पेज

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लॉग से कोई भी पोस्ट कहीं न लगाई जाये और न ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

बुधवार, 6 जुलाई 2016

तुमने कहा

तुमने कहा
गर्दन झुकाओ और ढांप लो अपना वजूद
कि
अक्स दिखाई न दे किसी भी आईने में

मैंने हुक्मअदूली करना नहीं सीखा
वक्त रेगिस्तान की प्यास सा
बेझिझक मेरी रूह से गुजरता रहा
सदियाँ बीतीं और बीतती ही गयीं
और आदत में शुमार हो गया मेरी बिना कारण जिबह होना

नींद किसी शोर खुलती ही न थी
जाने कौन सी चरस चाटी थी ...

फिर तुमने कहा
जागो , उठो , बढ़ो , चलो
कि सृष्टि का उपयोगी अंग हो तुम

कि
तुम्हारे बिना अधूरा हूँ मैं
न केवल मैं
बल्कि सारी कायनात
कि
तुम्हारे होने से ही है मेरा अस्तित्व
मैं और तुम दो कहाँ
समता का नियम लागू होता है हम पर

और मैं जाग गयी
उठ गयी चिरनिद्रा से

फिर क्यों नहीं तुम्हें भाता मेरा जागरूक स्वरुप
फिर तुम पति हो , पिता , भाई या बेटे

सुलाया भी तुमने और जगाया भी तुमने
तो भला बताओ मेरा क्या दोष?

फिर भी
मैं निर्दोष जाने क्यों होती रही तुम्हारे दोषारोपण की शिकार
कशमकश में हूँ ...

डिसक्लेमर :
ये पोस्ट पूर्णतया कॉपीराइट प्रोटेक्टेड है, ये किसी भी अन्य लेख या बौद्धिक संम्पति की नकल नहीं है।
इस पोस्ट या इसका कोई भी भाग बिना लेखक की लिखित अनुमति के शेयर, नकल, चित्र रूप या इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रयोग करने का अधिकार किसी को नहीं है, अगर ऐसा किया जाता है निर्धारित क़ानूनों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
©वन्दना गुप्ता vandana gupta  

मंगलवार, 21 जून 2016

राजपथ पर योगाभ्यास

समुद्र सूख रहा है
और तलहटी में बिलबिला रही हैं
सुनहरी , हरी , नीली मछलियाँ

कोई उद्यम नहीं करना अब
जिंदा रहने को जरूरी है पानी

और पानी
आज सूख चुका है
हर नदी तालाब और कुओं से
फिर क्या फर्क पड़ता है
इन्सान और इंसानियत के पानी पर
कोसने के लतीफे गढ़े जाएँ
फफोलों का पानी काफी है जीने के लिए

ये चुकने का समय है
इंसान कहलाने वाले दानव का
पानी कोसों दूर, न था न है
बस शर्मसारी को थोक में बेचा गया बाज़ार में

अब खाली लोटे लुढ़क रहे हैं
टन टन की आवाज़ के साथ
और टंकारों से अब नहीं होतीं क्रांतियाँ

ये आँख का पानी मरने का समय है
ये चुल्लू भर पानी में डूबने का समय नहीं

तो क्या हुआ
जो सूख रहा है समुद्र
तुम्हारी संवेदनाओं का
आशाओं का
विश्वास का

पानी समस्या नहीं
इंसानियत जिंदा थी, है और रहेगी
बिना पानी भी
फिनिक्स सी ...
ये समय है
दरकिनार करने का
छोटी मोटी बातों को

कि
स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का विकास संभव है
काया का निरोगी होना जरूरी है
बिना पानी भी

आओ राजपथ पर करें योगाभ्यास

शुक्रवार, 10 जून 2016

नया ज्ञानोदय में प्रकाशित

ज्ञानपीठ से निकलने वाली पत्रिका 'नया ज्ञानोदय ' के जून अंक में इस बार मेरी पांच कवितायें प्रकाशित हुई हैं जिनकी सूचना मुझे मित्रों और अजनबी पाठकों के फोन द्वारा प्राप्त हुई . 

7 जून से अब तक जाने कितने फ़ोन आ चुके हैं लेकिन अभी पत्रिका मुझे प्राप्त नहीं हुई इसलिए ‪#‎मुकेशदुबे‬ जी से फोटो प्राप्त किये और आज यहाँ लगा रही हूँ . ख़ुशी का पैमाना पाठकों की प्रतिक्रियाओं से लबरेज हुआ जा रहा है . 

जब 7 जून को पहला फ़ोन मिला तो यूँ लगा जैसे किस्मत ने जन्मदिन की पूर्व संध्या पर अपनी तरफ से एक उपहार दे दिया हो:)





शुक्रवार, 3 जून 2016

दुर्योधन व अन्य कवितायेँ ... मेरी नज़र से



मीना अरोरा का कविता संग्रह 'दुर्योधन व अन्य कवितायेँ ' एपीएन पब्लिकेशन से प्रकाशित हुआ है . बेहद सरस , सहज और सरल भाषावली में कवितायेँ पाठक मन तक पहुँचती हैं . उनकी कविताओं में कहीं व्यंग्य की तेज धार है तो कहीं सामाजिक चिंता तो कहीं राजनितिक परिवेश पर तीखा प्रहार .
पहली ही लम्बी कविता 'दुर्योधन' कवयित्री की सोच के दायरे को बताती है कि कैसे एक संवेदनशील ह्रदय जब किसी विषय पर गौर करता है और पुरा और आधुनिक काल का तुलनात्मक अध्ययन करता है तो दोनों परिवेश के आकलन से जो निष्कर्ष निकलता है वो न केवल सटीक और सार्थक होता है बल्कि मान्य भी क्योंकि काल कोई रहा हो दुर्योधन हो या रावण न मरे हैं न मरेंगे क्योंकि दोनों ही अहम् के प्रतीक हैं . आज अपने अहम् के आगे किसी रिश्ते की कोई परवाह ही नहीं रही तो क्या फर्क है उस काल में और आज के वक्त में ..........देखा जाए तो कोई फर्क नहीं और शायद यही कवयित्री के कहने का मकसद रहा . स्त्री कल भी अपमानित , प्रताड़ित होती रही आज भी , कल भी सत्ता के लिए अपनों का खून बहाया जाता रहा और आज भी . वहीँ इस कविता के माध्यम से एक और शिक्षा देने की कोशिश की है कि जब अंत काल आता है तब बड़े से बड़ा पापी दुराचारी भी अपने पापों या अपनी कमियों का आकलन करने लगता है तब जाकर वो जीवन का वास्तविक अर्थ समझ पाता है लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है . वहीँ मानो दूसरी तरफ ईश्वर को भी कवयित्री कटघरे में खड़ा कर देती है और कह देती है , सब करने वाले तो तुम हो , जिसे जैसे चाहे नचाते हो और दोष मानव पर मढ देते हो . एक तीर से जाने कितने शिकार किये हैं इस कविता में कवयित्री ने .
'घटना या दुर्घटना' राजनितिक चेहरों और आम जनता के मध्य की खाई को इंगित करती एक सरल भाषा में प्रस्तुत कविता है जिससे अनजान तो कोई नहीं लेकिन कह नहीं पाते और इस कविता में कवयित्री ने उन भावों को शब्द दे दिए . यही है कवयित्री के लेखन की खूबसूरती कि वो ऐसे भावों को शब्द दे देती हैं जिन्हें कई बार इंसान शब्दबद्ध नहीं कर पाता.
मानवाधिकार , झूठी कहानी , उम्मीदों का बक्सा ,समस्या , मेरी खता आदि ऐसी कवितायेँ हैं जहाँ सामाजिक विसंगतियों पर बिना किसी शोर शराबे के कवयित्री ने प्रहार किया है जो सोचने को विवश करता है .वहीँ 'चीख' कविता में धरती की चीख के माध्यम से सारे संसार में व्याप्त अव्यवस्था, आतंकवाद , वर्चस्ववाद को बखूबी उकेरा है .
कवयित्री की कवितायें आम जन की चिंताओं की कवितायेँ हैं . यहाँ न भावों का अतिरेक है न ही विषद व्याख्याएं . एक सहज गेयात्मक शैली में संसार और मानव ह्रदय में व्याप्त समस्याओं को शब्दबद्ध किया गया है . स्त्री विषयक समस्याएं हों या आतंकवाद या बलात्कार या फिर प्रेम सब पर कवयित्री की कलम चली है . कवयित्री की कविताओं में कोई आक्रोश नहीं , कैसे सहजता से बात कही जा सकती है वो इस संग्रह को पढ़कर जाना जा सकता है . कवयित्री का लेखन इसी तरह आगे बढ़ता रहे और पाठकों को उनकी खुराक मिलती रहे , यही कामना है .

मंगलवार, 31 मई 2016

मेरी मोहब्बत की दीवानगी ...

तेरे पुकारने और मेरे आने के बीच
देख सदियाँ जाने कहाँ बह गयीं
कोई पुल बचा ही नहीं
जिस पर पाँव रख तुझ तक पहुँच पाती मेरी सदा

जानते हो
यहाँ हवाएं नहीं करतीं सरगोशी
जो भेज देती पैगाम उनके परों पर लिख

सुनो
शब्दातीत हो चुकी है हमारी मोहब्बत
फिर किस भाषा में व्यक्त करूँ

मगर
तुमने दी है सदा
पुकारा है मोहब्बत को
दो बोल सुनने की ख्वाहिश से
देख बिना माध्यम के भी पहुंची है मुझ तक पुकार
तो क्या तुझ तक नहीं पहुँचेगा मेरा पैगाम


तेरी ख्वाहिश के सदके
मैंने मोहब्बत को आवाज़ दे दी
क्या पहुंची तुम तक ?
देख फिजाओं में नर्तन करते संगीत की गुंजार
बस इसी में तो हूँ मैं
तू कहे जा
मैं सुन रही हूँ
क्यूंकि
मोहब्बत किसी प्यास की मोहताज नहीं होती ...

सुन रहे हो न  .. . बतिया रहे हो न .......ओ मेरे दरवेश

तेरी कोई इच्छा अधूरी रह जाए ........क्या संभव है ?

बस यही है मेरी मोहब्बत की दीवानगी ...

रविवार, 8 मई 2016

मदर्स डे ?

कहने को आज मदर्स डे है और कोशिश करेंगे सब खुद को माँ का खैरख्वाह सिद्ध करने की लेकिन क्या हम यकीन से कह सकते हैं कि कहीं ऐसा नहीं हो रहा होगा कि कहीं कोई माँ बेघर हो रही हो , बेटे उसे रखने को राजी न हो फिर चाहे सब कुछ उसी माँ का दिया हो जिसने उन्हें जन्म दिया , ज़िन्दगी भर जिनकी ख़ुशी के लिए सौ सौ खून के आंसू रोते रही लेकिन उफ़ नहीं की , सास , पति आदि सबके जुल्म सहती रही सिर्फ इसलिए कि एक दिन बड़े होकर ये बच्चे ही उसकी सबसे बड़ी पूँजी होंगे और वो ही बच्चे सिर्फ अपनी खुशियों के लिए एक माँ को आसरा न दे पायें , दो वक्त की रोटी न दे पायें , रहने को छत न दे पायें ............ क्या संभव नहीं कहीं आज ही के दिन ऐसा भी हो रहा हो ?

आज के समय में यदि शिक्षित और उच्च पद पर होते हुए भी यदि बेटों में इतनी भी संवेदना न बची हो क्या फायदा उस शिक्षा का . क्या फायदा उन मूल्यों का जो हमारे देश की , हमारी संस्कृति की धरोहर हैं ?

तभी ये कहने को दिल करता है :

ये कैसा चलन आया ज़माने का
सुनता है घुटती हुई चीखें
फिर भी सांस लेता है
दो शब्द अपनेपन के कहकर
कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है

काश ! उसने भी ऐसा किया होता
तेरी पहली ही चीख को
ना सुना होता
बल्कि अनसुना कर दबा दिया होता
फिर कैसे तेरा वजूद आज
सांस ले रहा होता
मगर इक उसने ही
वो दिल पाया है
जिसमे सिर्फ प्यार ही प्यार समाया है
जिसने ना कभी
अपनी ममता का
मोल लगाया है
सिर्फ तुझे हंसाने की खातिर
अपना लहू बहाया है
अपनी साँस देकर
तेरा जीवन महकाया है
जन्म मृत्यु के द्वार तक जाकर
तुझको जीवनदान दिया है
ये तू भूल सकता है
बेटा है ना ............
मगर वो माँ है ............

पारदर्शी शीशों के पीछे
सिसकती ममता
सिर्फ आशीर्वाद रुपी
अमृत ही बरसाती है
जिसे देखकर भी तू
अनदेखा किया करता है
जिसे जानकर भी तू
अन्जान बना करता है
सिर्फ उसके बारे में
दो शब्द बोलकर
अपने कर्तव्यों से मुँह मोड़ सकता है
ऐसा तो बेटा सिर्फ
तू ही कर सकता है

क्योंकि
अपनी उम्र को तो शायद तूने तिजोरी में बंद कर रखा है ...........

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

सुरेन्द्र कुमार सिंह की नज़र में 'बदलती सोच के नए अर्थ '




जिस तरह कहा जाता है इंसान का कहा शब्द कभी ख़त्म नहीं होता , ब्रह्माण्ड में घूमता रहता है शायद उसी तरह इंसान का लिखा भी . अभी १ अप्रैल को सुबह सुबह मेरे पास फ़ोन आता है , मैं सुरेन्द्र कुमार सिंह बोल रहा हूँ आज़मगढ़ से और मेरे हाथों में आपकी किताब है , सुन लगा कि वो मेरे उपन्यास की बात कर रहे हैं , तभी बोले आपका  कविता संग्रह 'बदलती सोच के नए अर्थ' मुझे समीक्षा हेतु प्रदान किया गया और जैसे ही पहली कविता पढ़ी लगा कुछ बात है , कुछ अलग तेवर है और मैं आपका पूरा संग्रह पढ़ गया और जल्दी ही समीक्षा लिखने वाला हूँ जो आपको भी भेजूंगा . ये एक पत्रिका में आएगी . सुनकर ख़ुशी से अभिभूत हो गयी क्योंकि एक अनजान शख्स जिसे मैं जानती भी नहीं यदि वो खुद से फ़ोन करे और फिर आज समीक्षा लिखकर भेज भी दे तो ये किसी भी लेखक या कवि के लिए सबसे ख़ुशी की बात है क्योंकि एक लेखक/कवि की प्रतिक्रिया ही खुराक होती है. 

आज से दो साल पहले मेरा ये पहला कविता संग्रह आया था जो पहले पहले प्यार की तरह था और उनकी बात सुन मैं सोच में पड़ गयी आखिर कौन सी यात्रा तय करते हुए संग्रह उस हाथ में पहुंचा होगा . मुझे नहीं पता किस पत्रिका में आएगी और कब और किसने उन तक पहुँचाया लेकिन सुखद अनुभूति हुई .

आज विश्वास हो गया कि लिखा हुआ कहीं न कहीं जरूर पहुँचता है और खासतौर से उन तक जहाँ आपके लेखन को सार्थकता मिले बेशक देर से ही सही ...

अब उनकी लिखी प्रतिक्रिया जैसी  भेजी  है  बिल्कुल  वैसी  ही  यहाँ  लगा रही हूँ साथ में स्क्रीनशॉट भी  क्योंकि मुझे मेल पर भेजी है उन्होंने और फेसबुक या ब्लॉग पर वो सक्रिय नहीं :

एक नजरिया
बन्दना गुप्ता के काब्य सन्ग्रह
बदलती सोच के नये अर्थ पर
सुरेन्द् कुमार सिंह चांसO
खुद ही में है
बदलती सोच के नए अर्थ
..............................
...
यकीं नही था ऐसा होगा
चैन सपना प्रेम भी सपना होगा
जी हाँ मनुष्यता के अभाव मेँ उत्तपन्न हुयी बेचैनियों से ब्याकुल मनुष्य का कवि शाँति और सन्तुलन के प्रयास में जो पाता है उसे कविता के रूप में हमे उपलब्ध कराता है।बन्दना गुप्ता की कविताएँ कुछ इसी प्रकार की प्राप्तियां हैं हमारे लिये।

बदलती सोच के नये अर्थ उनके काब्य सन्ग्रह के बीच से गुजरते हुए उनके वैचारिक संसार का स्वाद लिया जा सकता है।सकारात्मकता से आबद्ध मनुष्यता का एक आवेग है उनके अंदर।यूँ तो कविताओं को प्रेम,स्त्री विषयक,सामाजिक और दर्शन जैसे शीर्षक से वर्गीकृत किया गया है लेकिन कविताओ के अंदर जाइये तो सारे वर्गीकरण टूटकर एक भाव दृष्टि से निबद्ध हैं।मैं यह नही कह सकता कि कुछ नया है इनमे लेकिन मानव सभ्यता के क्षरण होते परिवेश में,भावनातमक संवेग की तेज आँधी में अपने को बचाये रख पाना और औरों को बचाये रखने की कामना रखना मानवीय जिजीविषा का एक दस्तावेज तो हैं उनकी कविताएँ।

काब्य सन्ग्रह के प्रवेश द्वार पर ही उनकी आवाज कि देखो मुझे मुहब्बत के हरकारे ने आवाज दी है,एक आकर्षण पैदा करती है उनके प्रति और यह आकर्षण पुरे काब्य सन्ग्रह में न सिर्फ अस्तित्व में है अपितु सक्रिय है।अनजान से प्रेममय एहसास की कितनी प्यारी सी मुश्किल है
न मैं कोई रूह/शायद मेरी चाहत की कोई अनगढ़ी सी तस्वीर हो तुम।शायद रूह की होती होगी कोई दुनिया लेकिन जिस्म से मिलकर रूह ने बनायी है ये दुनिया।यह है दुनिया जिसमे बन्दना गुप्ता तलाशती है अपने प्रजाति का अस्तित्व।मनुष्यता से सम्पुरित खोज है उनकी जिसके अभाव में संशय के जंगल में तब्दील हो गयी है ये दुनिया।

एक विश्वास है उनके अंदर।जब हम लोग अराजकता पर धर्म के चढ़ाये जा रहे रंग पर प्रतिक्रया दे रहे होते है जब हम लोग परमात्मा के नाम पर खुद भटकते हुए पूरे समाज को भटकाने की कोशिश कर रहे होते हैं जब हम लोग निष्प्रयोजयता के आकर्षण में अपना सब कुछ बन्धक रखकर जीवन यात्रा कर रहे होते है बन्दना गुप्ता अपने लिये जीवन का आवशयक सामान ढूंढ लेती हैं और कहती हैं तुम तो मेरी प्रकृति का लिखित हसताक्षर हो/सर्वदा साथ साथ रहने वाली।सुना है इंसान सब कुछ बदल सकता है लेकिन प्रकृति नही...स्वाभविक होती है। यहीं ठहरकर वो जीवन के कुरुक्षेत्र में प्रवेश करती हैं जहां लगता है वो कविता लिख रही हैं लेकिन वस्तुतः वो ब्यक्त हो रही हैं।हम इस सच को प्रणाम करते है कि एक मुकम्मल हो गयी जिंदगी से पूरा अमानवीय परिवेश सिहर उठता है।वो हमारी श्रापित मुहब्बत का मुक्त द्वार खोलती हैं।जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ब्याप्त जड़ता को बहुत सहजता से तोड़ देती हैं।भारतीय समाज के सबसे दुरूह और विवादित सन्दर्भ सेक्स के पार इतनी सहजता से चली जाती हैं कि लगता ही नही कि सेक्स कोई विवादित या अमर्यादित सन्दर्भ है।प्रेम का अंतिम लक्ष्य क्या है....सेक्स ।जब हमे सेक्स प्रेम का पर्याय लगता है वो सेक्स के आगे प्रेम तक जाती हैं।सेक्स सीढ़ी हो सकता है शारीरिक सम्मिलन का लेकिन प्रेम तो अपने को जान लेने में है।अपने को जान लेने की प्रक्रिया में सेक्स एक आकर्षक त्याज्य या आवशयक विषय मात्र है।जब कि प्रेम हमेशा एक ताजगी लिए होता है।

अगर बदलती हयी सोच के नये अर्थ में बन्दना गुप्ता को देखा जाये तो वो अपने को ब्यक्त करती हुयी हमसे सम्बाद करती हैं।हम यानि पाठक स्त्री भी पुरुष भी।स्त्री के सन्दर्भ में उनकी कविताये खासकर अघाई औरतें,इतना विरोध का स्वर,मुझे साक्षत्कार देने नही आता,मैं नही जानती अपने अंदर की उस लड़की को और मीरा बनना आसान नही है जिस समय में लिखी गयीं है उस समय की अपनी विशिष्टता है।कवि और लेखक बनने का जूनून हैं।बेस्ट सेलर बुक लाने की महत्वाकांक्षा है।बौद्धिक बहसों का पैदा किया गया ब्यवसायिक आकर्षण है।प्रतिरोध है।मानसिक गुलामी का आकर्षण है और लीक से अलग हटकर लिखने का क्रेज है।विषयगत गुटबाजियां है और यह सब का सब एक संस्थगत ढांचे की तरह है।बन्दना गुप्ता इस ढांचे का ही प्रतिरोध करती हैं और अपनी ओर वापस आने की।कोशिश करती हैं।


स्त्री विषयक अपने समय के लोकप्रिय सन्दर्भों से अलग स्त्री सशक्तिकरण की आयातित विचारधारा से बाहर निकलने की उनकी अपनी मौलिक कोशिश है।अपनी तरफ वापस आने में आ रहे परतिरोध पर अगर प्रतिक्रिया दिया जाय तो ऊर्जा का अनावशयक उपयोग है ये।यह एक बाधा जरूर है उनके सामने।

भारत में स्त्री शक्ति स्वरूप् है और बदलती हुयी सोच के नए अर्थ में उसको नए रूप में देखा जा सकता है।सचमुच दुनिया की सबसे सुंदर और शक्तिशाली स्त्री हमारे अंदर है हमे उसे अपनी जरूरत के रूप में देखने की दृष्टि विकसित करनी होगी।विश्वास करना होगा उसकी शक्ति में।हम जानते है पुरुष का प्रतिरोध एक लेखकीय फैशन है और ऐसा करने वाली लेखिकाएँ एक काल्पनिक ही सही अपनी जरूरत का पुरुष चरित्र गढ़ने में अक्षम हैं।इसकी एक मात्र वजह है कि उन्हें अपनी ही शक्ति में विश्वास नही है और वो खुद को जानने की प्रक्रिया से बाहर चली गयी हैं।एक आयातित विचारधारा की धुनि में धुनि मिलाकर वाहवाही लूटने में मशगूल हैं।

सामाजिक और दर्शन के अंतर्गत उनकी कविताएँ अपने परिवेश को देखने की उनकी अपनी दृष्टि हैं।इंसान और उसकी अभिब्यक्ति में जो आदमी तमाम झंझावातों के बीच अपनी मनुष्यता अथवा अपना गुणधर्म बचाये रखता है वो शब्दों के जंगल में अजनवी सा लगता है लेकिन वो है और इसलिए कि वो अपने में है।

सम्भोग से समाधि बहुत विवादित और चर्चित सन्दर्भ है यूँ तो सेक्स हमारी उतपत्ति का आधार है लेकिन सम्भोग सेक्स नही है ।ये हमारी उतपत्ति का पुर्व है पृथ्वीं पर मनुष्य के प्रथम आगमन का क्रिया बाजार है।
ध्यानी ज्ञानी अथवा बैज्ञानिक न तो इस क्रिया के द्रष्टा है न जानने के राही।कोई कल्पना कर सकता है क्या कि पृथ्वी पर पहला आदमी कैसे आ गया।

बहुत बहुत धन्यबाद बन्दना गुप्ता जी को उनकी किताब बदलती सोच के नए अर्थ के लिए और इस विश्वास के लिए कि जबमै खुद से मिल लुंगी तो सारे प्रश्नो के उत्तर मिल जायेंगे अभी तो उत्तरों के समुन्दर में प्रश्न उछल रहे हैं।