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बुधवार, 14 मई 2014

शायद किसी बुद्ध का फिर जन्म हो

मौन का स्वर ही नहीं शोर भी होता है ………क्या कभी पहुँचा तुम तक?
स्वर तो अब दस्तक ही नहीं देते …………
मौन के शोर ने अपना अखाडा लगाया हुआ है 
हर तरफ़ देखो 
मौन का झंझावात कैसे चल रहा है 
दसों दिशाओं की हवायें भी कुम्हला गयी हैं 
सूरज अपने ताप से आकुल है 
क्योंकि वो मौन के ताप को सहने को अभिशप्त है
और तुम हो अभी स्वर पर ही रुके हो 
यहाँ तो वजूद का भी पता नहीं 
सिर्फ़ और सिर्फ़ मौन के शोर में आकुल 
मेरी देह के बीज मेरे मन के बीजों को मथ रहे हैं …………शायद किसी बुद्ध का फिर जन्म हो 


6 टिप्‍पणियां:

Siddharth Reja ने कहा…

मौन ही सौंदर्य है बुद्ध का....... Great poem !
Mam plz my blog....,

रश्मि प्रभा... ने कहा…

http://bulletinofblog.blogspot.in/2014/05/blog-post_14.html

मीनाक्षी ने कहा…

सूरज अपने ताप से आकुल है ,,,,क्योंकि वो मौन के ताप को सहने को अभिशप्त है --- जैसे कि हम मौन के झंझावत से जूझते जीते जाते हैं...

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुंदर !

Unknown ने कहा…

गंभीर रचना

Anita ने कहा…

गहन चिन्तन..