

तेरी याद इक दर्द है ऐसा जो दबाये बने ना 
दिखाये बने


कभी किया है त्रिवेणी मे स्नान?







यादों के संगम पर अब नही मिलते दोनो वक्त

त्रिवेणी के लिये दर्द का दरिया उधार कौन दे





ना कुछ चाहा ना कुछ मांगा 

ना जाने क्यूँ

फिर भी रिश्ता चटक गया







रिश्तों को भी जलना आ गया

शायद हमे भी जीना आ गया






दर्द भी होता है

टीस भी उठ्ती है

मगर अश्क नही बहते



जल बिन मछली का तडपना देखा है कभी?







दीप तले ही अंधेरा था

शायद मेरा नीड ही अकेला था


अब उम्र की बाती कौन बनाये?








जीवन की कश्ती मे अश्कों का पानी

हाय रे! क्या से क्या हुई ज़िन्दगानी


बचपन के दर्पण मे ज़िन्दगी नही मिलती











दोस्तों 


पिछली पोस्ट में आप सब वो पोस्ट नहीं पढ़ पाए क्यूंकि लिंक नहीं खुल 


रहा था मगर मेरे यहाँ खुल रहा था कोई बात नहीं मैंने अब वो आलेख 


वहीँ लगा दिया है आप सब चाहें तो वहां उसे पढ़ सकते हैं ........बस 


पत्रिका में थोडा एडिट हुआ है .