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गुरुवार, 28 अक्तूबर 2010

पर्दा हटा दिया.........

इक 
पर्दा लगाया 
आज तेरी 
यादों को 
ओट में 
रखने को
जब जी 
चाहे चली 
आती थीं
और हर 
ज़ख्म को
ताज़ा कर 
जाती थीं
मगर बेरहम
हवा ने 
यादो का ही
साथ दिया
जैसे ही 
आई यादें 
पर्दा 
हटा दिया
और
एक बार
फिर
हर ज़ख्म 
को झुलसा दिया

29 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

अक्सर ही हवाओं के ये थपेड़े यादों का ताज़ा कर जाते हैं..

बहुत ही ख़ूबसूरत रचना

उदास हैं हम ....

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

यादों का झोका प्रेम को नई दिशा में उदा ले जाता है और सब ज़ख्म हरे हो जाते हैं .. सुंदर रचना...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

ओह ..यह हवा भी कितनी बेरहम है ...यादों पर कोई पर्दा कभी टिका है ? सुन्दर अभिव्यक्ति

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

पर्दा
हटा दिया
और
एक बार
फिर
हर ज़ख्म
को झुलसा दिया
..
--
बहुत सुन्दर भावभरी रचना लिखी है आपने!
बधाई!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

पर्दा
हटा दिया
और
एक बार
फिर
हर ज़ख्म
को झुलसा दिया
..
--
बहुत सुन्दर भावभरी रचना लिखी है आपने!
बधाई!

राज भाटिय़ा ने कहा…

यादे ही इन जख्मो को हवा दे जाती हे, ताजा कर जाती हे, धन्यवाद

रश्मि प्रभा... ने कहा…

yaadon ka jhonka parde ki ot se bhi bahar aata hai aur ... jane kitni manahsthitiyaan de jata hai

Dr. Zakir Ali Rajnish ने कहा…

मन को छू गये आपके भाव।

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

pardanasheen!!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कुछ यादें मन झुलसाती है, कुछ मन हुलसाती हैं।

कुमार संतोष ने कहा…

वाह ! बहुत ही खूबसूरत रचना ! पुरवईया बयार सा प्रतीत हुआ !

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

bahut khoosurti se vandana ji aapne yaado ko beraham keh diya... bahut pyari kavita...

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

vandana ji aapki yah kavita aapke hi chachamanch par hai kal kee subeh... dhanyvaad

मनोज कुमार ने कहा…

ये तो होना ही था! आपने परदा ही तो खींच दिया था, खिड़की के कपाट तो खुले थे। और याद को बसा कर रखा था मन-आंगन में ....
एक पुराना मौसम लौटा, याद भरी पुरवाई भी,
ऐसा तो कम ही होता है वो भी हों, तनहाई भी।
यादों की बौछाड़ों से जब पलकें भीगने लगती हैं,
कितनी सौंधी लगती है, तब माझी की रुसबाई भी।

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बहुत सुन्दर भाव है आपकी रचना में !
-----------
क्यूँ झगडा होता है ?

वन्दना महतो ! (Bandana Mahto) ने कहा…

वक्त की हवा ऐसी ही होती है, जब चाहे चलने लगती है,सहेजे हुए यादों के पत्तें फिर से बिखरने लगते है,और कुछ जानी-सी महक उन पत्तों से निकलकर मन के चौखट लांघ कर आँखों से रिसने लगती है.


अच्छी रचना के लिए बधाई!

vins ने कहा…

bohot hi sundar... man ko chu gayi aapki rachna...

mridula pradhan ने कहा…

behad khoobsurat rachna.

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

वाह...बहुत सुन्दर रचना है.

अनुपमा पाठक ने कहा…

sundar rachna!
yaadein parde se kahaan rukti hain....

अनुपमा पाठक ने कहा…

sundar rachna!
yaadein parde se kahaan rukti hain....

Dorothy ने कहा…

हम सभी अपने स्मृतियों को खुद से भी छुपा कर पर्दे में रखना चाहते है पर अक्सर वक्त का झौंका जब उनको हल्के से भी स्पर्श कर जाता है और मन में फ़िर से उस अंधेरे में डूबे पीड़ा संसार को रोशनी के दहलीज पर ढकेल देता है. तब मन फ़िर से सब कुछ को भूल कर उस खट्टे मीठे संसार में डूबता उतराता रह जाता है. मन को गहराईयों तक जा कर छूने वाली एक खूबसूरत और भाव विभोर कर देने वाली प्रस्तुति. आभार.
सादर,
डोरोथी.

M VERMA ने कहा…

जख़्मों का क्या कब टीस उठा दे

Asha Lata Saxena ने कहा…

यादें समेटे एक सुंदर रचना |बधाई
आशा

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

वंदना जी .

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

आह! यादों ने हटाया ज़ख्मों का पर्दा। कम शब्दों में दिल को छूती अभिव्यक्ति।

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) ने कहा…

बेहतरीन।

सादर

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

बेदर्द सबा की साजिश है....

मेरा मन पंछी सा ने कहा…

heart touching poem....