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बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

"बदलती सोच के नए अर्थ " का सफ़र


दोस्तों 
मेरे आने वाले पहले संग्रह "बदलती सोच के नए अर्थ " का सफ़र भी बहुत अजीबोगरीब रहा । पहले तो मैंने सोचा ही नही था संग्रह निकलवाने का । काफ़ी वक्त से कुछ दोस्त कहते रहते थे और मैं चुप हो जाती थी तब मेरी एक खास छोटी बहन सरीखी मित्र ने बहुत जोर दिया और इस संग्रह को निकलवाने को प्रेरित किया और हिन्दी अकादमी में भेजने के लिये जोर दिया और मैं हिम्मत ही नही कर पा रही थी क्योंकि वहाँ की राह नही जानती थी फिर भी उनके जोर देने पर हिम्मत करके पाण्डुलिपि तैयार कर ली और इसी बीच मेरा एक्सीडेंट हो गया और मैं बिस्तर पर हो गयी और सारा काम वहीं रुक गया और मैने तो उम्मीद का दामन भी छोड दिया क्योंकि जो पाण्डुलिपि जमा कराने की आखिरी तिथि थी वो पास आती जा रही थी और मै कुछ काम कर नही सकती थी मगर जैसे तैसै मेरी बेटी , बेटे और पति ने मिलकर सारे काम समय से पूरे करके जमा करवा दी तो एक निश्चिंतता आ गयी मगर अब थी इंतज़ार की घडियाँ जो लम्बी और लम्बी होती जा रही थीं और जब पुस्तक मेला नज़दीक आने लगा और प्रकाशक भी इतनी जल्दी छापने से हिचकिचाने लगे तब पता चला कि पुस्तक को अकादमी से स्वीकृति मिल गयी है तो समस्या यहाँ खडी हुयी कि पुस्तक मेले तक तो अब संभव ही नही किताब का आना और बहुत से मेरे मित्र चाह रहे थे कि पुस्तक मेले तक बुक आ जाये और ऐसे में एक बार फिर मेरी वो ही मित्र कृष्ण सा सारथी बन फिर सामने आ गयी और सारा जिम्मा अपने ऊपर ले लिया कि मै आपको छपवा कर दे दूंगी आप चिन्ता मत करें जिसे उन्हें इस खूबी से निभाया कि परिलेख प्रकाशन के अमन कुमार जी को मेरी पाण्डुलिपि सौंप दी और कह दिया इतने दिन में चाहिये किताब , ना पैसे की बात ना प्रतियों की बस सीधा कह दिया और मुझे निश्चिंत कर दिया और उन्होने भी अपने वचन को निभाया । मेरी तो प्रकाशक से तब जाकर बात हुई जब प्रूफ़ रीडिंग के लिये आया …………और आज उन्हीं के अपरिमित सहयोग और मार्गदर्शन की वजह से ये संग्रह आपके सम्मुख आ रहा है जिनके लिये , आभार , धन्यवाद और शुक्रिया जैसे शब्द मुझे बहुत तुच्छ लग रहे हैं क्योंकि आज के इस युग में कौन किसी के लिये इतना करता है निस्वार्थ होकर ……………यहाँ तक कि अब भी सब वो ही देख रही हैं जिन्हें हम और आप#डाक्टरसुनीता#के नाम से जानते हैं जो नही चाहती थीं कि उनका नाम सामने आये लेकिन मुझसे रहा ही नहीं गया इसलिये आज सब बता दिया .............जिन्हें अब भी जब चाहे जहाँ चाहे मैं फोन बजा कर तंग कर देती हूँ और वो मुस्कुराकर मेरा काम पूरा कर देती हैं बताइये ऐसे शख्स के लिये शुक्रिया शब्द कितना छोटा होगा इसलिये बस इतना ही कहूँगी उनके लिये जो मेरे दिल में मान सम्मान है वो शब्दों में बयाँ नहीं हो सकता , जाने किस जन्म का नाता है उनसे क्योंकि इस जन्म मे तो मैने ऐसा कुछ किया नही , ना उनसे इतना मिलना जुलना हुआ बस शायद दिल से ही दिल मिल गया ………मेरी पुस्तक के इस सफ़र की एक ऐसी साथी रहीं जिसके सहयोग के बिना इस पुस्तक का आना संभव ही नही दिख रहा था ………… #डाक्टरसुनीता#



रविवार, 9 फ़रवरी 2014

एक बहुप्रतीक्षित खुशखबरी : उम्मीद से ज्यादा :)



दोस्तों 

"हिंदी  अकादमी दिल्ली " के सौजन्य से मेरा पहला काव्य संग्रह" बदलती सोच के नए अर्थ " परिलेख  प्रकाशन नज़ीबाबाद के माध्यम से आ रहा है।  

इतने वक्त से सभी यही पूछ रहे थे कि कब आएगा तुम्हारा संग्रह और मैं सिर्फ इतना ही कह पा रही थी कि जल्द ही आएगा क्योंकि उस पर काम चल रहा था मगर पूरा नहीं हुआ था।  आज जाकर प्रूफ रीडिंग का काम पूरा हुआ है और अब उम्मीद ने ये आश्वासन दिया है कि इस बार के पुस्तक मेले में आपको मेरा संग्रह " बदलती सोच के नए अर्थ " उपलब्ध हो जायेगा।

इतने कम समय में इस संग्रह को लाने की चुनौती को स्वीकाराने के लिए  परिलेख प्रकाशन और अमन त्यागी जी का  हृदय से आभार। 

आरती वर्मा का तहेदिल से शुक्रिया जो मेरे एक बार कहने भर से किताब का आवरण मेरी सोच के अनुरूप बना दिया। 

अब आप सबकी ढेर सारी शुभकामनाओं और आशीर्वाद  की आकांक्षी हूँ  :) :)

आँखें नम हैं और दिल बच्चा हो रहा है जी :) 

पिछले कुछ दिनों से व्यस्तता का एक कारण ये भी था :)

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

' डाली …मोगरे की ' नाम ही काफ़ी है


' डाली …मोगरे की ' नाम ही काफ़ी है महकाने को तन मन रूह तक और उस पर यदि हाथ में ले ली जाये तो खुश्बू में सराबोर हुये बिना रह जाये कोई संभव ही नहीं । प्रसिद्ध गज़लकार नीरज गोस्वामी , भूषण स्टील में वाइस प्रेजीडेंट के पद पर कार्यरत , एक भावुक ह्रदय के मालिक के प्रथम गज़ल संग्रह का ही ये नाम है………' डाली …मोगरे की ' । मानो बिखर गयी हों मोगरे की कलियाँ आस पास ही इस तरह गज़लों को संजोया है , हर शेर मारक वार करता हुआ , हर शेर इंसान को इंसान से जोडता हुआ , हर शेर जैसे अपना कहा हुआ सा लगता हुआ एक संजीदगी को समेटे गागर में सागर भर देता है । कभी कभी जो बात बडी से बडी कविता नहीं कह पाती उसे चंद शेरों या गज़लों के जरिये कह देने का हुनर सबमें कहाँ होता है और गज़लकार नीरज को तो जैसे इस विधा में महारत हासिल है । मैं कोई गज़लों के बहर , वज़न , रदीफ़ या काफ़िये को नहीं जानती मगर फिर भी कुछ शेर ऐसे थे जिन्होने सब कहानी कह दी । यूँ तो पूरा गज़ल संग्रह ही संजोकर रखने वाला है क्योंकि हर गज़ल , हर शेर दिल की गहराइयों से निकला हर दिल तक पहुँचता है जो बताता है किसी कसौटी के मोहताज नहीं हम । 

जो खुद को खुद पढवा ले सब काम छुडवा कर उस संग्रह में कुछ तो ऐसा होगा ही जो खास होगा हर आम से बस ऐसा ही कुछ इस संग्रह के साथ हुआ कि इतनी व्यस्त होने के बावज़ूद भी मैने सबसे पहले ये संग्रह पढा और अब खुद के विचार व्यक्त करने से खुद को रोक नहीं सकी ।


गज़ल विधा कभी प्रेम व्यक्त करने की खालिस विधा मानी जाती थी ये तो बाद के वर्षों में उसमे समाजिक स्थितियों ने भी जगह ले ली उसी प्रेम के विभिन्न आयाम देखने को मिले ।  विरह की वेदना का चित्रण करने मे तो महारत हासिल है उसके साथ यादों की पीर का दस्तक देना और फिर उस दस्तक को शब्दों से सहलाना कोई कवि से सीखे । हर शेर एक मुकम्मल कहानी कहने में सक्षम है। हर शेर में इक दीवानगी है तभी तो घुटन , तड़पन , उदासी , अश्क , रुस्वाई , अकेलापन बिना इश्क की कहानी अधूरी है वैसे तो इश्क शब्द भी अधूरा है तो कहानी कैसे पूरी हो सकती है तभी तो 

रात भर आरी चलाई याद ने 
रात भर खामोश हम चिरते  रहे 

उठे सैलाब यादों का , अगर मन में कभी तेरे 
दबाना मत कि उसका ,आँख से झरना जरूरी है 

मुस्कुराते हैं हम तो पी के इन्हें 
आप कहते हैं अश्क खारे हैं 

तमन्ना थी गुज़र जाता , गली में यार की जीवन 
हमें मालूम ही कब था यहाँ मरना ज़रूरी है 

याद हर पल तुझको करने , का सिला पाने लगा 
मुझको आइना तेरा चेहरा , ही दिखलाने लगा 

घुटन , तड़पन , उदासी , अश्क , रुस्वाई , अकेलापन 
बगैर इनके अधूरी इश्क की हर इक कहानी है 

आज की ज़िन्दगी की एक कडवी सच्चाई को कितनी सहजता से प्रस्तुत कर दिया कि पाठक मन में हलचल मचा गया 

तुझ में बस तू बचा है मुझमे मैं 
अब के रिश्तों में हम नहीं होता 

इक गुज़ारिश है याद जब आओ 
आँख से मत मेरी झरा कीजे 

लाख कोशिश करो आ के जाती नहीं 
याद इक बिन बुलाई सी मेहमान है 

जहाँ जाता हूँ मैं तुझको वहीँ मौजूद पाता हूँ 
अगर लिखना तुझे हो ख़त तेरा मैं क्या पता लिक्खूँ 

लाख चाहो मगर नहीं छुपता 
इश्क में बस यही बुराई है 

दर्द को महसूस शिद्दत से करो 
दर्द में लज्ज़त  नज़र आ जायेगी 

दर्द को भी जो लज़्ज़त से महसूस करे उस दीवाने को क्या कहिये 

याद हर पल तुझको करने , का सिला पाने लगा 
मुझको आइना तेरा चेहरा , ही दिखलाने लगा 

काफूर हो गए जो मिलने पे थे इरादे 
देखा किये हम उन को बस पास में बिठा कर 

मानो वासना की सही परिभाषा ही प्रस्तुत कर दी हो और समय से आँख मिला दी हो 

जिस्म से चलकर रुके, जो जिस्म पर 
उस सफ़र का नाम ही, अब प्यार है 

ज़िन्दगी की सच्चाइयों से यदि मुखातिब होना हो और कहने का ढंग भी आता हो तो क्या कहने और इस काम में कवि निपुण है । गहरी मार करता शेर ज़िन्दगी की हकीकतों से परिचित कराते हैं कि कितनी खुदगर्ज़ी समाई है , सब बस कहने भर के साथी हैं या फिर तमाशाई

देखने में मकाँ  जो पक्का है 
दर हकीकत बड़ा ही कच्चा है 

जान ले लो कहा जिसने भी , उसको जब 
आज़माया , लगा काटने कन्नियाँ 

कौन सुनता है 'नीरज ' सरल सी ग़ज़ल 
कुछ धमाके करो तो बजें सीटियाँ 

आज के दौर की हकीकत को कितनी साफ़गोई से परोसा है कि पढने वाला चमत्कृत हुए बिना नहीं रहता , हम सिर्फ़ शोर मचाने वाले भांड भर हैं वरना हिम्मत की दहलीजें तो कब की नेस्तनाबूद हो चुकी हैं और विश्वास की डोरों के दूसरे छोरों पर इक आग सुलगती मिल रही है 

इस दौर में उसी को सब सरफिरा कहेंगे 
जो आँधियों में दीपक थामे हुए खड़ा है 

हालात देश के तुम कहते खराब 'नीरज '
तुमने सुधरने को बोलो तो क्या किया है ?

वही करते हैं दवा आग नफरत की बुझाने का 
कि जिनके हाथ में जलती हुई माचिस की तीली है 

आह ! अब भी कुछ कहने को बचा क्या :)

खिलखिलाता है जो आज के दौर में 
इक अजूबे से क्या कम वो इंसान है 

मीर , तुलसी , ज़फर , जोश , मीरा , कबीर 
दिल ही ग़ालिब है और दिल ही रसखान है 

आँधियाँ जब दे रही हों दस्तकें 
तब दिए की लौ बचाना सीखिए 
आज के दौर की एक सच्चाई ये भी है जिसने कहावतों के अर्थ ही बदल कर रख दिये और अपने ही नये अर्थ बना दिये क्योंकि वक्त जब तारीखें बदल देता है तो दिल पर उग आयी लोकोक्तियों को भी बदलना जरूरी है 

डालिये दरिया में यूँ मत नेकियाँ 
अब भला करके जताना सीखिए 

इस जहाँ में यही झमेला है 
झूठ ने सच सदा धकेला है 

देश की चिन्ता कवि मन को उसी तरह व्याकुल करती है जैसे एक देशभक्त को या आम इंसान को तभी तो प्रश्न भी उठाते हैं उसके अल्फ़ाज़ आखिर कौन जिम्मेदार है चैन-ओ-अमन को मिटाने को , इंसाँ से इंसाँ को लडाने को , क्यों सहमी ही पीढियाँ जन्म ले रही हैं 

रौंद के गुल प्यार के इस मुल्क में 
खार नफरत के उगाता कौन है 

खौफ का खंजर जिगर में जैसे हो उतरा हुआ 
आज का इंसान है कुछ इस तरह सहमा हुआ 

खुश्बू फूलों की ही तय करती है उनकी कीमतें 
क्या कभी तुमने सुना है , खार का सौदा हुआ 

दूर होठों से तराने हो गए 
हम भी आखिर को सयाने हो गए 

लूट कर जीने का आया दौर है 
दान के किस्से , पुराने हो गए 

आज के दौर में इंसानी मन में उपजी असंवेदनशीलता का प्रत्यक्ष उदाहरण बन उभरे हैं ये शेर जो ना केवल व्याकुल करते हैं बल्कि कहीं दिशा भी देते हैं तो कहीं रिश्तों की अहमियत भी समझाते हैं ।

साथ बच्चों के गुज़ारे पल थे जो 
बेशकीमत वो ख़ज़ाने हो गए 

तुम जिसे थे कोख ही में मारने की सोचते 
कल बनेंगी वो सहारा देख लेना बच्चियाँ 

खोल कर रखिये किवाड़ों को सदा 
फिर ख़ुशी न लौट जाने पायेगी 

 कभी ज़माना था जब रिश्तों के लिये ही जीया जाता था और आज के दौर में जैसे सभी अजनबी हो गये हैं ऐसे में माँ की अहमियत को बडी संज़ीदगी से उकेरा है 

भले हो शान से बिकता बड़े होटल या ढाबों में 
मगर जो माँ पकती है , वही  पकवान होता है 

वक्त और हालात हमेशा एक से नहीं रह्ते और बदलते हालात के साथ जो खुद की खुद्दारी को ज़िन्दा रखे उसका जीना ही वास्तव में जीना होता है तभी तो कवि कहता है 

जहाँ दो वक्त की रोटी , बड़ी मुश्किल से मिलती है 
वहाँ ईमान का बचना , समझ वरदान होता है 

गहरे दिए हैं जब से , यारों ने ज़ख्म मुझको 
दुश्मन की याद तब से , मुझ को सता रही है 

बचपन की यादों संग डोलता कवि मन संयुक्त परिवार की महत्ता को तो दर्शाता ही है साथ ही बच्चे पर अपनी महत्त्वाकांक्षाओं का बोझ डालना कैसे उनके बचपन को लील रहा है उसे भी व्यक्त करता है ।

घोंसलों में परिंदे , जो महफूज़ थे 
छोड़ कर घोंसले , हाथ मलने लगे 

जब तलक है पास कीमत का पता चलता नहीं 
आप उनसे पूछिए जो दूर हैं परिवार से 

दौड़ता तितली के पीछे , अब कोई बच्चा नहीं 
लुत्फ़ बचपन का वो सारा , होड़ में है खो दिया 

माँ बाप को न पूछा कभी जीते जी मगर 
दीवार पे उन्ही का है फोटो सजा लिया 

सारी  खुशियों को लील जाती है 
होड़ सबसे अधिक कमाने की 

ज़िन्दगी की राह में हो जाएँगी आसानियाँ 
मुस्कुराएँ याद कर बचपन की वो शैतानियाँ 

बच्चों को अपना बचपन तो जीने दो 
यूँ बस्तों का बोझ बढ़ाना ठीक नहीं 

राजनीति के हथकंडों से भी कवि मन अछूता ना रह सका और आखिर अपने दिल की बात बहुत ही तहज़ीब से व्यक्त कर दी 

हाथ में फूल दिल में गाली है  
ये सियासत बड़ी निराली है 

भूलता है ईमानदारी को 
पेट जिसका जनाब खाली है 
बातों से जो मसले हल हो सकते हैं 
उनके कारण बम बरसाना ठीक नहीं 

बोलकर सच यही सुना सबसे 
यार तेरी ज़बान काली है 

पहले तो सबका इक ही था 
अब सबका अपना अपना रब 

बेगानेपन का सटीक उदाहरण बन गया है ये शेर :

हालत तो देखो इंसां की 
खुद से ही डरता  है वो अब 

जो भी आता हाथ नहीं 
लगता है अनमोल मियाँ 

कवि ने कुछ बहुत ही सटीक कबीर सी वाणी प्रस्तुत की है जो ज़िन्दगी जीने में सरलता पेश करेगी ऐसा विश्वास है 

भला करता है जो सबका , नहीं बदले में कुछ पाये 
कहाँ पेड़ों को मिलते हैं , कभी ठन्डे घने साये 

तल्खियां दिल में न घोला कीजिये 
गाँठ लग जाए तो खोला कीजिये 

दिल जिसे सुन कर दुखे हर एक का 
सच कभी ऐसा न बोला कीजिये 

यूँ  जहाँ से निकाल सच फेंका 
जैसे सालन में कोई बाल रहा 

पता है रिहाई की दुश्वारियां पर 
ये कैदे कफस भी तो भाती  नहीं है 

तुम चाहतों की डोरी इतनी भी मत बढ़ाना 
घिर जाय आँधियों में दिल की पतंग जा कर 

आज असंवेदनशीलता की कगार पर पहुँचे रिश्तों का इससे बेहतर चित्रण और क्या होगा भला ………स्वीकार लो जो है जैसा है कम से कम अजनबीयत से दूर ही सही इक रिश्ता तो है 

तलाशो मत तपिश रिश्तों में यारों 
शुकर करिये अगर वो गुनगुने हैं 

जी हजूरी जब तलक है तब तलक वो आपका 
फेर लेता है नज़र जब भी हों ना - फर्मानियाँ 

नाम तो लेता नहीं मेरा मगर लगता है ये 
रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से 

भूख से बिलबिलाते लोगों को 
कायदे मत सिखाइये साहब 


शिद्दत से है तलाश मुझे ऐसे शख्स की 
इस दौर में है जिसने भी ईमाँ बचा लिया 

गैर का साथ गैर के किस्से 
ये तो हद हो गई सताने की 

साथ फूलों के वो रहा जिसने 
ठान  ली खार से निभाने की 


दौड़ हम हारते नहीं लेकिन 
थम गए थे तुझे उठाने को 

कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में 
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए 

 आईना दिखाती गज़लें इंसानी फ़ितरत पर भी तीखा वार करती हैं और सोच के किवाडों पर भी दस्तक देती हैं 

सांप को बदनाम यूं ही कर रहा है आदमी 
काटने से आदमी के मर रहा है आदमी 

हैवानियत हमको कभी मज़हब ने सिखलाई नहीं 
हमको लड़ाता कौन है ? ये सोचा है लाज़िमी 

देश के हालात बदतर हैं, सभी ने ये कहा 
पर नहीं बतला सका , कोई भी अपनी भूमिका 

छोड़िये फितरत समझना , दुसरे इंसान की 
खुद हमें अपनी समझ आती कहाँ है , सच बता 


देखिये जिसको , वाही मगरूर है 
मौत को , शायद समझता दूर है 

धुल झोंकी है उसी ने , आँख में 
हम जिसे कहते थे , इनका नूर है 


तय किया चलना जुदा जब भीड़ से 
हर नज़र देखा , सवाली हो गई 



संपूर्ण गज़ल संग्रह मानो ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा है जिसे जिसने गुना उसी ने जाना क्या वक्त ने उसमें लिखा है । जब पहली बार इस गज़ल संग्रह को खोलकर हाथ में लिया तभी मदहोश कर दिया । 

हर पन्ने पर मोगरा बिखरा हुआ और उस मोगरे पर गज़ल का लिखा जाना एक अलग अन्दाज़ को प्रस्तुत करता है और फिर ' मोगरे' इस शब्द से तो मेरा बहुत ही पुराना नाता रहा है जिसे आप सब से शेयर किये बिना जाने क्यों रह नही पा रही मेरे पिताजी के मामा थे उन्हें घर में सबके अलग अलग नाम रखने का शौक था और कभी किसी को उसके ओरिजिनल नाम से नही बुलाते थे और मज़े की चीज़ हमारा संयुक्त परिवार इतना बडा था कि कम से कम 50 लोग तो घर के ही होंगे और वो सबके अलग ही नाम रखते किसी के प्रिंस या प्रिंसेस या लार्ड या प्रैज़ीडेंट आदि लगाकर एक नया शब्द जोड देते थे और मैं तो उस वक्त बहुत ही छोटी थी जब मुझे उन्होने 'मोगरा' नाम दिया जिसका अर्थ मैं नहीं जानती थी मगर मुझे ये शब्द भी अच्छा नहीं लगता था और कभी इसका अर्थ किसी से पूछा भी नहीं । वो जब भी कहते "ये तो मरा मोगरा है मोगरा " तो मुझे लगता जैसे कितना गन्दा सा नाम दिया है मामा ने मुझे । रिश्ते के अनुसार तो बाबा कहना चाहिये था मगर वो हम सबके जगत मामा थे तो क्या बच्चे क्या बडे सभी उन्हें मामा कहते थे । यहाँ तक कि वो जब नहीं रहे तब तक भी मुझे मोगरे का अर्थ पता नहीं चला और उसके बाद तो जैसे मैं ये शब्द भी भूल सी गयी मगर जिस दिन से नीरज जी के ब्लोग पर उनके ब्लोग का ये नाम पढा और फिर किताब का तब जाना मोगरे का असली अर्थ जिसने मुझे मोगरे की भीनी सी खुश्बू से सराबोर कर दिया कि कितना सुन्दर नाम दिया था मामा ने मुझे सोच कर आज भी आँखें नम हो जाती हैं और ऐसे में जब नीरज जी की ये किताब हाथ में आयी और उन्होने इतने प्रेम और स्नेह से भिजवायी तो एक बार फिर ना केवल अपने बचपन से जुड गयी बल्कि मोगरे की महक से सराबोर हो गयी । सिर्फ़ इसलिये कह देना कि मोगरे शब्द से मेरा बचपन का नाता है इसलिये अच्छा कह रही हूँ ऐसा नहीं है बल्कि ये संग्रह वास्तव में दिल को छूने वाला , दिल में उतरने वाला और भविष्य में गज़ल की दुनिया में अपनी एक पहचान बनाने वाला साबित होगा ऐसी मुझे उम्मीद ही नहीं पूरा विश्वास है। नीरज जी को संग्रह के लिये बधाइयाँ और शुभकामनायें देते हुये उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हूँ । 

यदि आप इस संग्रह को प्राप्त करना चाहते हैं तो नीरज गोस्वामी या शिवना प्रकाशन के पंकज सुबीर से निम्न पते पर संपर्क कर सकते हैं : 

शिवना प्रकाशन 
पी सी लैब , सम्राट काम्प्लैक्स बेसमैंट 
बस स्टैंड , सीहोर - 46601  ( म प्र )
फोन : 07562405545, 07562695918
E-MAIL : shivna.prakashan@gmail.com


शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

यूँ भी हर किसी के ख्वाबगाह युगों तक सुलगते नहीं रहते


एक ख्वाबगाह से हकीकत तक का सफ़र
फिर किसी ख्वाबगाह के 
मोड पर आकर रुक गया 
ज्यों लम्हा गिरा किसी तबस्सुम पर 
और लफ़्ज़ कोई लरज़ गया 
ये आने जाने के सफ़र मे 
युग देखो बदल गया
क्या आज भी तुम्हारे सिरहाने पर 
धूप दस्तक देती है
क्या आज भी ओस की पहली बूँद 
तुम्हारे रुखसार पर गिरती है
क्या आज भी दिनकर 
तुम्हारे दीदार के बाद ही सफ़र शुरु करता है
देखो ना …………
मै तो कैद हूँ तुम्हारी ख्वाबगाह मे
बताना तो तुम्हे ही पडेगा ………
बदलते मौसम के मिज़ाज़ को
अरे रे रे ..........ये क्या 
तुम तो अभी तक मोड़ मुड़े ही नहीं 
तो क्या युग परिवर्तन के साथ
तुम्हारे असीम निस्सीम प्रेम की 
धारा ने भी प्रवाह बदला है 
या प्रेम का बुलबुला उसी मोड़ पर 
लम्हे के हाथों कैद हुआ खड़ा है 
देखा कैद करने का हश्र ..........
ना सिर्फ कैदी बल्कि करने वाला भी 
स्वयं कैद हो जाता है निगेहबानी करते करते 
बताओ अब ............
क्या कभी जी पाए एक भी लम्हा मेरे बिन 
जब तुम्हारी ख्वाबगाह का आतिथ्य 
मैंने स्वीकार कर ही लिया था
तो फिर क्या जरूरत थी तुम्हें रुकने की
मोड़ से ना मुड़ने की
क्या जरूरत थी लम्हों को कैद करने की
यहाँ तो देखो वक्त ने सीढियां चढ़ी ही नहीं
और तुमने भी वक्त के केशों को उलझा दिया
ना खुद की कोई सुबह हुई
ना मेरी कोई शाम हुई
ये ख्वाबगाह  के सफ़र से 
ख्वाबगाह के मोड़ तक ही
उम्र तमाम हुई .............
भूले बिसरे लम्हे आज भी
आसमाँ के आँचल में बिखरे पड़े हैं
हिम्मत हो तो कभी
कोई तारा तोड़ कर देखना ..............
शायद किसी रूह को पनाह मिल जाए 
और उसकी मोहब्बत 
लम्हों की कैद से आज़ाद हो जाये ...............


यूँ भी हर किसी के ख्वाबगाह युगों तक सुलगते नहीं रहते 

शनिवार, 25 जनवरी 2014

साँकल

मैं रोज लगाती हूँ 
एक साँकल अपने 
ख्वाबों की दुनिया पर 
फिर भी जाने कैसे 
किवाड़ खुले मिलते हैं 
बेशक चरमराने की आवाज़ से 
रोज होती हूँ वाकिफ 
और कर देती हूँ बंद 
हर दरवाज़े को 
आखिर दर्द की तहरीरें 
कब तक बदलेंगी करवटें 
बार बार की मौत से 
एक बार की मौत भली 
मगर जाने कौन सी पुरवाई 
किस झिर्री से अंदर दस्तक देती है 
और खुल जाती है सांकल ख्वाबों की दुनिया की धीमे से 
और शुरू हो जाता है एक बार फिर 
आवागमन हवाओं का 
अगले ज़ख्म के लगने तक 
दर्द के अहसासों के बढ़ने तक 

मानव मन जाने किस मिटटी का बना है 
मिटटी में मिलने पर भी ख्वाब बुनना नहीं छोड़ता 
कितने जतन कर लो 
कितनी सांकलें चढ़ा लो 
ख़्वाबों की बया घोंसला बुनना जारी रखती है …… निरंतर कर्मरत रहना कोई इससे सीखे 

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

दो घूँट ज़िन्दगी के

चाहे खुद को मिटा देंगे 
मगर दिल ना किसी का दुखायेंगे 
जब ये वादा खुद से कर लेते हैं 
दो घूँट ज़िन्दगी के पी लेते हैं 

उसके चेहरे की हँसी के लिये 
अपने स्वाभिमान को छोड जब 
दोस्त के लिये झुक लेते हैं 
दो घूँट ज़िन्दगी के पी लेते हैं 

फिर चाहे घुट घुट कर जी लेंगे
अपने उसूलों से भी लड लेंगे
जुबाँ पर ना लाने का जब इरादा कर लेते हैं 
दो घूँट ज़िन्दगी के पी लेते हैं 

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

पीठ पर सदियों को लादे ……अपनी माटी पर

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका अपनी माटी के जनवरी अंक में प्रकाशित मेरी  कवितायें 




पीठ पर सदियों को लादे 
आखिर कितना चल सकते हो 
झुकना लाज़िमी है एक दिन 
तो बोझ थोड़ा कम क्यों नहीं कर लेते 
या हमेशा के लिए उतार क्यों नहीं देते 
और रख लो एक सलीब 
आने वाले कल की 
पीठ की दु:खती रगों को 
कुछ तो सुकून मिलेगा 

आगे ऊपर दिये गये लिंक पर पढिये ।

बुधवार, 15 जनवरी 2014

एक नयी शुरुआत के लिए




ये नया साल नयी खुशियाँ लेकर आया बिटिया का आज जन्मदिन है और उसको उसकी किस्मत ने कहूँ या ईश्वर ने जन्मदिन का तोहफ़ा एक हफ़्ते पहले ही दे दिया जब उसकी जाब बैंक आफ़ इंडिया में लगने की सूचना मिली जिसके लिये मेरी बेटी ने बेहद धैर्य रखा जिसका ये सुखद परिणाम निकला , उसके धैर्य की पूरी परीक्षा उसने दी और उसमें सफ़ल भी हुयी ………आज सबके साथ ये खुशी साझा कर रही हूँ 


एक नये साल के साथ एक नयी शुरुआत के लिए :

ज़िन्दगी दस्तक दे रही है 
बिटिया तुझसे कुछ कह रही है 

नयी बुलंदियां आवाज़ दे रही हैं 
नयी कसौटियाँ भी साथ खड़ी हैं 
ये उत्साह उमंग संग चुनौतीपूर्ण घडी है 
जिस पर तुझे चलना है 
और हिम्मत का एक दीया 
हर मोड़ पर रखना है 
सफलताओं का स्वागत करना है 
पर उन्हें सर पर न चढ़ने देना है 
असफलताओं से सीखना है 
और आगे बढ़ते चलना है 
यही जीवन को दिशा देगा 
तुझे हर संकट से लड़ने का हौसला देगा 
बस अब ना कहीं रुकना है 
मेहनत ,लगन और सच्चाई की राह पर 
आगे ही बढ़ते रहना है 
बस आगे ही बढ़ते रहना है 
खुद को न कभी कमज़ोर समझना 
बस हौसले की बाती जलाये रखना 
राहें खुद रौशन हो जाएँगी 
तेरी पहचान बन जाएँगी 
जब जब तू मुस्कायेगी 
ज़िन्दगी से आँख मिलाएगी 
हजार राहें खुल जाएँगी 
तेरे संयम और हौसले के आगे तो 
किस्मत की रेखाएं भी बदल जाएंगी 
बस इतना याद रखना 

ज़िन्दगी दस्तक दे रही है 
बिटिया तुझसे कुछ कह रही है 

जन्मदिन की असीम शुभकामनायें 
सारे जहान की खुशियाँ तेरी झोली में समाएँ 
एक माँ का बस यही है प्यार , दुलार और आशीर्वाद

रविवार, 12 जनवरी 2014

कौन है औरत?

एक प्रश्न : कौन है औरत महज घर परिवार के लिए बलिदान देकर उफ़ न करने वाली और सारे जहाँ के दोष जिसके सिर मढ़ दिए जाएँ फिर भी वो चुप रहे क्या यही है औरत या यदि वो सच को सच कह दे तो हो जाती है बदचलन औरत और हो जाते हैं उसकी उम्र भर की तपस्या के सारे महल धराशायी ? एक सोच से आज भी लड़ रही है औरत मगर उत्तर आज भी काल के गर्भ में दफ़न हैं क्योंकि आज कितना भी समाज प्रगतिशील हो गया है फिर भी यही विडंबना है हमारे समाज की सोच की वो  आज भी पुरातन है , आज भी औरत को महज वस्तु ही समझती है इंसान नहीं , एक ऐसा इंसान जिसे सबके बराबर मान सम्मान और स्वाभिमान की जरूरत होती है ………… काहे के रिश्ते मन बहलाव के खिलौने भर हैं , समाज में रहने के साधन भर क्योंकि असलियत में तो सबसे कमज़ोर कडी होते हैं एक ठेस और सारे रेत के महल धराशायी , एक ठोकर में अर्श से फ़र्श पर आखिरी साँस लेते दिखते हैं क्या ये रिश्ते होते हैं ? क्या इन्हें ही रिश्ते कहा जाता है जहाँ सिर्फ़ स्वार्थ ही स्वार्थ भरा होता है , सिर्फ़ अपनी मैं को ही स्थान दिया जाता है दूसरे के स्वाभिमान को भी कुचल कर …… क्योंकि स्त्री है वो मानो स्त्री होकर गुनाह किया हो , जिन्हें जन्म दिया , तालीम दी , साथ जीये हर सुख दुख में उनके लिये भी महज एक औरत जिसकी अपनी कोई पहचान नहीं तो इसे क्या कहेंगे , एक धोखा , एक ढकोसला भर ना ……… कहना आसान है कैसी औरत है ये मगर औरत बनना बहुत मुश्किल खुद को नकारती है तब बनती है एक सम्पूर्ण औरत , खुद को मारती है तब बनती है एक सम्पूर्ण औरत , खुद से लडती है तब बनती है एक सम्पूर्ण औरत और यदि वो ही औरत गर गलती से उफ़ कर दे और अपना सच कह दे  तो कहलाने लगती है बदचलन , बेगैरत , बेहया औरत और हो जाती है उसकी सम्पूर्ण तपस्या धूमिल , उम्र भर का स्नेह , वात्सल्य ,प्रेम हो जाता है चकनाचूर ……… जानते हो क्यों क्योंकि कहीं ना कहीं भावनात्मक स्तर से ऊपर नहीं उठ पाती है औरत , वक्त के मुताबिक नहीं ढल पाती है औरत , सबसे बडी बात प्रैक्टिकल नही बन पाती है औरत और उन संस्कारों को नही बीज पाती है आने वाली पीढी मे औरत ……… त्याग, तपस्या और वात्सल्य के आवरण से निकलने पर ही औरत लिख सकेगी एक नया औरतनामा और तभी सुधरेगी उसकी स्थिति और समाज की मानसिकता नहीं तो आज भी आधुनिकता के नकाब के पीछे वो ही पुरातन मानसिकता अपना दखल कायम रखेगी और औरत प्रश्नचिन्ह ही रहेगी जब तक ना दोयम दर्जे से खुद को मुक्त करेगी क्योंकि रिश्ते निभाना महज उसी की थाती नहीं ये उसे समझना होगा और रिश्ते की डोर को दोनो तरफ़ से पकडने पर ही दोनो छोर सुरक्षित रहते हैं । बदलाव के लिए एक क्रांति खुद से करनी पड़ेगी तभी उसकी स्थिति बदलेगी वरना तो हलके में ली जाती रही है और ली जाती रहेगी और घुट घुट कर औरत यूं ही जीती रहेगी। 
"कौन है औरत "इस प्रश्न का उत्तर अब उसे खुद खोजना होगा महज सामाजिक रिश्तों की बेड़ियों में जकड़ी एक कठपुतली भर या भावनाओं और स्वाभिमान से लबरेज एक आत्मबल। 

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

काश ! दिल की आवाज़ होती तो

वो कहते हैं 
दिल की आवाज़ लगती है 
जो कलम स्याही उगलती है 
और नक्स छोड़ जाती है 
पिछले पाँव के आँगन में 

काश ! दिल की आवाज़ होती तो 
किसी सरगम की 
किसी गीत की 
किसी संगीत की न जरूरत होती 

और बस हम गुदवा लेते निशान 
कुछ वक्त के दरीचों पर 
जो दिल की गर कोई आवाज़ होती 
तो वक्त के दरिया में न बह रही होती 

और हम किनारे खड़े अकेली कश्ती को यूँ न ताक रहे होते 

काश ! दिल की आवाज़ होती तो 
समंदर में ज्वार ना यूँ उठे होते ........

गुरुवार, 2 जनवरी 2014

क्योंकि मोहब्बत के तर्पण नहीं हुआ करते

ए मोहब्बत 
तुझसे हर जन्म मिलना है 
बिछडना है 
मगर चक्र यूँ ही चलना है 

ए मोहब्बत 
हर बार खोज करना है 
अधूरा रहना है 
मगर मिलकर भी ना मिलना है 

ए मोहब्बत 
हर बार इकरार से इंकार तक सिमटना है 
बहकना है 
मगर इंतज़ार के सिलसिलों को यूँ ही चलना है 

जानती है क्यों 
क्योंकि 
नियति की दुल्हनों के चेहरों से घूँघट नहीं उठा करते 
क्योंकि 
प्रेम की प्यास के अंतिम छोर नहीं हुआ करते 
क्योंकि 
मोहब्बत के तर्पण नहीं हुआ करते 
इसलिये अधूरा रहना ही नियति है तुम्हारी ………

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

स्वागत तो आपको करना ही पडेगा

स्वागत तो आपको करना ही पडेगा 
विगत के भय , संशयों और आशंकाओं को त्याग कर 
क्योंकि विगत की कहीं ना कहीं की गयी 
उपेक्षा ही कारण होती है 
आगत के दर्शन का 
आगत के शोक का 
आगत के भय का 
और इस बार त्यागना है उन आशंकाओं की मशालों को 
जिनसे भयभीत हम करते हैं बीजारोपण 
आने वाले कल में उन बीजों का 
जिनकी कोई शक्ल नहीं होती 
मगर हम खींच देते हैं तस्वीर 
और फिर करते हैं स्यापा ये जाने बिना 
निर्माता हैं हम खुद ही उस तस्वीर के 
जनक हैं उस शिशु के जिसका जन्म 
हमारी ही नपुंसकता से हुआ है 
और ये सिलसिला यूँ ही चलता रहा था और चलता रहेगा 
जब तक नहीं होंगे हम मुक्त 
अपनी ही आशंकाओं के बादलों से 
और नहीं करेंगे स्वागत आगत का 
हर्षमिश्रित मुस्कानों और मीठी ज़ुबानों से 
आओ करें आहवान एक खुशगवार कल का ............


नववर्ष 2014 सभी के लिये मंगलमय हो ,सुखकारी हो , आल्हादकारी हो …………

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

जाने कैसा मेरा मुझसे लिजलिजा नाता है

जाने कैसा मेरा मुझसे लिजलिजा नाता है 
बस लकीर का फ़क़ीर बनना ही मुझे आता है 
बदलाव की बयार भी मुझको चाहिए 
जादू की मानो कोई छड़ी होनी चाहिए 
जो घुमाते ही अलादीन के चिराग सी 
सारे मसले हल करनी चाहिए 
मगर सब्र की कोई ईमारत ना मैं गढ़ना चाहता हूँ 
बस मुँह से निकली बात ही पूरी करना चाहता हूँ 
खुद को आम बताता जाता हूँ 
मगर खास की श्रेणी में आना चाहता हूँ 
आम -ओ- खास की जद्दोजहद से 
ना बाहर आना चाहता हूँ 
जो है जैसा है की आदत से न उबरना चाहता हूँ 
यही मेरी कमजोरी है 
जिसका फायदा भ्रष्ट तंत्र उठाता जाता है 
और मैं आम आदमी यूं ही 
सब्जबागों में पिसा जाता हूँ 
साठ साल से खुद को छलवाने की जो आदत पड़ी 
उससे ना उबर पाता हूँ 
मगर किसी दूजे को छह साल भी 
ना दे पाता हूँ 
जो मेरे लिए लड़ने को तैयार है 
जो मेरे लिए सब करने को तैयार है 
उसे ही साथ की जमीन ना दे पाता हूँ 
फिर क्यों मैं बार बार चिल्लाता हूँ 
फिर क्यों मैं बार बार घबराता हूँ 
फिर क्यों मैं बार बार दोषारोपण करता हूँ 
जब आम होते हुए भी आम का साथ ना देता हूँ 
नयी परिपाटी को ना जन्मने देता हूँ 
ये कैसा आम आदमी का आम आदमी से नाता है 
जो आम को आम बने रहने के काम ना आता है 

इसीलिए सोचता हूँ 
जाने कैसा मेरा मुझसे लिजलिजा नाता है 
बस लकीर का फ़क़ीर बनना ही मुझे आता है

रविवार, 22 दिसंबर 2013

जानते हो मेरे इंतज़ार की इंतेहा

इश्क और इंतज़ार 
इंतज़ार और इश्क 
कौन जाने किसकी इंतेहा हुयी 
बस मेरी मोहब्बत कमली हो गयी 
और मेरे इंतज़ार के पाँव की फटी बिवाइयों में 
अब सिर्फ तेरा नाम ही दिखा करता है 
खुदा का करम इससे ज्यादा और क्या होगा 
देखूँ जब भी अपना चेहरा तेरा दिखा करता है 


जानते हो मेरे इंतज़ार की इंतेहा 
सारा शहर पत्थर हो गया 
हर नदी नाला सूख गया 
हर शाख जो हरी भरी थी 
पाला पड़ी फसल सी 
ज़मींदोज़ हो गयी 
दिल की जमीन ऐसी बंजर हुयी 
बादल कितना ही बरसें 
हरी होती ही नहीं 
शिराओं में जो बहती थी लहू बनकर 
मोहब्बत वहीँ थक्कों सी जम  गयी 
देख तो इंतेहा मोहब्बत की 
अश्क जो बहते थे आँखों से 
वहाँ अब तेरे नाम की इबादतगाह बन गयी 
चप्पे चप्पे पर तेरा नाम लिखा है 
आँख से झरना नहीं तेरा नाम झरा है 
क्या तू भी कभी ताप से नहीं शीत से जला है ……मेरी तरह महबूब मेरे!!! 

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

तुम हो तो ………मेरी नज़र में

पाथेय प्रकाशन जबलपुर से प्रकाशित कवयित्री प्रतिमा अखिलेश का प्रथम काव्य संग्र "तुम हो तो " छंदमुक्त और छंदबद्ध कविताओं का एक खूबसूरत संकलन है जिसमे प्रेम की प्रधानता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अपने प्रियतम को ही " तुम हो तो " नाम देकर संकलन को समर्पित कर दिया गया है।  संग्रह की विशेषता है कि इसमें जीवन के प्रत्येक पहलू को संकलित करने की कोशिश की गयी है फिर चाहे प्रकृति हो , ईश्वर हो , दलित विमर्श हो या स्त्री विमर्श , सामजिक चेतना हो या राजनितिक विडंबनाएँ सभी विषयों को समाहित करता संकलन वैविध्य की दृष्टि से खुद को विशिष्ठ बनाता है।  

प्रेम को परिपूर्णता देना कोई कवयित्री से सीखे जिसने अपने जीवनसाथी में ही सारा प्रेम का ब्रह्माण्ड खोज लिया तभी तो वो कहती हैं 

"जीवनसाथी /तुम हो तो/ ईंगुर/ कुमकुम/ कजरे की धार/ श्रृंगार/ महावर/ पायल / बाजूबन्द हैं /तुम हो तो / प्रकृति/ सृष्टि/ ईश्वर/किस्मत / सौभाग्य / समय / सब मेरे संग हैं /तुम्हीं से मेरे जीवन का /धर्म कर्म / अनुबंध है "

इसी तरह जीवन यात्रा को साहित्यिक रूप बहुत ही खूबसूरती से दे दिया जहाँ चंद शब्दों में पूरे जीवन की यात्रा को चित्रित कर दिया :

"जीवन / एक साहित्यिक यात्रा रहा / काव्यानुभूति से शुरू हुआ बचपन/ यौवन की / पद्यात्मक अनुभूति पार करता / प्रौढ़ हो चला है / गद्यात्मक एवं व्यंग्यात्मक शैली में / और अब कहानी बन / प्रतीक्षारत है / उपसंहार की और "

तो दूसरी तरफ एक गरीब लाचार माँ की पीड़ा से पीड़ित मन ईश्वर के अस्तित्व को भी झंझोड़ देता है और एक प्रश्न उसकी तरफ भी उछाल देता है जिसमे एक माँ की वेदना अपने चरम पर होती है :

" हे बाल गोपाल / क्षमाप्रार्थी हूँ कि / मैं उखाड़ फेंका तुम्हारे चित्र को / दीवार से / खूँटी से क्योंकि मेरी ममता तार तार हो रही थी / मैं नहीं सह पा रही थी / मेरे बच्चों का / चूल्हे के पास बैठकर / रूखी सूखी खाना / और लालायित आँखों से / तुम्हारी मटकी से बहता / दूध दही / मुख पर लिप्त / मक्खन देखना / मेरा ह्रदय दो भागों में बाँट जाता है / जब नन्हा कहता है / बड़े मनुहार से / माँ तू कब मक्खन देगी/ सूखी रोटी गले में अटकती है " 

वेदना की पराकाष्ठा को छूती पंक्तियाँ यूँ प्रतीत होती हैं मानो निकट से गुजरीं हों उस तकलीफ से 


" कोई तो रोक ले " कविता में बाल मजदूरी के प्रति कवयित्री का मन समाज के असंवेदनशील होते मन से एक प्रश्न कर रहा है अगर ऐसा होता रहा तो कल देश का भविष्य कैसा होगा ?

"ईश्वर" कविता में समाज में फैली दरिंदगी के लिए कवयित्री ईश्वर को भी कटघरे में खड़ा कर देती है कि अगर तुम हो तो निसहाय बच्चियों के साथ अमानवीय अत्याचार बलात्कार के रूप में क्यों हो रहा है तुम्हें सिद्ध करना होगा अपने अस्तित्व को नहीं तो नकारती है कवयित्री की संवेदना ईश्वर के अस्तित्व को जो दर्शाता है व्यथा जब हद से पार हो जाती है तो किस चरम पर पहुँच जाती है। 

जो हमारे लिए बेकार है , जो टूट चुका  है , जो फट चुका  है , जो रद्दी है और फेंक दिया जाता है कूड़े के ढेर में वो भी किसी के जीवन को खुशियां दे सकता है , वो भी किसी का खिलौना बन सकता है , वो भी किसी के लिए काम का बायस बन सकता है इस भाव को दर्शाया है "खिलौने " कविता में कवयित्री ने कैसे कूड़े के ढेर से बीने गए टूटे फूटे खिलौने , पन्नियां, नेल पोलिश की शीशियां , साईकिल की  चेन ,काले नीली आड़े तिरछे पत्थर बन जाते हैं उनके खिलौने जिसमे पा लेते हैं वो सारे जहाँ की खुशियां मानो कारूँ का खज़ाना मिल गया हो और इस बीच उनकी माएं निपटा लेती हैं घर के सारे काम ……… एक दूरदृष्टि को दर्शाती कवयित्री की सोच कितना गहरे उतर जाती है इसको दर्शाती रचना  पाठक को भावुक कर जाती है। 

"माँ/ मैं कैसे बन पाऊंगी / वीरांगना / तू तो लड़ने ही नही देती / नुराइयों से / बेड़ियों से / अत्याचारियों से / अन्यायियों से / आवाज़ नहीं उठाने देती / पापियों / नरसंहारों / दुष्टों के विरुद्ध / बस चुप कराके दुबका देती है बिछौने में "

"वीरांगना "कविता में एक बच्ची का अपने जन्म से लेकर शुरू हुए संघर्ष को एक दिशा देती बेटी की पुकार है जहाँ वो पुरुष प्रधान समाज की कमजोरियों को इंगित करती है और माँ के माध्यम से एक सन्देश देती है कि अब नारी को खुद उठना होगा और उसकी हुंकार से ना केवल दिशाएं विचलित होंगी बल्कि सोच में भी बदलाव करना होगा। 

" अछूत " कविता किसी जाति , धर्म या व्यक्ति पर नहीं बल्कि इंसानी मानसिकता पर एक प्रहार है कि छोटी सोच के कारण ही ये समाज बीमार है क्योंकि कर्मों की उच्चता ही श्रेष्ठता को सिद्ध करती है ना कि जाति या धर्म की दीवार। 

"अंतर " एक करारा प्रहार मानव की मानसिकता पर।  कैसी छोटी सोच के साथ हम जीते हैं जहाँ हमें नहीं दिखता उम्र का अंतर और वो होती है हमारी असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा जब एक ही उम्र के दो बच्चों में हम भेदभाव करते हैं क्योंकि एक अपना बेटा है और दूसरा कामवाली बाई का बेटा …… छोटी छोटी घटनाओं या रोजमर्रा की ज़िन्दगी में घटित होती आम ज़िन्दगी में गुजरती विसंगतियों -की ओर कवयित्री ईशारा करती है और सोचने को विवश कि आखिर कैसे हम फर्क कर जाते हैं अपने और पराये में और यही तो दूरदृष्टि है। 

सफलता , ज़िन्दगी और वक्त को "हम चाहते थे " कविता के माध्यम से बखूबी दर्शाया है।  और सफलता , ज़िन्दगी और वक्त तीनो चीजें ऐसी हैं जिन्हे हर इंसान चाहता है और ज़िन्दगी के एक बार पाना उसका मकसद होता है मगर सबको मिलती कहाँ हैं गागर में सागर भरती रचना दिल को तो छूती ही है साथ में हर दिल की आवाज़ सी भी लगती है 

"लिखना चाहते थे / एक कविता उसके रूप सौंदर्य पर / परन्तु उसने नहीं उठाया पर्दा / अपने चेहरे से / नहीं  कभी सामने /' वह सफलता थी ' "


"सुनो मेरी करूँ पुकार " एक छंदबद्ध कविता अजन्मी बच्ची की पुकार है तो "बचपन सतरंगी संसारों का " बचपन की मिठास को दर्शाता है कैसे उन्मुक्त जीवन होता है सभी व्यवधानों , पीड़ाओं से दूर।  
"चाह तेरी पूरी हो " , नन्ही काली आई रे , मेरी बेटियां बेटी को समर्पित कवितायेँ सभी छंदबद्ध होने के साथ साथ मन को छूती हैं। 

 कवयित्री की पूरी पकड़ है छंदबद्ध और छंदमुक्त कविताओं में जिसमे उसने अपने भावों का सुनहरा संसार बसाया है , जहाँ वो जो भी विसंगति देखती है तो कलमबद्ध करने मो मचल उठती है।  सरल सहज भाषा प्रवाहमयी होने के कारण आत्मसात होती हैं और खुद से भी कभी कभी प्रश्न करती हैं आखिर मुझे क्यों नहीं दिखा वो अंधकार जो समाज में व्याप्त है।  सामाजिक सरोकारों पर कलम बखूबी चलती है तो प्रेम , समर्पण और विश्वास से भरपूर कवितायेँ अपनी जीवंतता को भी दर्शाती हैं।  यथार्थ के चित्रों को उकेरती कलम कभी व्यंग्य के माध्यम से तो कभी प्रभावी और सशक्त शब्दों के माध्यम से अपनी बात रखती है जो पाठक को संतुष्ट करती है।  छोटी छोटी रचनाएँ सटीक शब्दों में अपनी बात कहने में सक्षम हैं जो एक बड़ी बात है , शब्दों का दुरूपयोग ना करके सदुपयोग करते हुए अपनी बात कह देना ही लेखन की कसौटी है जिसमे कवयित्री पूर्णतया सक्षम है।  कवयित्री को पहले संग्रह के लिए हार्दिक शुभकामनाओं के साथ उसके उज्जवल भविष्य की कामना करती हूँ।  

यदि आप ये किताब पढ़ना चाहते हैं तो निम्न पतों पर संपर्क कर सकते हैं :

प्रतिमा अखिलेश 
संपर्क सूत्र सिवनी 
द्वारा , दादू निवेन्द्र नाथ सिंह 
वल्लब भाई पटेल वार्ड 
दादू मोहल्ला 
सिवनी ( मध्य प्रदेश ) 
फ़ोन : 07692-220105

संपर्क सूत्र जबलपुर 
द्वारा , श्री एम् के श्रीवास्तव 
एन - २ १ , कचनार क्लब के पास 
कचनार सिटी , विजयनगर 
जबलपुर ( मध्य प्रदेश )
मो : 94251-75861

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

पानी का भी कोई आकार होता है क्या ?

कुछ तस्व्वुर सिर्फ़ ख्यालों की धरोहर ही होते हैं

आकार पाते ही नहीं......
............
लफ़्ज़ भी बेमानी हो जाते हैं वहाँ 

और तुम परे हो इन सबसे 

ना लफ़्ज़ , ना आकार , ना रूप , ना रंग

मगर फिर भी हो तुम यहीं कहीं 

मेरे हर पल मे, हर सांस मे, हर धडकन मे 

बताओ तो ज़रा बिना तस्व्वुर की मोहब्बत का हश्र 

पानी का भी कोई आकार होता है क्या ?

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

कौन कहता है हँसते हुए चेहरे ग़मज़दा नहीं होते

ज़िन्दगी सिर्फ सीधी सरल पगडण्डी नहीं होती 
वृक्ष की कौन सी ऐसी शाख है जो टेढ़ी नहीं होती 

हर बचपन के हाथ में सिर्फ खिलौने नहीं होते 
कौन कहता है हँसते हुए चेहरे ग़मज़दा नहीं होते 

सिर्फ बड़े होने पर ही कोई बड़ा नहीं होता 
हर शख्स यहाँ हँसता हुआ पैदा नहीं होता 

हर खुरदुरे चेहरे में छुपी सिर्फ इक तलाश नहीं होती 
वक्त की तपिश में कौन सी शय है जो खाक नहीं होती 

हर उड़ती सोन चिरैया में सिर्फ परवाज़ नहीं होती 
कौन सा ऐसा चूल्हा है जिसमे आग नहीं होती 

सोमवार, 9 दिसंबर 2013

फ़सल लहलहाने को तैयार है



अरुण शर्मा  अनंत ने बड़े प्यार और मान सम्मान से जब सन्निधि में एक गुलमोहर का फूल मेरे हाथ में दिया तो उसकी खुश्बू में सराबोर हुए  बिना कैसे रहा जा सकता था और मैं भी भीग गयी उस की खुश्बू में और जब बाहर निकली तो ये प्रतिक्रिया उभरी :

"गुलमोहर" नाम ही काफी है ना महकाने को मन का कोना कोना और फिर जब पुष्प गुच्छ सिर्फ गुलमोहर का ही बना हो तो खुश्बू का चहूँ ओर फैलना लाज़िमी है।  ३० कवि और सभी के अहसासों को एक सूत्र में पिरो  कर इस तरह पेश करना कि लगे वो मुक्त भी है और साथ भी।  गहरी संवेदनाओं का पानी जब हिलोर भरता है तभी वहाँ कहीं न कहीं कोई गुलमोहर खिलता है , महकता है , सुवासित करता है।  सभी कवियों का अपना आकाश है , अपने पंख हैं , अपनी उड़ान है।  सभी स्पंदित हैं भावों की झंकार से तभी तो कहीं प्रेम तो कहीं पीड़ा दृष्टिगोचर हो रही है।  कहीं आस की भोर है तो कहीं विषाद की सांझ , कहीं उम्र की सिमटती लकीर है तो कहीं एक मुट्ठी में सारा आसमान। जिनकी महक, पीड़ा और संवेदना आपको इन पंक्तियों में देखने को मिलेंगी : 

"ये हव्वा की बतियाना हैं 
बुनती रहती हैं एक श्रृंखला अनंत 
"वंश" तो एक "पुल्लिंग" शब्द है 
मैं नहीं मानती !मैं नहीं मानती !मैं नहीं मानती "

चंद पंक्तियाँ और पीढियों की वेदना का स्वर प्रस्फ़ुटित कर देना ही तो कवि के काव्य की विद्वता है ।

"क्या मन का मेटाबोलिज्म इतना कमज़ोर है ?"

ज़िन्दगी में सारी पीडा सिर्फ़ मन की तो होती है और उसे बहुत ही संजीदगी से पेश किया गया है इस कविता में 

"कानून और पुलिस पर आस्था ! / कैसा मज़ाक करते हैं ? / दरिंदगी का यह नंगा नाच / डर / क्या यही नियति रह जायेगी ? "

इस सत्य को कैसे नकार सकते हैं जिससे रोज दो चार होते हैं ।


"दिए नारी को दर्द इतने / हिसाब नहीं / या खुदाया तेरा जवाब नहीं "

कितना दर्द से लबरेज़ हुयी होगी तभी तो ये आह दिल से निकली होगी जो खुदा को भी कटघरे में खडा करना पडा होगा ।

"अभिभावक कर्जे की किश्तों  में पीस रहा / पर उनके लख्ते जिगर बेखबर हैं / यौवन के नशे में डूबे हुए को / क्या मैं " ईदगाह " पढ़वाऊँ मुंशी जी "

ओह! सत्य के जैसे किसी ने कपडे उतार दिये हों और भरे बाज़ार वस्त्रहीन कर दिया हो , समाजिक स्थिति , विडंबनाओं का सम्पूर्ण चित्रण है ये कविता 

"बुजुर्ग ऐसा सोना , जो अपनी अहमियत / वक्त पड़ने पर बताता है / पर कितना निर्मम है ना ? "

हम जानते भी हैं पर जाने क्यों मानना नहीं चाहते जाने कैसी और किस भागदौड में उलझे हैं उसी पर कुठाराघात करती है ये कविता 
"श्वेत आत्मा सा श्वेत दुपट्टा / और / उस पर पक्का रंग "

सोच के उच्च स्तर को प्रमाणित करती पंक्तियाँ साथ ही ज़िन्दगी को परिभाषित कर देना ही काव्य की पहली शर्त होती है जिसमें कवि सफ़ल हुये हैं 

"लगे न नज़र ज़माने की तुमको / घूंघट को थोडा सा सरकाए रखना "

"प्यार का दर्द है मीठा मीठा प्यारा प्यारा" जैसा अहसास समाया है जहाँ मोहब्बत तो झलक ही रही है साथ ही एक परंपरा को भी स्थान मिला है 

"शायद प्यार।/ अँधा नहीं , मौन होता है "

प्यार की इससे बेहतर और क्या परिभाषा होगी एक नया अर्थ दे दिया कवि ने प्रेम को यही तो प्रेम की ऊँचाइयाँ हैं जो सत्य है जब आप प्रेम की पराकाष्ठा पर पहुँचते हो तो मौन हो जाते हो और प्रेम रस मे छके होने पर सिर्फ़ मौन के सागर में हिलोरे लेते हो मगर वाणी शब्दहीन हो जाती है ……आहा! ये है आल्हादिक प्रेम जिसके लिये कवि प्रशंसा के पात्र हैं ।

"एक लड़की के लिए प्रेम पत्र / किसी देवता से कम नहीं होता "

कहीं से भी नहीं लगता कि कवितायें परिपक्व नहीं , हर कवि की अपनी सोच और अपने विचार जब ह्रदय के चूल्हे पर पके तो देखिये कितनी खूबसूरती से उभरे कि पाठक को अपने साथ बहा ले गये । 

"कब्रिस्तान में / सबसे अलग तरह की कब्र / हिजड़ों की होती है "

ये है दूरदृष्टि , एक परिपक्व सोच की सशक्त पहचान , जिसे हम देखकर भी अनदेखा करते हैं ,जहाँ अंत है वहीं से शुरुआत की है कविता ने और ये है कवि के भावों का रेला जो बहा ले जाता है अपने साथ और सोचने को मजबूर कर दे तो समझिये लेखन सफ़ल हुआ जिसमें कवि सफ़ल हुये हैं ।

"भाई की बिटिया के मुताबिक़ / चौराहा अब बड़ा हो गया है / कहती है , मैं भी बड़ी हो गयी हूँ "

चौराहे से बेटी के बडे होने का बिम्ब अपने आप में बेजोड है जो गहरी सोच को इंगित करता है।

"एक और नारी / एक और अपना / एक और रेप / वहशी यह समाज / कौन बचाये "

 रिश्तों की दहलीज पर कडा प्रहार करती कविता एक कटु सत्य को उजागर करती है और प्रश्नचिन्ह भी खडा करती है कि क्या अब पुनर्मूल्यांकन का समय आ गया है ?



"और मेरा दर्द, मेरे भीतर / हाथ पाँव मरने को बाध्य है "

दर्द की इंतेहा का इससे सटीक चित्रण और क्या होगा भला जहाँ शब्द सब चुकता हो जायें और सोच वहीं उसी चौखट पर बैठ जाये कि अब किधर जाऊँ अन्दर या बाहर ।

और अब अरुण की रचनाओं पर एक नज़र :

छंदबद्ध रचनायें लिखना अरुण के लेखन का सौंदर्य है जो उसकी सभी रचनाओं में छलकता है फिर चाहे शायरी हो , दोहे , गीत या ग़ज़ल।  चंद शब्दों में मारक शब्दों का समावेश उसकी विशेषता है।  गहन भाव गहन अर्थ समेटे रचनायें मन को छू जाती हैं  जिसकी बानगी देखते ही बनती है कुछ इस तरह :

माँ तेरी महिमा अगम , कैसे करूँ बखान 
सम्भव परिभाषा नहीं , सम्भव नहीं विधान 

कोमलता भीतर नहीं , नहीं जिगर में पीर 
बहुत दुश्शासन हैं यहाँ , इक नहीं अर्जुन वीर 

ठग बैठा पोषक में , बना महात्मा संत 
अपनी झोली भर रहा , कर दूजे का अंत 

कभी सच्ची मोहब्बत को, दीवाने दिल नहीं पाते 
यहाँ पत्थर बहुत रोया , वहाँ आंसू नहीं आते 

तालियों की गड़गड़ाहट , संग बजीं सीटियां 
देश का नेता हमारा , यूं शहर बदल गया 


दोस्तों मेरी भी एक सीमा है इसलिये सबकी सब रचनायें तो उद्धृत कर नहीं सकती थी बस कुछ रचनाओं की कुछ पंक्तियाँ लेकर अपने भावों को समन्वित किया है लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि बाकी रचनाओं में कोई  कमी है । सभी रचनाकार एक से बढकर एक हैं जिनकी रचनायें ह्रदय को छूती हैं ।


हिन्द युग्म से प्रकाशित इस काव्य संग्रह को संपादक द्वय अंजू चौधरी और मुकेश कुमार सिन्हा ने अपने संपादन में निकाला  है जिसमे ३० कवियों को सम्मिलित किया गया है।  सभी की रचनायें ज़िन्दगी के अनुभवों , पीड़ा और वेदना का सम्मिश्रण हैं।  गुलमोहर के सभी कवियों को मेरी शुभकामनाएँ कि गुलमोहर सा उनका लेखन महकता रहे और अपनी सुरभि से सभी को सुवासित करता रहे।  

नवोदितों को लेकर संग्रह निकालना साथ ही उनकी प्रतिभा का सही आकलन कर उन्हें एक जमीन प्रदान करना एक सराहनीय कदम है जिसमें संपादक द्वय सफ़ल रहे हैं । गुलमोहर के विमोचन पर जब नवोदितों की खुशी से दमकता चेहरा देखा तो उस प्रसन्नता का आकलन शब्दों में करना संभव ही नहीं इसलिये बस यही कह सकती हूँ " संभावनाओं की जमीन पर फ़सल लहलहाने को तैयार है बस जरूरत है तो सिर्फ़ उनके प्रयास को सराहने और बढावा देने की ।" जो भी ये पुस्तक पढने के इच्छुक हों तो यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं :