ये कैसी उलझन है
जिसमें उलझती जाती हूँ
जितना सुलझाने की
कोशिश करुँ
फिर भी उलझती जाती हूँ
कभी ख़ुद को चाहने लगती हूँ
कभी किसी की चाहत लगती हूँ
पर फिर भी किसी की यादों के
दायरों में सिमटती जाती हूँ
कभी उसकी यादों में होती हूँ
कभी उसको याद करती हूँ
ये यादों के भंवर में
क्यूँ रोज उलझती जाती हूँ
कभी दिल की वादी में मिलती हूँ
कभी दिल के कँवल खिलाती हूँ
फिर इक-इक फूल को
किताबों में सहेजे जाती हूँ
कभी उससे बातें करती हूँ
कभी उसकी बातें सुनती हूँ
इस सुनने सुनाने की महफिल में
क्यूँ उसके दीदार को तरसती हूँ
हाय!ये कैसी उलझन है
जिसमें उलझती जाती हूँ
गुरुवार, 8 जनवरी 2009
बुधवार, 7 जनवरी 2009
मैंने उसका दिल तोड़ दिया
मैंने उसका दिल तोडा
जाने क्यूँ वो
अपना सा लगा
मगर फिर भी
उसकी कुछ बातों ने
मेरे अंतर्मन को
ठेस पहुंचाई
और न चाहते हुए भी
मैंने उसका दिल तोड़ दिया
जो नही कहना था
वो भी उसको कह दिया
ग़लत शायद वो भी न था
मगर शायद
मेरी ही शह ने उसे
वो कहने को मजबूर किया
जो मुझे सुनना पसंद नही
शायद वो मेरे अपनेपन को
अपना,अपनापन समझ बैठा
फिर उसी रौ में
न जाने क्या क्या कह गया
ख़ुद को कुछ दायरों में
बांधकर खुश रहने वाली मैं
मुझको इतना अपनापन
शायद रास न आया
और इसलिए शायद
मैंने उसका दिल तोड़ दिया
अभी हम शायद
इक दूजे को समझे नही
और इसी जल्दबाजी में
जाने क्या क्या कह गए
कुछ अनकही बातों के
अपने ही अर्थ निकाल लिए
फिर उन्हें यादों में
अपनी सजाने लगे
मगर मिलने पर
फिर एक दूसरे से
अपनी अपनी कह गए
न जानते हुए भी
कि दूसरा क्या चाहता है
शायद इसलिए
मैंने उसका दिल तोड़ दिया
जाने क्यूँ वो
अपना सा लगा
मगर फिर भी
उसकी कुछ बातों ने
मेरे अंतर्मन को
ठेस पहुंचाई
और न चाहते हुए भी
मैंने उसका दिल तोड़ दिया
जो नही कहना था
वो भी उसको कह दिया
ग़लत शायद वो भी न था
मगर शायद
मेरी ही शह ने उसे
वो कहने को मजबूर किया
जो मुझे सुनना पसंद नही
शायद वो मेरे अपनेपन को
अपना,अपनापन समझ बैठा
फिर उसी रौ में
न जाने क्या क्या कह गया
ख़ुद को कुछ दायरों में
बांधकर खुश रहने वाली मैं
मुझको इतना अपनापन
शायद रास न आया
और इसलिए शायद
मैंने उसका दिल तोड़ दिया
अभी हम शायद
इक दूजे को समझे नही
और इसी जल्दबाजी में
जाने क्या क्या कह गए
कुछ अनकही बातों के
अपने ही अर्थ निकाल लिए
फिर उन्हें यादों में
अपनी सजाने लगे
मगर मिलने पर
फिर एक दूसरे से
अपनी अपनी कह गए
न जानते हुए भी
कि दूसरा क्या चाहता है
शायद इसलिए
मैंने उसका दिल तोड़ दिया
जाने क्यूँ
जब कोई मुझे अपना कहता है
जाने क्यूँ भरम सा लगता है
हर प्यार भरा लफ्ज़ किसी का
जाने क्यूँ शूल सा चुभता है
जब रात की खामोशी बढती है
जाने क्यूँ अपनी सी लगती है
हर दिन यादों से भरा
जाने क्यूँ तन्हा सा लगता है
जाने क्यूँ भरम सा लगता है
हर प्यार भरा लफ्ज़ किसी का
जाने क्यूँ शूल सा चुभता है
जब रात की खामोशी बढती है
जाने क्यूँ अपनी सी लगती है
हर दिन यादों से भरा
जाने क्यूँ तन्हा सा लगता है
साया
मेरे साये ने कल मुझसे कहा
किसको खोजता फिरता है तू
इधर उधर
मैं तो तेरे साथ हूँ
यहाँ कोई नही है तेरा
बाहर अपना कोई नही
जो तुझे समझ सके
फिर क्यूँ ढूंढता फिरता है
तू इन परायों में अपनों को
जब मैं तो तेरे साथ हूँ
यहाँ जीवन दो दिन का मेला है
कोई न किसी का साथी है
इस परायी बस्ती में
सिर्फ़ अपना ही मिलता नही
जो है तेरा अपना
उसको तू अपनाता नही
जो है तेरे साथ हर पल
उसको तू पहचानता नही
क्या कभी कोई अपने
साये से जुदा हो पाया है
फिर क्यूँ तू
अपने साये को पुकारता नही
यहाँ सब छोड़ जायेंगे
कोई न साथ निभाएगा
एक तेरा साया ही
सिर्फ़ तेरे साथ जाएगा
फिर क्यूँ किसी को खोजता है
मैं तो तेरे साथ हूँ
किसको खोजता फिरता है तू
इधर उधर
मैं तो तेरे साथ हूँ
यहाँ कोई नही है तेरा
बाहर अपना कोई नही
जो तुझे समझ सके
फिर क्यूँ ढूंढता फिरता है
तू इन परायों में अपनों को
जब मैं तो तेरे साथ हूँ
यहाँ जीवन दो दिन का मेला है
कोई न किसी का साथी है
इस परायी बस्ती में
सिर्फ़ अपना ही मिलता नही
जो है तेरा अपना
उसको तू अपनाता नही
जो है तेरे साथ हर पल
उसको तू पहचानता नही
क्या कभी कोई अपने
साये से जुदा हो पाया है
फिर क्यूँ तू
अपने साये को पुकारता नही
यहाँ सब छोड़ जायेंगे
कोई न साथ निभाएगा
एक तेरा साया ही
सिर्फ़ तेरे साथ जाएगा
फिर क्यूँ किसी को खोजता है
मैं तो तेरे साथ हूँ
मंगलवार, 6 जनवरी 2009
मकबरा
दिल कि कब्रगाह में न जाने
कितनी कब्र दफ़न हैं
हर राह पर मौत से मिले हम
हर मोड़ पर मौत का
नया रूप देखा हमने
हर बार किसी न किसी
ख्वाब को दफ़न किया
हर कब्र पर ख़ुद ही
फूल चढाये हमने
हर कब्र पर इक
ज़ख्म बना हुआ है
अब तो दिल इक
मकबरा बन गया है
जहाँ इबादत होती है
उन यादों कि
जो वहां दफ़न कि हमने
कितनी कब्र दफ़न हैं
हर राह पर मौत से मिले हम
हर मोड़ पर मौत का
नया रूप देखा हमने
हर बार किसी न किसी
ख्वाब को दफ़न किया
हर कब्र पर ख़ुद ही
फूल चढाये हमने
हर कब्र पर इक
ज़ख्म बना हुआ है
अब तो दिल इक
मकबरा बन गया है
जहाँ इबादत होती है
उन यादों कि
जो वहां दफ़न कि हमने
बुधवार, 24 दिसंबर 2008
यादें
आजकल यादों के पन्ने फिर उखड़ने लगे हैं
हर पन्ने पर एक गहरी याद कुच्छ याद दिलाती है
हम इन यादों को फिर से जीने लगे हैं
आइना बन कर हर याद सामने आ जाती है
और हम इन यादों के समुन्दर में गोते खाने लगे हैं
दिल में यादों के भंवर हैं बड़े गहरे
हम तो इनमें फिर से डूबने लगे हैं
यादों को फिर से जीना इतना आसां नही होता
न जाने कितनी मौत मरकर जिया जाता है
हर पन्ने पर एक गहरी याद कुच्छ याद दिलाती है
हम इन यादों को फिर से जीने लगे हैं
आइना बन कर हर याद सामने आ जाती है
और हम इन यादों के समुन्दर में गोते खाने लगे हैं
दिल में यादों के भंवर हैं बड़े गहरे
हम तो इनमें फिर से डूबने लगे हैं
यादों को फिर से जीना इतना आसां नही होता
न जाने कितनी मौत मरकर जिया जाता है
मंगलवार, 23 दिसंबर 2008
राहुल गाँधी के नाम
आज के अख़बार हिंदुस्तान में मैंने एक ख़बर पढ़ी की राहुल गाँधी एक दलित सुनीता के घर गए उसके बच्चों के पास पहनने को कपड़े भी नही थे और पिता कपड़े इसलिए पह्न्ताथा ताकि बच्चे भूख से न मरें और वो कुछ काम कर ला सके .........मगर मैं कहती हूँ कि वो बच्चे यदि भूख से न भी मरे तो सर्दी से मर जायेंगे ,मुसीबत तो तब भी कम नही हुयी उनके सिर से.............मेरा दिल सुबह से उसी बारे में सोचे जा रहा है ...................क्या हम उनके लिए कुछ नही कर सकते .............आज हमारा देश nuclear पॉवर बन गया है मगर हमारी जनता आज भी वहीँ उसी नरक में जी रही है ...................क्या राहुल गाँधी ने इस मुद्दे को उठाया....................क्या उनके लिए कुछ किया...........हो सकता है किया हो मगर और भी न जाने कितनी सुनितायें और उनके बच्चे इससे भी बुरी हालत में जी रहे हैं.....................उनके लिए उन्होंने क्या सोचा...............................हो सकता है कुछ सोचा हो और करना चाहते हों मगर क्या जो वो करना चाहते हैं वो उन तक पहुँच पायेगा .............इसका कोई इंतजाम किया उन्होंने.......................मेरी एक राय है ................क्यूँ नही राहुल देश की हर माता बहन से एक अपील करते कि उन गरीबों के लिए कुच्छ सोचें ......................वैसी ही अपील जैसी अभी देल्ही विधानसभा चुनावों में हुयी थी की वोट देना जरूरी है वरना पप्पू कहलाओगे ....................टीवी के मध्यम से बिल्कुल उसी प्रकार जैसे वोटिंग के लिए की उनके लिए भी करें ............क्या गरीबी की रेखा से ऊपर रहने वाले लोगों में इतनी भी दया या vivek नही होगा की वो इस अपील को समझ पाएं ...................उदाहरण के लिए ..........अगर आज इतनी बड़ी आबादी में से कम से कम २०-२५ करोड़ लोग तो ऐसे होंगे ही जो इस पर ध्यान दें .............अगर उनसे कहा जाए हर घर एक कपड़ा अपने घर से उनके लिए दो जिन्हें इतना भी नसीब नही की वो तन ढँक सकें तो क्या कोई इस पर ध्यान नही देगा.......................हर इन्सान उनके लिए कुछ न कुछ करना चाहेगा और इससे करीबन इतने ही दलितों को एक छोटी सी सहायता से तन ढंकने को कपड़ा नसीब हो जाएगा..............हर गृहिणी उनके लिए कुछ न कुछ देना चाहेगी क्यूंकि हम अपने न जाने कितने ही कपड़े मन से उतर जाते हैं तो छोड़ देते हैं तो क्या एक पहल उनके लिए नही कर पाएंगे ..................राहुल आज के युवा हैं उनसे ये उम्मीद है की वो इस दर्द को समझते हैं और इस सब के लिए कुछ ऐसा करेंगे जिससे वो सब उन्ही को मिले जिनके लिए किया गया है न की आज के भ्रष्ट नेता या अफसर उसे हड़प लें .............एक अपील ऐसी एक बार अगर वो कर दें तो सारी जनता उनका साथ देने को तैयार हो जाए ..........बस एक कोशिश , एक पहल की जरूरत है...................तभी देश की असली तरक्की है ।
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क्यूँ
क्यूँ हर बार नारी को ही अग्निपरीक्षा देनी पड़ी
क्यूँ हर बार नारी के सर ही हर दोष मढा गया
क्यूँ हर बार उसके हर निर्णय का अपमान किया गया
क्यूँ हर बार पुरूष के दंभ का शिकार बनी
हर अच्छाई का श्रेय नर को ही क्यूँ
क्यूँ हर बुराई का ठीकरा हर बार
नारी के ही सर फोड़ा गया
क्या उसका कोई अस्तित्व नही
क्या वो कोई इन्सान नही
क्या फर्क है नारी और नर में
क्या नारी का यूँ तिरस्कार कर
पुरूष सफलता पायेगा
क्या इतने से ही उसका
पोरुष संबल पा जाएगा
जब शक्ति बिना शक्तिमान
कार्य नही कर पाता है
तो फिर बता ए नर
तू उससे तो बड़ा नही
क्यूँ समझ नही पता है
नारी बिना नर का भी अस्तित्व नही
क्यूँ हर बार नारी के सर ही हर दोष मढा गया
क्यूँ हर बार उसके हर निर्णय का अपमान किया गया
क्यूँ हर बार पुरूष के दंभ का शिकार बनी
हर अच्छाई का श्रेय नर को ही क्यूँ
क्यूँ हर बुराई का ठीकरा हर बार
नारी के ही सर फोड़ा गया
क्या उसका कोई अस्तित्व नही
क्या वो कोई इन्सान नही
क्या फर्क है नारी और नर में
क्या नारी का यूँ तिरस्कार कर
पुरूष सफलता पायेगा
क्या इतने से ही उसका
पोरुष संबल पा जाएगा
जब शक्ति बिना शक्तिमान
कार्य नही कर पाता है
तो फिर बता ए नर
तू उससे तो बड़ा नही
क्यूँ समझ नही पता है
नारी बिना नर का भी अस्तित्व नही
शुक्रवार, 19 दिसंबर 2008
आओ एक बार फिर से एक कोशिश करके देखें
तुम क्यूँ नही पढ़ पाए मेरा मन आज तक
मैं तो हर मोड़ पर सिर्फ़ तुम्हें ही देखती रही
तुम्हारे लिए जीती रही तुम्हारे लिए मरती रही
मन का सफर तय करना इतना मुश्किल तो न था
इतना वक्त साथ गुजारने के बाद ,उम्र के इस मोड़ पर
अब भी मैं वो ही हूँ फिर तुम क्यूँ बदल गए
मेरे मन में आज भी वहीँ उमंगें हैं
वही अरमान हैं,वही चाहतें हैं
तुमने उन्हें कहाँ दफ़न कर दिया
आज फिर से वो ही पल
हम क्यूँ नही जी पाते
माना वक्त सब कुछ बदल देता है
मगर मन तो हमारा वो ही रहता है
क्यूँ हम एक ही बिस्तर पर पास होकर भी
मन से दूर हुए जाते हैं
क्या ज़िन्दगी ऐसे ही जी जाती है
कब तक हम अपने अपने
विचारों में गुम एक दूसरे से दूर
अपनी अपनी सोचों में जिए जायेंगे
क्यूँ नही तुम मुझे पढ़ पाते हो
क्या मेरी सदाएं तुम तक पहुंच नही पाती हैं
या फिर तुम सब जानते हो
और तुम भी अपनी ही दुनिया में
कहीं खोये जाते हो
क्यूँ हम अब एक दूसरे से
अपने जज़्बात बाँट नही पाते हैं
क्या उम्र इसी तरह दगा देती है
मुझे पता है कि दोनों तरफ़
प्यार की कोई कमी नही है
फिर भी मन क्यूँ बंटते जा रहे हैं
हम तो दोनों दो जिस्म एक जान हैं
फिर कहाँ से आया ये तूफ़ान है
आओ इस तूफ़ान को मिटा दें
अपने मन को एक बार फिर से मिला लें
अपने अपने मन को एक दूसरे में कुछ ऐसे
डुबो दें कि फिर कोई तूफ़ान
इन्हें जुदा कर न सके
आओ एक बार फिर से
एक कोशिश करके देखें
एक बार फिर से
एक कोशिश करके देखें
मैं तो हर मोड़ पर सिर्फ़ तुम्हें ही देखती रही
तुम्हारे लिए जीती रही तुम्हारे लिए मरती रही
मन का सफर तय करना इतना मुश्किल तो न था
इतना वक्त साथ गुजारने के बाद ,उम्र के इस मोड़ पर
अब भी मैं वो ही हूँ फिर तुम क्यूँ बदल गए
मेरे मन में आज भी वहीँ उमंगें हैं
वही अरमान हैं,वही चाहतें हैं
तुमने उन्हें कहाँ दफ़न कर दिया
आज फिर से वो ही पल
हम क्यूँ नही जी पाते
माना वक्त सब कुछ बदल देता है
मगर मन तो हमारा वो ही रहता है
क्यूँ हम एक ही बिस्तर पर पास होकर भी
मन से दूर हुए जाते हैं
क्या ज़िन्दगी ऐसे ही जी जाती है
कब तक हम अपने अपने
विचारों में गुम एक दूसरे से दूर
अपनी अपनी सोचों में जिए जायेंगे
क्यूँ नही तुम मुझे पढ़ पाते हो
क्या मेरी सदाएं तुम तक पहुंच नही पाती हैं
या फिर तुम सब जानते हो
और तुम भी अपनी ही दुनिया में
कहीं खोये जाते हो
क्यूँ हम अब एक दूसरे से
अपने जज़्बात बाँट नही पाते हैं
क्या उम्र इसी तरह दगा देती है
मुझे पता है कि दोनों तरफ़
प्यार की कोई कमी नही है
फिर भी मन क्यूँ बंटते जा रहे हैं
हम तो दोनों दो जिस्म एक जान हैं
फिर कहाँ से आया ये तूफ़ान है
आओ इस तूफ़ान को मिटा दें
अपने मन को एक बार फिर से मिला लें
अपने अपने मन को एक दूसरे में कुछ ऐसे
डुबो दें कि फिर कोई तूफ़ान
इन्हें जुदा कर न सके
आओ एक बार फिर से
एक कोशिश करके देखें
एक बार फिर से
एक कोशिश करके देखें
बुधवार, 17 दिसंबर 2008
पत्थर
ता-उम्र पत्थरों को पूजा
पत्थरों को चाहा
ये जानते हुए भी
पत्थरों में दिल नही होता
पत्थरों के ख्वाब नही होते
पत्थरों में प्यार नही होता
कोई अहसास नही होता
पत्थरों को दर्द नही होता
कोई जज़्बात नही होते
फिर भी पत्थरों को ही
अपना खुदा बनाया
पत्थरों की चोट खा-खाकर
पत्थरों ने ही
हमको भी पत्थर बनाया
हर अहसास से परे
पत्थर सिर्फ़ पत्थर होते हैं
जो चोट के सिवा
कुछ नही देते
पत्थरों को चाहा
ये जानते हुए भी
पत्थरों में दिल नही होता
पत्थरों के ख्वाब नही होते
पत्थरों में प्यार नही होता
कोई अहसास नही होता
पत्थरों को दर्द नही होता
कोई जज़्बात नही होते
फिर भी पत्थरों को ही
अपना खुदा बनाया
पत्थरों की चोट खा-खाकर
पत्थरों ने ही
हमको भी पत्थर बनाया
हर अहसास से परे
पत्थर सिर्फ़ पत्थर होते हैं
जो चोट के सिवा
कुछ नही देते
मंगलवार, 16 दिसंबर 2008
रविवार, 14 दिसंबर 2008
मुझे मुझसे मिला गया कोई
दिल के सोये तारों को जगा गया कोई
मुझे मुझसे फिर मिला गया कोई
फिर एक बार तमन्ना है जगी
फिर एक बार महफिल है सजी
यादों को गुलजार कर गया कोई
दिल की हर धड़कन को भिगो गया कोई
सोये अरमानों को आइना दिखा गया कोई
कुछ इस तरह एक बार फिर
मुझे मुझसे मिला गया कोई
मुझे मुझसे फिर मिला गया कोई
फिर एक बार तमन्ना है जगी
फिर एक बार महफिल है सजी
यादों को गुलजार कर गया कोई
दिल की हर धड़कन को भिगो गया कोई
सोये अरमानों को आइना दिखा गया कोई
कुछ इस तरह एक बार फिर
मुझे मुझसे मिला गया कोई
शून्य से शून्य की ओर
शून्य से शून्य की ओर जाता ये जीवन
कभी न भर पाता ये शुन्य
पैसा, प्यार, दौलत ,शोहरत
कितना भी पा लो फिर भी
शून्यता जीवन की
कभी न भर पाती
हर पल एक भटकाव
कुछ पाने की लालसा
क्या इसी का नाम जीवन है
हर कदम पर एक शून्य
राह ताकता हुआ
शून्य स शुरू हुआ ये सफर
शून्य में सिमट जाता है
जीवन की रिक्तता
जीवन भर नही भरती
और हम
शून्य से चलते हुए
शून्य में सिमट जाते हैं
कभी न भर पाता ये शुन्य
पैसा, प्यार, दौलत ,शोहरत
कितना भी पा लो फिर भी
शून्यता जीवन की
कभी न भर पाती
हर पल एक भटकाव
कुछ पाने की लालसा
क्या इसी का नाम जीवन है
हर कदम पर एक शून्य
राह ताकता हुआ
शून्य स शुरू हुआ ये सफर
शून्य में सिमट जाता है
जीवन की रिक्तता
जीवन भर नही भरती
और हम
शून्य से चलते हुए
शून्य में सिमट जाते हैं
शुक्रवार, 12 दिसंबर 2008
फूल का दर्द
क्यूँ उदास है वो फूल बाग़ का,शायद किसी का इंतज़ार है उसे
क्यूँ खिलते हैं ये फूल बाग़ में,शायद किसी पथिक की थकन उतरने के लिए
ये देते हैं शांती आंखों को,दिए जाते हैं उपहार में
मगर किसी ने पूछा फूल से उसके उत्पन्न होने का सबब
यूँ तो लगते हैं सेहरे में भी फूल और चढाये जाते हैं अर्थी पर भी
पर क्या बीतती है उस लम्हा दिल पर फूल के
न जानना चाहा इसका सबब किसी ने
यूँ तो डाली से तोडा जाता है और फेंकने के बाद कुचला भी जाता है
क्या गुजरी,कितने ज़ख्म बने दिल पर फूल के,न समझ सका कोई
हर किसी ने निकला मतलब अपना अपना इससे
मगर न पूछा किसी ने की तुझे दर्द कहाँ है
रोते हैं ये फूल भी मगर न देखा रोना इनका किसी ने
अगर सुनना है फूलों का रुदन तो ख़ुद फूल बन जा
ये शायद खिलते और मुरझाते हैं दूसरों को सुकून देने के लिए
कर देते हैं अपनी ज़िन्दगी बलिदान खुशियों पे सभी की
अगर कुच्छ पाना या खोना है तो सिख फूलों से
जो लेते हैं गम और खोते हैं अपना रंग रूप
और फिर भी रहते हैं सदा मुस्कुराते
क्यूँ खिलते हैं ये फूल बाग़ में,शायद किसी पथिक की थकन उतरने के लिए
ये देते हैं शांती आंखों को,दिए जाते हैं उपहार में
मगर किसी ने पूछा फूल से उसके उत्पन्न होने का सबब
यूँ तो लगते हैं सेहरे में भी फूल और चढाये जाते हैं अर्थी पर भी
पर क्या बीतती है उस लम्हा दिल पर फूल के
न जानना चाहा इसका सबब किसी ने
यूँ तो डाली से तोडा जाता है और फेंकने के बाद कुचला भी जाता है
क्या गुजरी,कितने ज़ख्म बने दिल पर फूल के,न समझ सका कोई
हर किसी ने निकला मतलब अपना अपना इससे
मगर न पूछा किसी ने की तुझे दर्द कहाँ है
रोते हैं ये फूल भी मगर न देखा रोना इनका किसी ने
अगर सुनना है फूलों का रुदन तो ख़ुद फूल बन जा
ये शायद खिलते और मुरझाते हैं दूसरों को सुकून देने के लिए
कर देते हैं अपनी ज़िन्दगी बलिदान खुशियों पे सभी की
अगर कुच्छ पाना या खोना है तो सिख फूलों से
जो लेते हैं गम और खोते हैं अपना रंग रूप
और फिर भी रहते हैं सदा मुस्कुराते
मंगलवार, 9 दिसंबर 2008
किसी ने कुच्छ कहा नही
फिर भी हमने सुन लिया
बिना कहे भी बात होती है
उसको कभी देखा नही
फिर भी हमने देख लिया
बिना देखे भी मुलाक़ात होती है
कभी कभी किसी को जाने बिना
हम जान लेते हैं ,पहचान लेते हैं
कुच्छ ऐसे नाते होते हैं
जो कभी अपने नही होते
फिर भी अपने से लगते हैं
कुच्छ रूहों को
न देखने की न जानने की
न पहचानने की
न अपनेपन की जरूरत होती है
यह तो जन्मों के नाते होते हैं
जो दिलों से बंधे होते हैं
फिर भी हमने सुन लिया
बिना कहे भी बात होती है
उसको कभी देखा नही
फिर भी हमने देख लिया
बिना देखे भी मुलाक़ात होती है
कभी कभी किसी को जाने बिना
हम जान लेते हैं ,पहचान लेते हैं
कुच्छ ऐसे नाते होते हैं
जो कभी अपने नही होते
फिर भी अपने से लगते हैं
कुच्छ रूहों को
न देखने की न जानने की
न पहचानने की
न अपनेपन की जरूरत होती है
यह तो जन्मों के नाते होते हैं
जो दिलों से बंधे होते हैं
मंगलवार, 2 दिसंबर 2008
तलाश जारी है
तलाश जारी है
हर किसी की
न जाने किसे
ढूंढ रहे हैं सब
हर कोई
जब मिल जाता है
तब फिर एक बार
कुछ नया पाने की
चाहत में
तलाश शुरू करता है
फिर एक बार
एक अंतहीन
दिशा की ओर
चलने लगता है
और उसकी
यह तलाश
ता-उम्र जारी रहती है
किसी को खोजने
की तलाश
कुछ पाने की
तलाश
मगर
तलाश है कि
कभी ख़त्म नही होती
मृत्यु के उस पार भी
उसकी यह
तलाश जारी रहती है
जब तक
ख़ुद को नही पाता
तब तक
तलाश जारी रहती है
ख़ुद को
पाये बिना
कोई तलाश
पूरी नही होती
और तब तक
तलाश जारी रहती है
हर किसी की
न जाने किसे
ढूंढ रहे हैं सब
हर कोई
कुछ न कुछ
पाना चाहता हैजब मिल जाता है
तब फिर एक बार
कुछ नया पाने की
चाहत में
तलाश शुरू करता है
फिर एक बार
एक अंतहीन
दिशा की ओर
चलने लगता है
और उसकी
यह तलाश
ता-उम्र जारी रहती है
किसी को खोजने
की तलाश
कुछ पाने की
तलाश
मगर
तलाश है कि
कभी ख़त्म नही होती
मृत्यु के उस पार भी
उसकी यह
तलाश जारी रहती है
जब तक
ख़ुद को नही पाता
तब तक
तलाश जारी रहती है
ख़ुद को
पाये बिना
कोई तलाश
पूरी नही होती
और तब तक
तलाश जारी रहती है
शुक्रवार, 21 नवंबर 2008
कुच्छ तो कहें
किसी से तो कहें
दिल की बातें
यूँ ही हर किसी से
तो नही कही जाती
कुच्छ बातें
सिर्फ़ दिल से ही
की जाती हैं
कहने को तो
बहुत कुच्छ
होता है
मगर..........
किस से कहें
इसका जवाब ही
नही मिल पाता है
कुच्छ कहना
चाहकर भी
दिल कुच्छ
नही कह पाता है
इस बेबसी को सिर्फ़
वो दिल ही जान पाता है
जो कुच्छ कहने
और न कहने की
उलझन में
उलझता जाता है
किसी से तो कहें
दिल की बातें
यूँ ही हर किसी से
तो नही कही जाती
कुच्छ बातें
सिर्फ़ दिल से ही
की जाती हैं
कहने को तो
बहुत कुच्छ
होता है
मगर..........
किस से कहें
इसका जवाब ही
नही मिल पाता है
कुच्छ कहना
चाहकर भी
दिल कुच्छ
नही कह पाता है
इस बेबसी को सिर्फ़
वो दिल ही जान पाता है
जो कुच्छ कहने
और न कहने की
उलझन में
उलझता जाता है
शुक्रवार, 14 नवंबर 2008
खोज
मन की सुनसान राहों पर
कुछ खोजना चाहते हैं
किसी को पाना चाहते हैं
मगर
क्या यह डगर इतनी आसां हैं
क्या वो हमें मिलेगा
जिसे हम खोजने चले हैं
काश
इतना आसां होता ?
अपने अस्तित्व को मिटा कर
किसी को खोजा जाता हैं
ख़ुद को मिटा कर ही
ख़ुद को पाया जाता हैं
कुछ खोजना चाहते हैं
किसी को पाना चाहते हैं
मगर
क्या यह डगर इतनी आसां हैं
क्या वो हमें मिलेगा
जिसे हम खोजने चले हैं
काश
इतना आसां होता ?
अपने अस्तित्व को मिटा कर
किसी को खोजा जाता हैं
ख़ुद को मिटा कर ही
ख़ुद को पाया जाता हैं
मंगलवार, 4 नवंबर 2008
सपनों को पूरे होते देखना और उनके साथ जीना ,यह अहसास सिर्फ़ वो ही महसूस कर सकता है जिसने उनके साथ वो लम्हे बिताये हों। सच ज़िन्दगी में हर सपना पूरा होता है मगर अपने वक्त पर,वक्त से पहले नही । हम कभी कभी वक्त से पहले कुच्छ सपनों को पूरा करना चाहते हैं मगर ऐसा नही हो सकता क्यूंकि हर काम का इक वक्त होता है। ज़िन्दगी हर सपना पूरा करती है बस हमें ही सब्र नही होता। अगर हम में कुच्छ धैर्य हो तो क्या है वो चीज़ जिसे हम पा न सकें। अपने सपनो में तो हम ता-उम्र डूबते उतरते रहते हैं मगर जब वो पूरे होते हैं तो उस अहसास को हम चाहकर भी नही बाँट पाते क्यूंकि जिसकी चाहत होती है वो ही उसे समझ सकता है दूसरा कोई नही इसलिए सपने बाँट नही सकते और न ही उन्हें पाने की खुशी ।
इक सपना देखा था मैंने
हर पल आंखों में पलते
उस सपने को पंख भी दिए
परवाज़ भी दी उसे
अब सिर्फ़ एक हवा के झोंके की जरूरत थी
वो भी आया न मालूम कहाँ से
और वो सपना जो सपना था
वो हकीकत बन गया
इक सपना देखा था मैंने
हर पल आंखों में पलते
उस सपने को पंख भी दिए
परवाज़ भी दी उसे
अब सिर्फ़ एक हवा के झोंके की जरूरत थी
वो भी आया न मालूम कहाँ से
और वो सपना जो सपना था
वो हकीकत बन गया
शनिवार, 1 नवंबर 2008
जिसे खोजती हूँ गली गली
मुझी में छुपा है वो कहीं
यह जानती हूँ मगर
फिर भी उसे सामने
ला नही पाती
कैसे ढूँढूं ,किस्से पता मीले
कोई तो मिला दे मुझे
मेरे श्याम से
एक दर्श दिखा दे
नैना तरस रहे हैं
एक झलक को
कैसे मिलोगे
कुच्छ तो बताओ
कभी सपने में ही आ जाओ
कहाँ तुम्हें पाऊँ में
अब तो बता जाओ
जान पर बन रही है
मिलने की तड़प भारी है
कोई तो बताये कहाँ खोजूं
कैसे तुम्हें खोजूं
कहाँ मिलोगे
कब मिलोगे
कैसे मिलोगे
अब तो हार गई हूँ
अब आ के संभल लो
मुझी में छुपा है वो कहीं
यह जानती हूँ मगर
फिर भी उसे सामने
ला नही पाती
कैसे ढूँढूं ,किस्से पता मीले
कोई तो मिला दे मुझे
मेरे श्याम से
एक दर्श दिखा दे
नैना तरस रहे हैं
एक झलक को
कैसे मिलोगे
कुच्छ तो बताओ
कभी सपने में ही आ जाओ
कहाँ तुम्हें पाऊँ में
अब तो बता जाओ
जान पर बन रही है
मिलने की तड़प भारी है
कोई तो बताये कहाँ खोजूं
कैसे तुम्हें खोजूं
कहाँ मिलोगे
कब मिलोगे
कैसे मिलोगे
अब तो हार गई हूँ
अब आ के संभल लो
रविवार, 19 अक्टूबर 2008
सोमवार, 22 सितंबर 2008
कोई हो ऐसा
कभी कभी हम चाहते हैं कि
कोई हो ऐसा जो
हमारे रूह कि
अंतरतम गहराइयों में छिपी
हमारे मन कि हर
गहराई को जाने
कभी कभी हम चाहते हैं कि
कोई हो ऐसा जो
सिर्फ़ हमें चाहे
हमारे अन्दर छीपे
उस अंतर्मन को चाहे
जहाँ किसी कि पैठ न हो
कभी कभी हम चाहते हैं कि
कोई हो ऐसा जो
हमें जाने हमें पहचाने
हमारे हर दर्द को
हम तक पहुँचने से पहले
उसके हर अहसास से
गुजर जाए
कभी कभी हम चाहते हैं कि
कोई हो ऐसा जो
बिना कहे हमारी हर बात जाने
हर बात समझे
जहाँ शब्द भी खामोश हो जायें
सिर्फ़ वो सुने और समझे
इस मन के गहरे सागर में
उठती हर हिलोर को
हर तूफ़ान को
और बिना बोले
बिना कुच्छ कहे
वो हमें हम से चुरा ले
हमें हम से ज्यादा जान ले
हमें हम से ज्यादा चाहे
कभी कभी हम चाहते हैं
कोई हो ऐसा.......कोई हो ऐसा
कोई हो ऐसा जो
हमारे रूह कि
अंतरतम गहराइयों में छिपी
हमारे मन कि हर
गहराई को जाने
कभी कभी हम चाहते हैं कि
कोई हो ऐसा जो
सिर्फ़ हमें चाहे
हमारे अन्दर छीपे
उस अंतर्मन को चाहे
जहाँ किसी कि पैठ न हो
कभी कभी हम चाहते हैं कि
कोई हो ऐसा जो
हमें जाने हमें पहचाने
हमारे हर दर्द को
हम तक पहुँचने से पहले
उसके हर अहसास से
गुजर जाए
कभी कभी हम चाहते हैं कि
कोई हो ऐसा जो
बिना कहे हमारी हर बात जाने
हर बात समझे
जहाँ शब्द भी खामोश हो जायें
सिर्फ़ वो सुने और समझे
इस मन के गहरे सागर में
उठती हर हिलोर को
हर तूफ़ान को
और बिना बोले
बिना कुच्छ कहे
वो हमें हम से चुरा ले
हमें हम से ज्यादा जान ले
हमें हम से ज्यादा चाहे
कभी कभी हम चाहते हैं
कोई हो ऐसा.......कोई हो ऐसा
बुधवार, 17 सितंबर 2008
लाश का कोई अरमान नही होता
वो तो सिर्फ़ लाश है
उसे किसी का इंतज़ार नही होता
लाश में प्यार की प्यास नही होती
दर्द का अहसास नही होता
चेतना अवचेतना का ग्यान नही होता
जो अपने हैं उनका भान नही होता
कुच्छ बन गए हैं कुच्छ बन जायेंगे
हम लाश समान
एक सड़ती हुयी लाश को
कोई क्यूँ अपनाएगा
उससे हमदर्दी तो दूर
कोई पास भी न आएगा
इसी तरह इस लाश को ढोते ढोते
अपनों के अहसास से बहुत दूर
चले जायेंगे हम
वो तो सिर्फ़ लाश है
उसे किसी का इंतज़ार नही होता
लाश में प्यार की प्यास नही होती
दर्द का अहसास नही होता
चेतना अवचेतना का ग्यान नही होता
जो अपने हैं उनका भान नही होता
कुच्छ बन गए हैं कुच्छ बन जायेंगे
हम लाश समान
एक सड़ती हुयी लाश को
कोई क्यूँ अपनाएगा
उससे हमदर्दी तो दूर
कोई पास भी न आएगा
इसी तरह इस लाश को ढोते ढोते
अपनों के अहसास से बहुत दूर
चले जायेंगे हम
शुक्रवार, 12 सितंबर 2008
मेरे आँगन में न उतरी धूप कभी
तब कैसे जानूं उसकी रौशनी है क्या
न बुन सकी कभी तमन्नाओं के धागे
न जोड़ सकी यादों के तार कभी
न जला सकी प्यार के दिए कभी
इस डर से की अंधेरे और न बढ़ जायें
माना नही ठहरती धूप किसी भी आँगन में
मगर मेरे आँगन में तो धूप की एक
छोटी सी किरण भी न उतर सकी
भला कैसे जानूं मैं किस तरह
खिला करती है धूप आँगन में
तब कैसे जानूं उसकी रौशनी है क्या
न बुन सकी कभी तमन्नाओं के धागे
न जोड़ सकी यादों के तार कभी
न जला सकी प्यार के दिए कभी
इस डर से की अंधेरे और न बढ़ जायें
माना नही ठहरती धूप किसी भी आँगन में
मगर मेरे आँगन में तो धूप की एक
छोटी सी किरण भी न उतर सकी
भला कैसे जानूं मैं किस तरह
खिला करती है धूप आँगन में
मंगलवार, 9 सितंबर 2008
मेरी मुस्कराहट तो एक ऐसा दर्द है
जो छुपाये बनता न दिखाए बनता
हर तरफ़ ये तूफ़ान सा क्यूँ है
हर इन्सान परेशां सा क्यूँ है
हर जगह ये सन्नाटा सा क्यूँ है
ये शहर भी वीरान सा क्यूँ है
क्या फिर किसी का दिल टूटा है
क्या फिर कोई बाग़ उजड़ा है
क्या फिर किसी का प्यार रूठा है
क्या फिर कोई नया हादसा हुआ है
शायद फिर से खंडहर बन गया है कोई
या ग़मों के हर दौर से गुजर गया है कोई
जो छुपाये बनता न दिखाए बनता
हर तरफ़ ये तूफ़ान सा क्यूँ है
हर इन्सान परेशां सा क्यूँ है
हर जगह ये सन्नाटा सा क्यूँ है
ये शहर भी वीरान सा क्यूँ है
क्या फिर किसी का दिल टूटा है
क्या फिर कोई बाग़ उजड़ा है
क्या फिर किसी का प्यार रूठा है
क्या फिर कोई नया हादसा हुआ है
शायद फिर से खंडहर बन गया है कोई
या ग़मों के हर दौर से गुजर गया है कोई
हर सितम सहूंगी उसके ये इकरार करती हूँ
इसे बेबसी कहूं या क्या कहूं,क्यूंकि
मैं उससे प्यार करती हूँ
जो गम दिए हैं मेरे देवता ने
मैं उनका आदर करती हूँ
उस सौगात का अनादर नही कर सकती,क्यूंकि
मैं उनकी पूजा करती हूँ
पुजारिन हूँ तुम्हारी में
बस इतना चाहती हूँ
मेरे मन मन्दिर में मेरे देवता
हर पल हर दिन बसे रहना
नही मांगती तुमसे कुछ मैं
मुझसे पूजा का अधिकार न लेना
इसे बेबसी कहूं या क्या कहूं,क्यूंकि
मैं उससे प्यार करती हूँ
जो गम दिए हैं मेरे देवता ने
मैं उनका आदर करती हूँ
उस सौगात का अनादर नही कर सकती,क्यूंकि
मैं उनकी पूजा करती हूँ
पुजारिन हूँ तुम्हारी में
बस इतना चाहती हूँ
मेरे मन मन्दिर में मेरे देवता
हर पल हर दिन बसे रहना
नही मांगती तुमसे कुछ मैं
मुझसे पूजा का अधिकार न लेना
सोमवार, 8 सितंबर 2008
गुरुवार, 4 सितंबर 2008
लोग न जाने कैसे किसी के दिल में घर बना लेते हैं
हमें तो आज तलक वो दर -ओ-दीवार न मिली
लोग न जाने कैसे किसी के प्यार में जान गँवा देते हैं
हमें तो आज तलक उस प्यार का दीदार न मिला
लोग न जाने कैसे काँटों से दोस्ती कर लेते हैं
हमें तो आज तलक दर्द के सिवा कुच्छ भी न मिला
लोग न जाने कैसे जानकर भी अनजान बन जाते हैं
हमें तो आज तलक कोई अनजान भी न मिला
हमें तो आज तलक वो दर -ओ-दीवार न मिली
लोग न जाने कैसे किसी के प्यार में जान गँवा देते हैं
हमें तो आज तलक उस प्यार का दीदार न मिला
लोग न जाने कैसे काँटों से दोस्ती कर लेते हैं
हमें तो आज तलक दर्द के सिवा कुच्छ भी न मिला
लोग न जाने कैसे जानकर भी अनजान बन जाते हैं
हमें तो आज तलक कोई अनजान भी न मिला
बुधवार, 3 सितंबर 2008
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