रोने के भी क्या
अर्थ होते हैं ?
हाँ , शायद
एक रोना जब
दर्द हद से गुजरे तब
या कोई बच्चा रोये तब
या जब कोई अपना बिछुड़े तब
कभी विरह के
कभी ख़ुशी के
कभी गम के
अश्क उतरे जब भी
असर कर गए
मगर जब कोई
स्वार्थ में रोये तब
जब कोई दिखावटी रोये
तब शायद अर्थ बदल जाते हैं
न अश्क सच्चे होते हैं
न रोना अर्थपूर्ण
मगर असर वो भी
कर ही जाता है
शायद हकीकत से भी ज्यादा
आज दुनिया
दर्द की इन्तिहाँ
शोर में सुनती है
बिन ढलके जो
अश्क जज़्ब होते हैं
उस रोने का भी
क्या कोई अर्थ होता है?
ये दुनिया अपने
अर्थ बनाती है
अपनी कसौटी पर
परखती है और
जहाँ जितना दिखावा हो
उसे उतना ही
ग़मज़दा समझती है
शायद तभी आज
रोने के भी
अर्थ बदल गए हैं
