मैं
दर्द में घुली इक नज़्म बनी होती
हर हर्फ़ में दर्द की ताबीर होती
कुछ तो लहू- सा दर्द रिसा होता
हर्फों के पोर- पोर से तो
और हर पोर हरा बना होता
असीम अनुभूत वेदना का
साक्षात्कार किया होता
तो शायद दर्द भी
पनाह मांग बैठा होता
दर्द के आगोश में मैं क्या
दर्द ही मेरे आगोश में
सिमट गया होता
कुछ तो दर्द को भी
सुकून मिल गया होता
मेरे दर्द की जिंदा लाश पर
कुछ देर दर्द भी जी लिया होता
