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मंगलवार, 13 मार्च 2012

साहित्य और सफेदी ........मेरी नज़र में


साहित्य और सफेदी 
 दोस्तों
अभी प्रेम जनमेजय जी ने फेसबुक पर नयी दुनिया में प्रकाशित अपना ये व्यंग्य आलेख "साहित्य और सफेदी"  लगाया है और चाहते थे कि सब अपनी राय रखें मगर उनके आलेख  को तो मैं नहीं पढ़ पाई क्यूँकि उसके फोंट्स बड़े नहीं हो पा रहे थे मगर उनके शीर्षक ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया और उन्हें मैंने अपने ये विचार प्रेषित किये  हैं ..........अब पता नहीं सही हैं या नहीं मगर ये मेरी एक सोच है और यदि ऐसा होने लगे तो भविष्य में साहित्य का अपना एक अलग मुकाम होगा ऐसा मेरा सोचना है ...............


मुझे नही पता आपने इसमे क्या कहा …………आप हैं साहित्य के पुरोधा , एक सशक्त हस्ताक्षर तो आपसे  सिर्फ़ इतना ही कहना चाहूँगी कि साहित्य और सफ़ेदी शीर्षक से जो मुझे समझ आया वो ये कि शायद ये हमारे वरिष्ठ साहित्यकारों की ही देन है जो आज साहित्य मे सफ़ेदी दिखायी दे रही है ………आप जानना चाहेंगे कि कैसे? तो उसका जवाब है कि जब वरिष्ठ साहित्यकार जब एक मुकाम पर पहुंच जाते हैं कम से कम तब तो आने वाले नये लेखकों को , कवियों को प्रोत्साहित करें ताकि वो भी साहित्य जगत मे अपना योगदान दे सकें मगर हमारे देश के साहित्य का ये दुर्भाग्य ही रहा है कि जितने भी साहित्यकार कम से काम आज जो हो रहे हैं वो सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने वर्चस्व के लिये ही जी रहे हैं और छोटे या नये लेखकों को प्रोत्साहन तो दूर उनकी एक से एक उम्दा रचनाओं को भी जल्दी नही सराहते जबकि अन्दर से जानते हैं कि शायद उनसे भी उम्दा और बेहतर लेखन है क्योंकि कहीं ना कहीं उन्हे डर रहता है कि कहीं वो उनसे आगे ना निकल जाये या उनका जो वर्चस्व कायम है वो ना छिन जाये…………अगर कोई किसी को थोडा बहुत प्रोत्साहित कर भी रहा है तो किसी ना किसी के कहने पर या किसी के किसी उपकार के नीचे दबे होने के कारण मगर वास्तव मे सच्चा साहित्यकार तो वो ही होता है जो ना केवल अपना बल्कि अपने साथ दूसरों को भी साथ लेकर चले…………मै तो यही कहूँगी कि उसे चाहिये अपनी एक पुस्तक छपवाने के साथ प्रकाशक से कहे कि एक नये कवि या लेखक की भी साथ मे एक पुस्तक प्रकाशित करे तो कैसे ना आने वाला वक्त बदलेगा क्योंकि स्थापित साहित्यकार तो हमेशा बिकता है तो इसलिये वो छपता है मगर नये के लिये कोई हाथ नही लगाना चाहता फिर चाहे उसमे कितनी भी संभावनायें हों ………यदि स्थापित साहित्यकार इस दिशा मे एक नयी पहल करें तो साहित्य पर कभी सफ़ेदी नही छा सकती और वक्त के इतिहास मे ये उदाहरण स्वर्ण अक्षरों मे जरूर लिखा जायेगा ऐसी मुझे उम्मीद है…………कुछ अन्यथा कहा हो तो माफ़ी चाहती हूँ जो आजकल देख रही हूँ उसी के बारे मे लिखा है .



बाल रंगने याना रंगने से ज्यादा जरूरी है कि आज के साहित्यकारों को 

अपनी जिम्मेदारी का अहसास हो और समाज के विकास मे अपना 

योगदान दे सकें …………वैसे भी साहित्यसमाज का ही दर्पण होता 

है…………अब ये आज के इन साहित्यकारों पर है कि ये कैसा समाज 

देंगे आने वाली पीढियों को..............



तो बताइये दोस्तों क्या मैने कुछ गलत कहा? क्या ऐसा होना संभव है? 

या ऐसी पहल की जानी चाहिये?


सोमवार, 12 मार्च 2012

ब्लोगर ने मचाया धमाल जर्मनी मे

दोस्तों
आप सब के लिए गर्व की बात है कि अपना स्टार बल्लेबाज उर्फ़ महफूज़ मियां ने वो कारनामा किया है जो हम आप स्वप्न में ही सोचते हैं . इतने वक्त से लगे हैं हम सब ब्लोगर मगर वहीँ के वहीँ हैं और उधर महफूज़ ने न केवल अपने देश बल्कि विदेशों में भी अपने लेखन से धाक जमा ली है जिसका ताजातरीन उदाहरण ये है कि उनकी लिखी कविता को जर्मनी में पाठ्यक्रम में शामिल किया जा रहा है और ये किसी भी भारतीय के लिए बेहद गर्व की बात है और मुझे तो बेहद ख़ुशी हो रही है कि वो महफूज़ हम सबकी ज़िन्दगी का एक हिस्सा है . हाँ , हम सब कह सकते हैं कि महफूज़ को हम जानते हैं और ये ही बात हम सब के लिए भी किसी गौरव से कम नहीं . आखिर ब्लोगर जाति के सम्मान की बात है भई :))))))))


वैसे इससे पहले भी महफूज़ ऐसा ही कारनामा कर चुके हैं जिसके बारे में हम सभी जानते हैं कि उनकी एक कविता अमेरिका में एक कंपनी ने टी-शर्ट पर छापी थी ......बस इसी तरह आगे बढ़ते जाओ :)))



लीजिये हिंदुस्तान में छपी उनकी खबर देखिये और उनके द्वारा प्रेषित सूचना में सराबोर होइए ……


महफूज़ के ही शब्दों में ..........


My NEWS IN HINDUSTAN (11/03/2012)

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आप सबको बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि मेरी एक इंग्लिश कविता जर्मनी में प्रकाशित हुई है... जो कि स्कूल पाठ्यक्रम में... भी ऐड हुई है..... यह ख़बर मैंने बहुत पहले सिर्फ Khushdeep Sehgal खुशदीप भैया को बता दी थी... लेकिन ... Authoritative परमिशन नहीं थी ...इसीलिए किसी को बताया नहीं... आप सबको यह बताते हुए ख़ुशी हो रही है.... कि मेरी एक किताब Penguin Publisher से जल्द ही प्रकाशित होने वाली है... जिसका विमोचन सितम्बर में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल करेंगे... मेरी किताब पब्लिश होने के लिए उसमें सबसे बड़ा मोटिवेशन मुझे खुशदीप भैया से मिला है.... मुझे डेढ़ साल पहले खुशदीप भैया ने सजेस्ट किया था... और उन्ही के सजेशन पर मैंने स्ट्रेटेजी अपनाई थी... बाद में यह ख़बर मैंने पाबला जी,Suman Motiani सुमन मोटिआनी जी (यह ब्लॉगर नहीं हैं) और अपने मित्रPawan Kumarपवन भाई (नजरिया ब्लॉग) को भी बताई...... जर्मन सरकार से वीज़ा भी जल्द ही मिलने वाला है... सारी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं.... उम्मीद है कि मई में जर्मनी जाना होगा.... बहुत जल्दी ही इसी सिलसिले में ग्रैंड पार्टी डेल्ही में करने वाला हूँ और इसकी सूचना Anju Choudhary अंजू जी और Sunita Shanoo सुनीता दी से कंसल्ट कर के आप सबको दूंगा... बहुत जल्दी में हूँ फिलहाल.... अब चलता हूँ....

आप सब स्नेह और प्यार ऐसे ही बनाये रखिये...



महफूज़ को हम सबकी तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं और ढेर सारी 

बधाइयाँ ...............इसी तरह सफलता की 
 सीढियां चढ़ते जाओ और 

देश , ब्लोगर्स और अपना नाम रौशन करते जाओ यही कामना करती हूँ .




पूरा आलेख आप फोटो पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं .........:))))))))

गुरुवार, 8 मार्च 2012

महिला दिवस और स्त्री सशक्तिकरण


महिला दिवस और स्त्री सशक्तिकरण

कितना सुन्दर लगता है ना जब हम सुनते हैं आज महिला दिवस है , स्त्री सशक्तिकरण का ज़माना है , एक शीतल हवा के झोंके सा अहसास करा जाते हैं ये चाँद लफ्ज़ . यूँ लगता है जैसे 
सारी कायनात को अपनी मुट्ठी में कर लिया हो और स्त्री को उसका सम्मान और स्वाभिमान वापस मिल गया हो और सबने उसके वर्चस्व को स्वीकार कर लिया हो एक नए जहान का निर्माण हो गया हो ...............कितना सुखद और प्यारा सा अहसास !

पर क्या वास्तव में दृश्य ऐसा ही है ? कहीं परदे के पीछे की सच्चाई इससे इतर तो नहीं ? 

ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है क्योंकि हम सभी जानते हैं वास्तविकता के धरातल पर कटु सत्य ही अग्निपरीक्षा देता है और आज भी दे रहा है . स्त्री मुक्ति, स्त्री दिवस , महिला सशक्तिकरण सिर्फ नारे बनकर रह गए हैं . वास्तव में देखा जाये तो सिर्फ चंद गिनी चुनी महिलाओं को छोड़कर आम महिला की दशा और दिशा में कोई खास परिवर्तन नहीं आया है फिर चाहे वो देशी हो या विदेशी . विश्व पटल पर महिला कल भी भोग्या थी आज भी भोग्या ही है सिर्फ उसकी सजावट का , उसे पेश करने का तरीका बदला है . पहले उसे सिर्फ और सिर्फ बिस्तर की और घर की शोभा ही माना जाता था और आज उसकी सोच में थोडा बदलाव देकर उसका उपभोग किया जा रहा है , आज भी उसका बलात्कार हो रहा है मगर शारीरिक से ज्यादा मानसिक . शारीरिक तौर पर तो उसे विज्ञापनों की गुडिया बना दिया गया है तो कहीं देह उघाडू प्रदर्शन की वस्तु और मानसिक तौर पर उसे इसके लिए ख़ुशी से सहमत किया गया है तो हुआ ना मानसिक बलात्कार जिसे आज भी नारी नहीं जान पायी है और चंद बौद्धिक दोहन करने वालों  की तश्तरी में परोसा स्वादिष्ट पकवान बन गयी है जिसका आज भी मानसिक तौर पर शोषण हो रहा है और उसे पता भी नहीं चल रहा . 

 सोच से तो आज भी स्त्री मुक्त नही है ………आज भी वो प्रोडक्ट के रूप मे इस्तेमाल हो रही है अपने स्वाभिमान को ताक पर रखकर ………उसने सिर्फ़ स्वतंत्रता को ही स्त्री मुक्ति के संदर्भ मे लिया है और उसका गलत उपयोग ज्यादा हो रहा है सार्थक नही.जिस दिन स्त्री इस बात को समझेगी कि उसके निर्णय पर दूसरे की विचारधारा हावी ना हो और वो खुद अपने निर्णय इतनी दृढता से ले सके कि कोई उसे बदलने को मजबूर ना कर सके…तभी सही मायनो मे स्त्री मुक्ति होगी और आज भी स्त्री कही की भी हो कहीं ना कहीं पुरुष के साये के नीचे ही दबी है ……एक मानसिक अवलंबन की तरह वो पुरुष पर ही निर्भर है जिससे उसे खुद को मुक्त करना पडेगा तभी वास्तविक स्त्री मुक्ति होगी ………अपने लिये नये पायदान बनाये ना कि पुरुष के ही दिखाये मार्ग पर चलती जाये और सोचे कि मै मुक्त हो गयी स्वतंत्र हो गयी फिर चाहे वो इस रूप मे भी उसका इस्तेमाल ही क्यों ना कर रहा हो…………उसे पहल तो करनी ही होगी अपनी तरह क्योंकि इसका बीडा जब तक एक नारी नही उठायेगी तब तक उसके हालात सुधरने वाले नही………अब सोच को तो बदलना ही होगा और ये काम स्वंय नारी को ही करना होगा ………जब तक संपूर्ण नारी जाति की सोच मे बदलाव नही आ जाता तब तक कैसे कह दें स्त्री मुक्त हुई………अपनी मुक्ति अपने आप ही करनी पडती है………  उसे सिर्फ़ विज्ञापन नही बनना है , अपना दोहन नही होने देना है आज ये बात स्त्री को समझनी होगी , अपनी सोच विकसित करनी होगी और एक उचित और विवेकपूर्ण निर्णय लेने मे खुद को सक्षम बनाना होगा ना कि कोई भी स्त्री मुक्ति के नाम पर कुछ कहे उसके पीछे चलना होगा…………जहाँ तक स्त्री का एक दूसरे के प्रति व्यवहार है उसके लिये यही कहा जा सकता है जब सोच मे इस हद तक बदलाव आ जायेगा तो व्यवहार मे अपने आप बदलाव आयेगा………जब तक सोच ही रूढिवादी रहेगी तब तक स्त्री स्त्री की दुश्मन रहेगी 
जब तक सोच में बदलाव नहीं आएगा फिर चाहे स्त्री हो या पुरुष या समाज या देश तब तक किसी भी महिला दिवस का कोई औचित्य नहीं . आज जरूरत है एक स्वस्थ समाज के निर्माण की , एक सही दिशा देने की और स्त्री को उसका स्वरुप वापस प्रदान करने की  और इसके लिए उसे खुद एक पहल करनी होगी अपनी सोच को सही आकार और दिशा देना होगा . किसी के कहने पर ही नहीं चलना बल्कि अपने दिमाग के सभी तंतुओं को खोलकर खुद दिमाग से विचार करके अपने आप निर्णय लेने की अपनी क्षमता को सक्षम करना होगा .  



 आज जो भी शोषण हो रहा है काफी हद तक तो महिलाएं खुद भी जिम्मेदार हैं क्योंकि वो दिल से ज्यादा और दिमाग से कम सोचती हैं मगर आज उन्हें भी प्रैक्टिकल  बनना होगा . सिर्फ एक दिन उनके नाम कर दिया गया इसी सोच पर खुश नहीं होना बल्कि हर दिन महिला दिवस के रूप में मने, उन्हें अपने सम्मान और स्वाभिमान से कभी समझौता ना करना पड़े और समाज और देश के उत्थान में बराबर का सहयोग दे सकें तब होगा वास्तव में सही अर्थों में महिला सशक्तिकरण , स्त्री की परम्परावादी सोच से मुक्ति और तब मनेगा वास्तविक महिला दिवस. 





मंगलवार, 6 मार्च 2012

गोरिया ने होली को गुलाल कर दिया





कमाल कर दिया कमाल कर दिया 
गोरिया ने होली को गुलाल कर दिया 
जो मारी तिरछी नैन कटार 
बिन पिचकारी और पानी के फ़ेंकी तीखी धार 
हर तरफ़ फिर तो बस 
धमाल कर दिया धमाल कर दिया 
गोरिया ने होली को गुलाल कर दिया 



जो पकडा देवर को भौजाई ने 
शंटी मार मार जो खेली अबकी होली
बिन रंग के भी कुछ ऐसे भाभी ने
देवर को लाल कर दिया
कमाल कर दिया कमाल कर दिया
गोरिया ने होली को गुलाल कर दिया 



छुपते फ़िरते थे सजनवा अबकी होली मे
सजनी ने भी कसर ना छोडी अब की होली मे
सोये सजनवा पर डार प्रेम रंग
प्रेमी प्रीतम को लाल कर दिया 
सजन संग होली को गुलाल कर दिया 
कमाल कर दिया कमाल कर दिया
गोरिया ने होली को गुलाल कर दिया 



रविवार, 4 मार्च 2012

यूँ ही नहीं राधा को मोहन मिला करते...........


चाहत कोई भी हो
कैसी भी हो
किसी की भी हो
एक बार नैराश्य के 
भंवर में जरूर डूबती है
फिर भी इंसान चाहत की 
पगडण्डी नहीं छोड़ता
एक आस का पंछी
उसके मन की मुंडेर पर
उम्र भर चहचहाता रहता है
उसे जीने की एक वजह 
देता रहता है
गर आस ना हो 
तो शायद जीवन नीरस हो जाये
और रसहीन तो कभी
मानव के हलक से कुछ
उतरा ही नहीं
नवरस से ओत- प्रोत 
उसका अस्तित्व कैसे 
रसहीन जीवन जी सकता है
शायद तभी नैराश्य में भी
एक आस का बादल 
लहलहाता है
और दुष्कर , दुश्वार जीवन में भी
आस के बीज बो जाता है
जीवन चक्रव्यूह से लड़ने के लिए
उसे भेदने के लिए
और लक्ष्य को हासिल करने के लिए
वो आस के रथ पर सवार हो
मछली की आँख पर 
निशाना साधता है 
और विजयरथ पर सवार हो
दिग्विजय पर निकल पड़ता है
आस का संबल ही तो 
असफलता में भी सफलता 
दिलाता है 
अंधकार से  प्रकाश की 
ओर ले जाता है
मानव के हौसलों को बढाता  है
यूँ ही हिमालय फतह नहीं होते
यूँ ही नहीं अन्तरिक्ष में डेरे बने होते
यूँ ही नहीं राधा को मोहन मिला करते...........


शुक्रवार, 2 मार्च 2012

ये है होली की सौगात


होली आयी और अपनी धमक , गमक और नमक सब साथ लायी तो फिर हम कैसे पीछे रह जाते और संजो लिए होली में अपनी पसंद के कुछ रंग आप सबको रंगने के लिए ..........


ये है दोस्तों आप सबकी चर्चा इस बार के गर्भनाल पत्रिका के होली अंक में 
www.garbhnal.com 

हिंदी साहित्य के फहराते परचम 

ब्लोगिंग की दुनिया में परचम फहराते ब्लोगर्स और उनके ब्लॉग आज स्वयं को सिद्ध कर रहे हैं और सार्थक लेखन के द्वारा हिंदी साहित्य में अपना अमूल्य योगदान भी दे रहे हैं जो हम सभी के लिए गर्व का विषय है . हर ब्लोगर चाहे जिस विधा में जो भी लिख रहा है वो अंकित हो रहा है जिसे कभी नहीं मिटाया जा सकता साथ ही काफी लोगों को इस दिशा में प्रेरित भी कर रहा है ताकि अपने आप को व्यक्त कर अपना योगदान दिया जा सके क्योंकि ना जाने इन हीरों में कौन सा हीरा कोहिनूर बन जाए जो हिंदी साहित्य के आकाश पर अपना परचम लहराए  तो चलिए आज की चर्चा की तरफ .........

राजेंद्र स्वर्णकार जी का ब्लॉग है . काव्य की हर विधा में लेखन कर रहे हैं जो अपने बारे में कहते हैं .......

मोम हूं , यूं ही पिघलते एक दिन गल जाऊंगा फ़िर भी शायद मैं कहीं जलता हुआ रह जाऊंगा... मूलतः काव्य-सृजक हूं।अब तक 3000 से अधिक छंदबद्ध गीत ग़ज़ल कवित्त सवैये कुंडलियां दोहे सोरठे हिंदी राजस्थानी उर्दू ब्रज भोजपुरी भाषा में लिखे जा चुके हैं मेरी लेखनी द्वारा । 300 से भी ज़्यादा मेरी स्वनिर्मित मौलिक धुनें भी हैं । आकाशवाणी से भी रचनाओंका नियमित प्रसारण । 100 से ज़्यादा पत्र - पत्रिकाओं में 1000 से अधिक रचनाएं प्रकाशित हैं । अब तक दो पुस्तकें प्रकाशित हैं- राजस्थानी में एक ग़ज़ल संग्रह रूई मायीं सूई वर्ष 2002 में आया था , हिंदी में आईनों में देखिए वर्ष 2004 में । चित्रकारी रंगकर्म संगीत गायन मीनाकारी के अलावा shortwave listening और DXing करते हुए अनेक देशों से निबंध लेखन सामान्यज्ञान संगीत और चित्र प्रतियोगिताओं में लगभग सौ बार पुरस्कृत हो चुका हूं । CRI द्वारा चीनी दूतावास में पुरस्कृत-सम्मानित … … और यह सिलसिला जारी है … !! 

अब इतने उच्च कोटि के रचनाकार के बारे में कुछ कहना मेरी लेखनी के वश की तो बात ही नहीं है सिवाय इसके कि हम उन्हें पढ़ते रहें और ज्ञानवर्धन करते रहें .



http://wwwbloggercom-vandana.blogspot.com/2011/10/blog-post_12.html#comment-form कागज मेरा मीत है, कलम मेरी सहेलीब्लॉग पर अमेरिका में रहने वाली वन्दना जी २००९ से ब्लॉगजगत में सक्रिय हैं . 

इनका  ब्लॉग हैं ..... कागज मेरा मीत है, कलम मेरी सहेली......जहाँ गजलों की महफ़िल सजी रहती है .ग़ज़लों के माध्यम से मन के भावों को इतनी खूबसूरती से उकेरती हैं कि पाठक उसमे खो सा जाता है . गज़लों पर उनकी पकड़ ही उनकी पहचान है .


http://kshama-bikharesitare.blogspot.com/ BIKHARE SITARE ब्लॉग की मल्लिका शमा जी तो जैसे अपने नाम को ही चरितार्थ करती हैं. शमा कैसे सुलगती है धीरे धीरे अपनी आखिरी सांस तक और सबका जहान रौशन करती रहती है बस इसी की बानगी मिलती हैं उनके ब्लॉग पर. एक से बढ़कर एक उम्दा कहानियों का ज़खीरा उनके ब्लॉग पर मिलेगा जो यूँ महसूस कराएगा कि  जैसे हकीकत में सब सामने घटित हो रहा हो और पाठक उससे इस तरह जुड़ जाता है कि  जब तक अंत ना जान ले उसे चैन नहीं पड़ता. अब चाहे संस्मरण लिखें या कहानियां अपने आप में उनकी पहचान बनकर ही उभरती हैं. 


कासे कहूँ? ब्लॉग की संचालिका कविता वर्मा जी जो अपने आस पास देखती हैं और उसे बदलना चाहती हैं मगर बदल नहीं पातीं उस बेचारगी को अपने शब्दों में ढ़ालकर प्रश्न करती हैं कि क्या वास्तव में हम आज़ाद हैं? अपने आलेखों, कहानियों और संस्मरण के माध्यम से विचारों का ज़खीरा बुन रही हैं और कोशिश कर रही हैं अपनी तरह जगाने की हर उस सोये हुए को जो जागा हुआ सो रहा है .


http://palkonkesapne.blogspot.com/2011/10/blog-post_12.html  पलकों के सपने ब्लॉग पर रामपती जी 2010 से लिख रही हैं और अपने बारे में कहती हैं ...........

अपने बारे में कहने को कुछ खास नहीं है. दिल्ली में जन्मी, पली बढ़ी, और भारत सरकार की सेवा कर रही हूँ... पढना अच्छा लगता था सो वही से लिखना भी अच्छा लगने लगा.. यदि मन के भावों को , जज्बातों को शब्द देना यदि कविता है, साहित्य है .. तो कविता लिख रही हूँ, साहित्य सृजन कर रही हूं.

और अब देखिये उनके शब्दों का जादू उनकी कविताओं में तो लगेगा वास्तव में यही तो है असली साहित्य सृजन........

पगडण्डी/जो तुम तक /नहीं पहुँचती/नहीं जाता मैं उस पर/हवाएं /जो नहीं लाती /तुम्हारी कुशल /नहीं सिहराती मुझे /संगीत /जिसमें तुम ना हो /मन के तारों को /नहीं करता झंकृत /नींद /तुम्हारे सपने ना हो /जिसमें आती नहीं /ना ही सुलाती मुझे /सुबह /नहीं होती खुशनुमा /तुमसे मिलने का यदि /ना हो कोई कारण/पूजा /भावों का नैवैध्य /तुम्हें चढ़ाये बिना /होती नहीं सम्पूर्ण .




http://kavikokas.blogspot.com/शरद कोकास ब्लॉग के संचालक शरद कोकस जी के तीन ब्लॉग हैं . ये स्वतंत्र लेखन करते हैं और २००९ से ब्लॉग लेखन में सक्रिय हैं . अपने बारे में बताते हैं ........

मुख्य रूप से कविता लिखता हूँ । कभी कभी कहानी,व्यंग्य,लेख और समीक्षाएँ भी । एक कविता संग्रह "गुनगुनी धूप में बैठकर " और "पहल" में प्रकाशित लम्बी कविता "पुरातत्ववेत्ता " के अलावा सभी महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं में कवितायें व लेख प्रकाशित ।झोपड़पट्टियों में जाकर उनके दुखदर्द बाँटता हूँ जिनके पास दुख ही दुख हैं । अपनी तरह से ज़िन्दगी जीने का शौक है इसलिये स्टेट बैंक की नौकरी छोड़कर अपनी फाकामस्ती के रंग लाने के इंतज़ार में हूँ ।

  • कौन सी विधा है जो अछूती हो इनसे . और इनके लेखन की उत्कृष्टता यदि देखनी हो तो इनकी कविताओं पर एक नज़र डालेंगे तो पाएंगे सच में आम आदमी का दर्द जैसे इनके दिल में कूट- कूट कर भरा है जो आक्रोश बनकर कविताओं में फूट पड़ा है जिसका उदाहरण चाहे आज की कविता हो या आज से २५ साल पहले की कविता हो सब में देखने को मिलता है ..........उसकी एक बानगी देखिये .....
  • इतिहास के पन्नों पर जमा रक्त/हमारे सगे सम्बन्धियों की रगों का/रक्त न होने के फलस्वरूप/हमारे संकुचित दिमागों में/हलचल मचाने में असमर्थ है/हमारे सामान्य ज्ञान में शामिल है/पाठ्यपुस्तकों में/विवशता वश पढ़े/चन्द महान व्यक्तियों के नाम/रंगबिरंगी पत्रिकाओं के/मख्खनी चेहरों पर अटकी नज़र/देख नहीं पाती/क्रांतिकारियों के अखबार गदर में प्रकाशित/रोज़गार का विज्ञापन/जहाँ मेहनताना थी मृत्यु/पुरस्कार शहादत/पेंशन में आज़ादी/

    और कार्यक्षेत्र हिन्दुस्तान/पहचानो उन सियारों को/जो तुम्हारी रगों में बहने वाले खून से/अपने आप को रंगकर/तुम्हे तुम्हारे ही घर में/गुलाम बनाने के साजिश रच रहे हैं/तुम्हारे ही भाइयों के हाथों में/बन्दूकें थमाकर/लाशों का व्यापार कर रहे हैं/शायद यही वक़्त है सोचने का/वरना आनेवाली पीढ़ीयाँ/इतिहास के पन्नों पर/देखेंगी/हमारे रक्त के निशान/लेकिन उन पर/गर्व नहीं कर सकेंगी 

मनोज जी का ब्लॉग आँच नाम से सक्रिय है जो अपने नाम को सार्थक करता है. जब तक कोई भी वस्तु कसौटी पर ना कसी जाये कैसे खरी उतर सकती है और यही कार्य ये ब्लॉग कर रहा है . कोई भी कविता हो या कहानी जब तक आँच की तपिश नहीं सहती वो कुंदन नहीं बनती और हर ब्लोगर चाहता है कि कम से कम एक बार तो उसकी कहानी हो या कविता उसकी निष्पक्ष समीक्षा की जाये और उसके गुण और अवगुणों से सबको परिचित कराया जाये और ये कार्य मनोज जी के ब्लॉग पर शामिल हरीश जी हों या पुरुषोत्तम जी या करण जी सभी बेहद मनोयोग और लगन से कर रहे हैं और रचनाकार को ना केवल उत्साहित करते हैं वरन उसकी खामियों को भी इस तरह बताते हैं कि रचनाकार मंत्रमुग्ध हो जाता है और मानने पर मजबूर ........शायद यही इस ब्लॉग की सबसे बड़ी पहचान है कि किसी को गलत सिद्ध नहीं करना और उसे सुधार भी देना .

http://sumanmeet.blogspot.com/बावरा मन ब्लॉग की संचालिका सुमन जी अपनी पहचान कुछ इस तरह देती हैं ..........

पूछी है मुझसे मेरी पहचान; भावों से घिरी हूँ इक इंसान; चलोगे कुछ कदम तुम मेरे साथ; वादा है मेरा न छोडूगी हाथ; जुड़ते कुछ शब्द बनते कविता व गीत; इस शब्दपथ पर मैं हूँ तुम्हारी “मीत”!! 

अब जब ऐसा मीत साथ हो तो और क्या चाहिए ..........बस चलते चलिए सुमन जी के साथ उनकी भाव गंगा में गोते लगाते हुए ..........अपनी कविताओं में सुमन जी ने प्रेम के अनेक रूपों को इस तरह सहेजा है कि पढने वाला मंत्रमुग्ध सा पढता चला जाता  है .........:

"तुम संग  चलूंगी " कविता में कवयित्री ने अपने प्रियतम का हर हाल में साथ निभाने का वादा किया जो समर्पण और प्रेम का जीता जागता सबूत है तो दूसरी ओर "ख्वाब हकीकत और मेरा ख्याल" कविता में ख्वाब और हकीकत की कशमकश को उकेरा है जो ख्यालों की दुनिया की सैर पर ले चलती हैं.


रजनीश का ब्लॉगhttp://rajneesh-tiwari.blogspot.com/2011/10/blog-post_12.html के संचालक रजनीश तिवारी जी 
पेशे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हैं जिन्हें गायन वादन और फोटोग्राफी का भी शौक है मगर अब ब्लोगिंग में ऐसे रम गए हैं कि  और कुछ करने का मन ही नहीं होता .........रजनीश जी की कवितायेँ स्वयं बोलती हैं हर कविता सोचने को विवश करती हैं थोड़े में ही बहुत कुछ कह जाते हैं
"बदलता हुआ वक्त " कविता में भावों का सुन्दर समन्वय किया है जो उनकी सोच को दर्शाता है .........
महीने दर महीने/ बदलते कैलेंडर के पन्ने /पर दिल के कैलेंडर में /तारीख़ नहीं बदलती  /