पेज

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लॉग से कोई भी पोस्ट कहीं न लगाई जाये और न ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

शुक्रवार, 27 जून 2014

मेरा हिस्सा

क्योंकि 
उम्र भर सिर्फ 
बँटती ही रही 
कटती ही रही 
छँटती ही रही 
पर कभी ना पाया पूरा हिस्सा 


हर बार जरूरी नहीं होता भावनाओं में कविता का होना 
क्योंकि 
आखिर हूँ तो स्त्री ही ना 
इसलिए 
आखिर कब तक ना चाहूँ अपना हिस्सा 

मुकम्मलता का अहसास सभी के लिए जरूरी होता है 
फिर ज़िन्दगी एक बार ही मिला करती है 
और जीना चाहती हूँ मैं भी उसे सम्पूर्णता के साथ 
इसलिए आज कहती हूँ 
मेरे हिस्से में से 
ले लो सब अपना हिस्सा 
ताकि जब समेटूँ खुद को 
तो सुकूँ रहे
बचा रहा कुछ मेरा हिस्सा 

शुक्रवार, 20 जून 2014

कविता में शून्यकाल

इस बार मै पुस्तक मेले से शुक्रवार साहित्य वार्षिकी 2014 लायी तो देखकर आश्चर्य हुआ कि जो हिंदी प्रदेशों की सांस्कृतिक स्थिति पर केन्द्रित है उसमें चाहे परिचर्चा हो, स्मरण , यात्रा वृतांत , आत्मकथ्य , कहानी , डायरी , उपन्यास अंश या कवितायें पूरी किताब में महज 11 महिलाओं के लेखन को जगह दी गयी जिनमे से 7 महिलाओं की कविता थीं और बाकि की 4 अन्य स्थानों पर तो सोचिये कैसे नहीं ह्रास होगा कविता और कवि कर्म का जहाँ 70 लोगों की कवितायें छपी हों वहाँ सिर्फ़ 7 महिलायें शामिल की गयी हों ……आज जरूरत है हर तरफ़ ध्यान देने की तभी समग्रता से कविता को उसका उचित दर्जा मिलेगा हो सकता है कुछ महिलायें दे रही हों कुछ नयापन कविता को अपने लेखन के माध्यम से जो सबकी दृष्टि से ओझल हो अगर इस तरफ़ भी ध्यान दें बडे बडे लोग तो कविता जरूर अपना स्थान बना लेगी …………आज चारों तरफ़ चिंता की पोटली लिए घूमते तो सभी हैं कि कविता को उसका उचित स्थान नहीं मिल रहा या कहाँ खो रही है मगर कोई ध्यान नहीं देना चाहता इस बात पर सब बस दिग्गजों को छापने पर ही जोर दिया करते हैं और नयों को आजमाने का जोखिम कम उठाते हैं  । कविता बेशक अपना मुकाम पा ही लेती है देर सवेर मगर जो हालात बनाए जाते हैं या पैदा किए जाते हैं उन्ही की वजह से कविता में शून्यकाल उपजता है और फिर हम ढूँढने लगते हैं कारण बस उन्हें मिटाने की वजह नहीं ढूँढा करते। और यही हाल पूरे साहित्य का है फिर वो कहानी हो उपन्यास या अन्य विधायें ।

1) क्या साहित्य में महिलाओं पर सिर्फ़ लिखा जा सकता है मगर उन्हें अग्रिम पंक्ति में लाने का उपक्रम नहीं किया जा सकता ? 

2) क्या वो ही दोयम दर्जा देने की मानसिकता यहाँ भी व्याप्त नहीं है ? 

जब तक इन प्रश्नों के हल साहित्य जगत नहीं ढूँढता एक पक्षीय वार्ताओं का कोई महत्त्व नहीं होता , व्यर्थ चिन्ताओं का लबादा ओढ खुद को साहित्य का हितैषी सिद्ध करने भर से नहीं बदला करती हैं तस्वीरें ।

सोमवार, 16 जून 2014

कवि कैसे कह गया हमारे दिल की बात

पाठकनामा पर मेरे द्वारा लिखी विमलेश त्रिपाठी के काव्य संग्रह ' एक देश और मरे हुए लोग ' की समीक्षा इस लिंक पर पढ सकते हैं

http://pathhaknama.blogspot.in/2014/06/blog-post.html
 

शनिवार, 14 जून 2014

' सरहद से ' ..........एक धीमी सरगोशी

कुछ सच्चाइयों से हम रु-ब-रु हो ही नहीं पाते क्योंकि आँखों पर अपनी ज़िन्दगी का ही चश्मा लगा होता है उससे इतर कुछ दिखता ही नहीं ……मगर कुछ सत्य कितने दुरूह होते हैं जिन्हें कोई कैसे शब्दों में बाँध देता है और चुप हो जाता है मगर उसकी चुप्पी उस क्षण बहुत खलती है जो बिना कहे भी बहुत कुछ कहती है ………ऐसे ही एक शख्स हैं मनोहर बाथम जी बी एस एफ़ में इंस्पैक्टर जनरल के पद पर कार्यरत हैं जिन्होने अपना काव्य संग्रह ' सरहद से ' मुझे बडे प्रेम से भेजा है और जिसे जितना पढ रही हूँ बस भीगे जा रही हूँ और मौन हुए जा रही हूँ एक एक कविता दिल पर प्रहार करती है बिल्कुल सहज सरल भाषा मगर कितनी मारक इसका नमूना देखिये :

जुर्म
(कामरेड हमीद के लिए )

ईद के दिन हमारी चौकी पर
पीछे के दरवाज़े से
उसने सेवईयाँ भेजीं चुपचाप
किसी को न बताने की शर्त थी

मेरी दीपावली की मिठाई भी शायद
इसी तरह से जाती
वो हो गया रुखसत दुनिया से

मेरे साथ ईद मनाने के जुर्म में

न जाने किन हालात से गुजरते हैं सीमा पर रहने वाले जहाँ कोई अपना नहीं होता और दुश्मन में भी मिल जाते हैं कभी कभी अपने से या कहो युद्ध तक ही बेगानापन होता है बाकि वक्त तो जैसे हमनिवाला बन जीते हैं ऐसी न जाने कितनी कवितायें हैं जो उस जीवन को तो जीवन्त करती ही हैं बल्कि उन दिलों में उपजी संवेदना और एकाकीपन की तस्वीर को भी उजागर करती हैं क्योंकि जो नहीं कहा गया वो कहीं ज्यादा कचोटता है , ज्यादा तकलीफ़ देता है , ऐसी कवितायें जो आपको मूक कर दें और सोचने पर मजबूर जहाँ आप न रो सकें न हँस सकें सिर्फ़ मौन हो सोचने पर विवश हो जाएं एक ज़िन्दगी ऐसी भी हुआ करती है जिसके बल पर हम हँसी खुशी घरों में रहा करते हैं ………


 वैसे ये कवितायें कहाँ ये तो वो दुरूह हकीकतें हैं जिनसे रु-ब-रु होना हर भारतीय के लिए जरूरी है क्योंकि आखिर हैं तो वो भी हमारी ही तरह इंसान , उनके दिल में भी दया , करुणा और संवेदना बसती है बस देश की खातिर देश में रहने वालों की खातिर खुद अपने सीने पर पत्थर रख कैसे मौत और ज़िन्दगी से आँख मिचौनी खेलते हुए जीने के बहाने ढूँढते हैं उन्ही लम्हात का चित्रण इस बारीकी से किया गया है कि पाठक चौंक उठता है तो कहीँ स्तब्ध रह जाता है तो कहीं निशब्द हो जाता है जहाँ एक ओर हम जरा जरा सी बात पर लड मरते हैं एक दूसरे का कत्ल तक कर देते हैं यहाँ तक कि रिश्तों को भी ताक पर रख देते हैं वहाँ एक सैनिक किन किन के साथ न केवल रहता है बल्कि उन्हें अपने परिवार का हिस्सा बना लेता है देखिए उसकी एक बानगी :


मैं और मेरे साथी 
****************
इस दो सौ गज के टुकड़े पर 
मैं और मेरे साथी 
मेरे घोड़े ऊँट 
मेरा कुत्ता कालू  
और कुछ घुसपैठिये चूहे 
सभी रहते हैं 

एक  मंदिर है इसी दो सौ गज में 
नमाज भी  पढ़ी  जाती है 
क्रिसमत पर केक भी कटता है 
वाहे गुरु की आवाज़ें 
रोज  सुन लेना 

 रहने का सलीका 
सीखना हो अगर 
बी ओ पी में  चले आना (  सीमा चौकी )

एक सैनिक के भी दिल होता है भारत माँ के बाद होती है कहीं उसकी भी माँ तो समझ सकता है वो माँ के दिल को मगर अपने कर्तव्य से कैसे विमुख हो सकता है , उसे तो देश हित में अपनी ड्यूटी पूरी करनी ही है फिर चाहे वो कोई हो कुछ ऐसे ही जज़्बातों से जब कवि ह्रदय व्याकुल होता है तो फ़ूट पडती है वेदना अक्षरक्ष : उसकी कलम में जो वो वहाँ न दिखा सकता है न कह सकता है किसी से वो व्यक्त तो होनी होती है तो हो जाती है कलम के माध्यम से कुछ इस तरह :

माँ 
***
आतंकी का मकान 
देख लें -- मैने कहा 
चप्पा चप्पा छान लो 
ऊपर नीचे छान लो 
कुछ मत छोडना 
कहीं भी हो सकता है वो 

सब  अस्त व्यस्त करने के बावजूद 
न मिला कुछ 

सफ़ेद बाल मोटा चश्मा 
पेट में कांगडी फ़िरन के अन्दर 
साठ साल में ऐसी विनम्रता '
बेटा अब बँद कर लूँ दरवाज़ा' ' 

माँ माफ़ करना ' मैने कहा 
' हमने सब सामान बिखेर दिया है ' 
'माफ़ी किस बात की बेटा ' 
' वो अपना काम कर रहा है ' 
गलत या सही मैं नहीं जानती -- 
तुम अपना काम कर रहे हो 
गलत या सही मैं नहीं जानती 

मैं तो तुम दोनो को ही 
नहीं कोस सकती 

मैं माँ हूँ 

वहीं दूसरी तरफ़ एक दूसरी माँ की वेदना और आतंकवादी हमलों के कहर का जीवन्त दृश्य उकेरना यूँ ही संभव नहीं होता जो गुजरा होता है उन परिस्थितियों से वो ही व्यक्त कर सकता है त्रासदी की भयावहता :

गूँगा 
*****
हर चौथे रोज़ ही दीखती थी 
दो - तीन बरस के बच्चे के साथ 
डॉक्टर से गिडगिडाती 
बच्चे के बोलने के इलाज के लिए
 ' गूँगा' लग्ज़ उसे अच्छा नहीं लगता 

माँ की तरह डॉक्टर भी 
उम्मीदों के साथ 
कि कभी तोतली आवाज़ से सही 
निकलेगा ' अम्मी ' 

कल की ही तो बात है 
उस जालिम के बम से 
चीखों से सारी बस्ती गूँजी
कहते हैं पहली और आखिरी बार 
गूँग़ा भी ' अम्मी' पुकारते 
चीखा 

आखिर सैनिक होता तो एक इंसान ही है तो मरने के बाद कहाँ रह जाती है कोई दुश्मनी बचता है तो एक इंसान वहीं दूसरी तरफ़ इस तरह मरने और मारने से आतंक कम नहीं होता बल्कि और बढ जाता है उस वेदना को बिना शब्दों की बर्बादी के कवि ने इस तरह उकेरा है कि आँख के आगे चलचित्र सा चलने लगता है : 

क्षणिक खुशी 
**************
मेरे हाथ से जब 
पहला आतंकी मरा 
वो खुशी का पल 
क्षणिक था 

उसके मरने का बिल्कुल नहीं 
मारने पे ज्यादा दुख 
पता नहीं क्यों? 

इस मर जाने से 
मरा नहीं आतंक 
नहीं मिला चैन 
गरीबों और बेसहारों को 

कुछ और बढ गए 
इस फ़ेहरिस्त में नाम 


ऐसी जाने कितनी कवितायें हैं जो कम शब्दों में मारक वार करती हैं , हर कविता एक सच्चाई को बयाँ करती है फिर वो कच्छ में रन का रेगिस्तान हो या वहाँ के जीवन और उसकी कठिनाइयाँ , या फिर फ़्लेमिंगो के प्रवास से जुडे कवि के सैन्य जीवन के अनुभव या फिर कश्मीर की वादियों में पडे लहू के छीँटे हर घटना को सलीके से कवि ने न केवल उकेरा है बल्कि कहीं कोई शोर शराबा नहीं एक वीभत्स सन्नाटा जो शनै: शनै: दस्तक देता हो और अन्तस मे चिकोटी भरता हो इस तरह आत्मा में उतरती कवितायें किसी भी ह्रदय में उथल पुथल मचाने में कामयाब होती हैं । सरल सहज और सुलझी भाषा में कम शब्दों मे गहरी बात कह देना कवि के लेखन की विशेषता है । यूँ तो दो संग्रह आ चुके हैं कवि के और 5 हजार प्रतियाँ बिक चुकी हैं मगर देखिए विशेषता वो ही सैन्य जीवन का अनुशासन काबिज़ है कहीं कोई शोर नहीं , कहीं आत्म प्रचार नहीं शायद सब जानते भी नहीं कि कोई सरहद पर रहने वाले ने ऐसा कुछ लिखा है जबकि आज यदि किसी की 500 प्रतियाँ भी बिक जाएं तो खुद को जाने क्या समझने लगता है , प्रचार के लिए व्याकुल हो उठता है वहीं मनोहर बाथम जी में वो ही अनुशासन कायम है जो एक सैनिक के जीवन में हमेशा होता है जो कभी अपने नाम के प्रचार प्रसार के लिए काम नहीं करता बल्कि देश हित में अपने प्राणों का बलिदान दे देता है । जल्द ही हमारे हाथों में उनका तीसरा काव्य संकलन होगा जिसकी मुझे बेसब्री से प्रतीक्षा रहेगी ………शुभकामनाओं के साथ उस सैनिक  को नमन करती हूँ जिसने हमें अपने कवि रूप से अवगत तो कराया ही बल्कि उन परिस्थितियों से भी रु-ब-रु करवाया । कोई यदि पढना चाहता हो तो संकलन शिल्पायन प्रकाशन से मंगवा सकता है । 

शिल्पायन फोन : 011-22821174

गुरुवार, 12 जून 2014

यूँ ही कभी कभी

हैलो 
बिजी हो क्या ?

( कोई जवाब नहीं )

आज बहुत जरूरत थी किसी  की 
और आज ही वक्त का सितम देखो 
खुद से भागने को जी चाहता है 

( कोई जवाब नहीं )

उफ़ ! मेरी बेअक्ली तो देखो 
तुम्हारे जवाब नहीं आ रहे 
और मैं लिखे जा रही हूँ 

( कोई जवाब नहीं )

आह ! ये दीवानगी नहीं 
ये है बेबसी , बेजारी 
इतने बड़े जहान में 
अकेलेपन को झेलने की त्रासदी 
जो शब्दों में व्यक्त हो नहीं पा रही 
कोई अविभक्त सी रेखा 
मानो विभक्ति के कगार पर खड़ी हो 
मगर विभक्त भी ना हो पा रही हो 
जुनून की हदें नहीं होतीं 
शायद इसीलिए 
बेसबबी के पायदान पर खड़े होकर 
तुम्हें पुकारा है 
मगर 
अंजुली में कब वक्त सिमटा है 
जो आज समेट पाती 
अच्छा , चलती हूँ 
कहाँ ? नहीं पता 
बिना मकसद की ज़िन्दगी के भी क्या कभी कोई मायने होते हैं 
डोर से टूटी पतंगों को भी क्या कभी आशियाँ मिलते हैं 
अलविदा ! 

अलविदा ! कितना मुश्किल होता है खुद को कहना 
और एक कहानी अधूरेपन के साथ ही ख़त्म हो गयी 

सोमवार, 9 जून 2014

दोस्त

जन्मदिन की असीम शुभकामनायें ………खुशियों से लबरेज़ हो तेरा जहान 



हाँ दोस्त
ना जाने कितनी 
किस्मे होती हैं दोस्तों की
अजी क्या सोचने लगे
दोस्तों की किस्मे
तो इसमें क्या अलग है
जब इस दुनिया में
दो शक्ल एक जैसी नहीं होतीं
दो लोगों के विचार एक जैसे नहीं होते
तो दोस्त और उनका व्यवहार कैसे
एक जैसा हो सकता है
उनमे भी तो वो ही 
दुनियावी रंग उतरा होता है
और सबसे बड़ी बात
दोस्ती एक होती है बचपन की
जिसमे बचपन से एक 
निश्छल प्रेम जुड़ा होता है
वहाँ दोस्ती की नींव
कच्ची मिटटी की बनी होती है ना
तो इतनी मजबूत होती है
कितने आँधी तूफ़ान आयें
सब झेल जाती है 
मगर दोस्त पर ना 
तोहमत लगाती है
यूँ ही थोड़े कृष्ण सुदामा की 
दोस्ती को दुनिया याद करती है 
मगर उसके बाद की 
जो भी दोस्ती होती है
स्वार्थ की जड़ों पर ही
उसकी नींव टिकी होती है
जब तक काम निकले तब तक दोस्ती
उसके बाद ना दोस्त ना दोस्ती
कैसे हो गए हैं ना
दोस्ती के रिश्ते
तो फिर दोस्त तो होंगे ही आर्टिफिशल 
ऊपर अपनेपन का मुखौटा लगाये
सबसे ज्यादा हमदर्द बनते
मगर वो ही हैं सबसे पहले
पीठ में छुरा हैं घोंपते
एक तो आज का माहौल ऐसा
उस पर आज की टैक्नोलोजी 
क्या से क्या बना दिया
दोस्त को और दोस्ती को
दोनों को सिर्फ एक खेल का 
मैदान बना दिया
अब देखो तो
फेसबुक हो या ट्विटर या ऑरकुट 
या फिर हो कोई भी चैट पर
बस हाय किया हेलो किया 
और हो गयी दोस्ती
कुछ उसकी सुनी
कुछ अपनी कही
और बन गए दोस्त
जो सिर्फ एक छलावा होते हैं
यहाँ नकाबों में छुपे ना जाने कितने
अन्जान चेहरे होते हैं
मुश्किल से ही यहाँ 
सच्चे दोस्त मिलते हैं
एक अन्जान चेहरा
एक अन्जाना नाम
एक अनजानी पहचान
पता नहीं क्यों 
फिर भी लोग यहाँ 
कुछ पलों के लिए ही सही
खुद को भुला देते हैं
ये दोस्त और दोस्ती का
नया रूप यहाँ दिखता है
जहाँ कुछ देर के लिए ही सही
झूठ भी सही दिखता है
क्योंकि 
मिल जाते हैं कभी कभी 
कुछ ऐसे चेहरे
जो सच में दोस्ती को 
एक मुकाम देते हैं
बिना देखे जाने पहचाने भी
दोस्त की उदासी में
उसे हँसाने का हुनर रखते हैं
फिर चाहे उसके लिए उससे 
झूठा लड़ना ही क्यों ना पड़े
उसे चिड़ाना ही क्यों ना पड़े
मगर दोस्ती को कई बार
नए अर्थ दे जाते हैं
शायद वो ही 
सच्चे और अपने दोस्त कहलाते हैं
जो चाहे आभासी हों या मूर्त 
मगर दोस्त की उदासी को भी 
मुस्कराहट में बदल जाते हैं 
चुपके से ही सही
दोस्ती को अर्थ दे जाते हैं 

और वो अर्थ हो तुम ……प्रिय मित्र राकेश 
तुम सा निस्वार्थ मित्र पा मैं धन्य हुयी 

ये कविता काफ़ी साल पहले लिखी थी आज तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हें समर्पित 
ये भी अजब इत्तफ़ाक ही है कि एक दिन के अन्तर पर ही हमारे जन्मदिन आते हैं :) :) 

मंगलवार, 3 जून 2014

खुश हो लो ओ माताओं बहनों और स्त्रियों !!!

क्योंकि अभी नहीं हुई हमारे जुल्मों की इंतेहा
इसलिए 
अभी और होना है तुम्हें तिरस्कृत 
अभी और होना है तुम्हें बलात्कृत 
क्योंकि 
क़ानून हो या सत्ता 
संग हैं हमारे 
और तुम्हारे औजार हैं सब पुराने 
बस रोना गिड़गिड़ाना जानती हो 
ज्यादा से ज्यादा क्या 
जाओगी कानून के पास गुहार लगाने 
मगर वहां भी हम जैसों को ही पाओगी 
तो करती रहो शोर 
और दबती रहेंगी तुम्हारी आवाज़ें इसी तरह 
क्योंकि जानते हैं हम 
यहाँ नहीं बदला करते क़ानून 
ज़रा ज़रा सी बातों पर
 ( लड़के हैं गलती हो जाया करती है तो क्या उसके लिए फांसी दे दें )
इस सोच के नुमाइंदे जब तक 
हमारे साथ हैं तब तक 
ढूँढने हैं हमें अभी और नए नए तरीके 
सरिये औजार पत्थर बोतल 
तो हम भर चुके 
आंतें भी बाहर निकाल चुके 
पेड़ पर भी लटका चुके 
एसिड भी पिला चुके 
मगर नहीं भरा अभी हमारी अमानवीयता का घड़ा 
अभी बाकी है और जद्दोजहद 
हमारी मानसिकता की 
क्योंकि हम वो कालसर्प हैं जो मौत से भी नहीं डरा करते 
हा हा हा के दंश से ही उपजती हैं हम में क्रूर ऋचाएं 
इसलिए 
जब तक नहीं कर लें हम ईजाद 
नयी संभावनाएं तुम्हारे शोषण की 
तब तक बची हो तुम …… खुश हो लो ओ माताओं बहनों और स्त्रियों !!!

शुक्रवार, 30 मई 2014

वो कोई भी हो सकती है ……



त्याग ममत्व सहनशीलता की मूरत 
तप कर कुंदन बन 
जब पक जाता है उसका रंग 
कृशकाय हो जाती है त्वचा 
चेहरे की सिलवटों में 
उभर आते हैं जब संघर्ष 
आँखों के घेरों में 
दिखने लगता  है 
जीवन के अंधियारे पक्ष का 
जब विराम चिन्ह 
बुदबुदाते होठों की लकीरें 
जब बाँचती हैं 
उम्र की रामायण में दर्ज 
सीता के जीवित दफ़न होने की दास्ताँ 
बेतरतीब पहनी धोती में 
जब ध्यान नहीं जाता पल्लू के सरकने पर 
गठिया के दर्द का कहर भी 
जब नहीं छू पाता अंतर संघर्ष के कहर को भी 
तब वो कोई भी हो सकती है 
किसी की माँ पत्नी बहन या  बेटी 
क्या फर्क पड़ता है  
क्योंकि 
संघर्षों की आंच पर 
जलने पिघलने और नए आकार में 
ढलने के बाद भी जो बचती है 
उस स्त्री का कोई चेहरा नहीं होता 
वो कोई भी हो सकती है ……


फ़ोटो साभार : Vijendra Kriti Oar 

बुधवार, 28 मई 2014

बिंदिया में

दोस्तों 
जून माह की बिंदिया पत्रिका में छपा मेरा व्यंग्य आपकी नज़र ………बिंदिया पत्रिका में ही सविता सिंह के लेख में हम नवागंतुकों को लेखिका का दर्जा मिलना ………बेहद सुखद लगा ………पढिये उनका आलेख और डालिए एक नज़र हम पर भी और तीसरी उपलब्धि ……मेरी बुक " बदलती सोच के नए अर्थ " की समीक्षा बिंदिया पत्रिका में …………#गीताश्री# का किन लफ़्ज़ों में शुक्रिया अदा करूँ समझ नहीं आ रहा ……एक ही पत्रिका में तीन जगह चर्चा कर दी ………निशब्द कर दिया मुझे :) 




शुक्रवार, 23 मई 2014

खबर में बने रहने के लिए

बहुत दिन हुए 
हंगामा नहीं बरपा 
बहुत दिन हुए 
किसी ने हाल नहीं पूछा 
बहुत दिन हुए 
कहीं कोई शोला नहीं भड़का 
और मैं अपने दड़बे में 
महज कैदी सा बन रह गया 

न कहीं आलोचना 
न कोई प्रसिद्धि 
न कोई मेरा नामलेवा रहा 
सब अपने अपने खेमों में मशगूल 
उफ़ ! इतनी ख़ामोशी ठीक नहीं 
इतना सन्नाटा तो 
मुझे ही लील जाएगा 
जब तक एक झन्नाटेदार तमाचा 
न पड़े और आवाज़ न हो 
कैसे संभव है शोर मचना 
मेरा नाम ले ले आंदोलन होना 
मेरे नाम की तख्ती का 
हर गली हर मोड़ पर लगे होना 
जरूरी है अपनी पहचान बनाये रखने को 
हंगामों की फेहरिस्त में खुद को शामिल रखना 

यूँ भी ज़माने की याददाश्त बहुत कमज़ोर है 
और मुझे याद बन रहना है 
एक कील बन चुभते रहना है 
ज़ेहन की दीवारों में 
एक सोच बन करवाने हैं 
क्रांतिकारी  आंदोलन 
मसीहा बनने से क्रांतियाँ नहीं हुआ करतीं 
ये जानते हुए 
ख़बरों में बने रहने के लिए 
जरूरी है मेरा आलोचनाओं से सम्बन्ध 
फिर वो चाहे पक्ष में हों या विपक्ष में 

ज़माने की आँख और सोच में 
घुन बन लगे रहना है 
क्योंकि 
मेरी शिराओं में लहू की जगह बहती है ईर्ष्या 
मेरे शरीर में अस्थि माँस मज्जा की जगह 
ले रखी  है प्रसिद्धि ने 
और खाल ओढ़ ली है भेड़िये सी आत्मसंतुष्टि की 
ऐसे में कैसे संभव है मेरा बचा रहना 
सन्निपात की कोई दवा नहीं हुआ करती 
और मैं घिरा हूँ आत्मप्रशंसा , आत्मवंचना की 
झूठी फरेबी बेड़ियों के मोहजाल में 
क्योंकि 
मेरा जीवन है यही 
मेरी सांस , मेरी आस , मेरा विश्वास है 
सिर्फ यही 
कि 
खबर में बने रहने के लिए जरूरी होता है 
कभी कभी 
खुद पर खुद ही प्रहार 
या आलोचनाओं का गर्म बाज़ार 
फिर चाहे कोई कहे 
सब जानते भी क्यों भ्रमजाल में उलझे हो 
तो प्रिय 
ये ही तो शगूफे होते हैं आत्मप्रसिद्धि के 
जो हर बार हवा का रुख मोड़ दिया करते हैं 
और मैं कोई अलग  कौम का वासी नहीं हूँ 
उन्हीं में से हूँ ,  तुम्हीं में से हूँ 
अब चाहे तुम उन्हें कोई नाम दो 
राजनीतिज्ञ ,कलाकार या साहित्यकार 
मेरा पेशा है 
खबर में बने रहने के लिए 
हर हथकंडे अपना अपने लिए जगह बनाए रखना 

ख्वाब को हकीकत का जामा पहनाने के लिए 
महज चुप्पी के खोल में सिमट नहीं खेली जातीं गोटियाँ 

जीतने और प्रसिद्धि पाने के भी अपने ही शऊर हुआ करते हैं …… 

बुधवार, 14 मई 2014

शायद किसी बुद्ध का फिर जन्म हो

मौन का स्वर ही नहीं शोर भी होता है ………क्या कभी पहुँचा तुम तक?
स्वर तो अब दस्तक ही नहीं देते …………
मौन के शोर ने अपना अखाडा लगाया हुआ है 
हर तरफ़ देखो 
मौन का झंझावात कैसे चल रहा है 
दसों दिशाओं की हवायें भी कुम्हला गयी हैं 
सूरज अपने ताप से आकुल है 
क्योंकि वो मौन के ताप को सहने को अभिशप्त है
और तुम हो अभी स्वर पर ही रुके हो 
यहाँ तो वजूद का भी पता नहीं 
सिर्फ़ और सिर्फ़ मौन के शोर में आकुल 
मेरी देह के बीज मेरे मन के बीजों को मथ रहे हैं …………शायद किसी बुद्ध का फिर जन्म हो 


रविवार, 11 मई 2014

मेरी माँ नहीं जानती क्या होता है मदर्स डे


मेरी माँ नहीं जानती क्या होता है मदर्स डे 
क्योंकि 
वो तो हर पल हर दिन है 
सिर्फ़ और सिर्फ़ 
अपने बच्चों की माँ 
क्या जाने नयी संस्कृति के नए चलन 
उसने तो जाना सिर्फ़ हर दिन हर पल 
अपने बच्चों के लिए जीना 
अपने बच्चों के मुख पर मुस्कान देखने को 
अपना सब कुछ कुर्बान करना 
अपने बच्चों के मुख पर दुख की स्याही देख 
खुद दुखी हो जाना 
वो क्या जाने क्या होता है मदर्स डे 
उसने तो जाना है सिर्फ़ इतना 
बच्चों से ही है जीवन उसका 
फिर कैसे उसे विश करूँ 
जो है जीती हर पल हर दिन मेरे लिए 
गर पूछ बैठी 
क्या सिर्फ़ आज के दिन ही हूँ मैं तेरी माँ 
तो क्या जवाब दूँगी 
इसलिये नहीं चाहती उसे और उसकी तपस्या और स्नेह को 
सिर्फ़ एक दिन में ही समेटना 
और चुप रह करती हूँ मन ही मन वन्दन अभिनन्दन उसका 
क्योंकि 
मेरी माँ नहीं जानती क्या होता है मदर्स डे 

गुरुवार, 8 मई 2014

रखती हूँ मैं भी आम स्त्री का बुत खुद में

अभी बाकि हैं मुझमे 
समस्याएं , इच्छाएं , आकांक्षाएं 
थोड़ी बहुत ईर्ष्या , जलन और नफरत  
क्योंकि 
रखती हूँ मैं भी आम स्त्री का बुत खुद में 

जो झगड़ती भी है 
सिसकती भी हैं 
झंझोड़ती भी है 
जो रूखी भी है 
तो प्रेम से भरपूर भी है 
जो आम मानवीय संवेदनाओं से भरपूर भी है 
जो खास नहीं है इसलिए मजबूर भी है 
कसमसाती हैं उसमे भी इच्छाएं 
उड़ान भरने की आकांक्षाएं 
फलक को छूने की सम्भावनाएं 
करती हैं उसे भी कुंठित 
क्योंकि 
रखती हूँ मैं भी आम स्त्री का बुत खुद में 

करती हूँ सबकी तरह मैं भी आह्वान 
कभी स्त्री मुक्ति का 
तो कभी स्त्री की जड़ सोच का 
कभी रखती हूँ निगाह 
देश और समाज की समस्या पर 
तो फूटता है मेरा भी गुस्सा 
समाज में व्याप्त बेचैनियों पर 
क्योंकि 
रखती हूँ मैं भी आम स्त्री का बुत खुद में 

होती हैं मुझसे भी गलतियां 
होता है मुझमे भी स्फुरण 
होते हैं मुझमे भी  इच्छाओं के अंकुरण 
कभी दबा भी लेती हूँ 
तो कभी उछाल भी देती हूँ 
कभी मूक रहकर जज़्ब करती हूँ 
तो कभी मुखर होकर 
सारे भेद खोल देती हूँ 
क्योंकि 
रखती हूँ मैं भी आम स्त्री का बुत खुद में 

क्यों फिर मैं देवी बनूँ 
क्यों सिर्फ मैं ही पत्तों सी झरूँ 
क्यों सिर्फ मैं ही रात्रि का सफ़र अकेले ही तय करूँ 
क्यों न मैं हुंकार भरूँ 
क्यों न मैं भी रुदन करूँ 
क्योंकि 
जन्मती हैं मुझमे भी इच्छाएं 
जो हमेशा सुपाच्य हों जरूरी तो नहीं 
लेती हैं आकार मुझमें भी समस्याएं 
जो हमेशा मेरा ही शोषण करें जरूरी तो नहीं 
टँगी होती हैं दिल की कील पर मेरी भी आकांक्षाएं 
जो हमेशा धूप में ही सूखती रहे जरूरी तो नही 
क्योंकि 
रखती हूँ मैं भी आम स्त्री का बुत खुद में 


सर्वगुण संपन्न होना 
और खुद को रिक्त करते हुए 
सब कुछ सह लेना ही मेरा वजूद नहीं 
अपनी जलन ईर्ष्या या नफरत को 
खुद ही पीते हुए 
खुद की तिलांजलि देकर 
जीते रहना ही मेरी नियति नहीं 
उससे इतर भी कुछ हूँ 
बस कभी ये भी याद रखा करो 
कभी मुझे भी इंसान समझा करो 

कभी तो बोलने का हक़ मुझे भी दो 

जरूरी नहीं होता हर बार 
मुखौटा लगाए खुद को बेदखल करना 
वास्तविकता से आँख मिलाकर जीने के लिए 
हटा देती हूँ नकाब चरित्र के रुख से भी 
क्योंकि 
नहीं चाहिए कोई तमगा भलमनसाहत का 
क्योंकि
जीना चाहती हूँ मैं भी 
अपनी आकांक्षाओं , इच्छाओं और चाहतों के साथ 
किसी को आगे बढते देख जलन से ईर्ष्याग्रस्त होना 
और अपनी उपेक्षा पर हताशा के सागर में डूबना 
संजोना चाहती हूँ हर लम्हात को 
अपनी गुनगुनाहट अपनी मुस्कुराहट के साथ 
इसलिये जीने दो मुझे 
मेरे स्त्री सुलभ सौंदर्य के साथ
मुझमें छुपी मेरी कुंठाओं , व्यंग्य बाणों , चपलताओं के साथ 
जब जब जिस रूप में चाहूँ 
कर सकूँ खुद को व्यक्त अपनी सम्पूर्णता के साथ 
क्योंकि 
रखती हूँ मैं भी आम स्त्री का बुत खुद में 


क्योंकि 
जरूरी नहीं होता 
महानता का आदमकद बुत बन 
किसी चौराहे पर खडा होना नितांत एकाकी होकर 



सोमवार, 5 मई 2014

मेरे सपनों की दुनिया का अंत

मेरे सपनों की दुनिया का अंत 
शायद यही है 
बिना व्यक्त किये दफ़न कर दूं 
कुछ आतिशी ख़्वाबों को 
कुछ चाहत के गुलाबों को 
जो मीर की ग़ज़ल से मुझमे 
पला करते थे 
जो भरी बज़्म में हरसिंगार से 
खिला करते थे 
जो मिटटी की सौंधी महक से 
साँसों में रमा  करते थे 
जो पलकों के पर्दों में नयी नवेली दुल्हन से 
छुपे रहा करते थे 
करना  होगा अब अंत 
क्योंकि 
शुरुआत को कुछ बचा ही नहीं 
आँचल को रोज झाडती हूँ 
मन के आँगन को रोज बुहारती हूँ 
मगर 
कोई आस की पत्ती झडती ही नहीं 
और आडम्बर से भरी इस दुनिया में 
मुखौटा कोई बदलता नहीं 
जब दूर तक सिर्फ और सिर्फ 
स्याह रातें हों 
धूप कभी निकलती न हो 
समय का सूरज अपना रुख बदलता ही न हो 
किस धान के खेत में रोपूँ सपनों के संसार को 
जिसका बीज पाले की मार से पहले ही नेस्तनाबूद हो गया हो 
बस बहुत हो चुका तसल्लियों का सिलसिला 
विश्वास और आस का मनोहारी नृत्य 
अब और नहीं ............अब और नहीं 
तुम्हें दफ़न होना ही है 
मेरे अन्दर ........मेरे साथ 
क्योंकि 
अब नहीं चाहिए मुझे आश्वासनों की हरित क्रांति 
उम्मीद के जागरण की महादेवी 
इसलिए 
शिखा पर गाँठ बाँध ली है मैंने स्वप्न विहीन जीने की कसम के साथ 

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

स्याह रुख




जीवन जीने की जिजीविषा 
व्यक्त हैं तुम्हारे चेहरे की लकीरों में 
हाथों पर पढ़ी झुर्रियाँ , झुलसी त्वचा 
स्वयं एक दस्तावेज़ है 
तुम्हारी ज़िन्दगी की जद्दोजहद की 

आशा निराशा और हताशा के झुरमुटों में भी 
सहेजी हैं तुमने उम्मीद की किरणें 
यूं ही नहीं त्वचा सँवलाई है 
आँखें प्रतीक हैं तुम्हारे पौरुष की 
जहाँ ठहरी चिंता की लकीरें 
दे देती हैं पता तुम्हारे मन की तहरीरों का 


दया करुणा की मोहताज नहीं तुम 
तुम तो हो वो स्वयंसिद्धा 
जिसके आगे नतमस्तक है 
सृष्टि का हर बंदा 
ऐसा कह उपहास नहीं कर सकती 
क्योंकि 
जानती हूँ न 
रोज कितनी आँखों में सिर्फ अपना बदन देखती हो 
तो कितने ही चेहरों में अपने लिए वितृष्णा
फिर कैसे हो सकता है हर बंदा नतमस्तक 
किन हालात से गुजरती हो 
किस नारकीय यातना को झेलती हो 
तब जाकर एक वक्त की रोटी का जुगाड़ करती हो 
सब जानती हूँ .......... क्योंकि 
आखिर हूँ तो एक औरत ही न 
और सुनो 
तुम्हारे रहन सहन के स्तर को जानने को 
नहीं है जरूरत मुझे तुम तक पहुँचने की 
तुम्हारी जीवन शैली का दर्शन करने की 
क्योंकि 
तुम अव्यक्त में भी व्यक्त हो 
यदि हो किसी के पास वो नज़र 
जो तुम्हें देह से परे  देख सके 
जो तुम्हारी उघड़ी देह का सही आकलन कर सके 
तो स्वयं जान जाएगा 
कैसे एक कपडे मे समेटा है तुमने पूरा ब्रह्माण्ड 

सोमवार, 28 अप्रैल 2014

ज़िन्दगी के पन्ने एक अकथ कहानी से

बुझते चिराग की लौ सुना है ज्यादा टिमटिमाती है …………मगर यहाँ तो बिना टिमटिमाये ही लौ बुझ गयी……अब मैं हूँ और मेरी तन्हाइयाँ ………सोचती हूँ क्या बात करें हम ? ना ना ………किसी बिखरी याद को नहीं समेटना अब ………ना ही आगत का सोचना अब …………और वर्तमान में कहने को कुछ बचा नहीं …………ऐसे में अब मै हूँ और मेरी तन्हाइयाँ मुझसी ही तन्हा ……एक बिना सोच का , बिना बात का , बिना लक्ष्य का सफ़र तय करते हुये्………यूँ भी गुजरा करते हैं ज़िन्दगी के पन्ने एक अकथ कहानी से 

गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

नहीं है कहीं प्रेम का अस्तित्व

नहीं , नहीं है कहीं प्रेम का अस्तित्व , जो है बस है सह -अस्तित्व . आप सोचेंगे रोज प्रेम का लाप अलापने वाली आज अचानक कैसे कह रही है प्रेम का अस्तित्व ही नहीं है  :) .............

सच्चाई तो यही है मगर हम जान ही नहीं पाते उम्र भर और एक अनजानी प्यास के पीछे उम्र तमाम करते फिरते हैं . साथ रहते हैं हम समाज में , परिवार में तो एक दूसरे  की आदत हो जाती है , एक  दूसरे  की जरूरत बन जाते हैं हम और उसे दे बैठते हैं प्यार का नाम , प्रेम का नाम जबकि वो होता है अपनापन जो एक दूसरे की जरूरतों से उपजा होता है . आप जब तक किसी के काम के हैं तभी तक याद रखती है दुनिया , तभी तक आपको पूजती है दुनिया जिस दिन आप असहाय हो गए , जिस दिन आप उनके काम के नहीं रहे तब कहाँ चला जाता है वो प्रेम ? अगर कहा जाता है कि दुनिया में प्यार ही प्यार है और उसी पर ये धरती टिकी है तो आज इतने असहाय , बेबस न होते लोग , रिश्तों के नाम पर एक  दूसरे  को विवशता मे ना ढोते लोग . क्या प्रेम सिर्फ क्षणिक होता है जबकि सुना है प्रेम तो सारी  कायनात में विद्यमान है और वो सब पर बराबर लुटाती है और ये सच भी है क्योंकि प्रकृति किसी से भेदभाव नहीं करती क्या छोटा क्या बड़ा , क्या अपना क्या पराया ,क्या बच्चा क्या बड़ा सब पर अपना बराबर का स्नेह लुटाती है तो उसे तो फिर भी प्रेम कह सकते हैं क्योंकि किसी से कोई भेदभाव नहीं और साथ में निस्वार्थता का भाव मगर हम मनुष्य नाम के प्राणी कहाँ ऐसा कर पाते हैं . 

कोई भी रिश्ता प्रकृति सा अटूट नहीं है हमारे पास , हम अपनों को ही नहीं सह पाते एक उम्र तक आते आते तो कैसे कहते हैं कि प्रेम की तपिश है हमारे अन्दर , जब अपनों की दयनीय दशा देखकर भी हम नहीं पिघलते , उन्हें बुरा भला कहने से नहीं चूकते यहाँ तक कि अपने मुनाफे के लिए उन्हें धोखा तक दे देते हैं तो कैसे कहते हैं प्रेम का अस्तित्व है इस जहाँ में ? आज जब बच्चे हों या बडे सभी एक दूसरे को भला बुरा यहाँ तक कि अपमान भी छोटी चीज़ है कत्ल तक कर देते हैं तो कैसे कहें प्रेम का अस्तित्व है , प्रेम तो एक विलक्षण स्थिति का नाम है जहाँ तक कोई नहीं पहुँचता सिर्फ़ साथ रहना और एक दूसरे की जरूरत में काम आना प्रेम नहीं सह अस्तित्व है वरना तो आज बीमार यदि कोई ऐसा पड जाए जिसकी उम्र भर सेवा करनी पडे तो उसे भी घर निकाला दे दिया जाता है तो कहाँ जाता है वो प्रेम यदि था तो ? कैसे भूल जाता है मानव रिश्ते की ऊष्मा को ? 

मुझे तो कहीं नहीं दिखता प्रेम का अस्तित्व. हर रिश्ता झूठा दिखता है या वक्त की नोक पर मजबूरी के अहाते में खड़ा बरसात रुकने की इंतज़ार में दिखता है . जो है बस सह अस्तित्व ही है जहाँ एक  दूसरे की जरूरत भर हम एक दूजे का साथ निभा कर अपने कर्त्तव्य को प्रेम का नाम देकर भावनाओं से खेलते भर हैं मगर वास्तव में प्रेम के वृहद् अर्थ को तो कभी समझ ही नहीं पाए गर समझा होता तो आज अपनों की , बुजुर्गों की इतनी दयनीय दशा न होती .........वो अकेलेपन का शिकार न होते , वो ज़माने पर बोझ न होते . 

वैसे भी देखा जाए कोई आज मरे तो कल नया सवेरा दिखता है , दो दिन याद किया और फिर भूल गए यही है हमारी फितरत ............क्या वास्तव में प्रेम हो तो क्या कभी हम भूल सकते हैं या उसके बिना जी सकते हैं ..........प्रेम , प्रेम कहना आसान होता है मगर निभाना बहुत मुश्किल ............वास्तव में तो हमने सिर्फ सह अस्तित्व के साथ जीना सीखा है और कुछ पल के साथियों को प्रेम नाम की माला दी है जपने को ताकि जीवन भ्रम में ही सही , चलता रहे .............


वैसे प्रेम की धारणा बहुत पुरानी है । युग ढोते रहे हैं और ढोते रहेंगे मगर जान कहाँ पाते हैं प्रेम के सूक्ष्म अणुओं और परमाणुओं को जहाँ अपेक्षा का सिद्धांत लागू ही नहीं होता और देयता और त्याग के सिद्धांत पर ही ज़िन्दगी बसर होती है और वो प्रेम आज के दौर में कहाँ संभव है ? 

मानविक प्रेम ही संभव नहीं हो पाता तो आत्मिक या दैविक प्रेम तो सिर्फ़ सोच और ख्यालों की बस ताबीर भर हैं और इसी छदम खेल में घिरे हम गुजार जाते हैं ज़िन्दगी , जी जाते हैं ज़िन्दगी और खो जाते हैं समय के गर्त में किसी सागर की बूँद सम मगर कभी नहीं जान पाते फ़र्क निस्वार्थ प्रेम और सह - अस्तित्व में । 

देखा जाये तो मूल धारणा तो यही है जीवन की इस पृथ्वी पर "नहीं है कहीं प्रेम का अस्तित्व , जो है बस है सह -अस्तित्व" बस हमने उसे तरह तरह के नाम और उपनाम देकर जीने का माध्यम भर बनाया है वरना क्षणभंगुरता ही शाश्वत है जब तब प्रेम अक्षुण्ण कैसे ? 

कपोल कल्पित कहानी के पात्रों को माध्यम बनाकर जीवन गुजारने का साधन मात्र है प्रेम की अवधारणा वरना तो जीवन चलता ही है सिर्फ़ सह - अस्तित्व की अवधारणा पर क्योंकि हम समाजिक प्राणी हैं और हमें जीने को एक साथ की जरूरत होती है, अपनेपन के अहसास की जरूरत होती है और उस जरूरत को हम प्रेम या प्यार का नाम दे देते हैं और एक जीवन जी लेते हैं मगर अंतिम पडाव पर जब ठगे से खडे होते हैं तब करते हैं विश्लेषण तब पाते हैं निष्कर्ष में यही कि जो था सिर्फ़ सह - अस्तित्व भर था , प्रेम तो किसी विषपात्र की तरह दुबका सहमा सिमटा सा वक्त के गर्त में कब का ज़मींदोज़ हो चुका था , गर वो प्रेम था तो !!!

शनिवार, 19 अप्रैल 2014

प्रेम एक अराधना

रात की लहरों पर चढती उतरती कोई अरदास 
प्रेम तो मानो तेरे मेरे होठों की कोई अबूझी प्यास 

दिन की नर्तन करती परछाइयों का कोई शहर 
प्रेम तो मानो तेरे मेरे प्रेम की कोई भटकी लहर 

भीगी रुत का कोई अनकहा गुनगुना अहसास 
प्रेम तो मानो आषाढ़ में बसंत का आभास 

रूप रंग से परे किसी खुदा का दीदार करता कोई दरवेश 
प्रेम तो मानो किसी मस्जिद से आती सुबह की पहली अजान 

जैसे खुश्बू को मुट्ठी में बाँधने की कोई जिद 
प्रेम तो मानो बच्चे की चाँद को पकड़ने की कोशिश 

रेशम के तागों से बुना इक ख्याल का कोई भरोसा 
प्रेम तो मानो तेरे मेरे अरमानों का कोई बोसा 

जलती आग की परछाइयों में हंसने का सुरूर 
प्रेम तो मानो तेरी मेरी मोहब्बत का कोई गुरूर 

इक साँस से निकलती आस की कोई आवाज़ 
प्रेम तो मानो सप्त सुरों पर बजता कोई साज